जिन्दगी की धूप
मनोरमा पंत
महू जिला इंदौर म.प्र.
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जिन्दगी में धूप कभी आई नहीं,
जिंदगी हमेशा कुहरे से ढकी रही
कितना चाहा, कोहरा चीर निकल जाऊँ
ऊपर जा सूरज को ही पकड़ लाऊँ,
पर चाहने भर से क्या होता है,
चाहने भर से क्या सब मिलता है?
तेरी यादें परछाई बन चलती है
कोहरे के कारण छिपी रहती हैं,
कुछ पत्थर बन अडिग रही,
कुछ नश्तर बन दिल गड़ती रही
न जाने कब ये कुहरा छूटेगा,
धूप का एक टुकड़ा मुझे मिलेगा
परिचय :- श्रीमती मनोरमा पंत
सेवानिवृत : शिक्षिका, केन्द्रीय विद्यालय भोपाल
निवासी : महू जिला इंदौर
सदस्या : लेखिका संघ भोपाल जागरण, कर्मवीर, तथा अक्षरा में प्रकाशित लघुकथा, लेख तथा कविताऐ
उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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