Sunday, October 25राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

BLOG

वक़्त के वक्तव्य
कविता

वक़्त के वक्तव्य

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** वक़्त पर वक्तव्य होता, कृतत्व से ही पार होगा कल के इंतज़ार में बंधु, जीवन दुश्वार ही होगा। "काल करे सो आज कर, आज करे सो अब पल में परलय होएगी, बहुरि करैगो कब" कबीर की साखी से, कर्मों में सुधार ही होगा कल के इंतज़ार में बंधु, जीवन दुश्वार ही होगा। आज का भी काज है, कुछ कल का भी होगा टालने की आदत से, आखिर किसका भला होगा भला खुद का ना करो तो, कई गुना भार होगा। कल के इंतज़ार में बंधु, जीवन दुश्वार ही होगा। हर कार्य समय पर होना, माना संभव ना होगा अनायास विवशता चक्रों से, सबका परिचय होगा नैतिक शिक्षा अभाव से, मानव जार-जार होगा कल के इंतज़ार में बंधु, जीवन दुश्वार ही होगा। शान बनती पूर्णता से, टालने का भी नशा होता स्वबिम्ब ही गुम जाए, ऐसा धुंधला शीशा होता क्षमा दया का पात्र बने, जीवन तार -तार होगा कल के इंतज़ार में बंधु, जीवन दुश्वार ही होगा। कर्...
जी के जंजाल की तरह
ग़ज़ल

जी के जंजाल की तरह

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** जी के जंजाल की तरह, हम हैं फुटबाल की तरह। सब हैं बीमार की तरह, सिर्फ़ मैं अनार की तरह। सपनों को पंख क्या लगे, तुम मिले धमाल की तरह। चादर को तान सो गये, हम भी ससुराल की तरह। गुड़ से गोबर हुये सपन, पर जिये कमाल की तरह। जन्नत कश्मीर सी मिली पर मुये बवाल की तरह। सब कुछ उनके लिये यहाँ, हम बस टकसाल की तरह। ख़्वाहिशें उघार क्या हुईं हम हैं कंगाल की तरह। उनके मक़तल सजे हुये, हम कच्चे माल की तरह।। परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि ...
हाई-वे के ढाबों सी
कविता

हाई-वे के ढाबों सी

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** कुछ टूटे, कुछ छूटे, ख्वाबों सी, जिंदगी अपनी हाई-वे के ढाबों सी! अब तो वही बुलंदी पर पहुंचते हैं, ज़हन जिनका गंदा, जुबां गुलाबों सी! मेरे चरित्र को घटिया बताने वालों, तुम्हारे चरित्र से बदबू आती जुराबों सी! शब्द मैं फिजूल क्यों खर्चूं उनके लिए ज्ञान की बातें दीमक लगी किताबों सी! जाने कहाँ खो गए खुशियों भरे पल फिरती हैं घड़ी की सुईयां अज़ाबों सी! परिचय :- आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका व दूरदर्शन तक पहुँचा दीया। कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित युवा कवि आशीष तिवारी निर्मल वर्तमान समय में कवि सम्मेलन मंचो...
मेरे बेटे ने
कविता

मेरे बेटे ने

धीरेन्द्र पांचाल वाराणसी, (उत्तर प्रदेश) ******************** छोड़ दिया है दामन मेरा मेरे बेटे ने। दूर हो जाओ दोनों बोला मेरे बेटे ने। जिसको राजा बेटा कहकर रोज बुलाते थे। जिसका सर सहलाकर पूरी रात सुलाते थे। क्यों इतना कड़वा बोल दिया है मेरे खोटे ने। दूर हो जाओ दोनों बोला मेरे बेटे ने। गिरवी मेरे सपने मेरी इच्छाएं लाचार थी। उसकी दुनिया लगती मुझको मेरा ही आकार थी। कैसे धक्के मारे मुझको मेरे छोटे ने। दूर हो जाओ दोनों बोला मेरे बेटे ने। क्या करुणा का सागर उसका सुख गया होगा। बूढ़े कन्धों से उसका मन ऊब गया होगा। गले लगा ले माँ बोली ना समझा बेटे ने। दूर हो जाओ दोनों बोला मेरे बेटे ने। डर लगता है यहाँ पराये होंगे कैसे कैसे। घर ले चल तू मुझको मैं रह लुंगी जैसे तैसे। एक बार ना पीछे मुड़कर देखा बेटे ने। दूर हो जाओ दोनों बोला मेरे बेटे ने। सुखी अंतड़ियों की खातिर अब दो रोटी भी भारी है। जिसने उसको...
संगीत से तुम
कविता

संगीत से तुम

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** तुम! जैसे कोई मीठा लम्हा "संगीत" का !! शाश्वत ताजगी!! से भरा हुआ!!! दिव्य स्मिति! में लिपटा हुआ!! आत्मा को! ब्रह्मानंद!! की अनुभूति भरे अतुलनीय दिव्य संगीत में डुबोता हुआ!!! भाव विभोर करती अविस्मरणीय संगीत-संध्या की स्मृतियों की! खूँटियों में!! टँगा हुआ!!! जिसमें भरा है! मेरे जीवन-संगीत का नादमय आकाश!!! जिसे जब मैं चाहती हूँ अपने हृदय की जमीं पर झुका लेती हूँ! और भर लेती हूँ अपने आगोश में!! प्राप्ति परम आनंद की!!! परिचय : डॉ. पंकजवासिनी सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफेसर भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय निवासी : पटना (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा ...
सवालों से परे लिखो
कविता

सवालों से परे लिखो

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** क्या......? कब.......! क्यों.......... ? किस लिए......! के प्रश्नों में, क्यों हम उलझते है। लिखावटों से , पीढ़ी दर पीढ़ी के, सोपान जब बदलते है। क्या लिखूँ..... यह सोच कर, कलम रूक न जायें। वो लिखों ... सोच जहाँ थम न जायें। जिंदगी के सोपानों से होती हुई। क्षितिज तक लें जायें। जिंदगी के तमाम पहलू, लिखों। कुछ आम,कुछ खास, लिखों।। ईश्वर को, अभार व्यक्त करते हुयें। जीवन की कहानी लिखों। वेदों की जीवन में, बहती रवानी। लिखों।। लिखों........... मानवता सर्द क्यों हो गई है। ईश्वर की बनाई। स्वर्ग रूप धरती को, नरक में क्यों झोंक रही है। लिखों.......... दिलों में अब, प्रेम के बीज। अंकुरित क्यों होते नही अब। मानवता अपने हाल पर। क्यों..... यार-यार रो रही है। लिखों......... हम क्यों अपनी, सभ्यता भूला गये। हम तो..... अंधविश्वासों से , लड़न...
कब तक बेचारी कहलाओगी?
कविता

कब तक बेचारी कहलाओगी?

ममता रथ रायपुर ******************** कोई खींचेगा वस्त्र तुम्हारा कोई तुम पर मर्दानगी दिखाएगा बलात्कार, हत्या से अब तुम ही खुद को बचाओगी शस्त्र कब तक ना उठाओगी? यह कलयुग है सतयुग नही यहां शील बचाने कोई आएगा नहीं इन दु:शासन से बचने को अब कब तक ना शस्त्र उठाओगी आदमी के खाल में घुम रहे हैं भेड़िए स्नेह की आस किससे लगाओगी अब खुद को कितना सताओगी आखिर कब तक बेचारी कहलाओगी परिचय :-  ममता रथ पिता : विद्या भूषण मिश्रा पति : प्रकाश रथ निवासी : रायपुर जन्म तिथि : १२-०६-१९७५ शिक्षा : एम ए हिंदी साहित्य सम्मान व पुरस्कार : लायंस क्लब बिलासपुर मे सम्मानित, श्री रामचन्द्र साहित्य समिति ककाली पारा रायपुर २००३ में सांत्वना पुरस्कार, लोक राग मे प्रकाशित, रचनाकार में प्रकाशित घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, ...
मुझे रास आई न दुनिया तुम्हारी
ग़ज़ल

मुझे रास आई न दुनिया तुम्हारी

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़ज़ल - २१२ २१२ २१२ २१२ मुझे रास आई न दुनिया तुम्हारी। परेशां तुम्हारा यहाँ है पुजारी।। सुखी है वही जो ग़लत है जहाँ में। सही आदमी बन गया है भिखारी।। दरिंदे हैं बे-ख़ौफ़ कितने यहाँ पर। सरेआम लुटती बाजारों में नारी।। जो सौ में सवा सौ काहे झूठ यारों। वही रहनुमा बन गया है मदारी।। यही डर है सबको सही बोलने में। कहीं घट न जाए ये इज़्ज़त हमारी।। बड़ा तो वही है जो चलता अकड़ कर। शरीफों का जीना जहाँ में है भारी।। निज़ाम अब कहाँ जाए या रब बताओ। भरी है बुराई से दुनिया ये सारी।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, रा...
स्वीकार करो
कविता

स्वीकार करो

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** जो होना है वो होता है, तो फिर काहे को रोता है....। नागफनी से भरा हो मरुस्थल, या गुलाब से खिला हो उपवन। काँटो को तो जब सहना है। तो फिर कहे का रोना है। जो होना है वो होता है, तो फिर कहे को रोता है....। फ़ुहारों से भीगा हो मरुस्थल, या बरखा से महके उपवन। ना भीगा मन का वो कोना है, तो फिर कहे का रोना है। जो होना है वो होता है, तो फिर काहे को रोता है....। उष्ण बयार से तपे मरुस्थल, या पवन से हो शीतल उपवन। मधु से भी जख्मों को सीना है, तो फिर काहे का रोना है। जो होना है वो होता है, तो फिर कहे को रोता है....। शुष्क रेत से जमा हो मरुस्थल, या कीचड़ से सना हो उपवन। हँस-हँस कर जब जीना है, तो फिर काहे का रोना है। जो होना है वो होता है, तो फिर काहे को रोता है....। परिचय :- माधुरी व्यास "नवपमा" निवासी - इंदौर म.प्र. सम्प्रति - शिक्षिका (हा.से. ...
याद रखना बिटिया
कविता

याद रखना बिटिया

दीवान सिंह भुगवाड़े बड़वानी (मध्यप्रदेश) ******************** कोख में लेकर यत्न किया, तुझे जन्म दिया नींद देकर तुझे, खुद न कभी चैन लिया एक आह सुन तेरी, कई रातें जिसने न सोया उस माँ की ममता को याद रखना बिटिया। भूखा रह खुद, जिसने निवाला दिया तुझे पालने हेतु खेतों में दिन-रात काम किया कर्ज लेकर भी मुरादें तेरी, जिसने पूरी किया उस पिता का समर्पण याद रखना बिटिया। अपनी खुशियां त्याग, सपनों का बलिदान दिया पढ़ाने के लिए तुझे, खुद पढ़ना छोड़ दिया तेरी फीस जमा करने हेतु जिसने मजदूरी किया उस भाई का बलिदान याद रखना बिटिया। लक्ष्य मिले तुझे अपना, हर संभव प्रयास किया मंजिल अपनी पा ले तू, वह धैर्य-साहस दिया विपदाएं तेरी सारी, जिसने खुद झेल लिया उस बहन की उम्मीदें, ध्यान रखना बिटिया। खुद्दारी से अपनी, समाज में थोड़ा सम्मान पाया गरीबी में गुजार दी जिंदगी, कभी दगा न किया मेहनत कर ही कमाया और सभी को ख...
जीवन का सफर
कविता

जीवन का सफर

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** तमाम उम्र निकल जाती है, और हम समझ नही पाते कि एक सफर ही तो है जिंदगी जिसका मुकाम सिर्फ एक है,,,,, चाहे राजा हो या हो फकीर अंत सबका एक ही है।।।। बीच मे आते है कई पड़ाव कभी खुशी के, कभी गम के और हम चलते जाते है बस चलते ही जाते है सफर में मिलते जाते है कई मुसाफिर और बिछड़ते भी जाते है और देते जाते है नए अनुभव कभी मीठे, कभी कडुवे और हम उन अनुभव की गठरी बाँधे आगे बढ़ते जाते है कभी खुश होकर, कभी रोकर बस चलते जाते है लेकिन चलना तो अकेले ही है सफर में,, साथी तो बहुत है राह में....... कभी परिवार, कभी दोस्त,कभी प्यार लेकिन जो हर पल साथ निभाये वो हम खुद ही है यार........ तो क्यों किसी से उम्मीद रखें कि वो आपके साथ चले रख भरोसा खुद पर और अपने सफर की राह पकड़,,, कुछ करगुजर मुकाम आने से पहले कि लोग तेरे सफर को याद करे,,, एक खूबसूरत सफर है जिंदगी जिसको तू ...
काम नही–वेतन नही
कविता

काम नही–वेतन नही

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** काम है.... तो वेतन है। अक्सर यही कहा जाता है। ईश्वर तो अपने काम का, कोई भी वेतन नही पाता है। बस सब बनाये जाता है। काम है... तो वेतन है। बस इंसानी कामों को, वेतन दिया जाता है। काम करा कर, धनाढ्य सेठों द्वारा, वेतनभोगी का, आधा हिस्सा मार लिया जाता है। वो जीवन की जरूरतें भी, बड़ी मुश्किल से जुटा पाता है। साहूकार बनता जाता है, दूसरे के मारें वेतन से, तनता जाता है। फिर अपने नीचें, काम करने वालों पर, अपशब्दों से चढ़ता जाता है। वेतन पाने वाला, मंहगाई से दबता जाता है। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अप...
एक बहाना था
कविता

एक बहाना था

मनमोहन पालीवाल कांकरोली, (राजस्थान) ******************** पतंग ऊड़ाने का तो एक बहाना था इसी बहाने तुमसे मिलने आना था नज़र क्या चूके हम, घोर से देखो कटी ऊॅगली तुमको दिखाना था नज़र अंदाज कर रहे थे कभी कभी हक़ीकत-ए-नज़रो से खीजाना था भिन्न रंगो से सज रहा आसमा अपना इन्द्र धनुषी रंगो मे तुमको भीगोना था यही मिलन का एक रंग हे मेरा बार-बार तिरे दिल को लुभाना था "मोहन" तो इक रंग मे डूब गया हे बस इसमे तुमको भी अब नहाना था परिचय :- मनमोहन पालीवाल पिता : नारायण लालजी जन्म : २७ मई १९६५ निवासी : कांकरोली, तह.- राजसमंद राजस्थान सम्प्रति : प्राध्यापक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्...
प्रीत की पाती
कविता

प्रीत की पाती

रेखा दवे "विशाखा" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुमसे परिणय कर मैंने, धन्य किया जीवन अपना। ओ बाला तुम अपने आँगन, पल प्रति पल प्रसन्न रहना। जब कभी स्मरण हो मेरा, नमन माँ को करना तुम। जिसने मुझे बड़ा किया, उनसे प्रेरणा लेना तुम। ओ बाला तुम अपने आँगन पल प्रति पल प्रसन्न रहना। जब कभी स्मरण हो मेरा, बालक को गले लगाना तुम। धीर वीरों सी वीरता, उसको भी सिखलाना तुम। ओ बाला तुम अपने आँगन पल प्रति पल प्रसन्न रहना तुम मेरे नयनो की ज्योति, तुम ही मेरी समर्थ शक्ति। मात-पिता की हितकारी, अपने बच्चों की अनुरागी। तुमसे परिणय कर मैंने, धन्य किया जीवन अपना। ओ बाला तुम अपने आँगन पल प्रति पल प्रसन्न रहना। परिचय :- श्रीमती रेखा दवे "विशाखा" शिक्षा : एम.कॉम. (लेखांकन) एम.ए. (प्राचीन इतिहास एवं अर्थ शास्त्र) निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान में : श्री माधव पुष्प सेवा समिति कि सामाजिक कार...
मृगतृष्णा
कविता

मृगतृष्णा

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** सागर की गहराई लगती मृगतृष्णा है! अंबर की ऊँचाई लगती मृगतृष्णा है! निर्धन-निर्बल है परिवार! कुटिया है आवासाधार! परिणय योग्य आत्मजा सहित, कुल सदस्य संख्या है चार! आँगन की शहनाई लगती मृगतृष्णा है! अंबर की ऊँचाई लगती मृगतृष्णा है! कानन में काटे सब वृक्ष! बना उपनगर व्यापे कक्ष! पर्यावरण हुआ आहत, मौन ही रहे पक्ष-विपक्ष! बस्ती में अमराई लगती मृगतृष्णा है! अंबर की ऊँचाई लगती मृगतृष्णा है! नभस्पर्शी बने भवन हैं! बढ़ती जाती और लगन है! नियमित भू से दूर हो रहे, लटकन जैसा अब जीवन है! सदन संग अँगनाई लगती मृगतृष्णा है! अंबर की ऊँचाई लगती मृगतृष्णा है! स्वार्थकेन्द्रित है अब मानव! अंतर में रहता है दानव! पर परिचय की बात करें क्या, आत्मबोध हो गया असंभव! अपनी ही परछाई लगती मृगतृष्णा है! अंबर की ऊँचाई लगती मृगतृष्णा है! परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रश...
हिन्दू हूँ… मैं हिन्दू हूँ…
गीत

हिन्दू हूँ… मैं हिन्दू हूँ…

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** हिन्दू हूँ, मैं हिन्दू हूँ प्रेम दया का सिंधू हूँ।। सबका सोचूं मैं मंगल हो न किसी का अमंगल कण कण में विश्वास है देश को अर्पण सांस है धर्मनिष्ठ का बिन्दु हूँ हिन्दू हूँ मैं हिन्दू हूँ प्रेम दया का सिंधू हूँ।। राम नाम का सहारा है सारा जगत हमारा है अहिंसा परमोधर्मः है योगक्षेमं मेरा कर्म है गंगा का जलबिन्दू हूँ हिन्दू हूँ मैं हिन्दू हूँ प्रेम दया का सिंधू हूँ।। गीता के ज्ञान से दूर हूँ अज्ञान से तुलसी सूर के गाऊ गीत राम कृष्ण है मेरे मीत पुष्प पर दवबिन्दु हूँ हिन्दू हूँ मैं हिन्दू हूँ प्रेम दया का सिंधू हूँ।। सत्य ही मेरा शिव है सुंदर हर एक जीव है सदाशिव में रमता हूँ बंधुभाव से रहता हूँ करुणा का चरम बिन्दु हूँ हिन्दू हूँ मैं हिन्दू हूँ प्रेम दया का सिंधू हूँ।। राष्ट्र मेरी माता है गोद मे हर कोई सोता है वन्य जीव से नाता है वनांचल मुझे भात...
वंदे मातरम
कविता

वंदे मातरम

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** वंदे मातरम वेद मंत्र हैं नित इसका उच्चार करें। आओ भारत वासी मिलकर भारत का जयकार करें॥ सूरज की पहली किरणे जब वंदे मातरम गाती हैं। मंदिर में घंटी बजती हैं चिड़िये दाना खाती हैं॥ खुलते हैं विधा के मंदिर पुस्तक पूजी जाती हैं। मिलता हैं निस ज्ञान हमें यहाँ मानव एक हीं जाति हैं॥ गुरु शिष्य की, परंपरा की शिक्षा मिली, पुराणों से। अडिग रहो, निशदिन पथ पर कुछ सीखों, पेड़ पहाड़ो से॥ अनुशासित मय, हों जीवन यह चलना सदपुरुषों, के पथ पर। ले राष्ट्रभक्ति का, गौरव रथ बढ़ना निस्वार्थ विजय पथ पर॥ परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) विशेष : कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रदेश सचिव - अ.भा.वंशावली संरक्षण एवं संवर्द्धन संस्थान म.प्र, रचनाएँ ...
अनंत
कविता

अनंत

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** कठिनाइयों में सोचने की शक्ति आर्थिक कमी से बढ़ जाती संपन्न हो तो सोच की फुरसत हो जाती गुम। अपनी क्षमता अपनी सोच बिन पैसों के होजाती बोनी पैसे हो तो घमंड का बटुवा किसी से सीधे मुँह बात कहा करता। बड़े होना भी अनंत होता हर कोई एक से बड़ा छोटा जीता अपनी कल्पना और आस की दुनिया में। आर्थिकता से भले ही छोटा हो मगर दिल से बड़ा और मीठी वाणी से जीत लेता अपनों का दिल। बड़प्पन की छाया में हर ख़ुशी में वो कर दिया जाता/या होजाता दूर। इंसान का ये स्वभाव नहीं होता पैसा बदल जाता उसके मन के भाव जिससे बदल जाते स्वभाव जो रिश्तों में दूरियां बना मांगता ईश्वर से और बड़ा होने की भीख बड़ा होना इसलिए तो अनंत होता। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन...
हे योगेश्वर
भजन

हे योगेश्वर

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** हे योगेश्वर यह नागेश्वर- हे अभ्यंकर हे शिवशंकर! जागो जागो है प्रलयंकर- ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय! जागो -जागो हे भोले शंकर- संघार करो तू दानव दल का! कर फिर से तू नव नर्तन- मानवता की धर्म ध्वज को! अडिग करो ही नागेश्वर- खोलो त्रि नेत्र हे प्रलयंकर- "मणिकर्णिका" महासमसान है! मां-गंगा की पुनीत तट पर- महासमसान में धधक रही! अनवरत चिता की ज्वाला- अर्ध रात्रि में निशा रात्रि में- विचरण करते कई "अवधूत" मतवाला! मैं अकिंचन इनके जीवन रहस्य- को समझ न पाया हे भोले शंकर! तंत्र मंत्र योग क्षेम सब तेरी ही माया- भटक रहा मैं भी "महाश्मशान" में! हे काशीनाथ हे विश्वनाथ सब तेरी ही माया- श्री तैलंग स्वामी महा अवधूत ने- यहां किए थे कठिन साधना! कमरू के स्वर मेरे हृदय में भर- करो कृपा हे विश्वेश्वर ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय यह "महामंत्र"है पंचाक्षर! परिचय :- ओ...
वही दर्द
लघुकथा

वही दर्द

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ********************                                                            मोना को आज ट्यूशन से घर आने में देर हो गई, जैसे-तैसे वह जल्दी जल्दी चलने लगी तो तेज आंधी शुरू हो गई। उसकी किताबें बिखर गई और तेज बारिश के कारण लाइट भी चली गई। वह बहुत डर गई। अंधेरा हो गया था कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, जैसे तैसे वह एक ऑटो आकर रुका, उसने कुछ कहा नहीं और ऑटो में बैठ गई। भैया तिलक नगर जाना है, जी मैडम वह सोच रही थी कि, अच्छा हुआ ऑटो मिल गया वर्ना आज तो मुश्किल हो जाती। कुछ दूर जाने के बाद ऑटो वाला सुनसान रास्ते पर ले जाने लगा। भैया आटो रोको, आप मुझे कहां ले जा रहे हो? ऑटो वाले ने शांति से कहा कि, मैडम मेन रोड से ले जाऊंगा, तो पुलिसवाले रोकेंगे और प्रश्न पूछेंगे। आपको और देर हो जाएगी।इसलिए मैं दूसरे रास्ते से ले जा रहा हूं। आप निश्चिंत रहिए मैं आपको घर तक छोड़ द...
सूफियाना हुआ दिल
कविता

सूफियाना हुआ दिल

रेशमा त्रिपाठी  प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश ******************** सूफियाना हुआ दिल मचलने लगे हम। तेरी याद में नगमे पढ़ने हम।। कैसे बताए क्या चाहते हम। तेरी खुशबू में जो महकने लगे हम।। सूफियाना........ तेरे जुल्फों की घनी छांव में। दबी उंगलियों संग उलझने लगे हम।। तेरी याद में..... मेरे दिल के घरौंदे में आओं कभी थोड़ा बहक जाऊं मैं भी तेरे आगोश में सूफियाना ...... मैं भी बंजर हूं, बेकार सा थोड़ी उग जाओं तुम भी मौसमी पौध सी... सूफियाना ......।। परिचय :- रेशमा त्रिपाठी  निवासी : प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com प...
व्यक्ति वही धनवान है….
दोहा

व्यक्ति वही धनवान है….

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उ.प्र.) ******************** सिर पर मेरे है बहुत मित्रों का एहसान करूँ शुक्रिया किस तरह मैं ठहरा नादान व्यक्ति वही धनवान है मिलते जिसे सुमित्र जीवन को दोजख समझ, साथी अगर कुमित्र। तन,मन रहता है मगन, साथी अगर उदार, संकट के हर दौर में, करता बेड़ा बार मित्रों से मत कीजिए, दगा और फौरेब, वरना जग तुमको कहे, कातिल औरंजेब। कृष्ण.. सुदामा मित्रता देते लोग मिशाल, पर कलियुग में पड़ गया, इसका सहज अकाल। धैर्य,धर्म और मित्रता, है जीवन का सार, रखिए सदा संभाल के, देते ख़ुशी अपार। साहिल अनुपम मित्र है, कभी न टूटे आस,ल होने मत देना कभी, रिश्तों का परिहास परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी :जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि : पुस्तक लेखन, सम्पादन, कविता, ग़ज़ल, १०० शोध पत्र प्रकाशित,...
मिलन
कहानी

मिलन

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** बेटा, तेरी डाक मेज पर रखी है। पता नहीं यह लड़का क्यों कागज काले करता रहता है? मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आता। डाकिया भी रोज ही घर के चक्कर लगाता रहता है। कल ही तो कह रहा था, माँ जी प्रकाश को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक है। वह बहुत सुन्दर कहानी-कविताएं लिखता है। यह बहुत अच्छी बात है। अच्छा माँ जी अब मैं चलता हूँ। वह डाक में आए पत्रों को खोलकर पढ़ने लगा। ज्यादातर पत्रों में रचनाओं के प्रकाशन की सूचना थी और अति शीघ्र ही पत्रिका की प्रति भेजने का आश्वासन भी था। उसके मन को तृप्ति मिलती थी कि उसके लेखन का प्रयास सफल हो रहा हैं, चाहे धीरे-धीरे ही सही। उसने आखिरी पत्र भी खोल ही लिया।वह हैरान था यह पत्र उसे किसी मिस कविता ने एक सुंदर लेटर पैड पर लिखा था। पत्र में से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थीं। उसे मेरी रचनाएँ बहुत पसंद आई थी। खासकर कहानियाँ जो पार...
दुल्हन ही दहेज है
कविता

दुल्हन ही दहेज है

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** वास्तव में दहेज का अर्थ स्वेच्छा से दिया गया उपहार होता है, लड़की के मां-बाप का उस उपहार में स्नेह और प्यार होता है। समाज के कुछ लोभी और लालची ने स्नेह व प्यार के उपहार को व्यापार का बना दिया, भारतीय समाज में दहेज रुपी अभिश्राप फैला दिया। देश के कानून ने दहेज लेना व दहेज देना दोनों अपराध बना दिया, फिर भी समाज ने इसे देना-लेना बन्द नहीं किया। मानव तुने अपने ही समाज में ये कैसी कुप्रथा फैला दिया, दहेज लोभी को अपनी बेटी देकर उसको आत्महत्या करने पर विवष कर दिया। हर व्यक्ति की मानसिकता को इस समाजिक कुप्रथा ने बदल दिया, बहुमुल्य उपहरो के साथ बहू घर में आई तो समाज ने अच्छा मान-सम्मान बढ़ा दिया। मेरी बहू महंगे-महंगे उपहार घर में लाई है, समाज में मेरा मान-सम्मान बढ़ाई है। जबकि घर बहू के अच्छे संस्कार व कुशल व्यवहार से चलता है, ...
तू सब कुछ जानता है
कविता

तू सब कुछ जानता है

मनीषा शर्मा इंदौर म.प्र. ******************** कहते हैं तू सब कुछ जानता है। पर क्या मेरे मन की पहचानता है।। कहते हैं तु सब जगह साथ साथ है। तो क्या तू मेरे भी आस-पास है ।। कहते हैं तुझे तो सबकी ही फिक्र है। पर क्या तेरे यहां मेरे दर्द का भी जिक्र है।। कहते हैं सब कुछ तेरी मर्जी से होता है। यह तो बता अच्छा इंसान ही क्यों रोता है।। कहते है तू ही तो बेसहारो का सहारा है। तो क्या मेरी कश्ती का भी तू किनारा है।। इन सब सवालों का जवाब सिर्फ आस है। जैसा भी है जो भी है मुझे तुझ पर पूरा विश्वास है।। परिचय :-  मनीषा शर्मा जन्म : २८/८/१९८२ शिक्षा : बी.कॉम., एम. ऐ. लेखन शुरुआत वर्ष : लेखन में रुचि बचपन से है लेखन विधा : कविता ,व्यंग्य ,कहानी समसामयिक लेखन। व्यवसाय : आकाशवाणी केंद्र इंदौर उद्घोषक निवासी : इंदौर म.प्र. घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कवि...