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जिंदगी के रंग
कविता

जिंदगी के रंग

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** कोई रंग भरने, जीवन में तेरे, बाहर से नहीं आएगा। तेरे जीवन में रंग, तो .........तेरे ही भरने से आएगा। कोई रंग भरने, जीवन में तेरे, बाहर से नहीं आएगा। किस सोच में .......हो। कोई बांध के, रंगों को सारे, इंद्रधनुष.....! तेरे हाथ में थमा जाएगा। जिंदगी को तेरी, रंगों से रंगीन, वह कर जाएगा। कोई रंग भरने, जीवन में तेरे, बाहर से नहीं आएगा। हकीकत के, उन बदरंग दागों से लड़। तू अपनी...... हिम्मत से, जिंदगी में रंग नये ... जब तक ना भर पाएगा। दुनिया के, रंगों के इंतजार में, बंदरंग तू हो जाएगा। कोई रंग भरने, जीवन में तेरे, बाहर से नहीं आएगा। तेरे जीवन में असल रंग तो, तेरे भरने से ही आएगा। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौल...
दयाभाव
कविता

दयाभाव

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.) ******************** चिलचिलाती धूप में राष्ट्रीय राजमार्ग पर दुर्घटना ग्रस्त बाइक सवार को देख पहले तो मैं घबड़ाया, फिर हिम्मत करके अपनी बाइक को किनारे लगाया। घायल युवक के पास गया, उसकी हालत देख मैं काँप गया, फिर वहाँ से भाग निकलने का विचार किया। परंतु दया भाव से मजबूर हो गया। अब आते-जाते लोगों से मदद की उम्मीद में सड़क पर आते-जाते लोगों से दया की भीख माँगने लगा। बमुश्किल एक अधेड़ सा व्यक्ति आखिर रुक ही गया, मेरी उम्मीदों को जैसे पंख लग गया। मैंने हाथ जोड़ मदद की गुहार की, मेरी बात उसे बड़ी नागवार लगी। उसने समझाया लफड़े में न पड़ भाया, तू बड़ा भोला दिखता है फिर लफड़े में क्यों पड़ता है? ऐसा कर तू भी जल्दी से निकल ले पुलिस के लफड़े से बच ले। ये तेरा सगेवाला नहीं है मरता है तो मरने दो दया धर्म का ठेकेदार न बन, तुम्हारे दया धर्म के चक्कर में वो मर गया...
प्रीति चित्रण
कविता, डायरी

प्रीति चित्रण

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** मौन धारण कर वचन मेरे, लज्जा आए प्रीत मेरे। मगन प्रेम सांसे सत्य ही है, शब्द अनुराग है मेरे।। दुखद: प्रेम सदियों से चला आया। माया, लोभ ने विवश बनाया।। कामुक कल्पनाएं प्रेम सजाए, विनम्र प्रेम जगत सौंदर्य दिखाएं। प्रीति, प्यार अनोखा चित्रण मन को भाता यह बोध विधान।। बजता प्रेम का है यह अलौकिक संदर्भ जगत में। देखो सजना सजे हैं हम प्रेम इन जीवन अब हाट पे।। स्वर का विश्वास नहीं, देखो माया संसार में। वाणी के बाजे भी अब तो, टूट गए हैं आस में।। प्याला मदिरा का मनमोहक दृश्य लगे जीवन आधार में। बिखरे हैं यह सज्जन देखो, टुकड़े-टुकड़े कांच जैसे कांच के।। कलयुग में सजती है स्वर्ण कि यह लंका। ताम्र भाती प्रेम बना है, प्रेम यह संसार में।। मैं चला हूं उस पथ पर अग्रसर कटु सत्य वचन से। मिथ्य वाणी ना बो...
होली का रंग
कविता

होली का रंग

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** तुम्हें कैसे रंग लगाएं, और कैसे होली मनाएं? दिल कहता है होली, एक-दूजे के दिलों में खेलो क्योंकि बहार का रंग तो, पानी से धुल जाता है पर दिल का रंग दिल पर, सदा के लिए चढ़ा जाता है॥ प्रेम-मोहब्बत से भरा, ये रंगों का त्यौहार है। जिसमें राधा कृष्ण का, स्नेह प्यार बेशुमार है। जिन्होंने स्नेह प्यार की, अनोखी मिसाल दी है। और रंग लगा कर, दिलों की कड़वाहट मिटाते हैं॥ होली आपसी भाईचारे, और प्रेमभाव को दर्शाती है। और सात रंगों की फुहार से, सात फेरों का रिश्ता निभाती है। साथ ही ऊँच-नीच का, भेदभाव मिटाती है। और लोगों के हृदय में, भाईचारे का रंग चढ़ाती है॥ परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इ...
फागुन आया
गीत

फागुन आया

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** फागुन आया होली आई ढोल बजाओ मांडल रे आंगन-आंगन बजी बधाई देहरी पहने पायल रे, पायल रे फागुन आया होली आई ढोल बजाओ मांदल रे यौवन सजे सजे हर द्वारें पायल नूपुर बाजे रे गेहू वाली लेकर आती खनखन करती करती चूड़ियां रे फागुन आया होली आई ढोल बजाओ मांदल रे रंगा गुलाल संघ मचल रही है हरि पीली आंचल चांदनी ताल-ताल पर नाच रही है मेरे मन की रागिनी रवि किरणे भी घोल रही है सतरंगी केसरिया रंग रे फागुन आया होली आई ढोल बजाओ मांडल रे टेसु-टेसु रंग केसरिया पाखी-पाखी झूम मेरे घर आंगन में सजी सावरी ढाणी चुनरिया ओढेरे पीली-पीली सरसों पर मान मतवाला डोले रे फागुन आया होली आई बोल बजाओ मांडल रे प्रातः संध्या अवनी अंबर अभी राकेश एरिया खेले रे आज नहीं है देव्श कहीं भी अनुराग मानव भरे रे फागुन फाग सजे मतवाले मत वालों की टोली रे फागुन आया होली आई ढोल बजाओ मादल रे ...
रंग-रंग के रंग
कविता

रंग-रंग के रंग

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** रंग-रंग के रंग खिले लाल हरे नीले पीले जीवन उल्लास रे आनंद घट पीले आनंद घट पीले झूम रहा टेसू है झूम रहा अमलतास है गुलमोहर की छांव में बीत रहा मधुमास है क्षण क्षण भंगुर यहाँ क्षण क्षण को जीले आनंद घट पीले आनंद घट पीले। रंग आकाश का रंग प्रकाश का रंग माटी का पवन के रंग में घुला रंग सलिल का जीवन का हर तल छूले आनंद घट पीले आंनद घट पीले आमोद है प्रमोद है रसरंग से भरी भरी प्रकृति की गोद है ऋतुएँ सीखा रही सप्तसुरो के भेद है गा गीत प्रेम के लगा सभी को गले आनंद घट पीले आनंद घट पीले ह्रदय के आलोक में बरसा प्रेम त्रिलोक में जन्म हो सार्थक तेरा जन हो समर्थक तेरा जीवन ऐसा जीले आनंद घट पीले आनंद घट पीले रंग रंग के रंग खिले लाल हरे नीले पीले। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्...
होली गीत
गीत

होली गीत

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** नित नूतन परिधान पहनकर, सृजित करे रंगोली है। प्रकृति सतत अनुपम विधियों से, खेल रही शुभ होली है। सूरज की सोने-सी किरणें, चारु चाँदनी रजत लगे। विस्मित विस्फारित नयनों को, नैसर्गिक सौंदर्य ठगे। कभी तिमिर तो कभी उजाला, अद्भुत आँख मिचोली है। प्रकृति सतत अनुपम विधियों से, खेल रही शुभ होली है। इन्द्रधनुष सातों रंगों से, अपनी शोभा बिखराए। रंग नहीं कम अंबर में भी, धरती को यह दिखलाए। बादल गरजें, बिजली चमकें, वर्षा करे ठिठोली है। प्रकृति सतत अनुपम विधियों से, खेल रही नित होली है। कानन में फूले पलाश हैं, उपवन-उपवन सुमन खिले। खेतों में सरसों है पीली, नए-नए पत्ते निकले। मनमोही व्यापक होली से, सबकी काया डोली है। प्रकृति सतत अनुपम विधियों से, खेल रही शुभ होली है। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्...
गुलाबी गुलाल
कविता

गुलाबी गुलाल

विकाश बैनीवाल मुन्सरी, हनुमानगढ़ (राजस्थान) ******************** गुलाबी गुलाल लगाए, हाथ जो भी लग जाए। गुड़िया के लगा रंग, देखो मुन्ना खूब हर्षाए। प्रफुल्लीत हुए तन-मन, आज दिल बड़ा प्रसन्न। झाँझर चमके गोरी के, बंगड़ी बजे खन्न-खन्न। ओ यारों की टोली सजी, लगी महफिल की अर्जी। भांग पीकर मस्ती हुए है, चलाते सब अपनी मर्जी। पिचकारी फव्वार चली, रंगो-रंग हुई गली-गली। घर लौट आए अब सब, जब दोपहर-शाम ढली। दरवाज़े की कुंडी खोली है, जो दिखी सूरत भोली है। अरे लगा ग़ुलाल भागकर, यार बुरा न मान होली है। परिचय :- विकाश बैनीवाल पिता : श्री मांगेराम बैनीवाल निवासी : गांव-मुन्सरी, तहसील-भादरा जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान) शिक्षा : स्नातक पास, बी.एड जारी है घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मं...
तुम मेरी ज़द से
ग़ज़ल

तुम मेरी ज़द से

विवेक सावरीकर मृदुल (कानपुर) ****************** तुम मेरी ज़द से अक्सर जरा-सी कम रही कोशिशें पर मैंने की ये खुशी भी कम नहीं औरों की बेबसी पर आती है उनको हँसी झेल सकें हालात दो पल को भी दम नहीं उनपे हौसला न था, हम किस्मत के मारे थे वगरना हमने पेशनगोई, की कोई कम नहीं कब तलक रोते रहोगे, जख्म़ सहलाते हुए मुस्कुराओ इससे, बढ़कर कोई मरहम नहीं नेकियों का साथ मिल रहा है मुसलसल बदी करने वालों तुम इतने भी तुर्रम नहीं . परिचय :-  विवेक सावरीकर मृदुल जन्म : १९६५ (कानपुर) शिक्षा : एम.कॉम, एम.सी.जे.रूसी भाषा में एडवांस डिप्लोमा हिंदी काव्यसंग्रह : सृजनपथ २०१४ में प्रकाशित, मराठी काव्य संग्रह लयवलये, उपलब्धियां : वरिष्ठ मराठी कवि के रूप में दुबई में आयोजित मराठी साहित्य सम्मेलन में मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व, वरिष्ठ कला समीक्षक, रंगकर्मी, टीवी प्रस्तोता, अभिनेता के रूप में सतत कार्य, हिंदी और मराठी दो...
आओ मिलकर रंग सजाएँ
कविता

आओ मिलकर रंग सजाएँ

श्रीमती विभा पांडेय पुणे, (महाराष्ट्र) ******************** तुमसे, मुझसे,उससे, इससे माँग कर थोड़ा साथ तो लाएँ। आओ मिलकर रंग सजाएँ। लाल, गुलाबी, चटक रंग को हर सूने मन पर बरसाएँ। आओ मिलकर रंग सजाएँ। बीमारी ने पकड़ रखा है, पंजों में अपने जकड़ रखा है। दूर हुए जो घर आँगन से फिर से सबको साथ में लाएँ। आओ मिलकर रंग सजाएँ। दूर हुए बस तन ही तन से जुड़े हैं तार तो मन के मन से। क्या होता जो दो सालों से होली गुलाल की खेल न पाए। आओ मिलकर रंग सजाएँ। गीतों से कुछ रंग चुराकर होली के दिन मेल मिला कर आभासी माध्यम को अपनाकर क्यों न पुराना फगुआ गाएँ। आओ मिलकर रंग सजाएँ। जो न मिला फिर याद करें क्यों, बस सबसे फरियाद करें क्यों? सूने पड़ते चौबारों में फिर से रंगों को बिखराकर आस का क्यों ना दीप जलाएँ। आओ मिलकर रंग सजाएँ। परिचय :- श्रीमती विभा पांडेय शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी एवं अंग्रेजी), एम.एड. जन्म : २३ सितम...
पनघट
छंद

पनघट

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया (गुजरात) ******************** विष्णुपद छंद दृश्य सुहाना पनघट पर का, चहल-पहल सारी, चली नीर भरने पनिहारी, ले गगरी न्यारी, पायल को छनकाती चलती, कटि को लचकाती, तिरछी नैनों से दिख के वो, हिय में शरमाती । पायल की झनकार जगाती, प्रीत युवा दिल में, मधुकर मँडराते हैं मानो, पुष्पों के दल में , बीच घोर घन कुंतल दिखती, चंद्र-मुखी प्यारी, घायल सबको करती चलती, मधु मुस्का न्यारी। छोटी-सी ठोकर से छलके, निर्मल जल घट का, मानो नीलांबर है बरसे, खोल स्नेह पट का , बूँद मोतियों-सी सिर पर से, अधरों पर ठहरी, ओस पंखुडी पर  मोती-सी, शोभित है गहरी। परिचय :- डॉ. भावना नानजीभाई सावलिया माता : वनिता बहन नानजीभाई सावलिया पिता : नानजीभाई टपुभाई सावलिया जन्म तिथि : ३ अप्रैल १९७३ निवास : हरमडिया, राजकोट सौराष्ट्र (गुजरात) शिक्षा : एम्.ए, एम्.फील, पीएच. डी, जीएसईटी स...
सार्व भौम चेतना
कविता

सार्व भौम चेतना

ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) धवारी सतना (मध्य प्रदेश) ******************** निराकार परमात्म प्रभु का, होता नही है कोई आकार। भक्त के मन के भाव सदा, दे, देते हैं प्रभु को आकार।। मन में प्रतिक्षण चिंतन आता, इस सृष्टि का कौन नियामक। कौन बिगाड़े, कौन बनाये, कौन बना है इसका नायक।। क्या नायक हैं ब्रह्मा, विष्णु, या हैं नानक, ईशा, राम आओ तनिक विचारें हम, खोज उन्हें, हम करें प्रणाम।। खोजे किसी सहृदय के मन में, हमें मिलेगा प्रभु का वास। ईश रूप का तत्व समेंटे, ये जन होते आस ही पास।। कभी कला के रूप में आकर, बन जाते हैं, वे कलाकर। फिर कला निखरती कलाकार की, कला में दिखता प्रभु का आकार।। कभी लेखनी में बस कर ईश्वर, करते शब्दों का निर्माण। कवि की निर्जीव इस लेखनी में ईश तत्व से ही बसते प्राण।। अतः किसी को करें न आहत, सबमें पायें प्रभु का दर्शन। अब न भटकें हम आकारों में, निराकार का यही है चिंतन।। ...
रामायण चालीसा
दोहा

रामायण चालीसा

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* राम नाम उच्चारिये,छूटे भव संसार। जीवन परहित कीजिये,कहत है कवि विचार।। राम नाम जग महिमा छाई। राम कथा शिव उमा सुनाई।।१ काकभुसुंड गरुड़ समझाई। याज्ञवल्क भरद्वाज बताई।।२ रामायण के भेद अनेका। बहुभाषा में कवियन लेखा।।३ कृती वास बंग्ला में गाया। रंगनाथ को तेलगु भाया।।४ भाष तमिल में कंबन भाई। दिवाकरा कश्मीरी गाई।।५ सरलदास की उड़िया भाषा। देश विदेशा जन विश्वाशा।।६ वाल्मीकि संस्कृत में गाई। तुलसी ने फिर अवधि रचाई।।७ संवत् सोलह तैंतिस आया। रामचरित मानस जग छाया।८ सात महीना अरु दो साला। छब्बिस दिन में ग्रंथ विशाला।।९ दोहा चौपइ छंद अनेका। सात कांड में रचना लेखा।।१० बाल कांड जन्मे रघुराई । भरत शत्रुघन लछमन भाई।।११ कौशल दशरथ नंदन प्यारे। खेलें आंगन आंखन तारे।१२ विश्वामित्र गुरू रघुराई। बाल पने में शिक्षा पाई।।१३ मार ताड़का सुबाहु दानव। ...
हो बंद शहादत सीमा की
गीत

हो बंद शहादत सीमा की

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** सीमाएं आग उगलती जब, सैनिक जब मारे जाते हैं। व्यवहार बिगडते मुल्कों के, आंसू जनता के आते हैं।। भूमि के टुकड़ों के खातिर, क्या लड़ना बुद्धिमानी है। सरकारों का यूँ बैर भाव, रखना लोगों नादानी है।। सीमाएं जब तय हो जाती, क्या रोज बदलती रहती हैं। दीवारें क्या मानव हैं जो, उठ-उठकर चलती रहती हैं।। फिर क्या होता है सीमा पर, क्यों शांत पड़ोसी लड़ते हैं। हथियारों को हाथों में ले, इक दूजे पे क्यों चढ़ते हैं।। हो राजाओं का राज अगर, सीमाओं का विस्तार करें। निर्दोष जहां कुचले जाएं, बेरहम सिपाही वार करें।। अब राजाओं का राज नहीं, सब की ही इज्जत होती है। हो छोटा बड़ा भले कोई, वोटर है ताकत होती है।। जब बने पड़ोसी दुःख क्यों दें, मानवता का विस्तार करें। सुख-दुख बांटें मिल बैठ सभी, मिल-जुल के सब त्योहार करें।। इन्सानी गरिमा को समझें , ह...
मां
कविता

मां

रश्मि नेगी पौड़ी (उत्तराखंड) ******************** मेरा संसार ही तू मां मेरी ईश्वर ही तू मां है सब कुछ तू ही मेरी मेरा प्राण ही तू माँ तुझमें बसती मेरी जान है… तू ही मेरी शान है तू ही मेरी मित्र मां तू ही मेरे जीवन का सार मां तू सबसे मीठा बोल है मां संसार में सबसे अनमोल है मां मेरे हर मर्ज की दवा है तू मां तेरे जैसा इस संसार में कोई नहीं है मां तुलना तेरी किसी से कर नहीं सकती क्योंकि तू स्वयं में सर्वश्रेष्ठ है मां परिचय : रश्मि नेगी निवासी : पौड़ी उत्तराखंड शिक्षा : एम.ए. प्रथम वर्ष राजनीति विज्ञान सम्प्रति : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद पौड़ी जिले की जिला सह संयोजिका। घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक ...
मौत
कविता

मौत

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** बैठे है कब से मेरे सिरहाने आस-पास वे भी, जिन्हें फुर्सत ना थी कभी मुझसे मुलाकात की। जिन्हें पसंद ना थी मेरी शक्ल फूटी आंख भी, अब दर्शन को भीड़ लगी है सारी कायनात की। जिनसे तोहफे में नसीब ना हुआ इक बोल भी, आज वे भी मुझ पर बरसा रहे फूल कचनार की। तरसे- रोये है मुश्किलों में हम एक कन्धे को, और अब बानगी देखिए जरा हजारों कन्धों की। कल दो कदम साथ चलने वाला ना था कोई, अब गणना असंभव है साथ चल रहे कारवां की। कमबख्त जिंदगी मौत से बदत्तर लगी आज, कितने रो रहे यहां कमी नहीं चाहने वालों की। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप ...
बस हैं भटकन
कविता

बस हैं भटकन

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आ खड़ा हूँ, आज फिर मैं, ज़िंदगी तेरे, तंग गलियारे में, ताक रहा हूं, तन्हा अम्बर, उलझा जलते बुझते तारों में... भटक रहे हैं,वलय में अपने, दिखते हैं, यो तो पास-पास, चाहें भी तो, मिल नही पाते, कोई गुरुत्व नही,आस-पास... नही कोई, संभावना उनमें, स्याह, प्रहर बस,ख़ालीपन, निर्वात में नही जीवन ऊर्जा, पर हैं कितना चमकीलापन... छूपा हुआ हैं स्रोत कही दूर, तू सोख रहा ,रोशनाई को, चमक भर तुझमें, हैं उसकी, बस वक्ती फ़लक सजाने को... बंद होते पल्लों के ही फिर, अंनत जहां यो रोशन होगा, विलीन हो जायेगे तारे भी, गलियारे में, तन्हा मन होगा. परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, ...
मतदान
कविता

मतदान

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.) ******************** दान की परम्परा का एक बार फिर निर्वहन करते हैं, आइए! साथ चलकर मतदान करते हैं। मतदान हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है, परंतु देश के नागरिक हैं इसलिए कर्तव्य भी। बस यही याद रखिए कर्तव्य की बलिबेदी पर खुद को न बेंचिए, राष्ट्र, समाज और खुद के लिए मत दान से पहले खूब सोचिए, बिचारिए, किसी के बहकावे में कभी न आइए। खुद ही फैसला कीजिए सही क्या है? अपना ही नहीं राष्ट्र का भविष्य जिन्हें सौंप रहे हैं, उनके बारे में भी तनिक विचार कर लीजिये फिर मतदान कीजिए। क्योंकि तब पाँच साल सिर्फ़ पछताना न पड़ेगा, सब ओर खुशियों का परचम जो फहरेगा । परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि : ०१.०७.१९६९ पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव माता : स्व.विमला देवी धर्मपत्नी : अंजू श्रीवास्तव पुत्री : संस्कृति, गरिमा पैतृक निवास : ग्राम-बरसैनियां, मनकापुर, ज...
नहीं हो तुम मगर
कविता

नहीं हो तुम मगर

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** कठिन बड़ी डगर, नहीं हो तुम सगर, बोल रहे हर- हर, नहीं हो तुम मगर। चले हैं हम सफर, लगता नहीं है डर, गये थे हम घर घर, नहीं हो तुम मगर। अकेले हमें चलना, घर छोड़ निकलना, प्रकृति होती सुंदर, प्रकृति में ही पलना। सांझ जरूर ढलती दिन फिर निकलता, कभी खुशियां मिले, कभी दिल मचलता। कौन साथ जग देता, क्यों दर्द व्यर्थ लेता, जिंदगी गुलगुनाइये, कहते आये हैं वेत्ता। कभी खुशी मिलती, कभी मिलते हैं गम, कभी दर्द सह- सह, आंखें हो जाती नम। प्राण बेशक जाते हैं, साहस नहीं छोडऩा, अपने भी पराये होते, पराये जन खोजना। जिंदा दिल इंसान को, सारा जगत ही पूजता, हिम्मत हारे जन को, कुछ भी नहीं सूझता। धन दौलत की चाह, जन को दे जाए दर्द, बिन पैसे के जीना है, कहलाता है वो मर्द। वक्त के साथ चलो, वक्त साथ देता रहे, वक्त को छोड़ देना, मृत्यु के सम कहे। आया जन जाएग...
जल ही है जीवन
कविता

जल ही है जीवन

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** जल ही है जीवन, जल है अनमोल बन्धु जीवनदायी जल दिए प्रभु कृपासिंधु अहो मानव! इसे बूँद बूँद बचाइए पृथ्वी का हिस्सा तीन है जल से भरा उसमें दो भाग बर्फ ग्लेशियर है धरा बचे एक हिस्से को जतन से सँभालिए पेयजल संकट से त्राहि-त्राहि हैं लोग चरणामृत सा कर इसका कृपण उपयोग कर जल का दुरुपयोग संकट न बढा़इए जल के जो हैं विविध स्रोत प्रकृति प्रदत्त तृप्त होंगे धरा के जीव-जंतु समस्त पयस्विनी सलिला में उच्छिष्ट न बहाइए बरसे है जो अमृत आसमा से धरा पर स्वच्छ गुणवत्तापूर्ण वर्षा जल छतों पर तत्क्षण ही गढ्ढे में उस पय को जुगाइए नीचे भूजल के स्तर को भी सुधारिए हिमगिरि-संजीवनी लिय सुरसरि बचाइए जल बिन जीवन नहीं, हर मूल्य बचाइए परिचय : डॉ. पंकजवासिनी सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफेसर भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय निवासी : पटना (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाण...
विश्व जल दिवस
गीत

विश्व जल दिवस

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** नदिया न पिये, कभी अपना जल। वृक्ष न खाए, कभी अपना फल। सभी को देते रहते, सदा ही फल जल। नदिया न पिये कभी...।। न वो देखे जात पात, और न देखे छोटा बड़ा। न करते वो भेद भाव, और न देखे अमीरी गरीबी। सदा ही रखते समान भाव, और करते सब पर उपकार। नदिया पिये कभी.....।। निरंतर बहती रहती, चारो दिशाओं में नदियां। हर मौसम के फल देते, वृक्ष हमें सदा यहां। तभी तो प्रकृति की देन कहते, हम सब लोग उन्हें सदा। नदिया न पिये कभी...।। जय जिनेन्द्र देव संजय जैनविश्व जल दिवस* विधा : गीत नदिया न पिये, कभी अपना जल। वृक्ष न खाए, कभी अपना फल। सभी को देते रहते, सदा ही फल जल। नदिया न पिये कभी...।। न वो देखे जात पात, और न देखे छोटा बड़ा। न करते वो भेद भाव, और न देखे अमीरी गरीबी। सदा ही रखते समान भाव, और करते सब पर उपकार। नदिया पिये कभी.....।। निरंतर बहती रहती, चारो दिशाओं मे...
जल जीवन
कविता

जल जीवन

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** जल से जीवन पाते हैं। हो रहा प्रकृति पर जो, अत्याचार देख... आंखों में नीर आ जाते हैं। जल से जीवन पाते हैं। बूंद-बूंद बचाएं #पानी की, ना व्यर्थ करें पानी को, नहीं मिलता जब पानी, आंखों से नीर भी सूख जाते हैं। जल से जीवन पाते हैं। खुशियों की चौखट पे जब मां वारी-वारी जाती हैं। बिन वारि के खुशियां भी अधूरी रह जाती हैं। जल से जीवन पाते हैं। इसी पय से प्यास का अर्थ पाते हुए, अंतिम तृप्ति पा, इसी में लीन हो जाते हैं। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं,...
मैं गौरैया नन्ही जान
हाइकू

मैं गौरैया नन्ही जान

संजू "गौरीश" पाठक इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आधुनिकता परवान चढ़ी है तरु गुम हैं। पर्यावरण हुआ संतप्त गौरैया अस्त। कटते वृक्ष बनती इमारतें क्या करें हम? छीन ली मेरी चहचहाती सी धुन क्यों न तू सुन? हौंसले मेरे आसमान से ऊंचे समझ ले तू। रूठी प्रकृति ढहेगा तेरा नीड मिटाया हमें। आया समय कर तू संरक्षण मैं भी सृष्टि का अंग।। परिचय :- संजू "गौरीश" पाठक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके ह...
ख्वाब नही आते अब रातों में
ग़ज़ल

ख्वाब नही आते अब रातों में

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ख्वाब नही आते अब रातों में असर तो है आपकी बातों में लड़ता भिड़ता हूँ हालात से थक के चूर सोता हूँ रातों में जीने का सबक सिखा गया हँसते-हँसते, बातों-बातों में आओ आज जुर्म करते है लोगो के दर्द चुराते है रातों में काश की तू मुझे समझ पाता तुझे यकीन लोगो की बातों में सच हमेशा मीठा नही होता तू घिरा रहा मीठी-मीठी बातों में आओ मिल कर ढूढ़ते है उसे जो खोया हमने कड़वी बातों में नफरतों से भरे पड़े है सब प्यार ही नही किसी खातों में अंधेरा हर सिम्त पसरा है दोस्त दहलीज़ पर दिया जलाए रातों में तेरी याद शिद्दत से आती है देखता हूँ जब सितारें रातों में मुंतज़िर हूँ लौट आ, धैर्यशील, रूठा जो तू मुझसे बातों-बातों में परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के...
मैं और मेरी तन्हाई
कविता

मैं और मेरी तन्हाई

आनन्द कुमार "आनन्दम्" कुशहर, शिवहर, (बिहार) ******************** मैं और मेरी तन्हाई! अक्सर बातें करती है। वह मुझसे सवाल करती और मैं सवालों की गठरी लिए जवाबो की शहर पहुँचता पर जवाब ढूंढ न पाता ये सिलसिला जारी है... कई दफा सोचता हूँ रिश्ता ही तोड़ दूँ अगले ही पल जेहन में फिर एक सवाल रिश्ता जोड़ा कब? मैं और मेरी तन्हाई! अक्सर बातें करती है। परिचय :- आनन्द कुमार "आनन्दम्" निवासी : कुशहर, शिवहर, (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टा...