Thursday, June 25राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

BLOG

बेटियाँ
कविता

बेटियाँ

मनीषा जोशी खोपोली (महाराष्ट्र) ******************** ईश्वर की सौगात, खुशियों की बरसात हैं बेटियाँ। आँगन की चिड़ियाँ, पापा की गुड़िया हैं बेटियाँ। हर घर की खुशहाली, आंगन की हरियाली हैं बेटियाँ। तारों की शीतल छाँव, दिल का लगाव हैं बेटियाँ। फूलों की सुन्दर क्यारी, सबसे प्यारी न्यारी है बेटियाँ। समुद्र सी विशाल, गंगा सी निर्मल हैं बेटियाँ। औैस की बूँद सी, शंख की गूंज सी हैं बेटियाँ। घर की न्यारी रौनक, खुशियों की दौलत है बेटियाँ। अपने पापा की जान, माँ की पहचान होती हैं बेटियां। परिचय : मनीषा जोशी निवासी : खोपोली (महाराष्ट्र) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
चमकदार
लघुकथा

चमकदार

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** घर का माहौल काफी गमगीन था। सभी नीमी को बार-बार समझा रहे थे कि वो अपना निर्णय बदल दे। पर वह मानने को तैयार नहीं थी।परिवार के सभी लोग हार चुके थे। वह अपने फैसले पर अडिग थी। माँ कह रही थी, पता नहीं सोनू ने मेरी बेटी को क्या घोल कर पिला दिया है? अब सिर्फ पापा ही कुछ कर सकते हैं, यह उनकी बात कभी नहीं टाल सकती। पापा इसे सबसे ज्यादा लाड़ करते हैं। अगर इसने सोनू से शादी कर ली तो पूरे परिवार की नाक कट जाएगी। पापा सारी घटना को जान कर भी कैसे अनजान रह सकते हैं, भाई चिल्ला उठा? मम्मी मैं पापा से खुलकर बात करूँगा, आखिर उनके मन में क्या चल रहा है? उन्हें पूरा हक है कि वह नीमी को रोक दे। वरना अनर्थ हो जाएगा। क्या हमारी बिरादरी में अच्छे लड़के खत्म हो गए हैं? क्या सोनू ही अकेला कामयाब लड़का रह गया है? मुझें समझ नहीं आता, यह लड़की मान क्यों नहीं रही है? न...
घर एक मन्दिर ही है
आलेख

घर एक मन्दिर ही है

राजकुमार अरोड़ा 'गाइड' बहादुरगढ़ (हरियाणा) ********************                   यह बात निस्संदेह नितान्त सत्य ही है कि घर एक मन्दिर की तरह है। मन्दिर में जाते ही प्रभु से समीपता का एहसास होता है, ऐसे ही घर में जहाँ परस्पर प्यार,लगाव, आकर्षण है, जाते ही अपनेपन का एहसास हिलोरें लेना लगता है, घर की देहरी में आते ही सारी थकान दूर हो जाती है तो यह मंदिर ही जैसा लगता है,नहीं तो मकान ही है, ईंट सीमेंट से बना, जहां एक दूसरे से विमुख कुछ प्राणी बस किसी तरह रहते हैं। पति-पत्नी दोनों या सिर्फ पति की नौकरी,बच्चों के स्कूल,टयूशन व शाम को ऑफिस से लेट आना, फिर घर रसोई के काम, बच्चों से पढ़ाई व अन्य जानकारी लेना अगले दिन फिर वही रूटीन, जिंदगी यूं ही बीतती जाये तो मशीन से क्या अलग है,एकाएक इस महामारी के कारण हुए लॉकडाउन या अब कुछ अनलॉक के कारण जीवनधारा तो बिल्कुल ही बदल ही गई, पहले कहते थे,मरने की फुर्सत न...
देश मेरा
कविता

देश मेरा

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** सीमा पर तैनात है जवान जो, सर्दी, गर्मी व बरसात सहन कर लेते हैं। ऐच्छिक सेना बनकर पीछे कभी ना हटते, दुश्मनों को कभी ना भीतर आने देते हैं। सबसे प्यारे जवान हमारे सबसे प्यारा देश मेरा... दुनिया के पवन रूपी में सुप्रसिद्ध हुआ भारत जो, तरह-तरह की संस्कृति, तरह तरह का वेश। भाषा है जो अनेक, तीर्थ स्थल है यहां अनेक, जगतगुरु व स्वर्ण चिड़िया कहलाया भारत देश। कितना सुंदर कितना निराला भारत देश मेरा..... हर क्षेत्र में ना कभी पीछे हटता भारत, खेल में सबसे आगे रहता है जो। प्रथम प्रयास पर मंगल पर पहुंचता है भारत, संकट में जात पात धर्म भूल जाता है। हर मुसीबत में साथ निभाता है भारत, चार धाम है जहां पर वो भारत देश मेरा.... परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी (राजसमंद) राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाण...
यह कैसी आजादी है
कविता

यह कैसी आजादी है

दीवान सिंह भुगवाड़े बड़वानी (मध्यप्रदेश) ******************** सीमा पर सिपाही गोलियां झेल रहा है देश में नागरिक समाज-समाज खेल रहा है इस महान देश में,यह हो क्या रहा है। यह कैसी आजादी है। किसान गरीबी से तड़प रहे है मजदूर रोजगार के लिए तरस रहे है देश के युवा बेरोजगार घुम रहे हैं नसीब नहीं दो वक्त की रोटी,खुदखुशी कर रहे है। यह कैसी आजादी है। बेटियाँ देश की अकेली सफर करने से डरती है यदि रात में गलती से भी चली जाती है तो वह लौटकर कभी नहीं आ पाती है। यह कैसी आजादी है। अस्पताल तो सैकड़ों यहां है मगर स्वास्थ्य का कोई वजूद नहीं है सड़कों पर रोगियों की, कई जानें जाती है। यह कैसी आजादी है। मुल्क के लोग बड़ी चाह से जिसे चुनते है वही तो अपना रुख बदल लेते हैं सरकारें बदलती है, योजनाएं वहीं है विकास की किसी में,जगी भावनाएं नहीं है। यह कैसी आजादी है। आस जगी थी,सदियों की गुलामी के बाद एक ज्योत जली थी, कई ...
प्रेम
कविता

प्रेम

डॉ. भगवान सहाय मीना बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, (राजस्थान) ******************** प्रेम पावन गंगा, प्रेम में शक्ति अपार। प्रेम उत्तंग हिमालय, प्रेम है उपहार। प्रेम वेद ऋचा, प्रेम अनन्त रसधार। प्रेम गीता ज्ञान, प्रेम सावन की बौछार। प्रेम मानस की चौपाई, प्रेम फागुन की बौछार। प्रेम समर्पण, प्रेम बंधन, प्रेम पैनी तलवार। प्रेम वात्सल्य, प्रेम भाग्य, प्रेम अनन्त उदगार। प्रेम भाव, प्रेम भाषा, प्रेम सकल संसार। प्रेम संस्कृति, प्रेम सभ्यता, प्रेम संस्कार। प्रेम मंदिर, प्रेम पूजा, प्रेम प्रकृति उपहार। प्रेम चंदा, प्रेम दिनकर, प्रेम आत्म वरदान। प्रेम नवरंग, प्रेम सौंदर्य, प्रेम पारावार। प्रेम मोक्ष दाता, प्रेम ईश साकार। प्रेम पावन गंगा, प्रेम में शक्ति अपार। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह ...
राम भारत का स्वाभिमान
कविता

राम भारत का स्वाभिमान

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ******************** भगवान राम से है भारत की पहचान शुरू हो गया रामजन्म स्थल निर्माण राम मंदिर हम सभी भारतीयों का स्वाभिमान राम सभी के, सभी राम के ये हमारी शान संस्कृति ओर संस्कारों पर हमें हो अभिमान सर्वें भवन्तु सुखीन: परिपाटी करें सब का सम्मान त्याग, बलिदान, साहस, धैर्य की थी वह मूर्ती तभी सारे विश्व में है आज सियाराम जी की कीर्ति वानर सेना ने दिखाई प्रभु राम जी में भक्ति तभी समुद्र पर पुल बनाने की उन्हें मिली शक्ति रावण जैसे बलशाली राक्षस को मार समझाई, बुराई पर अच्छाई की जीत चारों भाई सगे न होने पर भी रिश्तों को साथ रखने की सीख अपने आराध्य के चरणों में बिन संदेह समर्पित होना तभी मोक्ष और जन्म मरण से छुटकारा पाना विनम्र आचरण से बड़ों का सम्मान, मानों छोटों का आभार उम्र, लिंग भेदभाव बावजूद समान करो व्यवहार युगों से न हो सका अब हो रहा साकार वर्षों ...
संसार का बदलता स्वरूप
कविता

संसार का बदलता स्वरूप

काकोली बिश्वास सिमुलतला (बिहार) ******************** संसार का बदलता स्वरूप हो रहा कुत्सित, बड़ा कुरूप मर्यादा रहती ताखों पर, और बड़े-बुजुर्ग हैं, खामोश और चुप! युवाओं का मन डोल रहा संस्कारों की कमी बोल रहा बोले इनका असंयमित मन धैर्य का हुआ अब वक्त खतम! बनना था इन्हें हमारा कल ये हैं अटूट-अडिग-अचल ये कहते चाहे जो हो जाए न बनेंगे हम भारत का बल न बनेंगे हम भारत का कल! हम अपनी धुन पर चलते चले हमें दुनिया की परवाह कहाँ, हमारा अपना जहाँ वहां.... सुख-समृद्धि-कुकृत्य जहाँ! नशा जुर्म हमसे हैं फलते अपने पास है वक्त कहां!! ईश्वर के हम अद्भुत सृष्टि मानव का ऊर्जामय रूप पर इस ऊर्जा की बर्बादी पर देश की जनता क्यूँ है चुप??? क्यों नहीं ये आवाज उठाती इन्हें सही राह पर लाती... 'बिगड़ा युवा, बिगड़ेगा देश' क्यों आखिर ये समझ न आती? शेष है अब भी वक्त है थोड़ा लोहा है गर्म मारो हथौड़ा... न जाने किस करवट बदले द...
आजादी
कविता

आजादी

गीतांजलि ठाकुर सोलन (हिमाचल) ******************** खुली हवा में चैन की सांस ले रहे हैं हम सभी जान गवाई उन वीरों ने जो थे पिंजरे में कैद कभी अपने वतन पर फिदा वो इस कदर की जान से प्यारी उन्हें आजादी लगी नमन है मेरा उन वीरों को जिनके कारण आजाद है हम अभी परिचय :-गीतांजलि ठाकुर निवासी : बहा जिला सोलन तह. नालागढ़ हिमाचल आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 आपको यह रचना अच्छी लगे तो साझा जरुर कीजिये और पढते रहे hindirakshak.com राष्ट्रीय हिंद...
शिक्षा का मन्दिर
कविता

शिक्षा का मन्दिर

रमेश चौधरी पाली (राजस्थान) ******************** रुक कर भी में चलती रही फिर से शिक्षा का मन्दिर बनूंगी। जहा में ज्ञान दिया करती थी, वहा में बेसहारों को साहारा देती रही। रुक कर भी में चलती रही फिर से शिक्षा का मन्दिर बनूंगी। जो चावल में अपने लाडलो को ना खिला सकी, वो मैने बेसाहरो को खिलाया है। रुक कर भी में चलती रही फिर से शिक्षा का मन्दिर बनूंगी। जो शिक्षा के गुरु कहलाते थे, वो कोरोना योद्धा बने अपने लिए नहीं, अपने देश वासियों के लिए। रुक कर भी में चलती रही फिर से शिक्षा का मन्दिर बनूंगी। मैने अपना कर्तव्य छोड़ा, इस कोरोना को हराने के लिए। तुम भी अपना कर्तव्य निभाओ, इस कोरोना को हराने के लिए। रुक कर भी में चलती रही फिर से शिक्षा का मन्दिर बनूंगी। जहां मैं जंजीरों से बंधी हुई थी, फिर भी में अपने लाडलो को ऑनलाइन शिक्षा देती रही। रुक कर भी में चलती रही फिर से शिक्षा का मन्दिर बनूंगी।...
नन्हा बीज
कविता

नन्हा बीज

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** एक छोटा सा नन्हा सा बीज वो प्यारा सा बीज कभी मिट्टी में बोया था मैंने,,, सोचा नहीं था कि अनन्त सम्भावनाएं है उसमें पहले उससे अंकुर निकला, नई जड़े जमीन को पकड़ने लगी,, फिर नव कोपल आये फिर तना, शाखा, फूल फल और वो बढ़ता ही चला आकाश की ओर बस थोड़ी सी मिट्टी मांगकर,,, और फिर वो देता ही चला कभी छांव, कभी फल, कभी आश्रय और भी बहुत कुछ और एक हम है जो उस मुठ्ठी भर मिट्टी के बदले लिये जा रहे उससे , उसका सबकुछ रोज कुछ न कुछ लेते जा रहे उससे,,,, लेकिन वो आज भी मुस्कराकर, सर झुकाकर देता ही जा रहा हम जैसे स्वार्थी लोगो को वो जड़ होकर भी चुका रहा कर्ज उस माटी का और इंसानो को देखो अपना तो ठीक, लेकिन दुसरो का भी हक़ खा रहा समझ नही आ रहा कि जड़ वृक्ष है या इंसान जो प्रकृति के करीब होकर भी उसे समझ नही पा रहा परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रह...
मै एक अकिंचन हूं
कविता

मै एक अकिंचन हूं

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** माँ भवानी मै एक अकिंचन हूं तेरी कृपा दृष्टि की भिखरी। माँ मै न मंत्र जानता हूं न कोई तंत्र जानता माँ भवानी न आवाहन जानता तेरी। न अस्तुति याद मुझे न अस्तोत्र सारी सब प्राणियों का उद्धार करने वाली। तुम्ही हो कल्याणमयी, ममतामयी माँ भवानी समस्त दुख विपत्तियो को हरने वाली इस करोना काल मे फेल रही है विपति भारी। करोंना विषाणु की महामारी तू संघार कर माँ इस विषाणु का जो बड़ा ही है क्षयकारी कष्टकारी। तू सब का उद्धार करने वाली हो माँ भवानी न मै तेरी पूजा विधि जनता न वैभव है सारी। केवल एक मै एक भिखरी माँ भिक्षा तू मुझे दे तू भर दे मानवता की भिक्षा पात्र सारि। मै सभाव से आलसी हु लोभ है सारी न तेरी पूजा ध्यान तप कर पाता। तू करुणा की सिंधु हो माँ भावनी तेरी कृपा दृष्टि का हु एक भिखरी। जब अंतिम क्षण माँ आए मेरी तो मेरे कन्ठ से निकले माँ भवानी माँ भवानी...
टीस उभरती है
कविता

टीस उभरती है

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** अंखुवाये सपने मरते, मन ऊसर, परती है। रह रहकर चुभती है कोई टीस उभरती है।। सदियों का नदियों-सा नाता सुविधाओं से है, बढ़ी चाहतों का रिश्ता सौ दुविधाओं से है; जाने क्या-क्या सह जाती भावों की धरती है।। रह-रहकर चुभती है, कोई टीस उभरती है।। प्रकृति अछूती कन्या जैसी, छेड़े पाप करे, सौ आपदा निमंत्रित करके अपने आप मरे। बादल में सागर-तल की ही पीर उबरती है ।। रह-रहकर चुभती है कोई टीस उभरती है।। परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित ...
देश के नौजवान
कविता

देश के नौजवान

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** तुम देश के नौजवान हो, इस जगत की शान हो। तेरे दम पे बना यह, देश महान है। पाट दो जमीन पर, नफरतों की खाईयां, दूर हो समाज की, सारी वह बुराईयां, होसलें पे तेरे सारे, विश्व को गुमान है तुम तो नौजवान हो। जात पात तोड़ दो, वैमनस्य छोड़ दो, शांन्ति के समुद्र से, राह जग की जोड़ दो। एक नवीन विश्व का, तू बना निशान है। इस पवित्र भूमि पर, स्वर्ग है उतारना, इस के रुप को, है तुम्हें संवारना। तू ही देश की शान है तुझसे रौशन जहाँन है। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का प्रकाशन होता रहा है।...
सोचता हूँ…क्यों लिखूँ?
कविता

सोचता हूँ…क्यों लिखूँ?

नरपत परिहार 'विद्रोही' उसरवास (राजस्थान) ******************** सोचता हूँ... क्या लिखूँ? क्यों लिखूँ? किसलिए लिखूँ? आज पढ़ता कौन है? क्या इसलिए लिखूँ? कि लोगो की निगाहों में कवि दिखूँ! क्या इसलिए लिखूँ? कि किसी साहित्य नामा समूह में वाहवाही लूट सकूँ? या इसलिए कि किसी खबरनामा में, अपना स्वयं प्रसार-प्रचार कर सकूँ? आज देश और समाज में पीड़ित की पीडा़ को पढ़ता कौन हैं? सब लिखने वाले हैं! कवि है! अपने भाव समझता कौन हैं? निष्पक्ष लिखने का दम किसमें हैं? आज देश के जन-जन में, फैले नफरती माहौल को देख लगता हैं, कि कहीं न कहीं आज के इस माहौल की जिम्मेदार, साम्प्रदायिक बनी कलम हैं। वो कलम कहां है? जिसे प्रेमचंद ने चलायी, पंत, निराला ने चलायी, महादेवी वर्मा, नागार्जुन की तो कलम ही खो गयी। शायद! आज के कवियों ने इन्हें पढा़ नहीं होगा, समझा नहीं होगा। या पढा़ और समझा भी हैं तो आज के कवियों व लेखकों म...
चल चल रे मुसाफ़िर
ग़ज़ल

चल चल रे मुसाफ़िर

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़ज़ल - २२१ १२२२ २२१ १२२२ अरकान- मफ़ऊल मुफ़ाईलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन चल चल रे मुसाफ़िर चल है मौत यहाँ हर पल मालूम किसी को क्या आए की न आए कल भूखा ही वो सो जाए दिन भर जो चलाए हल सोया है जो कांटों में उठता वही अपने बल वो दिल भी कोई दिल है जिस दिल में न हो हलचल ढकते हैं बराबर वो टिकता ही नहीं आँचल इतरा न जवानी पर ये जाएगी इक दिन ढल विश्वास किया जिसपे उसने ही लिया है छल रोशन तो हुई राहें घर बार गया जब जल कहते हैं सभी मुझको तुम तो न कहो पागल जो ताज को ठुकरा कर सच लिखता कलम के बल शायर वही अच्छा है जिसका नहीं कोई दल करनी का 'निज़ाम' अपनी मिलना है सभी को फल अब ढूंढ रहे हो हल जब बीत गए सब पल परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अप...
मेरे कान्हा
कविता

मेरे कान्हा

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** ये बांसुरी है सौतन मेरी‌, लो इसको मैंने अलग किया, आलिंगन में भर लो कान्हा, मैंने तुम को समर्पण किया। नैनो को ना मिलाओ तुम, इसमें कजरे की धार नहीं, हृदय में बसा कर मैंने तुमको, है प्रेम की नई सौगात दी। मन मंदिर में बसाकर तुमको, वो राधा तेरे नाम हुई, अब तो संभालो सांवरिया, राधा प्रेम में बेहाल हुई। अधरों पर बांसुरी सा रख लो, क्यों ह्रदय में अब हलचल हुई, वादा कर लो कान्हा मुझसे, तू मेरा श्याम और मैं तेरी राधा हुई। आलिंगन में भर के मुझको अंजुली सा मेरा साथ बनो, तुम बिन राधा बिल्कुल अकेले, तुम धड़कन मेरे नाम करो। चित चोर बने हो तुम कान्हा हमको भी अपने सम भाग करो आलिंगन में लेकर हमको, मेरे अब तो घनश्याम बनो।। परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा उपनाम : साहित्यिक उपनाम नेहा पंडित जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेग...
कर्मो का फल
गीत

कर्मो का फल

संजय जैन मुंबई ******************** नही भूल पाया हूँ में जिन्होंने दगा दिया था। मेरी हंसती जिंदगी में जहर जिन्होंने घोला था। कहर बनकर उनपर भी टूटेगा मेरे हाय का साया। और तड़पेगे वो भी जैसे में तड़प रहा।। जिंदगी का है हुसूल जो तुमने औरों को दिया। वही सब तुमको भी आगे जाकर मिलेगा। फिर तुमको याद आएंगे अपने सारे पाप यहां। और भोगोगे अपनी करनी का पूरा फल।। समय चक्र एक सा कभी नही चलता है। जो आज तेरा है वो कल औरों का होगा। यही संसार का नियम विधाता ने बनाया है। और स्वर्ग नरक का खेल यही दिखाया जाता है।। जो गम तुमने दिए थे वो अब तुम्हे मिलेंगे। और तेरे साथी ही तुझ पर अब हंसेगे। और ये सब देखकर तू अपनी करनी पर रोएगा। पर तेरी आंसू कोई भी पूछने वाला नहीं होगा। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर...
पीहर
गीत

पीहर

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** साजन के घर तन है पर मन पीहर में है। छूट गया दुल्हन का बचपन पीहर में है। प्यारी गुड़िया कैसे भूले सपने में भी मन को छू ले सखियों से झगड़े के कारण फुग्गे-से मुँह फूले-फूले सखियों संग झूलों का सावन पीहर में है छूट गया दुल्हन का बचपन पीहर में। हरी-भरी तुलसी आँगन की न्यारी सुन्दरता उपवन की त्रुटि अगर कोई हो तो फिर स्नेहसिक्त झिड़की परिजन की मधुर-मधुर यादों का चन्दन पीहर में है। छूट गया दुल्हन का बचपन पीहर में। सुनकर पापा जी की डांट मन होता था कभी उचाट होती थीं मनुहारें भी फिर थे बचपन में कितने ठाट पापा का स्नेहिल अनुशासन पीहर में है। छूट गया दुल्हन का बचपन पीहर में। सर्वाधिक था माँ प्यार करती थी वह बहुत दुलार है असीम माँ का ऋण तो प्रकट करे कैसे आभार माँ के आँचल का सुख पावन पीहर में है। छूट गया दुलहन का बचपन पीहर में है। रोक-टोक भाई...
उपहार
कहानी

उपहार

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, जिला-गोण्डा, (उ.प्र.) ********************      आज रक्षाबंधन का त्योहार था। मेरी कोई बहन तो थी नहीं जो मुझे (श्रीश) कुछ भी उत्साह होता। न ही मुझे किसी की प्रतीक्षा में बेचैन होने की जरुरत ही थी और नहीं किसी के घर जाकर कलाई सजवाने की व्याकुलता। सुबह सुबह ही माँ को बोलकर कि एकाध घंटे में लौट आऊंगा। माँ को पता था कि मैं यूँ ही फालतू घर से बाहर नहीं जाता था। इसलिए अपनी आदत के विपरीत उसनें कुछ न तो कुछ कहा और न ही कुछ पूछा। उसे पता था कि मेरा ठिकाना घर से थोड़ी ही दूर माता का मंदिर ही होगा। जहाँ हर साल की तरह मेरा रक्षाबंधन का दिन कटता था। मैं घर से निकलकर मंदिर के पास पहुँचने ही वाला था सामने से आ रही एक युवा लड़की स्कूटी समेत गिर पड़ी, मैं जल्दी से उसके पास पहुंचा, तब तक कुछ और भी लोग पहुंच गये। उनमें से एक ने स्कूटी उठाकर किनारे किया। फिर एक अन्य व्यक्ति की सहायता...
कोई आता न ही जाता जहाँ पर
ग़ज़ल

कोई आता न ही जाता जहाँ पर

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कोई आता न ही जाता जहाँ पर। करेंगे हम भी क्या जाकर वहाँ पर। बिछड़कर साथ जो उसके चला था, हमारी है नज़र उस कारवाँ पर। सुबह वो चाँद ख़ुद से पूछता है, अकेला रह गया फिर आसमाँ पर। वो बातें आप में देखी तो फिर से, भरोसा आ गया उस दास्ताँ पर। गुजरता है कभी जो दिल से होकर, रहा करता है वो अपनी जुबाँ पर। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प...
मुझे अपनी शरण में ले
कविता

मुझे अपनी शरण में ले

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** भाद्र मास तिथि को अष्टमी लिया नर अवतार! अर्धरात्रि आलोकित हो उठा कारागार!! खुलीं बेड़ियाँ मात-पितु की सो गए प्रहरी! खुल गए सब बंद द्वार, हुआ विचित्र चमत्कार!! चले वसुदेव गोकुल को, थमा जमुना ज्वार!! जन्मदाता देवकी वसु, नंद-यशु पालनहार! बाललीला लख अतुल, नंद यशु बलि बलि जाएँ!! पाएँ स्वर्ग सुख: गृहांगण संग गोकुल गुंजार!! प्राण खींच पूतना के किया पवित्र अमियधार!! किया वकासुर वध संग बच्चन के मार हुलार! क्रीड़ा कर कालिया दह किया यमुना उद्धार!! गिरि को उंगली पर उठा मर्दित इंद्र अहंकार! निर्भय किया जन को गिरि प्रकृति महत्व साकार!! चरवाहा बन गउओं के बने पालनहार! बांस की बंसी के सुलभ मन रंजन सृजनहार!! गौ गोपी ग्वाल डूबे प्रेम: सुन वंशी स्वर! गोपी राधा संग रास कर प्रेम भक्ति संचार !! दधि माखन रोक मथुरा हित, विरोध आचार! कर से पूर्व दें बालकों को पौष्...
डॉं. मसानिया कृत शोध नवाचार शिक्षा जगत के लिये उपयोगी
पुस्तक समीक्षा

डॉं. मसानिया कृत शोध नवाचार शिक्षा जगत के लिये उपयोगी

                                 आगर मालवा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय आगर के व्याख्याता डॉ. दशरथ मसानिया साहित्य के क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां दर्ज हैं। २० से अधिक पुस्तके, ५० से अधिक नवाचार है। इन्हीं उपलब्धियों के आधार पर उन्हें मध्यप्रदेश शासन तथा देश के कई राज्यों ने पुरस्कृत भी किया है। डॉं मसानिया विगत १० वर्षों से हिंदी गायन की विशेष विधा जो दोहा चौपाई पर आधारित है, चालीसा लेखन में लगे हैं। इन चालिसाओं को अध्ययन की सुविधा के लिए शैक्षणिक, धार्मिक महापुरुष, महिला सशक्तिकरण आदि भागों में बांटा जा सकता है उन्होंने अपने १० वर्ष की यात्रा में शानदार ५० से अधिक चालीसा लिखकर एक रिकॉर्ड बनाया है। इनका प्रथम अंग्रेजी चालीसा दीपावली के दिन सन २०१० में प्रकाशित हुआ तथा ५० वां चालीसा रक्षाबंधन के दिन ३ अगस्त २०२० को सूर्यकांत निराला चालीसा प्रकाशित हुआ। रक्षाबंधन के मंगल पर्व पर डॉ दशर...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : अंतिम भाग- ३१
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : अंतिम भाग- ३१

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** उस दिन स्कूल में सोनू को मैने बडी शान से कहां, 'आज मैने राम मंदिर में पूजा की।' 'क्यों? उस घर के सब बडे कहां गए?' सोनू ने पूछा। सोनू को भी पता था कि वह घर मेरा नही है।' कितने सारे तो भगवान है वहां मंदिर में? तुमने कैसे की होगी पूजा?' सोनू ने मुझसे पूछा। 'माई बताती गयी और मै करते गया।' 'वो बुढीया तो बहुत ही खूंसट है। तू अनाथ उस घर में आश्रित है। तेरे उपर तो बहुत चिल्लायी होगी? है कि नही?' सोनू के बोलने का तरीका ऐसे ही था और वो बातों-बातों में हमेशा मेरी हालात का मुझे एहसास भी करा ही देता था। 'नहीं ज्यादा नहीं चिल्लायी मेरे उपर।' 'ठीक है।मै तेरी जगह होता तो उस खूंसट की एक भी नहीं सुनता।' 'तूने नहीं की कभी तेरे घर में भगवान की पूजा?'मैने सोनू से पूछा। 'अरे हाट! अपने को नहीं कहता कोई ऐसे फालतू काम। इन्ना ही करती है सब कुछ। मेरे को तो सिर्फ खा...
व्यवहारिक कुशलता
कविता

व्यवहारिक कुशलता

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** बड़ी बहुत जिंदगी बड़ा बहुत संसार, जिंदगी बेकार बने, सीखा न व्यवहार, व्यवहार कुशल होना, होती बड़ी बात, इससे जीवन मोल है, जन्मभर दे साथ। दो प्रकार के लोग, मिलते इस संसार, बुद्धिमान को लोग, करे जमकर प्यार, एक तो वो ज्ञानी, कहलाते जगत में, दूजे जो है पागल, मिलते कई हजार। पागल उनको जानिये, न जाने व्यवहार, मार पीटकर दम ले, नहीं माने वो हार, बुद्धिमान वो कहलाते, कुशल व्यवहार, हर काम को पूरा करे, जन से हो प्यार। व्यवहार कुशल जो, इस जहान में हो, व्यवहारिक कुशलता का जिनको ज्ञान, ऐसे जन सदा सफल हो हर जगह पर, अच्छे बुरे की मिलती उसको पहचान। भूख मरेगा वो जग, कुशल न व्यवहार, पैसे लेकर लौटाये ना, करता ऐसे कार, एक बार तो दे देंगे, धन, वस्तु व्यापार, भूले से फिर ना मिले, लोगों का प्यार। गरीब वहीं कहलाते, जाने ना व्यापार, या फिर उनका, कुशल नही...