शोर
डॉ. चंद्रा सायता
इंदौर (मध्य प्रदेश)
********************
बाहर हर तरफ सन्नाटे का राज था और बुजुर्ग दद्दा के मन के अंदर बहुत शोर तथा कोलाहल था।
"राज ...बे ..टा। जरा ...इधर आना, जरुरी काम है।" खाँसते-खाँसते दद्दा ने वाक्य पूरा किया।
दद्दा ने पास आए पोते राज के कान में कुछ कहा। उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर जड़ी वीरान आँखें राज को याचना की दृष्टि से देखने लगी।
शशीन्द्र रोज आफिस जाने से पहले और आने के बाद अपने अठ्ठानवे वर्षीय बीमार पिता को कमरे में देखने आता था। बीच-बीच में उन्हें जरुरत की चीजें मुहैया कराने का काम बीवी और बच्चों के जिम्मे कर रखा था।
आज शाम जब शशीन्द्र दद्दा से मिलने आया, उसे बीड़ी की दुर्गंध का भान हुआ। उसने पलंग के सिरहाने जाकर लठकते तकिये को ठीक किया। कोई वस्तु नीचे गिरी, ऐसा लगा उसे।
"राज। ओ... रा..ज। कहाँ हो तुम? एक मिनिट के अंदर दद्दू के कमरे में आ ज...






















