मजनूं
डॉ. चंद्रा सायता
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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मैं तुम्हारी गली से गुजरा था कई बार यकीन मानो।
ना जाने क्या सोचकर रह गया। तुमसे मिल ना सका
मैंने तुम्हारे घर की खिड़की देखी
पैबंद लगा टाट का पर्दा नहीं था वहां।
लहराता रेशमी पर्दा मानो कह रहा था।
"वह अब यहां नहीं रहती" पर्दों के
इनकार को सही मान लिया।
तुमसे मिल ना सका।
तेरे दर की चौखट से आती रोशनी,
खूबसूरत रेशमी पर्दों की शान बढ़ा रही थी।
पंखे की तेज हवा उसके इतराने में मददगार थी।
तुम भला यहां कैसे रह सकती थी?
मैंने समझाया अपने मन को।
तुमसे मिल न सका।
बड़ी खाला के खखारने की
आवाज खामोश हो गई थी।
शायद बदले में रुक रुक कर
खिलखिला हट की गूंज रही थी।
बाहर रखी हसीन चप्पलें
मानो कह रही थी ।
"कौन चाहिए?" आंखों की कोरें
शरारती हंसी से भरी होती।
मैं दीवाना इतना भर कह
आगे बढ़ गया "कोई नहीं"
असल में तुम्हारी चप्पल देख रहा था
जैसे चोर ...























