शीशा बांँट रहे
डॉ. कामता नाथ सिंह
बेवल, रायबरेली
********************
गन्जों को कंघी, अन्धों को
शीशा बांँट रहे।
राजा जी घर-घर को ताज़ा
किस्सा बांँट रहे।।
आओ हम सब झूमें, नाचें
गायें गीत मल्हार,
रोटी की क्या सोचें ,
जब अपने ही हैं सरकार;
संसद में मुद्दों पर वे
मुर्दों को डांट रहे।।
गन्जों को कंघी, अन्धों को
शीशा बांँट रहे।।
हरिश्चन्द्र जी धनपशुओं को
दान बाँट देते ,
लेकिन नौकर चाकर की तो
जेब काट लेते,
वे विकास के मुद्दे पर
गुजराती छांट रहे।।
गन्जों को कंघी, अन्धों को
शीशा बांँट रहे!!
मेहमानों की अगवानी में
चुनवा दी दीवार,
फिर भी तुम पर निर्धनता का
काला भूत सवार??
फटी गूदड़ी पर, वे चिथड़ी
चादर सांँट रहे।।
गन्जों को कंघी,अन्धों को
शीशा बांँट रहे।।
परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह
पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह
निवासी : बेवल, रायबरेली
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौल...























