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मुझे समझौता ही रहने दो…
कविता

मुझे समझौता ही रहने दो…

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** जिंदगी से , मैंने सौदे तो नही कियें। सच का सामना करने के लिए, मुखौटे भी नही लिए।। मेरा सच, मेरे साथ रहने दो। मुझे समझौता ही रहने दो....... जिंदगी से,प्यार किया। छल तो नही किया।। शब्दों की सलाखों को, मेरे दिल के आर-पार ही रहने दो। मुझे समझौता ही रहने दो......... शिकवे और शिकायतों पर, अब न वक्त जाया कर। शिकायतें सब मेरी, मेरे साथ रहने दो। मुझे समझौता ही रहने दो........ मैं किसी का , अपना कहाँ हो पाया। पराया था, पराया ही रह गया। मुझे अपना तो...रहने दो। मुझे समझौता ही रहने दो....... देख लिया चेहरा दुनिया का, मकसदों और सियासतों का है। मेरा चेहरा, बस मेरा ही रहने दो। मुझे समझौता ही रहने दो। मुझे समझौता ही रहने दो।। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट...
बैंक एफडी
लघुकथा

बैंक एफडी

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ********************                        राजमोहन गांव के बड़े जमींदार थे। गांव वालों की नजर में उनकी छवि सदा ही एक सम्मानित एवं साफ सुथरी व्यक्ति की रही। राजमोहन हमेशा ही दीन, हीन, भिक्षु, विकलांग वा आमजन के प्रति उदार भावना रखते थे। खुशियां सबसे बांट लेते लेकिन दुख दर्द अकेले ही झेल जाते थे। इसके पीछे उनका निजी दृष्टिकोण था। राजमोहन का बड़ा बेटा राधे घर में रहकर घर के काम खेती, किसानी में हाथ बंटाता था। एक दिन राजमोहन अपने बड़े बेटे के साथ घर में बैठे कुछ विषयों पर बात ही कर रहे थे, कि गांव के ही एक व्यक्ति राजबली अचानक आ पहुंचे। राजबली के चेहरे और हाव भाव को देखकर ही राजमोहन समझ गये कि हो ना हो इनको किसी तरह की मदद की जरूरत है। इसलिए अचानक ये हमारे पास आये....। राजमोहन बिल्कुल भी देरी ना करते हुए राजबली को बैठने को कहते हुए बोले- कहिए कैसे आना ह...
क्षतिपूर्ति
कहानी

क्षतिपूर्ति

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** गीतू ऐसा क्या हो गया हैं? जो नौबत यहाँ तक पहुँच गई है। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी, तुम्हारे साथ ऐसा हो सकता है। पति-पत्नी में कहा-सुनी होना कोई बड़ी बात नहीं है। हर घर में ऐसी स्थिति बन जाती है। इसका मतलब यह नहीं है कि एक-दूसरे को छोड़ने को तैयार हो जाओ। तुम तो पढ़ी-लिखी हो, फिर तुमने समझदारी से काम क्यों नहीं लिया? पति-पत्नी दोनों को ही कुछ बातों को नकार देना चाहिए। इससे रिश्तों में दरार पड़ने से बच जाती है। माँ कहे जा रही थी। गीतू चुपचाप सुन रही थी। आखिर कब तक अपने संबंधों में दरार पड़ने से बचाती। मैं तो हमेशा ही सतर्क रहती थी। झगड़े की हर वजह को उसी समय नकार देती थी। ताकि झगड़ा किसी बड़े कलह का कारण ना बन जाए। वह अपनी माँ की इकलौती संतान थी। पिता जी माँ को अकेला छोड़ कर जा चुके थे। किसी नाचने वाली के चक्कर में। जब मै दस वर्ष की हुई ...
आओ लौट चलें अपने गांव…
आलेख

आओ लौट चलें अपने गांव…

डॉ. ओम प्रकाश चौधरी वाराणसी, काशी ************************                                   अचानक आज शाम को राम निहोर काका की याद आ गई, आए भी क्यों न, शाम को वर्षों तक किस्सा सुनाते जो आए थे। एक थे राजा, एक थी रानी (राजा ब्रिज व रानी सारंगा) से शुरू होकर, राजमहल से जंगल तक की सैर कराते थे, मिलन, विरह, श्रृंगार, करुण, वीर सभी रसों से सराबोर कर देते थे। कभी-कभी आकाश विचरण भी करा देते थे, चारपाई पर लेटे-लेटे ही, मैं और बड़े भाई-कम-बचपन से आज तक के जिगरी दोस्त डॉ सेवाराम चौधरी (अवकाश प्राप्त वरिष्ठ जेल अधीक्षक) हुंकारी भरते-भरते कब सो जाया करते थे, पता ही नहीं चलता था, मानों काका हम लोगों को सुलाने ही आते थे। आज राम निहोर काका चिर निद्रा में चिर शांति के लिए विलीन हो गए हैं, उनकी याद में आंख का कोना गीला हो जाना स्वाभाविक है। उन्हें परमात्मा शांति दें व अपने चरणों में स्थान। हम लोग...
इक्कीसवीं सदी
कविता

इक्कीसवीं सदी

डॉ. भगवान सहाय मीना बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, (राजस्थान) ******************** इक्कीसवीं सदी को लगा इक्कीसवां साल। आपको हृदय से मुबारक हो यह नया साल। अभिनंदन नववर्ष नव उमंग उम्मीद किरण, करूं अलविदा शत्-शत् नमन पुराने साल। यह काल याद रखेंगी मानव तेरी पीढ़ियां, चंद्रमा का कलंक सदी में यह बीसवां साल। घबराया महामानव प्रकृति चित्कार उठीं, जैसे- तैसे गुजर गया दानव कातिल साल। सदी में यम का जाल कोरोना काल, समय भी याद रखेगा यह बीसवां साल। आओ पधारों सुस्वागतम नूतन वर्ष, तुझे अंतिम सलाम अलविदा रुग्ण साल। हे प्रभु नववर्ष में हर जन खुशहाल रहे, प्रकृति भी संभलें भूलकर यह बीता साल। इक्कीसवीं सदी को लगा इक्कीसवां साल, आपको हृदय से मुबारक हो यह नया साल। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत...
प्रकृति के त्रैमासिक ‘नूतन वर्ष’
कविता

प्रकृति के त्रैमासिक ‘नूतन वर्ष’

अर्चना "अनुपम क्रान्ति" जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** दे भेंट धरा पर दिव्य गगन चहुँओर छत्र बिखराता है। जैसे अवनि में स्वयं उतर नववर्ष मनाने आता है।। नटखट खग छोड़ देश अपना यहां कलरव गान सुनाते हैं। और घास-पात की ओसों से करतब कर खुशी जताते हैं।। इस धुँध में भी मकरंद पुष्प की हो सुगंध भीनी भीनी। वाह सुबह खिले जब धूप; ताप सुखमय प्रकृति धीमी-धीमी।। सरसों के पियरे बलखाकर नृत्य जता कुछ कहते हैं। आलिंगन गेहूँ की बाली का कर बधाई संग रहते हैं।। और चने मटर की छीमी की उस नोक-झोक के क्या कहने। गेंदा गुलाब और सुमन कई अवतरित हुये जिम संग रहने।। हम भी ऐसे ही मिलजुलकर खुशियाँ हरएक मनायेंगे । इन मूक जीव अथ प्रकृति के नियमों को सतत् निभायेंगे।। है धन्य धरा यह भारत की जहाँ हर मौसम खिल जाते हैं। एक नहीं यहाँ त्रैमासिक; नूतन वर्ष सदा सुख लाते हैं।। ...
प्रेम दीप
गीत

प्रेम दीप

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल मध्य प्रदेश ******************** प्रेम दीप हम, चलो जलाये, निज अन्तर्मन में। दंभ द्वेष छल तम मिट जाये, नय अभिनंदन में।। दीप्त देह से, फिर उजियारा, कर्मों का फैले। धुल जाये आबद्ध चित्त जो, भ्रम में है मैले।। ज्योतित हो फिर करुण प्रेमरस, उर के दर्पण में।। प्रेम दीप हम, चलो जलाये, निज अन्तर्मन में।। (१) आलोकित पुरुषार्थ पुंज से, भू परिमंडल हो। चिर प्रदीप से, दिग दिगंत तक कणकण उज्ज्वल हो।। कुटिल वृत्तियों, के चंचल पग, जकड़े बन्धन में।। प्रेम दीप हम, चलो जलाये, निज अन्तर्मन में।। (२) विषम तटों के, तट बन्धों से, दीवारें जोड़े। कलुष भेद के, निंदित बंधन आओ हम तोड़े।। रुचिर प्रेम की, सघन उर्मियाँ, थिरके चिंतन में।। प्रेम दीप हम, चलो जलाये, निज अन्तर्मन में।। (३) परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी- बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचन...
ऐ मौत अभी तू वापस जा
कविता

ऐ मौत अभी तू वापस जा

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ऐ मौत अभी तू वापस जा बीमार की हसरत बाक़ी है। बस देख लूँ उनको फिर आना दीदार की हसरत बाक़ी है।। ग़म जिसने दिए इतने मुझको खुशहाल वो कैसे रहते हैं। आया न समझ में इतनी बस ग़मख़्वार की हसरत बाक़ी है।। साक़ी ने पिलाई जी भर के बोतल न बची मयख़ाने में। फिर भी है शिकायत पीने की मयख़्वार की हसरत बाक़ी है।। अपनों की मोहब्बत से यारों ग़ैरों कि ये नफ़रत अच्छी है। पीकर भी न भूले हम जिसको उस यार की हसरत बाक़ी है।। समझा न किसी ने ग़म मेरा जी भरके निज़ाम अब पीता हूँ। मैं एक शराबी शायर हूँ बस प्यार की हसरत बाक़ी है।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प...
नव वर्ष
कविता

नव वर्ष

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** हे प्रभु आशाओं का सूरज चमके, बीत गया साल बीस अब न रहें कोई टीस। नव वर्ष का अभिनंदन करते, विगत को भूल नव इतिहास रचायेगें। उत्साह उमंग से करें स्वागत, झूमे नाचे गायेगें। प्राप्त संबल हो सतत, उत्कर्ष का आदर्श का, नव वर्ष की कूख से, जन्म हो नित हर्ष का मातृभाव का वरण, हरण हो प्रेम भाव का, शुभ की दृष्टि सतत हो, सृष्टि बनें उजियारी। कलियों सी खिले, जीवन बगियाँ हमारी, रंगो सी रंगीन हो दुनियां सारी। वर्तमान की मिटे त्रासदी, उर में न् ऊर्जा का संचार हो, यथावत जन जीवन हो। नव वर्ष की नव ज्योति, में प्रभु ऐसी जोत जगा देना। नव वर्ष हो हम सबको, चरण चरण अनुकूल, रहे बरसते रातदिन, सुख वैभव के फूल। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - ...
वो ख़त
कविता

वो ख़त

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उ.प्र.) ******************** डायरी के पन्नों को पलटते, हमें याद आ गए वो तुम्हारे ख़त कितने महके से हुआ करते थे, वो ख़त, खुशी का खाजाना हुआ करते थे, गहरी नींद से जगा दिया करते थे वो ख़त। जागती आंखों में सुहाने सपने संजोया करते थे वो ख़त!! दिल के हालात और जज़्बात से रूबरू किया करते थे वो ख़त समय की इस दौड़ में ना जाने कहां गुम हो गए वो ख़त, ना वो सपने रहे, ना मीठी नींद भरे सुकून के वो ख़त दूर तक फैली खामोशी, हमसे सवाल करती है कभी-कभी तो बातें हज़ार करती है, कि.. चलो पुराने खतों को फिर से ढूंढते हैं, उन्ही शब्दों को नई पहचान देते हैं, सपने तो अब भी छुपे होंगे उन पन्नों में, कुछ अधूरे, कुछ पूरे, क्या पता फिर से चल पड़ें वो सिलसिलेवार, "वो ख़त"!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म...
२०२० तू जा
कविता

२०२० तू जा

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** पाखंडी, निष्ठुर, निर्दयी जारे बीस बीस अब तू जा कर अपना मुंह श्याम कारागार में चक्की पीस तू जा जारे बीस बीस अब तू जा। तूने अपनो से किया अलग आज भी ह्रदय रहे सुलग जीवन से तूने नाता तोडा किया सभी को अलग थलग गांव क्या स्मृति से भी तू जा जारे बीस बीस अब तू जा। आंखों से आँसू पाव से रक्त बहाया तूने रोजी रोटी को तरसाया भूखा प्यासा सुलाया तूने सुनी मांग व गोद कह रही तू जा जारे बीस बीस अब तू जा। मिलना था जो दंड मिल गया मेरी करनी का फल मिल गया अब रखूंगा तालमेल सृष्टि से अब चौकड़ी भरना भूल गया मैं हूँ अब प्रभु शरण मे तू जा जारे बीस बीस अब तू जा जारे बीस बीस अब तू जा। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के...
नाराज हो मुझसे
कविता

नाराज हो मुझसे

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** खपा-खपा लगते हो, बस शिकायत तुझसे, मुंह चिढ़ा बात करते क्यों नाराज हो मुझसे? बस यूं ही बात करते, फुरसत क्षणों में तुझसे, वादों पर खरा उतरा हूं, क्यों नाराज हो मुझसे? कभी झगड़ा ना हुआ, शिकायत नहीं तुझसे, बातें नहीं कर रहे हो, क्यों नाराज हो मुझसे? कभी दिल दुखाया ना, हँसकर बातें की तुझसे, मुंह फेर लेते मिलने पर, क्यों नाराज हो मुझसे? साथ-साथ चलते आये, दूर ना हुये कभी तुझसे, बातें करना गवारा नहीं, क्यों नाराज हो मुझसे? जब भी कष्ट मिला है, पुकारा बस मैंने तुझको, पर अब वो बात नहीं, क्यों नाराज हो मुझसे? साथ खाना खाया हमें, खपा नहीं कभी तुझसे, तुम अलग राह चलती, क्यों नाराज हो मुझसे? रात दिन तुझे चाहा था, मुहब्बत बड़ी थी तुझसे, दूर-दूर छुपकर रहते हो, क्यों नाराज हो मुझसे? खेल अधूरा छोड़ों ना, यह प्रार्थना बसु तुझसे, अच्छा नहीं लग...
मोक्ष का मार्ग
लघुकथा

मोक्ष का मार्ग

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** आज मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती के साथ आदरणीय अटलबिहारी बाजपेई जी की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। मेरी क्रिसमस कहने पर बहुत से लोग तपाक से ये रिप्लाई सोशल मीडिया पर कर रहे थे। ये बात २५ वर्ष के पोते ने दादा को बड़ी बेचैनी से बताई। बोला दादू ये तीन पर्व तो हर साल ही तिथि से मनाए जाते है ना! हाँ बेटा पर कभी इस प्रकार मनाते नहीं देखा। अटलजी जब तक जीवित थे तो उनके जन्मोत्सव की शुभकामना का आदान प्रदान नहीं हुआ। पोता बोला- ये वही लोग हैं जो साम्प्रदायिक वैमनस्य से ऐसा करते हैं। हाँ बेटा पहले तो गुड़ी पडवां पर नया साल मनाते थे। ये क्रिसमस और न्यू ईयर ज्यादा लोगों को नहीं मालूम था। इन पर्वों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सब मनाने लगे ऐसे बहुत से पर्वो की शुभकामना का आदान प्रदान सालभर होता है पर आज एकादशी और गीताजयन्ती सौभाग्य से अटलजी की जनमदिन ...
रिश्ते
कविता

रिश्ते

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** अजीब से रिश्ते इस दुनिया के अजीब सी है रिश्तों की दुनिया तरह तरह के किरदार मे लोगों को बहकाती दुनिया कोई सगा, कोई सौतेला, कोई अपना तो कोई पराया तरह-तरह के संबंधों को अपने ढंग से निभाती दुनिया लेकिन सब रिश्तों को पीछे छिपी हुई है स्वार्थ की दुनिया बड़ी मुश्किल से मिलेंगे इस दुनिया मे निस्वार्थ के रिश्ते... ऐसे रिश्तों को ही केवल, दिल से निभाती है दुनिया बाकी तो सब दिखावे के है रिश्ते जो सिर्फ बेमतलब निभाती है दुनिया..... रुचि!!!! मत उलझ इन रिश्तों के भंवर में सबको भटकाती है ये दुनिया चलती जाओ बस कर्म पथ पर सुलझती जाएगी ये रिश्तों की दुनिया अजीब से रिश्ते इस दुनिया के अजीब सी है रिश्तों की दुनिया परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयो...
जा रहा हूँ मैं हूँ साल दो हज़ार बीस
कविता

जा रहा हूँ मैं हूँ साल दो हज़ार बीस

कार्तिक शर्मा मुरडावा, पाली (राजस्थान) ******************** जा रहा हूँ, मैं हूँ साल दो हज़ार बीस, क्षमा करना, नफ़रत स्वाभाविक है, छीना जो है बहुत कुछ, बच्चों से पिता को, बहन से भाई को, पत्नी से पति को, ना जाने कितने रिश्तों से रिश्तों को, कारोबार, ऐशो आराम, सुख चैन, फ़ेहरिस्त लंबी है, द्वेष है, क्रोध है, नाराज़गी है, इच्छा यह सभी की है, कब जाओगे, कब आएगी चैन की नींद, जा रहा हूँ, मैं हूँ साल दो हज़ार बीस।। लौटाया भी है बहुत कुछ मैंने, नदियों को साफ़ पानी, पेड़ों को हरियाली, पहाड़ों को झरने, बेघर पशु-पक्षियों को घर, धड़कनों को सांसें, जीवन को अर्थ, रिश्तों को प्यार, बागों में फूलों की बहार, सर्दी की बर्फ़, गर्मी को ठंडी हवाएं, सूखे को बरसात, ज़िंदगी को मौसमी सौगात, रखना याद हर हार के बाद है जीत, जा रहा हूँ,मैं हूँ साल दो हज़ार बीस।। दुखों को नहीं खुशियों को याद रखना, मिली है जो सीख, उसे सं...
थोड़ी बहुत पिया करो
कविता

थोड़ी बहुत पिया करो

अलका जैन (इंदौर) ******************** ओ सजनी ना कर शराब बंदी मिन्नतें करे दीवाना दो घूंट में तू भी विश्व सुंदरी नजर आती जान जानी कर मेहरबानी दिवाने आने दे आशियाने में दुनिया से क्या पूछे दिवानै से पूछ शराब क्या है जन्नत में भी शराब मिलती बहुत रानी खुशी हो या गम शराब साथ जिसके जन्नत उसकी दिवाने का बस चले तो शराब राष्ट्रीय पेय घोषित करवा डाले सुन सजनी शराब बांट कहलाये बावले सायाने नेता शराब में नहीं कोई खराबी मान मेहबूबा शराब भरे सरकारी खजाने तो काहे नहीं पिये मयकश मयकशी में है कितने मजा एक घुंट तू पीले जानी घूंघट में तेरी जवानी काहे खराब करे जानी तू भी पी के टन हो जा मे भी जन्नत देखू मजा ज़िंदगी यूं ले हम तुम जानू जिसने नहीं पी शराब उसकी जिंदगी समझो आधी हुई बेवजह खराब जानू शराब से जिंदगी बन जाती मान जानू जिसके साथ हम प्याला हो गया इंसान उसकी यारी दोस्ती कभी नहीं टूटे जानू शराब ऐसे रिश्ते ...
भाई की डांट
लघुकथा

भाई की डांट

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** आनंद तब से अपने बड़े भाई राजीव को जोर-जोर से डांटे जा रहा था। आनंद का कहना था- कि तुम घर से बाहर मत जाया करो। आसपास मुहल्ले के लोगों से बोलचाल मत रखो। तुम्हारी सहजता, सरलता, मृदुभाषिता के चलते लोग तुम्हारी कोई इज्जत नहीं करते। तुम सबसे प्रणाम, दुआ, सलाम करते रहते हो तो लोग तुम को हल्के से लेते हैं। हर किसी से हंसकर मुस्करा कर बात मत किया करो। लोगों की नजरों में तुम्हारी कोई अहमियत नहीं है। कोई कुछ भी काम कह दे तो फौरन कर देते हो। लोगों को समय देते हो यह सब पूरी तरह बंद करो। गंभीर बनो, लोगों से बातचीत नहीं करो। घमंडी दिखो, स्वभाव से स़ख्त रहो तब लोग इज्जत देंगे सम्मान देंगे तुम्हारी अहमियत समझेंगे। राजीव जो इतनी देर से सब ख़ामोश होकर सुन रहा था अचानक उसने ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा कि तुम मेरे छोटे भाई होकर जब मुझे सम्मान नहीं देते। म...
कंकाली स्तुति
भजन

कंकाली स्तुति

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** श्री कंकालीकायै नमः जगत कल्याणी जानकर,ब न्दों चरण तुम्हार। समस्त कामना पूर्ण करो, हरहु क्लेश हमार। जय माँ कंकाली क्लेश बिनाशनी। जग-जननी शम्भु भामिनि।। शवारूढ़ श्मशान -वासिनी। उग्ररूप अभयंकर करणी।। श्याम-वर्ण बाघम्बर धारी। लक्ष सूर्य सम ताप तुम्हारी।। पिंगल जटा अरुण त्रिनैनी। चतुर्बाहु भुजदंड बिशाला।। खप्पर जलज कत्री कृपाणा। हस्त लिए तुम काल समाना।। पद नख झलमल ज्योतिरत्न की। छुअत खुलत कपाट नयन की।। वाक चातुरी छंद गायिका। तू पूर्ण ब्रम्ह ब्रमांड नायिका। तू माँ पूर्ण पुनः तू रीता। सगुनागुण से परे अनिता।। जड़ चेतन अरु जीव प्रवीणा। सब तुममे तुम सबमे लीना।। सभी तुम्ही से जीवन पाते। अन्त समय तुझमे मिल जाते।। यंत्र मंत्र इतिहास पुराना। आगम निगम वेद प्रमाणा।। घोर छटा माँ तरी जितनी। परम कारुणिक हो तुम उतनी।। दया मात्र माँ जा पर तेरी। ऋद्धि-सिद्धि...
बेटी
लघुकथा

बेटी

मनीषा जोशी खोपोली (महाराष्ट्र) ******************** आज बाबूजी बहुत ही उदास और अनमने से थे। उन्हें अपनी पत्नि सुमित्रा की बहुत याद आ रहा थी। उनके जन्मदिन पर वह उनकी पसंद के तरह तरह के व्यंजन बनाती थी। सुबह से शाम होने आयी किसी ने भी उन्हें जन्मदिन की बधाई नहीं दी। यही सोच रहे थे तभी उनकी बेटी स्मिता का फोन आया। जन्मदिन की बधाई बाबूजी, बाबूजी खुश हो कर बोले अरे बेटा तुझे याद था मेरा जन्मदिन तभी बहू ने आकर सुना और कहने लगी उम्र हो गयी है और इन्हे इस बुढ़ापे में भी जन्मदिन मनाना है। बाबूजी सोचने लगे बेटी दूर होकर भी कितने पास है। यह वही बेटी है जिसे हम जन्म से पहले मार देना चाहते थे। बाबूजी की पलकों से आँसू छलक उठे। परिचय : मनीषा जोशी निवासी : खोपोली (महाराष्ट्र) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख...
जलियांवाला बाग सुनाता
गीत

जलियांवाला बाग सुनाता

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** अमर शहीदों ने खूं से जो, लिख दी उसी कहानी को। जलियांवाला बाग सुनाता, डायर की मनमानी को।। ब्रिटिश हुकूमत ने जब हम पर, रौलट एक्ट लगाया था। स्वतंत्रता के मतवालों को, नहीं एक्ट वो भाया था।। उसका ही विरोध करने को, सभा एक बुलवाई थी। जनरल डायर को लेकिन वो, फूटी आंख न भाई थी।। महंगा पड़ा मगर उसको भी, करना इस नादानी को। जलियांवाला बाग सुनाता, डायर की मनमानी को।। शांत सभा पर चली गोलियां, कत्लेआम हजारों का। भला नहीं यह काम विश्व ने, माना था हत्यारों का।। तब चूलें अंग्रेजी शासन, की डोली तम छाया था। आजादी के सूर्योदय का, समय निकट यूँ आया था।। और अंततः हुए स्वतंत्र हम, हरा के दुश्मन जानी को। जलियांवाला बाग सुनाता, डायर की मनमानी को।। वाहक "अनंत" समरसता का, था उधमसिंह निर्भीकमना। तीनों धर्म जोड़ने को ही, राम, मोहम्मद, सिंह बना।। उसने ही तब दो गोली...
संस्कार
लघुकथा

संस्कार

माया मालवेन्द्र बदेका उज्जैन (म.प्र.) ******************** सम्पूर्ण समर्पण से अपने पति को प्यार करती थी दयावती। उसे तो उसके पति में ईश्वर नजर आता था। पति जब तक घर परिवार में रहा उसके साथ ठीक रहा, क्योंकि बड़े परिवार में अक्सर पति-पत्नी रात्रि विश्राम पर ही मिल सकते हैं।दो कमरे का घर और दस लोग। हर समय चहल-पहल शुरू रहती थी। एक बेटी हुई, वह भी सासू माँ के सपनों को तोड़कर, क्योंकि पोता होता फिर उसका पड़पोता होता वह सोने की निशनी चढ़ती। दयावती के पति की नौकरी बदली, बाहर नौकरी के लिए गया तब पत्नी को घर परिवार में रखा फिर ले गया फिर छोड़ गया। पारिवारिक कामकाज चलते रहते थे। बाहर रहते पड़ोसी की शादीशुदा लड़की से मन लगा बैठा। पड़ोसी की बेटी आगे की पढ़ाई के लिए मायके में रहती थी। वह साथ रहकर भी साथ नहीं थी, हर समय वह लड़की प्रताड़ना पर उतर आई थी। दयावती ने उस लड़की को समझाने की बहुत कोशिश की, पर...
मौन
कविता

मौन

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** मौन तो, केवल मन से है। जीवन की आपाधापी में, कलह, क्यों........? मन-मन है। मौन तो, केवल मन से है। कौन जीत गया। कौन हार गया। एक लड़ रहा। एक तैयार खड़ा। यह सारी, क्या........? भागमभागी है। जो चुप न रहा। जो कहता ही रहा। यह शब्द भी, बहुत खुराफाती है। जो समझ गया। और मौन रहा।। मन को मथ, ज्ञान रत्न वो ढूंढ लिया। शोर-शोर में सब गया। मन को तो, कुछ न मिला। जीवन मंथन, जब-जब किया। मौन को, मन में जब धरा। लेश यहीं ही वाकि है। शेष यहीं ही वाकि है।। मौन तो, केवल मन से है। मौन तो केवल मन से है।। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्...
प्यार ऐसा ही होता
कविता

प्यार ऐसा ही होता

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** धड़कन की चाल बढ़ सी जाती जाने क्यों जब तुम सामने से गुजरती आँखों में अजीब सा चुम्बकिय प्रभाव छा सा जाता शब्दों को लग जाता कर्प्यू देह की आकर्षणता या प्यार का सम्मोहन कल्पनाएं श्रृंगारित आइना हो जाता जीवित राह निहारते बिना थके नैन पहरेदार बने इंतजार के प्यार के लहजेदार शब्द लगे यू जैसे वर्क लगा हो मिठाई में संदेशों की घंटियां घोल रही कानों में मिश्रिया इंतजार में नाराजगी वृक्षों को गवाह तपती धूप ,बरसता पानी फूलों की खुशबू लुका छुपी का खेल होता है प्यार में विरहता में प्यार छूटता रेलगाड़ी की तरह बीती यादों के सिग्नल तो अपनी जगह ठीक है उम्र की रेलगाड़ी अब किसी स्टेशन पर रूकती नहीं प्यार का स्टेशन उम्र को मुंह चिढ़ा रहा जब उम्र थी तब बैठे नहीं गाड़ी में आखरी डब्बे का गार्ड दिखा रहा झंडी। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी व...
चाहत
कविता

चाहत

सुधाकर मिश्र "सरस" किशनगंज महू जिला इंदौर (म.प्र.) ******************** कहानी गूंजे घर-घर में, कर गुज़र ऐसा कुछ तू भी बदल दे ज़ायका सुनने का, शोरगुल के ज़माने में दुनिया में है दम घुटता, ये कैसा छाया अब मंज़र खरे उतरें ना क्यों हम सब, इंसानियत के पैमाने में ओढ़कर चोला रहबर का, लगे रहबरी ज़ताने में पाप का घड़ा है जब भरता, भटकते हैं ज़माने में सब कुछ पाने की चाहत में, तनहा हो गई ज़िन्दगी परेशां होते हैं जब हम, जवाब ढूंढते हैं मयखाने में लूटने मज़ा जिंदगी का, गिर जाते हैं हद से भी बात जब आती अपने पर, कहते भूल हुई अंजाने में परिचय :-  सुधाकर मिश्र "सरस" निवासी : किशनगंज महू जिला इंदौर (म.प्र.) शिक्षा : स्नातक व्यवसाय : नौकरी पीथमपुर जन्मतिथि : ०२.१०.१९६९ मूल निवासी : रीवा (म.प्र.) रुचि : साहित्य पठन व सृजन, संगीत श्रवण उपलब्धि : आकाशवाणी रीवा से कहानियां प्रसारित, दैनिक जागरण रीवा से ...
जिसे हमने कभी देखा नहीं है
ग़ज़ल

जिसे हमने कभी देखा नहीं है

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कभी उसका पता पूछा नहीं है। जिसे हमने कभी देखा नहीं है। कभी तुम चाँद पर जाकर तो देखो, वो दिखता है, वहाँ वैसा नहीं है। थके राही सफ़र छोड़ेंगे फिर भी, गुज़रता कारवाँ रुकता नहीं है। ख़िलेंगे फूल उतने ही चमन में, बहारों से जिन्हें धोखा नहीं है। किनारें कब, कहाँ जाकर रुकेंगे, ये दरिया ने कभी सोचा नहीं है। कही ,जो बात थी कहने सरीखी, ये झूठी बात की चर्चा नहीं है। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां,...