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आओ इस बार अपने मन के अंदर बैठे हुए रावण का अंत करें
आलेख

आओ इस बार अपने मन के अंदर बैठे हुए रावण का अंत करें

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ********************                                                           हम हर वर्ष दशहरा में बुराई का प्रतीक रावण का पुतला जलाते हैं। पुतलों की ऊंचाई हर बार बड़ी और बड़ी होती जाती है। रावण का पुतला दहन कर हम अपने आप को राम के तुल्य मान लेते हैं, और खुश हो जाते हैं। आपको मालूम है कि रावण अपने बड़ी-बड़ी आंखों को दिखाकर और बड़े बड़े दांत दिखाकर जोर-जोर से हंसता है, और कहता है कि रे! मानव तुम लोग मुझे जिंदा जला नहीं सकते, इसलिए कागज का जला कर ही खुश हो जाते हो। मैं मरता कहां हूं? मैं तो हर वर्ष और अधिक शक्तिशाली होकर तुम्हारे सामने प्रकट हो जाता हूं, और तुम लोग मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। सही भी तो है कि अगर हम अपने अंदर बैठे हुए रावण (बुराई) का अंत कर दे, तो फिर रावण के पुतले को जलाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। आज हर मानव के मन में दानव कुण्डली मारक...
मासूमियत
कविता

मासूमियत

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उ.प्र.) ******************** (बेटी को समर्पित) हमने देखी है मासूमियत एक सच की तरह, वो मासूम सी है, स्निग्ध चांदनी सी धवल भी, शक्ल पर नूर सा बिखरा है उसके शुद्ध, शांत और सौम्य सी है। कभी नन्ही, चंचल, अल्हड़पन से घिरी हुई से, कभी कठोर, अटल, अडिग सी आसमान की ऊंचाई को नापती हुई दिखती है, कभी गंभीर, समुंदर की गहराई छुपाए हुए चुपचाप सी उमंग की लहरें भी बेतहाशा दौड़ पड़ती हैं ठोकर भी खाती हैं, वापस भी आती हैं, गिर के उठती भी हैं, सपने कल्पना बनकर आंखों में सजते भी हैं आंख खुली तो वो हकीकत बनकर टूटते भी हैं। फिर भी उसकी मासूमियत जिंदा है उसमे, कल भी थी, आज भी है, मासूम सी ही रहेगी खुद में।। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए.,एम.फिल – समाजशास्त्र,पी....
लड़ रहे… बढ़ रहे…
कविता

लड़ रहे… बढ़ रहे…

दीवान सिंह भुगवाड़े बड़वानी (मध्यप्रदेश) ******************** कोई लिख रहा है, कुछ लोग पढ़ रहे हैं कोई पढ़ते हुए लड़ रहा है, कुछ लोग लड़ते हुए पढ़ रहे हैं। कोई बोल रहा है, कुछ लोग आवाज उठा रहे हैं कोई जुड़ रहा है, कुछ लोग लड़ रहे हैं। कोई चल रहा है, कुछ लोग दौड़ रहे हैं कोई स्वयं के लिए, कुछ समाज हित में लड़ रहे हैं। कोई अधिकारों के लिए, कुछ कर्जदारों हेतु लड़ रहे हैं कोई ठगों को पकड़ रहा है, कुछ लोग मांगों हेतु लड़ रहे हैं। कोई अपना ही रोक रहा है, कुछ लोग रास्ते में अड़ रहे हैं कोई जातियां तोड़ रहा है, कुछ लोग समाज जोड़ रहे हैं। कोई हौंसला बढ़ा रहा है, कुछ लोग हिम्मत जुटा रहे हैं कोई राजनीति कर रहा है, कुछ आपबीती हेतु लड़ रहे हैं। कोई रहमत कर रहा है, कुछ लोग मेहनत कर रहे हैं कोई जागरूक कर रहा है, कुछ लोग लड़ते हुए बढ़ रहे हैं। परिचय :- दीवान सिंह भुगवाड़े निवासी : बड़वानी (म.प्र.) घ...
मेरी ग़ज़लों को आवाज दे दो
ग़ज़ल

मेरी ग़ज़लों को आवाज दे दो

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** सुनो अपना दिल मुझको उधार दे दो, तुम पर ग़ज़ल कहूँ मैं थोड़ा प्यार दे दो! संग-संग हंसे और संग-संग रोंए दोनों मुझे भी अपने सुघर नेह की धार दे दो! सिवा तुम्हारे ना किसी का जिक्र करूँ मैं, अपनी चाहतों का अब ऐसा खुमार दे दो! है मुश्किल काम मोहब्बत को निभा पाना मैं कर लूंगा ये काम भी, तुम ऐतबार दे दो! एक-दूसरे का हमसाया बनकर रहें हम, मेरी ग़ज़लों को आवाज तुम एक बार दे दो! परिचय :- आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका व दूरदर्शन तक पहुँचा दीया। कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित युवा कवि आशीष तिवारी निर्मल वर्तमान सम...
मां तेरे चरणों में
कविता

मां तेरे चरणों में

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** शीश झुकाऊं मां तेरे चरणों में पल पल ध्यान करूं मां और शीश तेरे चरणों में झुकाऊं मां। जब जब तेरा स्मृण करूं आंखें खोलूं तेरा सुन्दर रूप दिखें मेरी मां। ज्ञान दीप जले तेरे आंचल में मां, तू जननी है मां इस सृष्टि की नहीं भेद भाव किसी से करती तू मां। नहीं कोई वजूद मेरा मां, और नहीं कोई तेरे सिवा मेरा मां। तू धनी अपनी ममता की मां, सरणागत हूं मां ख़ाली हाथ आया था, खाली हाथ जाऊंगा तेरा आशीष मिल जाए जीवन मेरा तर जाये मां। तेरे दर आतें सभी दिन दुखियारें मां, सभी की मनोकामना करती पूरी मां गगन भी खड़ा शिश नमाये पुष्प सुमन आरती लिए हाथ जोड़कर भक्ति भाव से तेरे चरणों में हूं मां। परिचय :- गगन खरे क्षितिज निवासी : कोदरिया मंहू इन्दौर मध्य प्रदेश उम्र : ६६वर्ष शिक्षा : हायर सेकंडरी मध्य प्रदेश आर्ट से सम्प्रति : नर्मदा घ...
अच्छा लगता हैं…
कविता

अच्छा लगता हैं…

राजेश चौहान इंदौर मध्य प्रदेश ******************** अच्छा लगता हैं...... कवि को मंच और दर्शकों को बातों का पंच अच्छा लगता हैं...... सौ झूठ कहने से, एक सच कहना अच्छा लगता हैं...... कभी-कभी अपनों से हार जाना, जीत जाने से अच्छा लगता हैं...... अमीरों के राजमहल से, गरीब की कुटिया में रहना अच्छा लगता हैं...... एकल परिवार में रहने से, संयुक्त परिवार में रहना अच्छा लगता हैं...... नई फिल्मों को देखने से, पुरानी फिल्मों को देखना अच्छा लगता हैं..... डीजे की भड़भड़ से, ढोलक की मधुर थाप पर नाचना अच्छा लगता हैं...... अच्छे काम के लिए झूठ बोलना, सच कहने से अच्छा लगता हैं...... विदेशों में रहने से, अपने देश में रहना अच्छा लगता हैं...... बहुत अधिक बोलने से, मौन रहकर कहना अच्छा लगता हैं....... वर्तमान महामारी को देखकर, घर में सुरक्षित रहना अच्छा लगता हैं..... परिचय :- राजेश चौहान (शिक्षक) निवासी : इंदौ...
मैं एक अदना सा शिक्षक
कविता

मैं एक अदना सा शिक्षक

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** मैं एक अदना सा शिक्षक, अपनी जिंदगी की सफर में, समय का पाबंद और नियमों, का गुलाम रहा घनघोर बरसात हो। या कड़क धूप की दुपहरिया हो- हम अपनी पूरी लगन और निष्ठा से- जीवन की विगत कई बसंतो को- अपनी जीवन में आहिस्ता-आहिस्ता दफन होते देखकर हैरान हुआ- एक पुरानी साइकिल पर रेंग कर चढना फिर अपने गंतव्य पर! पहुंचने की जद्दोजहद से- हकलान और परेशान हुआ! मैं एक अदना सा शिक्षक- अपनी जिंदगी की सफर में- समय का पाबंद और नियमों- का गुलाम रहा परेशान रहा! अपनी जीवन के बीते पल पल को- समय की प्रवाह में बहते देख अवाक रहा! दरवाजे पर खड़ी इंतजार में- मेरी सह धर्मनी और छोटे बच्चे- सभी परेशान और उदास रहा! नियत समय पर हाथों में पंखा लिए- चिलचिलाती धूप की लू में उदास भया क्रान्त रहा! अब थक गया हूं जिंदगी की उम्मीदों से- बस मां भारती तेरी आंचल में छुप कर- सो जाओ जिंदगी ...
गरीबी की परिभाषा
कविता

गरीबी की परिभाषा

संजय जैन मुंबई ******************** गरीबी क्या होते है किसी किसान से पूछो। ये वो शख्स होता है जो खाने देता अन्य। परन्तु इसकी झोली में नहीं आता उसका हक। इसलिए यही से गरीबी का खेल शुरू हो जाता है।। कड़ी मेहनत और लगन से किसानी वो करते है। कितना पैसा और समय वो इस पर लगाते है। और फल के लिए वो भगवान पर निर्भर होते है। और गरीबी अमीरी का निर्णय फसल आने पर होता है।। मेहनत और काम ही इन का लक्ष्य होता है। उसी के बदले में जो कुछ इन्हें मिलता है। उसे इनका जीवन यापन चलता है। अब निर्णय आपको करना है की ये गरीब है या.....।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (hindirakshak.com) सहित बहुत सारे अखबारों-...
आज फिर घूमना है
कविता

आज फिर घूमना है

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** स्वतंत्रता मिल चुकी है, आजादी से सबको प्यार, आसमान अब चूमना है, लो आज फिर घूमना है। आजादी के रूप अनेक, कोई काम से है आजाद, किसी को बचपन याद, कोई करता है फरियाद। कोरोना के बंधन में थे, अनलॉक के दिन आये, बीते के दिन भूलना है, लो आज फिर घूमना है। कैदी काट रहा था जेल, कैदियों से था बस मेल, छूट गया फिर, कैद से, कैद से खत्म हुआ खेल। कैदी हुआ कैद से रिहा, कैदखाना दिन भूलना है, प्रसन्न बहुत नजर आया, आजाद फिर, घूमना है। पढ़ते पढ़ते हुआ बोर, नींद हैं आंखों में घोर, परीक्षा संपन्न हो गई, आज फिर, घूमना है। दौड़ रहा मंजिल ओर, मंजिल अभी दूर ना है, एक दिन मिले मंजिल, तब तक यंू घूमना है। दुश्मन बचकर निकले, आंसू आंखों से, बहते, अब दुष्ट को, घूरना है, ले आज फिर घूमना है। गर्मी की छुट्टियां, शुरू, स्कूल अब, भूलना है, दौड़ चले, सैर सपाटा, लो...
माँ के लिए
गीत

माँ के लिए

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** ईश्वर से अनाथ बालक की विनती मैने देखी नहीं, माँ की सूरत कहाँ से पाउँगा, माँ का प्यार माँ करती है, प्यार-दुलार ये बतियाते है मुझसे-यार मै अनाथ ये क्या जानूँ क्या होता है माँ का प्यार बिन माँ के लगते सूने त्यौहार। मैने देखी ही नहीं …। माँ का आँचल आँखों का काजल मीठे से सपने जैसे खो गए हो अपने बिन माँ के लगता है कोरा संसार। मैने देखी ही नहीं.... ऊपर वाले ओ रखवाले अंधेरों में भी देता उजियाले मेरी विनती सुन, दे माँ का प्यार बिन माँ के कहाँ से पाउँगा माँ का प्यार। मैने देखी नहीं, माँ की सूरत कहाँ से पाउँगा, माँ का प्यार माँ करती है, प्यार-दुलार ये बतियाते है मुझसे-यार मै अनाथ ये क्या जानूँ क्या होता है माँ का प्यार बिन माँ के लगते सूने त्यौहार। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन...
कुदरत के फैसले…
कहानी

कुदरत के फैसले…

मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) ********************                                                      पिछले महीने सितम्बर के आखिरी हफ्ते की बात है, मैं कुछ अनमनी, हैरान,परेशान सी थी, अपने ही लोगों से कुछ आहत थी! जीवन में यह सब नया नही था और ना पहली बार! सब कुछ चलता रहता है यही सोचकर मैं घर के छोटे-मोटे काम निबटा कर नहाई! समय लगभग दिन के एक बज चुके थे, मंदिर में दीप जलाते ही मुझे याद आया कि तुलसी का पौधा सूखने लगा होगा, इसलिए जल चढ़ाने के लिए बाहर गई! मन में संशय था कि कहीं कोई देखेगा तो क्या सोचेगा...? कि दिन के एक-दो बजे तुलसी में जल चढ़ा रही है, कितनी लापरवाह और आलसी औरत है! यूँ तो सरपट भागती दिल्ली नगरिया में किसी को किसी से कोई विशेष मतलब नहीं रहता है, फिर भी आस पड़ोस की कुछ महिलाएँ दूसरी महिलाओं की कमियाँ और खोट निकाल कर मजे लेने से पीछे नहीं हटती हैं! जो भी हो लेकिन म...
हे माँ तुझको नमन है
कविता, भजन

हे माँ तुझको नमन है

मनमोहन पालीवाल कांकरोली, (राजस्थान) ******************** हे माँ तुझको नमन है स्वीकार करो माँ हे माँ तुझको नमन है बारम्बार नमन है हे माँ तुझको नमन है स्वीकार करो माँ ऐसा वर माँ मुझको दो करता रहूं गुणगान जीवन पथ पर अडिग न होऊं हे माँ तुझको नमन है स्वीकार करो माँ प्रेम प्यार मुझमें भर दो जो आए खाली न जाए कर्म वचन से न मैं रहूँ दूर सदा हे माँ तुझको नमन है स्वीकार करो माँ भक्ति में शक्ति है माँ सदा रहूँ चरणों में तेरे इतनी शक्ति मुझे दे दो झूठ कभी न बोलूं मैं माँ हे माँ तुझको नमन है स्वीकार करो माँ अबोध बालक हूँ मैया करो मेरा कल्याण दया दृष्टि डालो मुझ पर दो मैया तुम ऐसा वरदान हे माँ तुझको नमन है स्वीकार करो माँ हो तुम जगत दात्री माँ मोहन की रख लो लाज जो आता शरण में तेरे जगदात्री करो स्वीकार हे माँ तुझको नमन है स्वीकार करो माँ परिचय :- मनमोहन पालीवाल पिता : नारायण लालजी...
मुसाफ़िर
कविता

मुसाफ़िर

मोहम्मद मुमताज़ हसन रिकाबगंज, (बिहार) ******************** मुसाफ़िर- चलता है निरन्तर अपनी मंजिल की तलाश में रास्ते के तमाम झंझावतों को करके दरकिनार बढ़ता जाता है-अपने लक्ष्य की ओर तय कोई पड़ाव है न ठिकाना कहीं स्वयं भी नहीं जानता वह ख़त्म होगा कहां जाकर ये सफ़र जीवन का चलना, लड़खड़ाना, गिरना फिर सम्भलना- उबड़-खाबड़ रास्तों को लांघते हुए पुनः चल पड़ना- अपने लक्ष्य की ओर, पड़ाव की तलाश में- जीवन शायद इसी का नाम है!! परिचय : मोहम्मद मुमताज़ हसन सम्प्रति : लेखन, अध्ययन निवासी : रिकाबगंज, टिकारी, गया, (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेत...
नारियाँ : अबला या सबला
आलेख

नारियाँ : अबला या सबला

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.) ********************                                       ये ऐसा विषय है जिस पर पूरे विश्वास से कोई कुछ भी नहीं कह सकता। क्योंकि इस परिप्रेक्ष्य में सिक्के के दोनों पहलुओं का अपना अपना मजबूत पक्ष है और किसी भी एक पक्ष को कम करके आंकना खुद को धोखा देना ही कहा जायेगा। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि नारियां नित नये मुकाम पर पहुंच रही हैं। जिंदगी के हर क्षेत्र में अपने आप को न केवल सिद्ध कर रही हैं। बल्कि खूद को स्थापित कर खुद को खुद से ही चुनौती पेश कर कदम दर कदम अपने बुलंद हौसले की मिसाल भी पेश कर रही हैं।शिक्षा, कला, साहित्य, विज्ञान, सेना, खेलकूद, प्रशासन, राजनीति हर जगह अपनी मजबूत उपस्थिति का अहसास करा रही हैं। यही नहीं चूल्हा चौका से बाहर भी नारियां अपनी नेतृत्व क्षमता का भी लोहा मनवा रही हैं। इसलिए ये कहना गलत ही होगा कि नारिया...
जख्मों की टीस
कहानी

जख्मों की टीस

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************                                   नेहा महज तीस साल की है। वह हिमाचल प्रदेश के बद्दी में रहती है। वह बद्दी के एक नामी पाठशाला में शिक्षिका है। वह अक्सर कहती कि उसे छुट्टियों वाले दिन की दोपहर बहुत लम्बी लगती है जैसे कि दिन यहाँ आकर रुक सा जाता है और इन दोपहरों की चुप्पी जैसे बीहड़ की कोई झील एकदम शांत सी। आज इतवार था। इस दिन का सभी बेसब्री से इंतजार करते हैं। कोई दोस्तों से मिलने जाता है तो कोई सिनेमा देखने तो कोई शॉपिंग। पर नेहा के लिये यह सबसे लंबा और बोझल दिन रहता है। वह तब भी था जब आकाश था और वह अब भी है जब आकाश नहीं। आकाश नेहा का पति एल. आई. सी. में फील्ड ऑफिसर था। उसकी मौत हो चुकी थी। वह कोशिश करती कि रविवार को भी कॉपी चेकिंग के लिए ले जाये। पर आज तो उसके सारे काम भी खतम हुए काफ़ी समय हो गया था। शाम का समय था कॉलोनी के कपल देख उस...
हिन्दी चालीसा
दोहा

हिन्दी चालीसा

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* तैंतिस व्यंजन को गिने, ग्यारह स्वर पहिचान। अं अः है आयोगवह, चार संयुक्त जान।। ड़ ढ़ को मत भूलिये, हिंदी अक्षर ज्ञान। बावन आखर जानिये, कहत हैं कवि मसान।। जय कल्याणी हिंदी माते। तुमको नित विज्ञानी गाते।।१ व्याकर तीनों भाग बताये। वरण शब्द अरु वाक्य कहाये।।२ वर्णों का जब होता मेला। संधि का है यही झमेला।३ तीन भेद संधी है भाई। स्वर व्यंजन विसर्ग कहाई।।४ बहु तत् द्विगु अरु कर्मधराये। अव्यय द्वन्द्व समास बनाये।।५ उपसर आगे प्रत्यय पीछे। तत्सम मूला तद्भव रीझे।।६ वाक्य की परिभाषा जानो। सरल संयुक्त मिश्रा मानो।।७ सकल नाम संज्ञा कहलाते। सर्वनाम बदले में आते।।८ किरिया कर्म करत है भाई। विशेषण रंग रुप गहराई।९ अल्प अर्द्ध अरु पूर्ण विरामा। योजक कोष्ट प्रश्न निशाना।।१० गुरु कामता व्याकरण दाता। भाषा नियमा रचा विधाता।।११ नागरी देव लिपि है आली...
वनवास
कहानी

वनवास

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** अवनी आज अपनी माँ से लगातार सवाल पूछ रही थी। यह अंकल कौन थे? बताओ ना माँ, आखिर कब तक तुम यूं ही घुटती रहोगी? क्या तुम्हें अपनी अवनी पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है? पापा को गुजरे बीस साल हो गए। कब तक उनकी यादों में खुद को डुबोकर रखोगी? आखिर कुछ तो कहो, माँ। देखो माँ तुम्हारे चेहरे की रंगत भी फीकी पड़ रही है। कल को मेरी भी शादी हो जाएगी। मुझें तुम्हारी बहुत चिंता रहती है। सुधा अंदर ही अंदर घुट रही थी कि वह अपने अतीत की छाया अपनी बेटी की जिंदगी पर नहीं पड़ने देगी। सब कुछ खत्म हो चुका था, फिर आज राजन क्यों लौट आया था, क्या पड़ी थी उसे? अवनी, माँ मैं ऑफिस जा रही हूँ, शाम को आकर बात करते हैं। उसने जाते-जाते माँ को गले लगा कर चूम लिया था। मेरी प्यारी माँ नाराज हो अब तक, अच्छा अब मैं कुछ नहीं पूछूंगी? अब तो हँस दो माँ। बेटी का मन रखने के लिए ही सह...
मातृ-पितृ भक्त होती बेटी
कविता

मातृ-पितृ भक्त होती बेटी

प्रियंका पाराशर भीलवाडा (राजस्थान) ******************** तन से समर्पण मन से समर्पण सब कुछ अपना कर दे अर्पण नयनो में आत्मिक भाव झलकता हृदय में उपस्थित अति कोमलता उल्लास का अर्णव होती बेटी मातृ- पितृ भक्त होती बेटी दो कुलों की लक्ष्मी और लाज इस आधुनिकता में भी परायी आज कहने को सिर्फ शब्द है आज के युग में, बेटा बेटी एक समान पर जब अधिकारो का बँटवारा होता फिर कर्तव्यों के लिए क्यों असमान दूसरे कुल जाकर, कुल का मान बढ़ाती संवेदनशील होकर हर रिश्ता निभाती फिर भी हर गलती की जिम्मेदार वही ठहरायी जाती क्यों समझी जाती हैं वह परायी बेटी जबकि मातृ-पितृ भक्त होती बेटी हो चाहे धर्म माता-पिता या जन्मदाता हृदय दोनों से स्नेह, अपनत्व है चाहता ससुराल में भी जब बेटी मुस्कुराये, सम्मान पाएं तो हर माता-पिता बेटी के जन्म से न घबराए सभी खुशी की अनुभूति से बेटी दिवस मनाएं सर्व गुणों की खान, प्रत्येक क्षेत्र में...
स्त्री भी एक इंसान है
कविता

स्त्री भी एक इंसान है

डॉ. सोनल मेहता भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अच्छा लगता है जब अपने लिए कुछ अच्छा सुनती हूँ. कानों में संगीत सा बजता है. झूठ होगा कहना कि मुझे तारीफ़ से फ़र्क़ नहीं पढ़ता, ये फ़र्क़ तब महसूस होता है जब अपनों से अपनी ख़्वाहिशों पर ताना मिलता है जब महसूस कराया जाता है कि घर की ज़रूरतें पूरी करना मेरा शौक़ है मेरा वजूद सिर्फ़ किचन तक है . उफ़्फ़ ये क्या कह दिया. वजूद ! ये कब मेरा हुआ हुआ है मेरा तो वो है मेरा अकेलापन जो बर्तनों के शोर से कभी घबरा सा जाता है और खुद के लिए एक निवाला सुकून का चाहता है. परिचय :- डॉ. सोनल मेहता निवासी : भोपाल म.प्र. सम्प्रति : इंसान बनने की कोशिश शैक्षणिक योग्यता : पी.एचडी., एम.फ़िल, एल.एल.बी., एम.बीए, एम.एड, एम.ए, बीएससी घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अप...
बचपन हमारा
कविता

बचपन हमारा

सपना दिल्ली ******************** कितना प्यारा होता है, बचपन हमारा न किसी बात की फ़िक्र हमें, न किसी से ड़र हमें, न कोई टेंशन जो जी में आए करते जिसे करने का मन न उससे कोसों दूर भागते। पापा की परी कहलाती माँ की गुड़िया होती भाई की लाड़ो बहन की चुटकी दादा-दादी के आँखों का तारा। जब पापा पूछते, सबसे प्यारा कौन? तो पापा की साइड हो जाती, और जब यही प्रश्न माँ करती तो माँ के आंचल से लिपट जाती और कहती सबसे प्यारी आप! माँ जिसे करने से मना करें वही करने को मन बाए औ’ पकड़े जाने पर, भाई, दीदी को आगे कर ख़ुद पीछे छिप जाती। मन करता तो पढ़ती वरना न पढ़ने के सौ बहाने बनाती अपना काम दीदी से करवाती औ’ ख़ुद छोटी होने का फ़ायदा उठाती। सबसे अपनी बात मनवाती छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाती और फिर पल-भर में ही मान जाती। सखियों संग मिलकर शोर से कॉलोनी सिर पर उठा देती तब न भूख लगती, न प्यास, खेल में सब कुछ भूल जाती। ……वह ...
माँ
कविता

माँ

सौरभ कुमार ठाकुर मुजफ्फरपुर, बिहार ************************ जब-जब गलत हुआ धरती पर आई माता तुम बारम्बार फिर से कष्ट एक आन पड़ा है आ जाओ फिर से ईक बार माता करो जग का उद्धार। देखो मानव फिर ग्रसित हुआ है, बहुत ही हो रहा अत्याचार देखो तेजी से पाप हो रहा है एक दिनों में लाखों बार माता करो जग का उद्धार। जब मानवता पर दुख बरसा है कष्ट हरा तूने हर बार फिर से माते कष्ट हरो और आशीष तुम देना अपरंपार माता करो जग का उद्धार। परिचय :- नाम- सौरभ कुमार ठाकुर पिता - राम विनोद ठाकुर माता - कामिनी देवी पता - रतनपुरा, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) शिक्षा - १० वीं के छात्र और बाल कवि एवं लेखक जन्मदिन -१७ मार्च २००५ देश के लोकप्रिय अखबारों एवं पत्रिकाओं में अभी तक लगभग ५० रचनाएँ प्रकाशित सम्मान- हिंदी साहित्य मंच द्वारा अनेकों प्रतियोगिताओं में सम्मान पत्र, सास्वत रत्न, साहित्य रत्न, स्टार हिंदी ब...
तुम कहाँ हो?
कविता, भजन

तुम कहाँ हो?

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** माँ तुम यहाँ हो कि वहाँ हो, माँ तुम इस संसार में कहाँ-कहाँ हो। मैने सुना माँ तुम इस संसार के कण-कण में हो, माँ तुम कहाँ हो, माँ तुम कहाँ हो। माँ करके सिंह सवारी, माँ लगे सारे संसार को प्यारी। माँ पहने चुनर-साड़ी, जग को लगे तू माँ प्यारी। माँ तुम्हे पूँजे जग के सब नर-नारी, तुमपे वारी-वारी जाये ये जनता सारी। पंडित जी लो मैया की नजर उतारी।। कोई बेचे माँ गली-गली घूम-घूम तरकारी, कोई करे माँ की कृपा से नौकरी सरकारी। मुझे चाहिये माँ कृपा तुम्हारी, सदा बनी रहे हमारे ऊपर दयादृष्टि तुम्हारी। माँ तुम यहाँ हो माँ तुम वहाँ हो, माँ तुम सारे जहाँ के कण-कण में हो। माँ तुम हर गाँव-गाँव और शहर-शहर में हो, माँ तुम हर एक के मन मंदिर में हो। माँ तुम इस नौरातम में गली-गली डगर-डगर के पंडालो में सजी हो, हर गाँव-गाँव शहर-शहर में माँ तुम्ही ही तुम्ह...
सपने सजने लगे
कविता

सपने सजने लगे

बबली राठौर पृथ्वीपुर टीकमगढ़ (म.प्र.) ******************** धीरे-धीरे हौले-हौले हवा के झोके चलते रहे खुशी के पैगाम दिल में लिए हम मन के दामन समेटने लगे सपने सजने लगे। चाँद तारो की चादर ओढ़कर उनकी बातें अमल करने लगे खुशी के पैगाम लिए हम तकदीर पढ़ने लगे सपने सजने लगे शाम ढली रात आई लम्हों की ख्वाब सजे थे दिल में मेरे खुशी अपनी पहलू में लिए हम हाथ की लकीरें पढ़ने लगे सपने सजने लगे। जिन्दगी की जब सुबह आई हम अपनी धुन में मग्न रहे खुशी का सावन लिए हम अरमान ले बरसने लगे सपने सजने लगे दिन गुजरे साल गए गुलिशता में फूल खिले खुशी का एहसास लिए हम जिन्दगी के मायने पढ़ने लगे सपने सजने लगे परिचय :- बबली राठौर निवासी - पृथ्वीपुर टीकमगढ़ म.प्र. घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक...
माँ ऐसा वर देना।
कविता

माँ ऐसा वर देना।

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** नमन करु माँ मे तुझको, ऐसा वर मुझको देना। दुखियों के दुखः हम दूर करें, श्रृम से कष्टों से नहीं डरें, उर में सबके प्रति प्यार, भरें। ऐसी शक्ति मुझे देना। जल बनकर मरुस्थल, में बिखरें, बाधाओं से टकरा जाये माँ ऐसा ज्ञान हमें देना। आलस के दिवस कटें, न कभी, सेवा के भाव मिटे न कभी, पथ से ये चरण हटें न कभी, जनहित के कार्य न छूटे कभी, देवी क्षमतार विकसाये, ऐसा भाव हमें देना। यह विश्व हमारा ही घर है उर में स्नेह का निर्झर हो, मानव के बीच न अंतर हो, बिखरा समता का मृदु स्वर हो, ऐसा भाव जगा देना। माँ ऐसा वर मुझको देना। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन...
जाँ की हिफाजत नहीं है
ग़ज़ल

जाँ की हिफाजत नहीं है

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़ज़ल नक्ल हो अच्छी आदत नहीं है। कहे खुद की सब में ये ताकत नहीं है।। है आसान इतना नहीं शेर कहना। हुनर है क़लम का सियासत नहीं है।। नहीं छपते दीवान ग़ज़लें चुराकर। अगर पास खुद की लियाक़त नहीं है।। हिलाता है दरबार में दुम जो यारों। कहे सच ये उसमें सदाक़त नहीं है।। जो डरता नहीं है सुख़नवर वही है। सही बात कहना बगावत नहीं है।। सभी खुश रहें बस यही चाहता हूँ। हमारी किसी से अदावत नहीं है।। दबाया है झूठों ने सच इस कदर से। कि सच भी ये सचमें सलामत नहीं है।। दरिंदे भी अब रहनुमा बन रहे हैं। ये अच्छे दिनों की अलामत नहीं है।। निज़ाम आज बिगड़ा है ऐसा जहाँ मे। किसी की भी जाँ की हिफाजत नहीं है।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अप...