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वक्त
कविता

वक्त

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वक्त चलता है दौड़ता है भागता है पर वक्त की परछाई तनहाई नहीं होती क्योंकि तनहाई में वक्त डरावना लगता है सदा मुस्कुराता हुआ आगे निकल जाता है कोई पकड़ पाता है और कोई नहीं पकड़ पाता इस वक्त हंसता हुआ आगे निकल जाता है पर वक्त तंहा नहीं होता कहीं करुणा रस बरसाता कहीं विभत्स तो कहीं आज आश्चर्य तो कहीं वक्त वीर रस में नहाया। मन दौड़ता है मनु को पीछे छोड़ने के लिए। परंतु विवेकी वक्त का मूल्य समझ ने वाले समय को अपनी मुट्ठी में बंद कर नीत नए अनवेषण कर आगे बढ़ता है वह वक्त को पकड़ने का प्रयास करता है की फिर कुछ नया कर सके तंहा ही वक्त का मुंह चिढ़ाती है सरिता सार के किनारे का वक्त भागते मैं गुनगुनाते हुए दुखी मन को आश्वस्त करता है वक्त कब रात की काली चादर होता है पता नहीं चल पाता दौड़ो भागो वक्त के ...
मेरी पसंद
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मेरी पसंद

रश्मि लता मिश्रा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** मुझे बातें पसंद हैं इंसान की न हिंदू की न मुसलमान की। कहो, रोटी, कपड़ा और मकान से क्या कभी कोई अलग है या पेट से पहले किसी की अन्य तलब है। खून का रंग भी तो लाल ही है फिर भी रात दिन भेद का ख्याल ही है। ये हरकत है किस नादान की मुझे बातें पसंद... न हवा बदलती,न सूर्य न चन्द्रमा फिर न जाने खुद को अलग मानने का है क्यों गुमां। भेद तो कभी धरती ने भी नही किया। वही एक भंडार भोजन सबको दिया। फिर बुद्धि क्यो फिरी बुद्धिमान की मुझे बातें पसन्द है,,,, न धर्म बुरा न मजहब बस भाषा का ही भेद है। अब तक भी न समझ सके यही तो खेद है। कहाँ ग्रन्थों ने करी है अनैतिकता की प्रशंशा किस धर्म ने जाहिर की भेद भाव की मंशा। धर्म के ठेकेदार करते क्यों बातें अंजान सी मुझे बातें पसंद है। परिचय :- रश्मि लता मिश्रा निवासी : बिलासप...
जब खत को लीखा
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जब खत को लीखा

मनमोहन पालीवाल कांकरोली, (राजस्थान) ******************** पहली बार जब खत को लीखा खत में तेरी मुहब्बत को लीखा खत में यारो मैने भी अपनी कहीं उन सब हकीकत को लीखा कट जाता है वक्त मेरा बातों मे मेरे उस उल्फ़त को लीखा याद है वो सब बातें तुम्हारी उन बातों की शरारत को लीखा पहले नज़र मीली तुमसे यहाॅ उसमे अपनो चाहत को लीखा इश्क़ खुदा की सौगात हैं यारों उस में मेरी इबादत को लीखा जब वक्त आया इज़हार का, राहों की कयामत को लीखा वो ख़त जब सरे आम हुआ था मैने दिल की आहत को लीखा खुदा के दर कबूल हुई दुआ मोहन आहसास- ए- इशरत को लीखा मेरी मंजिल मुकम्मल हुई "मोहन" ख़त मे अपनी किस्मत को लीखा परिचय :- मनमोहन पालीवाल पिता : नारायण लालजी जन्म : २७ मई १९६५ निवासी : कांकरोली, तह.- राजसमंद राजस्थान सम्प्रति : प्राध्यापक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता ...
स्त्री नियमो की सीमा को क्यों लांघ न पाए?
कविता

स्त्री नियमो की सीमा को क्यों लांघ न पाए?

गरिमा खंडेलवाल उदयपुर (राजस्थान) ******************** अतीत के विकृत संकल्पो, की मिथ्या परछाई ने, उन्नति के पथ पर रोडे अटकाए, जाने क्यों ? स्त्री थोथे नियमो की सीमा को लांघ ना पाए। ब्रह्मांड में जो कुछ भी चलायमान, उत्पत्ति निर्माण में स्त्री का योगदान उपलब्धियों पर हीन दृष्टि पाए जाने क्यों ? स्त्री अपनी शक्ति को, पहचान न पाए। शून्य जगत का हर कोना गति पाता स्त्री के तप से वही जगत से हेय दृष्टि पाए जाने क्यों ? स्त्री अभिमानियों के मिथ्या दम को मिटाना चाह ना पाए। नियम वर्जनाओ की बेड़ियों मे भी सृजन व पालन की ताकत, मानस पटल पर भय शंका बढ़ाएं, जाने क्यों ? स्त्री अपनी पीड़ा को, बतला न पाए। जग स्त्री उपलब्धियों को पचाना पाए, कमी निकालने से बाज ना आए, टूटता स्त्री मनोबल षड्यंत्रों में फंस जाएं, जाने क्यों ? स्त्री अपनी विवशता को समझ न पा...
नारी की व्यथा
कविता

नारी की व्यथा

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** हे पुरुष...! तेरी चौखट पे खड़ी सदियों से प्रतीक्षारत स्त्री हूंँ मैं...!!! खुद में रेशा रेशा पिरोती तुझे...! सांँस-सांँस में महसूसती तुम्हें...! धड़कन-धड़कन में समाती तुझे... ! खुद को कतरा-कतरा पिघलाती तुझमें... ! रोम-रोम से समर्पित तुझ पर! खुद को तेरी हर चाह पर न्योछावर करती...! रही न मैं! बन कर रह गई परछाई भर तेरी!! बस एक नन्हीं-सी चाह मार न सकी! और ताक रही तुझे एकटक... !! कब झरेगा झरने सा झर झर झर झर... तेरी दृष्टि से अनुराग सिर्फ मेरे लिए!!! परिचय : डॉ. पंकजवासिनी सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफेसर भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय निवासी : पटना (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, ल...
उपेक्षित उर्मिला
कविता

उपेक्षित उर्मिला

बृजेश कुमार सिंह करण्डा, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** साहित्य भरा पड़ा हुआ है बहुतों के व्यर्थ सम्मान से, आओ लेखनी को धन्य करें उपेक्षित उर्मिला के गान से..!! राम संग वन गमन हेतु तैयार हुए थे जब लक्ष्मण.. उर्मिला ने भी संग चलने का प्रस्ताव रखा था तत्क्षण.. माताओं-परिजनों को प्राणप्रिये तुम्हारी है बहुत जरूरत.. लक्ष्मण ने वन न जाने के लिए उर्मिला को कर लिया सहमत.. सुमित्रानंदन ने उर्मिला से यह ले लिया वचन.. भूलकर भी आंसू नहीं लाएंगे ये तेरे नयन.. अपने ही दुख में गर तुम डूबी रहोगी.. माताओं-परिजनों का ख्याल तब कैसे रखोगी.? बंध गया अगाध यौवन अशिथिलनीय प्रतिमान से.. आओ लेखनी को धन्य करें उपेक्षित उर्मिला के गान से..!! कितना शूलकारी रहा होगा नव विवाहिता के लिए वह छन, जब प्राणाधार जा रहे हो चौदह वर्षों के लिए वन.. वह महाविदाई का कठिन समय ...
कब से मदन रहा है सींच
कविता

कब से मदन रहा है सींच

माधवी मिश्रा (वली) लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** खिलते फूलों की खुशबू से महक रहा था मेरा मन चटक चाँदनी की किरणों से रश्मित था घर का आँगन जुही चमेली बेला गुढ़हल ओढ़े फूलों की चादर रात लजाती आई थी तू जग मग था सब अगर डगर चंदन की तब शोख महक ने कानो मे कुछ बोल दिया ज्यों भवरे की पंख ध्वनि ने बंशी का रस घोल दिया। कोमल कलियाँ फूल बन गयी थिरक रहीं सूरज के संग कमल कुमुदनी उठी उनींदी भूल गयीं रातो का रंग इंद्र धनुष की सतरंगी डोरी से जैसे बँधे हुए फूलो की अनगुथ वेड़ी ज्यों हो केशो मे सजे हुए आई थी मृदु विमल विभा सी रज्जु रथी तुम बन करके ज्यों हीरक तारावलियाँ उतरें भू पर छन कर के। सजा हुआ रति भवन सरीखा मंडप नभ के बीचों बीच फूलों सी नभ मन्जरियों को कब से मदन रहा है सींच। परिचय :- माधवी मिश्रा (वली) जन्म : ०२ मार्च पिता : चन्द्रशेखर मिश्रा पति ...
खुशी से मिली नई खुशी
संस्मरण

खुशी से मिली नई खुशी

मंजू लोढ़ा परेल मुंबई (महाराष्ट्र) ********************  घटना अप्रैल २०१९ की है मुंबई के अपर वर्ली इलाके मे स्थित आवासीय इमारत लोढा वर्ल्ड टॉवर्स मे जैनों के बारहवें तीर्थंकर, भगवान वासूपुज्य स्वामी के हमारे नए मंदिर का अंजनशलाका प्रतिष्ठा समारोह था, मंदिर में प्रभु की प्रतिमाओं का प्राण प्रतिष्ठा का समारोह था। यह चार दिवसीय कार्यक्रम बहुत धूमधाम से संपन्न हुआ। इस अंजन शलाका प्रतिष्ठा महोत्सव में होने वाले धार्मिक कार्यक्रम में मैं और मेरे पति मंगल प्रभात लोढ़ा जी ने परंपरा अनुसार प्रभु के माता-पिता का पात्र निभाया। हमारी बड़ी पोती यशवी उस प्रतिष्ठा समारोह में प्रियंवदा दासी का पात्र निभा रही थी। इसी दौरान यशवी से उसके दादाजी बोले- ‘यशवी, मैं और आपकी दादी प्रतिष्ठा महोत्सव में राजा रानी, प्रभु के माता-पिता का पात्र निभा रहे हैं, तो आप राजकुमारी यानी भगवान की बहन का पात्र निभा लो।" तो, उ...
भाई
कविता

भाई

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** भाई शब्द ही दुनिया में बहुत अनमोल हैं भाई छोटा हो या बड़ा पऱ बहन को हमेशा छोटा ही समझता हैं मेरी वो हिम्मत हैं मेरा वो सहरा हैं भाई मेरा मेरी जान से भी प्यारा हैं समय आने पऱ जो बहन से लड़ता हैं और बहन को कोई उफ़ तक कर दे तो पूरी दुनिया से लड़ता हैं मेरी वो हिम्मत हैं मेरा वो सहारा हैं भाई मेरा मेरी जान से भी प्यारा हैं खुद धूप खड़े बहन को छाँव देता हैं खुद कितनी भी मुसीबत में हो पऱ बहन के सामने हमेशा मुस्कुराता मेरी वो हिम्मत हैं मेरा वो सहारा हैं भाई मेरा मेरी जान से भी प्यारा हैं मेरा दुश्मन भी तू मेरा दोस्त भी तू मेरे लिए मुसीबत भी तू उसका हल भी तू भाई बहन से कभी नहीं नाराज होता हैं मेरी वो हिम्मत हैं मेरा वो सहारा हैं भाई मेरा मेरी जान से भी प्यारा हैं मुझ पऱ आती हैं मुसीबत तो वो संभाल लेता हैं पी...
प्यार का भूखा
बाल कहानियां

प्यार का भूखा

राजनारायण बोहरे इंदौर मध्य प्रदेश ******************** रिंकू को तेज बुखार था और वह बिस्तर पर अकेला रो रहा था। सुबह जब उसके पापा अपने दफ्तर जाते समय रोज की तरह रिंकू के कमरे में आये तो पापा से बड़े दबे से अंदाज में उसने कहा था- ’’पापा मुझे कल रात से बहुत तेज बुखार है। प्लीज आज आज आप घर पर रहिये न।’’ पापा ने हमेशा की तरह उसकी प्रार्थना को ठुकरा दिया था- ’’नो रिंकू, इस तरह कमजोर नहीं बनते। तुम्हें मजबूत बनना है- एकदम स्ट्रांग। ये छोटे मोटे बुखारों से भला क्या घबराना। आज मेरे ऑफिस में बहुत जरूरी मीटिंग है, इसलिये मैं घर पर नहीं रूक पाऊंगा।’’ ’’लेकिन पा ’’....कुछ कहने का प्रयास करते रिंकू की बात काटते पापा बोले थे- ’’मैंने फोन कर दिया है। डॉक्टर अंकल तुम्हें दवा दे जायेंगे। घर के दोनों नौकर तुम्हारी सेवा में पहले से ही तैनात हैं न।’’ यह कहकर पापा चले गये तो कम्बल में ...
रेडियो की बात निराली
आलेख

रेडियो की बात निराली

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** गीत की कल्पना, राग, संगीत के साथ गायन की मधुरता कानो में मिश्री घोलती साथ ही साथ मन को प्रभावित भी करती है। गीतों का इतिहास भी काफी पुराना है। रागों के जरिए दीप का जलना, मेघ का बरसना आदि किवदंतियां प्रचलित रही है, वही गीतों की राग, संगीत जरिए घराने भी बने है। गीतों का चलन तो आज भी बरक़रार है जिसके बिना फिल्में अधूरी सी लगती है। टीवी, सीडी, मोबाइल आइपॉड आदि अधूरे ही है। पहले गावं की चौपाल पर कंधे पर रेडियो टांगे लोग घूमते थे। घरों में महत्वपूर्ण स्थान का दर्जा प्राप्त था। कुछ घरों में टेबल पर या घर के आलीए में कपड़ा बिछाकर उस पर रेडियों फिर रेडियों के ऊपर भी कपड़ा ढकते थे जिस पर कशीदाकारी भी रहती थी। बिनाका-सिबाका गीत माला के श्रोता लोग दीवाने थे। रेडियों पर फरमाइश गीतों की दीवानगी होती जिससे कई प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रेम के तार आपस...
मुझे तो राधा ही रहने दो
कविता

मुझे तो राधा ही रहने दो

कीर्ति सिंह गौड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** क्या करूँगी मैं तुम्हारी रुक्मणी बनके मुझे तो बस राधा ही रहने दो। परमानंद है प्रेम की सम्पूर्णता में मुझे तो अंग तुम्हारा आधा ही रहने दो। जीवन का सच सिर्फ़ इतना सा है कान्हा इस जग में प्रेम के अलावा सब कुछ है, नहीं है दुःख मुझे आठों पहर संग रहने का इन संग के पहरों को भी तुम आधा ही रहने दो। समय कहाँ होगा रुक्मणी को, तुम्हारी बांसुरी को अपने अधरों पे धरने का। तुम्हारे कांधे पर झुका हुआ मेरा शीश और तुम्हारी बांसुरी को मेरे अधरों पर ही रहने दो। कान्हा, कभी बैठे हो कदम की छाया में रुक्मणी के संग उस कदम की छाया के नीचे संग हम दोनों का ही रहने दो। व्यस्त कर रखा है रुक्मणी को तुमने अपने घर संसार में, पहरों बैठकर जमना के तीर प्रतीक्षा का वो अधिकार भी मेरा ही रहने दो। “मुझे तो बस राधा ही रहने दो” “ओ‘कान्हा’म...
अपनों से प्रेम
कविता

अपनों से प्रेम

जयप्रकाश शर्मा जोधपुर (राजस्थान) ******************** अपनों से प्रेम कागज पर लिख देना प्रेम नहीं होता प्रेम ना लिखकर प्रेम का आभास कराकर प्रेम होता है जलती चिता में तो हर कोई लकड़ी देता है पर जीवित रहते अपनों से प्रेम करना यही प्रेम है प्रेम की अनुभूति ओर प्रेम का आभास यही प्रेम की भावना और प्रेम है परिचय :- जयप्रकाश शर्मा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु ...
जीवन का सच
कविता

जीवन का सच

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** इश्क़ की राह में हर एक इंसान बदनाम हैं...! कुछ खत लिखें तो कुछ अभी भी बेनाम हैं..!! खुशियों को तलाश रही, जिन्दगी गमों की बहार हैं...! हारना और जीतना यहीं तो जीवन का सार हैं..!! जिम्मेदारियों ने उस नन्ही सी मासूमियत को घेरा है...! एक गलती से टूट गया वो संबंध, उसनें कहा ये तेरा है ये मेरा हैं..! किसी की यादों में ये आँखें भी बरसती हैं...! प्यास लगने पर ये धरती भी बारिश के लिए तरसती हैं..!! दुनिया कहें समय को यहीं सबसे बड़ा काल हैं...! कहती है कुछ रातें अंधेरों से, इंसान ही इंसान के लिए बना रहा जाल हैं..!! परिचय :- कु. आरती सुधाकर सिरसाट निवासी : ग्राम गुलई, बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविता...
सैंया
कविता

सैंया

मधु अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** प्लेन में बिठा दे सैंया, लंदन पेरिस न्यूयॉर्क घुमा दे सैंया। डाल गल बहियां, घूमेंगे हम सैंया, कभी झुमका, कभी मुंदरी, नेकलेस से अब बात बने ना। हवाई जहाज में सैर करा दे सैंया। वादा तो तू करता है, ओ मेरे सपनों की रानी। मेरा घर चलाने वाली, बच्चों की ओ मैया प्यारी। घुमा दूं! तुझे इस साल नहीं ? मैं अगले साल दुनिया सारी, लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क, सभी की सैर करा दूंगा। अभी तो तू दिल्ली घूम ले रानी, काम चला ले इससे महारानी। दिला दूं तुझको, ब्रासलेट, कंगना, टीका, बिंदी, पायल, झुमका प्लेन में भी बिठा दूंगा वादा रहा इस साल नहीं तो अगले साल ओ मेरी राम प्यारी।। परिचय :- मधु अरोड़ा पति : स्वर्गीय पंकज अरोड़ा निवासी : शाहदरा (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक ह...
ये शब्द आईने है
कविता

ये शब्द आईने है

प्रीति जैन इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** शब्द मन के अमिट भावों का दर्पण शब्द ही करते बयां, भावनाओं का स्पंदन शब्दों से मिले नफरत, शब्दों से मिले सम्मान ये शब्द आईने है, किरदार करते हैं बयान शब्दों का कारवां अंतहीन, शब्द रंगभरे और रंगहीन फूलों सी खुशबू दे या कांटों भरे ज़ख्म दे संगीन करते हैं दिल भी छलनी या देते खुशियों भरा जहान ये शब्द आईने है, किरदार करते हैं बयान कुछ शब्द आंसू बनकर दिल में उतरते हैं कुछ शब्द कानों में घोले सरगम, कुछ नश्तर से चुभते हैं शब्दों की अदावरी से, दिल में बसे या दिल से उतरे इंसान ये शब्द आईने हैं, किरदार करते हैं बयान अपने हर शब्द का खुद तुम आईना बनो दिल न हो छलनी किसी का, ऐसे शब्दों को चुनो शब्द ही जीवन रेखा संबंधों की, बोलो तुम मीठी जुबान ये शब्द आईने है, किरदार करते हैं बयान मुझे गर्त में ले जाने वाले, स...
दया करदो अब तो करतार
गीत

दया करदो अब तो करतार

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दया करदो अब तो करतार। घिरा है संकट में संसार। हुई है सारी धरती त्रस्त। नहीं है कौन आपदाग्रस्त। मचा है जग में हाहाकार। घिरा है संकट में संसार। विनाशक है कोरोना रोग। गए जग से हैं लाखों लोग। हो रहा अगणित का उपचार। घिरा है संकट में संसार। पुरुष-नारी, बच्चे या वृद्ध। रोगवश हैं सब घर में बद्ध। प्रभावित हुए सभी परिवार। घिरा है संकट में संसार। दुकानें कर्फ्यू में हैं बन्द। हुई गतिविधियाँ हैं अब मन्द। बन्द हो गए सभी व्यापार। घिरा है संकट में संसार। ज्ञान-शिक्षा की संस्थाएँ। कौन जाने कब खुल पाएँ। हृदय में आते विविध विचार। घिरा है संकट में संसार। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्...
उम्मीद
कविता

उम्मीद

डॉ. मोहन लाल अरोड़ा ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) ******************** फिर खिले अमन चमन अगन मगन हो हर वीर कांधे न हो आक्सीजन बच्चे बिन बैग अधीर गली गली हो वैन स्कूल एंबुलैंस ना दिखे तीर सब दुकाने कतारे दवाखाने ना भीड़ काढा ना चाय चुस्की हो अच्छी तकदीर बेख़ौफ सभी घुमे संग रहे तदबीर फिर से खिले चमन सुरम्य हिंद तस्वीर फिर से भारत माटी हो चंदन और अबीर टैरेस न मंदिर में दादी चढावे नीर हाथ ना कैरम लुडो बच्चे बिन बैट अधीर सन्नाटो से पिंड छुटे हो चहल पहल भीड़ सारी पाबंद हट जाए मन हो सकल अधीर हिल मिल कर सब रहे गाँव शहर घर वीर तज सपन बीते बुरे नैना खुशी नीर फिर से खिले चमन सुरम्य हिंद तस्वीर फिर से भारत माटी हो चंदन और अबीर परिचय :- डॉ. मोहन लाल अरोड़ा कवि लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता निवासी : ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) प्रकाशन : ३ उपन्यास, ७२ कविता, ७ लघु कथा १२ सांझा क...
उदास फूल
कहानी

उदास फूल

पारस परिहार मेडक कल्ला ******************** वह मुझे देख रहा था और मैं उसे... लेकिन... लेकिन... हम दोनों में से किसी ने भी कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं की। ये माजरा करीब आधे घंटे तक यू ही चलता रहा। आखिरकर...मैं समझ गया कि गलती मेरी ही थी क्योंकि उसको अपना जीवन समाप्त किए पूरे बारह महीने हो चुके थे, सो कैसे बोलता और मैं तो एक जिंदा इंसान था पूछना तो मुझे चाहिए था। फिर एकाएक स्मरण हो आया कि किससे पूछूं वह तो बोलता ही नहीं था। उसको एक दुकानदार नए वर्ष की नई तारीख को तोड़कर लाया था और नए वर्ष की नई तारीख को ही बाहर फेंका गया था। भाग्यवश...मै भी उसी दिन उस दुकान पर पहुंच गया। वह फूल मुझे उदास भाव से अपनी आंखों से देख रहा था। मानो कह रहा हो जब मैं डाली पर था तब सुंदर लग रहा था, वहां मेरी इज्जत थी, लोग मुझे बड़े आदर से देखते थे, हर रोज मुझे पानी दिया जाता था और वही लोग आज मुझे अपने पैरों क...
आई याद जो तेरी
कविता

आई याद जो तेरी

दिनेश कुमार किनकर पांढुर्ना, छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) ******************** आई याद जो तेरी! लगाई हृदय ने फिर, सुधि डगर की फेरी! अहे प्रीत गात की गंध, नवपुष्प की ज्यों सुगंध, मानो आ गया वसंत, सुमुखि तुम रति की चेरी!.. जबसे तुम मुझको भाई, मन ने प्रीत की टेर लगाई, तुमने सारी प्यास बुझाई, प्रिये, तुम रूप की चितेरी!.. मन मेरा था कोरा दर्पण, किया तुमने प्रेम समर्पण, प्रेम क्या है तर्पण अर्पण, तुम मिलन की शाम घनेरी... लगाई हृदय ने फिर, सुधि डगर की फेरी! आयी याद जो तेरी! परिचय -  दिनेश कुमार किनकर निवासी : पांढुर्ना, जिला-छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र :  मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, र...
विरासत
लघुकथा

विरासत

मंजिरी "निधि" बडौदा (गुजरात) ******************** आज स्कूल में निबंध प्रतियोगिता रखी गईं थी। विषय था आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं और क्यों? समाप्ति के पश्चात निर्णायक महोदया सभी निबंधों को पढ़ बहुत प्रसन्न हुईं। बच्चों ने क्या बनना हैं और क्यों बहोत ही अच्छे तरीके से उदाहरण के साथ लिखा था। ज्यादातर बच्चों ने विदेश जाकर डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर बनना ही लिखा था और कारण भी करीब करीब एक जैसे ही थे। परन्तु भैरवी और रेवा का निबंध पढ़ कर दिल खुश हो गया था। भैरवी को भरतनाट्यम कीे नृत्यॉगना बनने की चाह थी क्यूंकि उसे अपनी दादी की भारतीय नृत्य की विरासत को आगे बढ़ाने की इच्छा थी और रेवा को भारतीय योग गुरु बनने की चाह। उसे भारत की योग पद्धति की विरासत का विश्व भर में परचम लहराना था। दोनों की वजह पढ़कर निर्णयक महोदया ने उनको प्रथम पुरस्कार दिया और बच्चों को अपने देश की विरासत कोे सहेजने का संद...
कभी तुम पाँव चलना सीख लोगे
ग़ज़ल

कभी तुम पाँव चलना सीख लोगे

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कभी तुम पाँव चलना सीख लोगे। गिरोगे तो सम्भलना सीख लोगे। मिलेगा हौसला इन गल्तियों से, घिरोगे तो निकलना सीख लोगे। जुबाँ तक आई कोई बात वैसी, कहोगे तो बदलना सीख लोगे। कभी पानी से थोड़ा बर्फ़ में तुम, जमोगे तो पिघलना सीख लोगे। चकोरों की शिकायत चाँदनी से, सुनोगे तो मचलना सीख लोगे। जो संगेमरमरी पर हाथ अपना, रखोगे तो फिसलना सीख लोगे। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां...
जिंदा रहे यादें
कविता

जिंदा रहे यादें

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** मेरी आँखों में क्यों तुम आँसू बनकर आ जाते हो। और अपनी याद मुझे आँखों से करवाते हो। मेरे गमो को आँसुओं के द्वारा निकलवा देते हो। और खुशी की लहर का अहसास करवा देते हो।। मुझे गमो में रहने और उनमें जीने की आदत है। पर हँसते हुए लोगों को दुआएँ देना मेरी आदत है। तुम रहो सदा खुशाल अपनी नई जिंदगी में। मैं तुम्हें खुश देखकर अपने गम भूल जाती हूँ।। बदलते हुये इस जमाने में कुछ तो नया होना चाहिए। अपनी मोहब्बत का अहसास दूर होकर भी होना चाहिए। भले ही उन्हें मोहब्बत का अहसास आज न हो । पर जमाने की नजरो में तो इसे जिंदा रहनी चाहिए।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में ...
गृहस्थाश्रम में पत्नी
आलेख

गृहस्थाश्रम में पत्नी

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर दिल्ली ******************** मनुष्य ब्रह्मचर्याश्रम के बाद विवाह संस्कार करके गृहस्थाश्रम मेंं प्रवेश करता है, गृहस्थी के लिए पत्नी मात्र कामपूर्ति के उद्देश्य से नहीं है, अपितु यह मानव को सभ्य सुसंस्कृत व संस्कारवान बनाती है। यदि यह विवाह संस्कार नहीं होता तो मानव समाज में-माँ, बहन, बेटी आदि पहचानने की शक्ति नहीं होती। सृष्टिकर्ता के दांए स्कंध से पुरुष और बांए स्कंध से स्त्री की उत्पत्ति होने के कारण स्त्री को वामांगी कहा जाता है, अतेव शादी के बाद उसे पति के बांई ओर बैठाने की परंपरा है। धर्मग्रंथों में पत्नी को पति का आधा अंग कहा जाता है उसमें भी उसे वामांगी कहा जाता है, अर्थात वह पति का बांंयां भाग है, शरीर विज्ञान और ज्योतिष विज्ञान ने भी पुरुष के दांए व स्त्री के बांए भाग को शुभ माना है। मनुष्य के शरीर का वांया हिस्सा खासतौर पर मस्तिष्क की रचनात्मकता का प...
मां शबरी चालीसा
दोहा

मां शबरी चालीसा

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* भक्ति शिरोमणि मातु है, शबरी सुंदर नाम। रामनाम सुमिरन किया, पाया बैकुंठ धाम।। सीधी साधी भोली-भाली। दंडक वन में रहने वाली।।१ सबर भील की राजकुमारी। करुणा क्षमा शीलाचारी।।२ बेटी श्रमणा सबकी प्यारी। सुंदर रूपा बढ़ व्यवहारी।।३ बीता बचपन भइ तरुणाई। समय देख कर भई सगाई।।४ फिर पिता ने ब्याह रचाये। जाति भाई सभी बुलाये।।५ मंडप बंदन खूब सजाये। बेलें बूटे फूल लगाए।।६ नगर गांव में बजी बधाई। नाचे गावे लोग लुगाई।।७ समझ पाए बरात बुलाई। बूढ़े बालक सबमिल आई।।८ भोज रसोई मेढा़ लाई। दृष्य देख शबरी घबराई।।९ करुणा से आंखे भर आई। उपाय कोई समझ न पाई।।१० सौ जीवों की जान बचायें। कोई बात सुझा ना पाये।।११ मंडप छोड़ा शबरी भागी। प्रभु की भक्ती मन में लागी।१२ गुरु मतंग के आश्रम आई। चरण छुए फिर आशीष पाई।।१३ श्र...