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ऊंची कुर्सी… नीचे काम
कविता

ऊंची कुर्सी… नीचे काम

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** बदल गया युग, बदल गये सब जीवन के आयाम। योगेश्वर! हम कब तक ढोयें कर्मयोग निष्काम।। युद्ध अधर्म-विरुद्ध‌‌‌ गये जीते, क्या धर्म-भरोसे, अश्वत्थामा,कर्ण गये मारे क्या पुण्य-करों से; कटे अंगूठे एकलव्य के कबतक करें प्रणाम?? अगर जुए में धर्मराज हारेंगे द्रुपद-सुता को, राम परीक्षा लेकर, वन भेजेंगे जनक-सुता को; तो समाज झेलेगा इसका निश्चित दुष्परिणाम।। यहां धर्म की नहीं, सिर्फ स्वारथ की सत्ता है, महाधूर्त पाखण्डी की ही अधिक महत्ता है; जितनी ऊंची कुर्सी जिसकी, उतने नीचे काम।। परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करव...
प्रदूषण मुक्त सांसें : पर्यावरण की महत्ता बताती जरूरी किताब
पुस्तक समीक्षा

प्रदूषण मुक्त सांसें : पर्यावरण की महत्ता बताती जरूरी किताब

योगेश कुमार गोयल नजफगढ़ (नई दिल्ली) ******************** पुस्तक : प्रदूषण मुक्त सांसें लेखक : योगेश कुमार गोयल पृष्ठ संख्या : १९० प्रकाशक : मीडिया केयर नेटवर्क, ११४, गली नं. ६, एमडी मार्ग, नजफगढ़, नई दिल्ली-११००४३ मूल्य : २६० रुपये समीक्षक : लोकमित्र हाल के सालों में यह पहला ऐसा मौका है, जब पिछले कुछ महीनों में दुनिया के बिगड़ते पर्यावरण और प्रदूषण की किसी गहराती समस्या ने हमारा ध्यान नहीं खींचा। शायद इसकी वजह यह है कि दुनिया पिछले कुछ महीनों से कोरोना संक्रमण के चक्रव्यूह में फंसी हुई है, नहीं तो कोई ऐसा महीना नहीं गुजरता, जब बिगड़ते पर्यावरण की बेहद चिंताजनक और ध्यान खींचने वाली कोई खबर दुनिया के किसी कोने से न आती हो। वास्तव में २१वीं सदी की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी या आतंकवाद नहीं है। इनसे भी बड़ी समस्या हर तरह का बढ़ता प्रदूषण है, जिसके कारण धरती पर लगातार विनाश का खतरा मंडरा रहा...
सूर्यकांत निराला चालीसा
दोहा

सूर्यकांत निराला चालीसा

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* शारद सुत को नमन करुं, कीना जग परकाश। सूर अनामी गीतिका, परिमल तुलसीदास। अणिमा बेला अर्चना, चमेली अरु सरोज। गीत कुंज आराधना, सूरकांत की खोज।। हिन्दी कविता छंद निराला। सूर्यकांत भाषा मतवाला।। बंग भूमि महिषादल भाई। मेंदनपुर मंडल कहलाई।। पंडित राम सहाय तिवारी। राज सिपाही अल्प पगारी। इक्किस फरवरी छन्नु आई। पंच बसंती दिवस सुहाई।। बालक सुंदर जन्मा भाई। सकल नगर में बजी बधाई।। जनम कुंडली सुर्ज कुमारा। पीछे सूर्यकांत उच्चारा।। बालपने में खेल सिखाया। कुश्ती लड़के नाम कमाया।। हाइ इस्कूल करी पढ़ाई। संस्कृत बंगला घर सिखलाई ।। धीरे-धीरे विपदा आई। संकट घर में रहा समाई।। तीन बरस में माता छोड़ा। बीस साल में पिता विछोहा।। पंद्रह बरस में ब्याह रचाया। वाम मनोहर साथ निभाया।। पत्नी प्रेरित हिंदी सीखी। सुंदर रचना रेखा खींची।। शोषित पीड़ित कृषक लड़ाई। छोड़ न...
“मैथिली” पथ प्रदर्शक
कविता

“मैथिली” पथ प्रदर्शक

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** दशा दिशा समाज सुधार जगत की बहुधा टूटी बिखरी है हर बार भूतल को ही स्वर्ग सदृश्य बनाने 'मैथिली' स्वप्न भूल चुके हैं यार मत भूलो इस देश समाज का तब तलक ना होगा पूर्ण उद्धार जलन स्वार्थ विवादों का पूर्ण अंत जड़ सहित मिटाना अबकी बार। दायित्वों का कैसा उपभोग किया अधिकारों का मनमाना उपयोग किया सामाजिक पद और रिश्तों को कटुता कलंक के पन्नों का रोग दिया पदों की गरिमा का हासिल क्या था जो पाया वो भी डूबा मझधार जलन स्वार्थ विवादों का पूर्ण अंत जड़ सहित मिटाना अबकी बार। सप्तम स्वर में स्व महिमा गुणगान लेकिन नेतृत्व क्षमता का अधकचरा ज्ञान लकीर घटाने की ओछी फितरत ने दिखलाई समाज को झूठी शान खोए संस्कारों को अब गली-गली पुनः रोपण कर खूब बढ़ाएं पैदावार जलन स्वार्थ विवादों का पूर्ण अंत जड़ सहित मिटाना अबकी बार। रौशन चिराग सम प्रतिभाशाली बच्चा समाज आधार औ...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग ३०
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग ३०

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** दिन कैसे जल्दी जल्दी गुजरते रहते हैं इसका हम अंदाज भी नहीं लगा सकते। मैं फिर से जनकगंज में सरकारी प्राथमिक विद्यालय में जाने लगा था। मेरी तीसरी कक्षा की परीक्षाएं ख़त्म हो गयी थी और विशेष यह था कि इतना भटकने के बाद भी मैं प्रथम श्रेणी में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुआ था। काकी ने तो पूरे बाड़े में ही पेढ़े बांटे थे। नानाजी ने भी दादा को चिट्ठी लिखकर मेरे पास होने की खबर कर दी थी। दादा का भी नानाजी को जवाब आ गया था जिसके अनुसार हमें ये भी पता पड़ा कि माँजी और सुशीला बाई सिवनी में थी। सुशीलाबाई ने भी अपना त्यागपत्र भेज दिया था पर उस पर फैसला जुलाई महीने में स्कूल खुलने के बाद ही होने वाला था। दादा का जरूर भोपाल तबादले का आदेश अभी तक उन्हें नहीं मिला था। कुल मिलाकर इन सब अनिश्चतितताओं के कारण दादा के विवाह की तिथि अभी तय नहीं हो सकी थी। मेरे स्कू...
बहिन भाई का संबंध
कविता

बहिन भाई का संबंध

संजय जैन मुंबई ******************** छोटी बड़ी बहिनों का, हमे मिलता रहे प्यार। क्योकि मेरी बहिना ही, है मेरी मातपिता यार। जो मांगा वो लेकर दिया, अपने आपको सीमित किया। पर मांग मेरी पूरी किया, और मेरे को खुश करती रही। मेरी गलतियों को छुपाती रही, और खुद डाट खाती रही। पर मुझे हमेशा बचती रही, ऐसी होती है बहिना। उन सब का उपकार में, कभी चुका सकता नहीं। अपनी बहिनों को मैं, कभी भूला सकता नहीं। रहेंगी यादे सदा उनकी, मेरे दिल के अंदर। जो कुछ भी हूँ आज में, बना बदौलत उनकी ही। ये कर्ज हमारे ऊपर उनका जिसको उतार सकता नही। मैं अपनी बहिन को जिंदा, रहते भूल सकता नही। रक्षा बंधन पर बहिना से, मिलना तो एक बहाना है। वो तो मेरी हर धड़कन में, बसती क्योंकि बहिन हमारी है। इसलिए टूट सकता नही, भाई बहिन का ये बंधन। इसलिये भूल सकता नही, रक्षा बंधन रक्षा बंधन।। उपरोक्त मेरी कविता सभी भाइयों की ओर से बहिनों के लिए समर्पित...
राखी का त्यौहार
कविता

राखी का त्यौहार

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** घिर आये बदरा है, झूम उठा ये मनवा हैं, रिमझिम बरसी फुहार है, आया राखी का त्यौहार है। बीरा ने खुशियों की बारिश की है, भावज की पायलिया छनक उठी है, उमंगों से भरा आया घर और द्वार है। आया राखी का त्यौहार है। भाई-बहनों के न्यारे रिश्ते है, माता के आँचल में आज सिमटे है, प्रेम बंधन में बंधे सब आज है। आया राखी का त्यौहार है। बहना ने भैया से अरज ये की है, प्रेम से अखियाँ की डिबिया भरी है, खूब लुटाया, बाबा ने लाड़ है। आया राखी का त्यौहार है। छोटी सी रेशम की ये डोरी है, इसमे ही रिश्तों कि आस बंधी है, अनोखा ये बंधन, न्यारा ये प्यार है। आया राखी का त्यौहार है। कोरोना ने कैसी ये पीड़ा दी है, मन में यादों की झड़ियाँ लगी हैं, यादों की लड़ियों में बीता दिन आज है। आया राखी का त्यौहार है। घिर आये बदरा है, झूम उठा ये मनवा है, रिमझिम बरसी फुहार है, आय...
मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ
कविता

मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ

अभिषेक शुक्ला सीतापुर (उत्तर प्रदेश) ******************** मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ मेरा मित्र सखा तो मैं ही स्वयं हूँ, मैं हूँ सुदामा तो मैं ही कृष्ण हूँ। मैं ही सुख-दुख का संयोग हूँ, मैं हूँ मिलन तो मैं ही वियोग हूँ। मैं माँ की ममता-सा शान्त हूँ, मैं ही द्रोपदी का अटूट विश्वास हूँ। मैं प्रलय का अन्तिम अहंकार हूँ, मैं ही भूत, भविष्य और वर्तमान हूँ। मैं नित्य ही प्रभु का वन्दन करता हूँ, परिश्रम से स्वेद को चंदन करता हूँ। विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत रखता हूँ, जुनून से अपने उनका सामना करता हूँ। जब कभी कुण्ठा अत्यधिक व्याप्त होती है, अन्तर्मन में सुदामा से मुलाकात होती है। स्वयं ही स्वयं से स्वयं का आकलन करता हूँ, स्वयं सुदामा बन कृष्ण का अभिनंदन करता हूँ। अपनी परिस्थितियों का मैं ही कर्णधार हूँ, मैं हूँ पुष्प तो मैं ही तीक्ष्ण तलवार हूँ। मेरा मित्र सखा तो मै...
मानसिक स्वास्थ्य को कैसे रखें दुरुस्त?
स्वास्थय

मानसिक स्वास्थ्य को कैसे रखें दुरुस्त?

डॉ. ओम प्रकाश चौधरी वाराणसी, काशी ************************ विगत कई महीनों से हम सभी प्रायः घरों में ही कैद हैं अत्यंत आवश्यक होने पर ही घरों से बाहर निकल रहे हैं। आफिस का काम घर से ही 'वर्क फ्रॉम होम' कर रहे हैं। लोगों से मिलना-जुलना, चौराहे, चट्टी, हाट-बाजार में जाना न के बराबर हो गया है। सुख-दुःख बांटने का अवसर अब केवल संचार माध्यम से हो रहा है। जियनी-मरनी, शादी-विवाह में शामिल होना दूर की बात हो गयी है। मुहल्ले,कॉलोनी में कोई कोरोना पॉजिटिव हो गया तो 'हॉट स्पॉट'होते ही बांस-बल्ली से घिरकर घरों में रहने को अभिशप्त। ये सभी हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। वास्तव में जो 'सोशल दिस्टैंडिंग'की बात की जा रही है, वह लोगों से आपस में भौतिक दूरी बनाए रखने की अपील है ताकि एक दूसरे को संक्रमित होने से बचाया जा सके।लोग घरों में रहने के लिए बाध्य हैं। प्रतिदिन अट्ठाईस...
प्रेमचंद चालीसा
दोहा

प्रेमचंद चालीसा

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* उपन्यास व गद्य कथा, हिन्दी का उत्थान। प्रेमचंद सम्राट हैं,कहत है कवि मसान।। प्रेम रंग सेवा सदन, प्रेमाश्रम वरदान। निर्मल काया कर्म प्रति, मंगल गबन गुदान।। प्रेमचंद लेखक अभिनंदन। हिन्दी विद्जन करते वंदन।।१ डाक मुंशी अजायब नामा। जिनकी थी आनंदी वामा।।२ मास जुलाई इकतिस आई। सन अट्ठारह अस्सी भाई।।३ उत्तर लमही सुंदर ग्रामा । प्रेमचंद जन्मे सुखधामा।।४ धनपतराया नाम धराये। पीछे नवाबराय कहाये।।५ सन अंठाणु मैट्रिक पासा। बनके शिक्षक बालक आशा।।६ इंटर की जब करी पढ़ाई। दर्शन अरु भाषा निपुणाई।।७ सात बरस में माता छोड़ा। चौदह पिता गये मुख मोडा।।८ दर दर की बहु ठोकर खाईं। बाला विपदा खूब सताईं।।९ बाल ब्याह से धोखा खाया। पीछे विधवा को अपनाया।।१० शिवरानी को वाम बनाये।। श्रीपत अमरत कमला पाये।।११ सन उन्निस शुभ साल कहाया। सोजे वतन देश में छाया।।१२...
राखी
कविता

राखी

राज कुमार साव पूर्व बर्धमान (पश्चिम बंगाल) ******************** राखी का त्यौहार है आया भाई-बहन के चेहरों पर खुशियां है लाया पीतल की थाली में राखी, चंदन, दीपक, कुमकुम,हल्दी, चावल के दाने और मिठाईयां लेकर बहन ने भाई के माथे पर तिलक लगाकर कलाई में राखी है बंधवाया। बहन ने अपने भाई से रक्षा करने का वचन है दिलवाया। परिचय :- राज कुमार साव निवासी : पूर्व बर्धमान पश्चिम बंगाल घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर ...
बरसि के मास
कविता

बरसि के मास

तेज कुमार सिंह परिहार सरिया जिला सतना म.प्र ******************** बरसि के मास सामन सामन के पूरनमासी भाई बहिन के प्यार कै आय या तिउहार राखी भाई के मान आय बहिन के अरमान आय इंद्र के जीतय के इंद्रानी तप त्याग आय भारत के नही दुनिया के त्योहार आय पामन बंधन राखी सुर सत्ता में सोधन राखी अपने मन म राखी रच्छा के प्रन राखी पै या साल राखी कोरोना म कइसन राखी घर म है कैदि राखी राखी म न आई राखी राखी के आँख पानी कइसन के कहइ जुमानी कलाई सून बिनै राखी बस रखी म नेक राखी परू साल जो भलाई राखी मिली भेटि कै मनाऊँब राखी परिचय :- तेज कुमार सिंह परिहार पिता : स्व. श्री चंद्रपाल सिंह निवासी : सरिया जिला सतना म.प्र. शिक्षा : एम ए हिंदी जन्म तिथि : ०२ जनवरी १९६९ जन्मस्थान : पटकापुर जिला उन्नाव उ.प्र. घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।. ...
स्वतंत्रता
कविता

स्वतंत्रता

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** स्वतंत्रता प्रभात की खिलते हैं खलिहानों में वेदों से ले पुराणों में ऋषियों के आह्वान में प्रिय स्वतंत्र देश है गंगा पखारती जहाँ धरा ये विश्वेश है। क्षितिज गगन हरित है वन, सिद्धि औ यश का संचरण पवन-पवन कहे सदा स्वतंत्र मन प्यारा वतन इतिहास है यह कह रहा स्वतंत्रता जय मान की धरा ये विश्वेश है। तीर्थों का तीर्थ देश है कोटि आदर्श भेस है स्वतंत्रता के कंठ से कर रहे जय नाद हैं समता के संवाद का ना कोई व्यवधान है धरा ये विश्वेश है। परिचय :- डाँ. बबिता सिंह निवासी : हाजीपुर वैशाली (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के ...
सच्चे मित्र
संस्मरण

सच्चे मित्र

डॉ. सर्वेश व्यास इंदौर मध्य प्रदेश ********************                                      जिंदगी की उपादोह में व्यक्ति ने अपने आपको इतना उलझा लिया है कि कभी पीछे मुड़कर देखने का मौका ही नहीं मिलता। आजकल व्यक्ति के चिंतन का मुख्य बिंदु है, भविष्य में क्या करना है? कैसे करना है? इस भागा दौड़ी में वह अपने आप को ना जाने कहां छोड़ आया है? जिसे खोजने के लिए उसे समय चाहिए, जो शायद आज उसके पास नहीं है। इसी भागा-दौडी़ और उपादोह बीच अचानक कोरोना आया, लाक डाउन हुआ, गाँव रुक गया, शहर रुक गया, देश रुक गया, विदेश रुक गया और सबसे बड़ी बात मनुष्य रुक गया, हाँ-हाँ मनुष्य रुक गया। जहां यह कोरोना बहुत सारी समस्याएं लेकर आया, वही यह एक अवसर लेकर आया-खोजने का। किसको? अपने आप को और अपनों को। यह अवसर लाया उस यात्रा पर पीछे जाने का, जिस यात्रा के किसी मोड़ पर हम अपने आपको और अपनों को पीछे छोड़ आए थे। मैंने स...
मित्रता की परिभाषा
कविता

मित्रता की परिभाषा

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** मित्र एक शब्द है जाना पहचाना सा.... दिल के क़रीब कोई अपना सा.... जिससे नहीं हो कोई भी सम्बन्ध.... पर हो दिल के गहरे बंधन। जो बिन कहे सब समझ जाएं जिसे देख दर्द भी सिमट जाए.... जहाँ उम्र भी ठहर जाए.... जिसे देखकर ही आ जाये सुकून और सब तनाव हो जाये गुम.... तो वह है मित्र जब मुश्किलों से हो रहा हो सामना.... और लगे कि अब किसी को है थामना तब जो हाथ बढ़ाये वह है मित्र.... निःस्वार्थ, निश्छल, और सब सीमाओं से परे जहाँ बाकी न रह जाये कोई आशा.... बस यही है मित्रता की परिभाषा परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप इंदौर निवासी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौ...
उनकी यादें
कविता

उनकी यादें

रवि कुमार बोकारो, (झारखण्ड) ******************** आँखों के बीच समुंदर मे मौसम ने की बदमाशी है। सोते ही नही हम रातों को केसी ये तन्हाई हैं।। यादों के बीच समुंदर में तैर रहा हुँ मै। उनकी याद की 'यादो' से अब गैर हुआ हुँ मै।। माँ की ममता भुल गया में भुल गया राखी त्यौहार। जबसे पाया हे तुमको, मै भुल गया सारा संसार।। ना दोस्त रहें ना प्यार रहा ना रहा मेरा घर-संसार। तस्वीरो में केद होके, बस रह गई उनकी यादें हजार।। परिचय :- रवि कुमार निवासी - नावाड़ीह, बोकारो, (झारखण्ड) घोषणा पत्र : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindir...
भाई-बहन
कविता

भाई-बहन

उषा शर्मा "मन" बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) ******************** भाई-बहन का प्रेम से भरा, ऐसा त्योहार है रक्षाबंधन। रक्षा का सूत्र कलाई पर सजा, ललाट पर लगा ये रोली-चंदन। राखी है एक अद्भुत बंधन, जिसकी ना हो शब्दों में अभिव्यक्ति। भाई-बहन की असीम डोर, बांध रही रक्षा की यह पंक्ति। हर बहन को मिल जाती सारी खुशी, जब भाई की कलाई पर राखी बांधती। साथ ही भगवान से भाई की खुशी संग, लाखों दुआएं व खुशियां मांग लाती। आशीष-उमंग से भरा बहन का, भाई के प्रति ऐसा है प्रेम। जीवन का कैसा भी मोड़ हो, बहन-भाई का रिश्ता ना होगा कभी कम। परिचय :- उषा शर्मा "मन" शिक्षा : एम.ए. व बी.एड़. निवासी : बाड़ा पदमपुरा, तह.चाकसू (जयपुर) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते है...
माँ
कविता

माँ

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** माँ तु फूल की डाल है वो, जो कभी ना मुजराने दिया मुझे। सर्वप्रथम मुख देखा है मैंने तेरा, तूने ही जन्म दिया है जो मुझे। गिर ना जाओ माँ कहीं में, चलना सिखाया है तूने मुझे। तू ही गुरु तू ही अन्नपूर्णा है माँ........ तूने खुशियां दी मुझे वो माँ, कभी तेरे आंचल से दूर गया नहीं मैं। जब रोता में माँ हँसाने का प्रयास करती तू, आज बारी मेरी तो कैसे दूर छोड़ जाऊं मैं। आशीर्वाद दे माँ तू मुझे अब, सपने सच करने चलता हूं मैं। तू ही लक्ष्मी तू ही वंदना हे माँ....... परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी (राजसमंद) राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प...
रक्षाबंधन
कविता

रक्षाबंधन

जसवंत लाल खटीक देवगढ़ (राजस्थान) ******************** राखी का त्यौहार आया, संग में खुशियां हजार लाया। भाई-बहन का सच्चा प्यार, प्रेम के धागे में पूरा समाया।। बहन अपने पीहर आयी, घर में फिर से रौनक छायी। बाबुल के बगिया की चिड़िया, फिर से घर में बहार लायी।। सबके चेहरे खिले-खिले, हंस-हंस कर सब बात़े करते। सब बचपन को याद करके, फिर से जीने की आस करते।। माथे पर तिलक लगा कर, कलाई पर राखी बांधती है। जीवन भर प्यार के संग-संग, बहन रक्षा का वचन मांगती है।। कहती है मेरे प्यारे भैया, तुम राखी की लाज रख देना। मां- बाप की सेवा करना, और उनको दुःख तुम मत देना।। शराब का सेवन मत करना, गाड़ी हेलमेट पहन चलाना। घर पर राह तकते बीवी-बच्चे, उन पर खूब प्यार लुटाना।। बहन तो इतना ही चाहती, अपने घर का मान बढाती। बहन बड़े प्यार से भाई की, कलाई पर राखी सजाती।। बहन बेटी जिस घर में होती, उस घर में सदा खुशियां आती...
धूप छांव आते हैं
कविता

धूप छांव आते हैं

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ******************** धूप छांव आते हैं ! पूरा असर दिखाते हैं !.. धूप छांव मुट्ठी रेत उठाई हैं, प्यास भी बुझाई हैं, मृगतृष्णा नचाती हैं, भ्रम जाल बिछाती हैं, सूरज बनकर दावानल कभी दिन-रात जलाते हैं !... धूप छांव समय चक्र चलता है, मानव मन छलता है, सुख दुख का डेरा है, राग द्वेष का घेरा है, काल नियंता सबको नियंत्रित धूरी घुमाते हैं !... धूप छांव अनिश्चय सब फैला है, दो दिनों का मेला है, छल छिद्र भरे पड़े हैं, हानि लाभ अटे पड़े हैं, जिजीविषा के फेरे में सब अपना दांव लगाते हैं !... धूप छांव कर्म प्रधान माना है, धर्म महान जाना है, पुण्य सदा साथ चलेंगे, बाकी सारे हाथ मलेंगे, पाप संताप के झमेले में सब सपना नया सजाते हैं !... धूप छांव परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
अभी तो बहुत हौसला है
कविता

अभी तो बहुत हौसला है

दीवान सिंह भुगवाड़े बड़वानी (मध्यप्रदेश) ******************** अभी तो बहुत हौसला है मुझमें, बेजान नहीं हूँ मै, इस मतलबी दुनिया से अनजान नहीं हूँ मै। कोई कुछ भी कहे परवाह करता नहीं हूँ मैं, इस बेदर्द जमाने से भी डरता नहीं हूँ मै। पढूंगा-लिखूंगा नवाब भी बनूँगा मै, माता-पिता का नाम रौशन करूंगा मै। मंजिलो का मुसाफ़िर हूं मै, ख़बर कामयाबी की भी सुनाऊंगा मै। वक्त को मै बदलकर दिखाऊंगा, आसमान में भी परचम लहराउंगा। राहें आसान नहीं है मेरी, जानता हूं मै, नामुमकिन कुछ भी नहीं, यह मानता हूं मै। ठोकरें खाकर गिरता हूं मै, गिरकर उठता सम्भलता हूं मै। मुसीबतें कितनी भी हो, घबराता नहीं हूं मै धोखा अपने ही देते हैं, बस उनसेे डरता हूँ मै। कोसू किस्मत को, इतना मै बुजदिल नहीं हूं कमजोर जरूर हूं, मगर मै कायर नहीं हूं। थककर बैठ जाऊं बीच सफ़र में, इतना भी नालायक नही हूं मै। नाम मेरा भी होगा दुनिया में, बेनाम मर जाऊं...
रेशम के धागे
लघुकथा

रेशम के धागे

सुभाषिनी जोशी 'सुलभ' इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** वरुण की एक ही बहन है रीमा। उसके विवाह को पांच वर्ष हो गये। ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह रक्षाबंधन पर नहीं आई परन्तु इस वर्ष का रक्षाबंधन कोरोना काल में आया। वरुण का मन यह माननें को तैयार नहीं था कि इस वर्ष उसकी कलाई पर बहना की राखी नहीं सजेगी। रीमा भी बहुत लालायित थी मायके जाने को पर दोनों ने अपनी भावनाओं के प्रवाह को काबू में करके तय किया कि हम कोरोना काल में स्वास्थ्य मंत्रालय के नियमों का पालन करेंगे और सामाजिक दूरी बनाए रखेंगे। यही सोंचकर रीमा बाजार भी नहीं गई और घर में रखे कुछ रेशम के धागे एक लिफाफे में रखे, साथ में एक चिट्ठी में लिख दिया भाई इन धागों को मेरी राखी समझ अपनी बिटिया चीनू से बंधवा लेना। रीमा ने नम आँखों से वह लिफाफा पोस्ट कर दिया। परिचय :- सुभाषिनी जोशी 'सुलभ' जन्म तिथि : ०३/०४/१९६४ शिक्षा : बी. एस. सी; एम.ए.(अ...
राखी पे क्यों नही आये भईया
कविता

राखी पे क्यों नही आये भईया

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** यह कविता समर्पित है। देश के दो लाल (जवान) शहिद किशन लाल, और शहीद देव कुमार, जी को रक्षाबंधन के ठीक कुछ ही दिन पहले शहादत को समर्पित हो गए। इन्हें शत शत नमन है। 🙏🙏 दिलों में दीप खुशियों की जलाए बैठी थी,,, आएगा मेरा भईया आस लगाए बैठी थी,, पागल सी बनके बहना लोग से पूछे बार बार,, राखी पे क्यों ना आये, मेरे भईया अबकी बार।। फूलों की थाली हाथों में सजाएं बैठी थी,, चंदन, मिठाई, राखी सब लियाए बैठी थी,, बहन का भी अब सब्र का बांध टूट रहा था,, आँखों की आंसू बनके दरिया फुट रहा था,, क्यों भूल गया है तू अब माँ-बाबुल का दुलार राखी पे क्यों ना आये, मेरे भईया अबकी बार।। आँगन बैठी रोये बहना भाई के लिए श्रद्धा से राखी लाई हूँ कलाई के लिए सुनो ना भईया मुझे तुम इतना सताओ ना कर लूंगी थोड़ा इंतजार जल्दी से आओ ना ना चाहिए हमें मोतियों की माला और हार,, राखी ...
कथासम्राट प्रेमचंद
कविता

कथासम्राट प्रेमचंद

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन! हे आर्यावर्त के सूर्य! तुम्हें क्या दीया दिखाऊँ!! हे मानवता के दिव्य उज्ज्वल रूप! बलिहारी जाऊँ। दीन - हीन-पीड़ितों के हित लहराय तुझ हिय में प्रखर : कैसी अप्रतिम उत्कट सहानुभूति का अगाध सागर! सादा जीवन जीया औ सदा ही रखे उच्च विचार! अपनी कथनी करनी से दिखाय सदा उच्च संस्कार!! साहस, संघर्ष, पौरुष के साकार रूप रहे सदा तुम! सदा ही किये चुनौतियों और मुश्किलों का सामना तुम!! जीवन के पथ पर अनवरत चलते अनथक राही तुम! सतत् प्रेरणा के शुभ स्रोत बने परम उत्साही तुम!! बालकाल से ही जीया अभावों का दूभर जीवन! खेलने-खाने की उम्र से ही करन लगे चिंतन-मनन!! मांँ की ममता से भी वंचित, हा महज आठ की वय में! झेला विमाता का दुर्व्यवहार औ पिता का धिक्कार!! कैशोर वय में ही आ पड़ा तेरे कोमल कंधों पर : पूरे परि...
खाली स्थान
लघुकथा

खाली स्थान

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** गंगा की याद आते ही मन पूरी तरह उचट जाता था। सभी कुछ था मेरे पास। आज तक मैं जीवन में दौड़ ही रहा था। कभी डिग्री पाने के लिए, कभी नौकरी पाने के लिए। मैं तो अपने घर में ही खुश था। अपने गाँव में, अपने खेतों में, बाप-दादा की तरह। मैं भी खेती करना चाहता था। मुझें बचपन से ही खेत-खलिहान अपनी तरफ खीचते थे, लहलहाती फसलें, माटी की भीनी-भीनी सुगंध। ऐसा सादा जीवन ही मुझें पसन्द था। पर उसकी जिद के आगे मै नतमस्तक हो गया था। वही चाहती थी कि मै पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनू। जब भी पीछे मुड़कर उसका बलिदान देखता हूँ, परेशान हो उठता हूँ। हमेशा मेरे पीछे लगी रहती थीं। जब भी मै विदेश जाने की बात पर टाल मटोल करता। उसका प्यार भरा स्पर्श, अपनेपन का अहसास मुझें अन्दर तक सहला जाता। उसके इस प्यार भरे अहसास ने ही मुझें विदेश जाकर डॉक्टरी करने को मजबूर कर दिया था। उसी का प...