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आहट
कविता

आहट

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मेरे कदमों की आहट से वर्तमान ठहर जाएगा और भविष्य का चुपके से आगमन होगा। मेरे कदमों की आहट से देवी शक्तियां मोहित होगी और दुष्ट शक्तियों स्थानांतरण करेंगी। मेरे कदमों की आहट से जीवन में प्रकाश का उदय होगा और अंधकार का विनाश होगा। मेरे कदमों की आहट से हृदय में ज्ञान का उजाला होगा और अज्ञान का ध्वंस होगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...
गंगा मैया ने सुनली पुकार
भजन

गंगा मैया ने सुनली पुकार

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** गंगा मैया ने सुन ली पुकार, बुलावा भेज दिया। देखी बच्चे की तड़प अपार, बड़ा उपकार किया। गंगा मैया ने सुन ली ... माघ मेला सजाती है मैया मेरी, अपने बच्चों को बाहों में लेने के मित। जो समझ पाते है अपनी मां की तड़प, वो लगाते हैं डुबकी तो उनका है हित। मां ने आंचल में अपने बुला बच्चो को, उन पर अपना दुलार बहा है दिया। गंगा मैया ने सुन ली ... निकली गौमुख से, और जाके सागर मिली। निकली जिस तीर्थ से, उसकी महिमा बढ़ी। जहां निकली और बच्चे मिलन आए तो, उनपे अपनी कृपा बरसा है दिया। गंगा मैया ने सुन ली ... मैने हरद्वार में मां को पाया बहुत, भाव आया कि भक्तों को लेकर चलूं। वृद्धों की सेवा का फल मिलेगा मुझे साथ जाने वाला धन कमाता चलूं। मेरे आराध्य ने सात्विक भाव को, देके साहस सदा ही है पूरा किया। गंगा मैया ने सुन ली...
बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए
व्यंग्य

बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बधाई हो... शर्मा जी आख़िरकार अंकल बन ही गए। मोहल्ले में आज यही बड़ी खबर है। कल ही गली में खेलती एक बच्ची ने मुस्कराकर उन्हें पुकारा “अंकल!” और शर्मा जी के जीवन में उम्र का यह प्रमोशन स्थायी रूप से दर्ज हो गया। यह बात जैसे ही उनकी पत्नी तक पहुँची, वह हँसते-हँसते दोहरी हो गईं। बोलीं- “मैं तो कब से कह रही हूँ कि आपकी उम्र ‘भैया’ वाली नहीं रही, पर आप ही मानते नहीं।” शर्मा जी ने दर्पण में खुद को देखने की कोशिश की वही रंगी हुई मूँछें, गहरे श्याम रंग की डाई से रंजित बालों की अंतिम बस्ती खुले दालान के किनारे बसी हुई। मगर सच्चाई यह कि जवानी के रंग-रोगन का असर अब शरीर की दीवारों पर नहीं टिकता। समय अपने हस्ताक्षर छोड़ ही देता है। उन्होंने जवानी को बचाए रखने के क्या-क्या जतन नहीं किए विदेशी डाई, घ...
एक हाथ से ताली
कविता

एक हाथ से ताली

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** एक हाथ से ताली बजाने वालों, ध्यान से मेरी बात सुनो तुम्हें कभी न कभी ज़रूरत पड़ेगी दूसरे हाथ की… साथियों के साथ की… जब खुद पर बीतेगी, तब खोजोगे दूसरा हाथ, और अपनी ही ताली पर दोगे सफ़ाई की सौ-सौ बातें, पर याद रखना जिस दिन अति आवश्यकता होगी, उस दिन पीछे कोई खड़ा नहीं होगा। कुछ चुनिंदा सरपरस्त जब खुद फँसने लगेंगे, तो सबसे पहले तुम्हीं पर उँगली उठाएँगे, अपना दामन पाक-साफ, और तुम्हें दाग़दार बताएँगे। औरों का नुकसान करने की हनक में तुम अपना ही पैर तुड़वाओगे, रह-रह कर छटपटाओगे कि जो साथ खड़े थे वे कहाँ गए? कीमती हीरे-मोती कैसे गंवा गए? नहीं है तुम्हारे भीतर कोई कस्तूरी जिसे तुम बाहर खोजोगे, अपने ही किरदार की सुगंध तुम सदा के लिए खो दोगे। एक हाथ से ताली बजाना तुम्हें मुबारक़ हो, ...
मुलाकात तुझसे हुई
दोहा

मुलाकात तुझसे हुई

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मुलाकात तुझसे हुई, मुझको दिन याद। तेरे मिलने ने किया, मुझे सदा आबाद।। करो इरादा प्रेम का, तो मिलता है मीत। जिससे अधरों पर सजे, खुशहाली का गीत।। वादा करना सोचकर, फिर मत देना तोड़। जिसको अपनाना उसे, देना कभी न छोड़।। करो अगर इकरार तुम, फिर मत कर इनकार। यही प्रेम की चेतना, यही प्रेम-आधार।। सोच-समझ ही दो सदा, दिल का तो प्रस्ताव। बात तभी जब अंत तक, रहे प्रेम का ताव।। बंधन हो मजबूत जब, तभी बढ़ेगी शान। करना नित ही प्रेम का, दिल से सब सम्मान।। आया है देखो 'शरद', निकट आज मधुमास। हर दिल में तो पर रहा आज प्रखर विश्वास।। अंधकार को मारकर, देता जो उजियार। कहता है सारा जगत, उसको ही तो प्यार।। प्रेम ईश का रूप है, लगता है दिनमान। जो भावों की श्रेष्ठता, शुभ-मंगल का गान।। रखो हृदय को निष्कलुष, करो सदा नि...
वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान
आलेख

वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** इंसान कलाओं के भंडार में पारंगत है। वह उपयोग कहां कब किस तरीके से कला को दर्शाता है उसका निखार लाता है यह व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। इसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व साफ झलकता है । कला का रूप प्रत्यक्ष होता है। व्यक्ति अपनी प्रतिभा का परिचय देने में सक्षम संबल होता है। अपने अंदर छुपी कला कब कहां किस रूप में उभारता है यह अपनेआप में पेचीदा प्रश्न है। यह जरूर है कि अवसर सुअवसर में श्रोता ही कला का निर्णयकारी सहित मूल्यांकन करता है। यकीनन मानिए तालियां की गड़गड़ाहट में वाक कला प्रमाणित करती है कि वक्ता के भावनात्मक विचार श्रोताओं के ह्र्दयमन में स्पर्श कर गए है। व्यक्ति की प्रतिभा औऱ उसकी कला जब प्रकट होती है तो वह निश्चित चर्चित होती है। यह बयां करती है कि वाक कला में पारंगत है। इंसान वाक कला कौशलता में बोलकर खरा उतरता है। वाक कला ...
कैसे-कैसे लोग जहाँ में आये हैं
कविता

कैसे-कैसे लोग जहाँ में आये हैं

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** कैसे-कैसे लोग जहाँ में आये हैं अपने फन से दुनिया को हर्षाये हैं तुलसी ने मानस का वो उपहार दिया जिससे भक्ति की वर्षा हम पाए हैं नन्द विवेका ने दुनिया झकझोर दिया। जिनके आगे मस्तक सब झुक जाये हैं राणा, वीर शिवा ने घुटने नहीं टेकी दुश्मन के छक्के हरदम छुड़वाये हैं लता ने ऐसे-ऐसे गीतों को गया कौन है जो उनको सुन झूम न पाए हैं नन्दलाल के चित्र सदा ही बोल उठे लगतें नहीं हैं चित्र, जिवंत हो आये हैं मैथिली, दिनकर की कवितायेँ ऐसी हैं अंतस्तल तक को झंकृत कर जाये हैं स्वतंत्रता को लेने की खातिर कितने लालों ने फाँसी पर प्राण गाँवाये हैं किन-किन की चर्चा हम करें भंडार बहुत उनके आगे सर हरदम झुक जाये हैं परिचय :-  विजय वर्धन पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद माता जी : स्व. सरोजिनी देवी निवासी : लहेरी टोला भागलपुर (बिहार) शिक्षा : एम.एससी.ब...
पुण्य भूमि भारत
कविता

पुण्य भूमि भारत

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** भारत भूमि को दुनियां मे सब से बड़ा तीर्थ मान। इस भूमि को भारतवासी देते माता का सम्मान। भारत भूमि…. देवत्व भूमि यह अनेकों देवताओं का है धाम। जन मानस मे रचे बसे है राधा कृष्ण और राम। देव वाणी हमारे जन मानस के मन मे गुंजायमान। देव वाणी से परिपूर्ण है हमारा गीता ग्रंथ महान। भारत भूमि…. इस भूमि पर पले बढ़े हुए अनेकों धर्म महान। धर्म रक्षा के ख़ातिर अवतरित हुए है यहाँ स्वयं भगवान। सनातन की भावना देखती सब को एक समान। युग युग से यह पावन भूमि कहलाती धर्म प्रधान। भारत भूमि…. वेद पुराणों अनेकों ग्रंथों मे है इसकी गाथा। आया जो भी इस धराती पर शरण इसकी पाता। अहिंसा परम् धर्म है मूल मन्त्र इसकी पहचान। पूरे भारत मे होता है इसकी महिमा का गुणगान। भारत भूमि….. पर्वत राज हिमालय पर है इस धरती को अभिमान। मानसरोवर है पावन गंग...
नउकरी के बंधना
आंचलिक बोली, कविता

नउकरी के बंधना

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) घुम-घुम, किन्दर-किन्दर अपन रचना ल सुनावव जी, कभु रइपुर, कभु कोरबा अउ कभु रइगढ़ म अंजोर बगरावव जी, बंधाय हे हमर अंग-अंग बंधना म, रचना पढ़े के फुरसत नइ हे अपन दुवारी अउ घर अंगना म, राती-राती भर गोष्ठी करव दिन म ऊंघे के बेरा हावय, गेरवा ले गर बंधाय हे हमर आउ चारो कोती घेरा हावय, तुंहर घुमइ फिरइ देख के लालच हमरो बाढ़त हावय, दंउरी कस बइला फंदाय हवन छाती म पथरा माढ़त हावय, दु पइसा कमाए के चक्कर म हाल डोल नइ पावत हावन, फाग, ददरिया चाहे भजन दय मालिक ह नाच-नाच के सब गावत हावन, पुरुस्कार ल तुंहर देख के संगी हिरदे हमर गदगद झुमत हावय, तुमन ल रचना सुनावत देखके मन हमरो छत्तीसगढ़ भर घुमत हावय। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
नन्हें साथी
पुस्तक समीक्षा

नन्हें साथी

सुधा गोयल द्वारा लिखित 'नन्हें साथी' पुस्तक की विवेचना समीक्षक :- नील मणि मवाना रोड (मेरठ) *************** अदम्य नारी रत्न सम्मान एवं कोहर प्रसाद पाठक स्मृति बाल साहित्य श्री सम्मान से सुशोभि श्रीमती सुधा गोयल जी का बाल साहित्य-संग्रह नन्हें-साथी मेरे हाथों में होना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। १०७ पृष्ठों में सजी ३७ बाल कहानियों की यह पत्रिका बाल मन की दुनिया का ऐसा आईना है, जिसमें बच्चे अपने बचपन की शरारतें, जिज्ञासाएँ और संवेदनाएँ साफ़ देख पाते हैं। एक के बाद एक छोटी, मनोरंजक और दिलचस्प कहानियाँ बच्चों को बाँधे रखती हैं। यह संग्रह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि संवेदनशीलता, नैतिक मूल्यों और सुसंस्कृत समाज की नींव भी रखता है। पढ़ते-पढ़ते रुकने का मन नहीं होता- हर कहानी अगली कहानी की ओर सहज ही खींच ले जाती है। शब्दों की चंचलता मन मोह लेती है। भाषा सरल, स्पष्ट और कहीं-कहीं हल्...
मुंह पर थप्पड़
लघुकथा

मुंह पर थप्पड़

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ********************  यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया। पहले तो जयंत ने मानसी का फोन अटैंड नहीं किया, और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा, और जब मानसी ने सीधे-सीधे सवाल किया कि, "जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं, तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?" "हां है तो...।" "क्या, तुम उससे सहमत नहीं ?" "नहीं।" "मतलब असहमत हो?" " नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।" "मतलब यह कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है, तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा ...। और फिर इसमें बुराई भी क्या है, आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है। इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।" "मतलब, यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?" "हां ...ऐसा ही समझो ...।' "और हमारे प्यार का ...
कन्हैया तुम्हारा सहारा न होता : सनातनी गज़ल
ग़ज़ल

कन्हैया तुम्हारा सहारा न होता : सनातनी गज़ल

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** सनातनी गज़ल कन्हैया तुम्हारा सहारा न होता। तो दुनिया में कोई हमारा न होता। जो पकड़ा न होता मेरा हाथ तुमने, तो ग़म की नदी का किनारा न होता। न होते लता, पुष्प, पर्वत ये झरने। तो जग में ये अनुपम नज़ारा न होता। दिया ज्ञान गीता का तुमने जहां को, बिना कर्म जग में गुज़ारा न होता। भरा स्वार्थ सारे ज़माने में दिखता बिना काम कोई भी प्यारा न होता। बनाते नहीं प्रेम की रीत जग में, तो इंसा किसी से भी हारा न होता। "प्रिया" मोह माया में सोई हुई थी, न जगती जो तुमने पुकारा न होता। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य/पद्म लेखन एवं गायन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक ...
ख्बाव सा तुम्हारी आंख में
कविता

ख्बाव सा तुम्हारी आंख में

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** ख्बाव सा तुम्हारी आंख में बसने लगा हूं फूल के सौंदर्य सा मुस्कराने लगा हूं तुम सुबह की पहली किरण सी उतरी हो जब से मेरे आंगन में मैं धूप में भी मुस्कराने लगा हूं। देखता हूं खाली आकाश को जब भी मैं बादल सा उमड़ने लगा हूं चाहता हूं कि बरसूं तुम्हारे गेसुओं पर मैं नटखट थोड़ा मुस्कराने लगा हूं तुम देखती हो मुझे छिपकर यह मैं जानता हूं तुम्हारी चाहते पा मन ही मन मुस्कराने लगा हूं। मेरे चेहरे पर खिली रहती है ताजगी अब मैं सबसे हंस हंस कर मिलने लगा हूं। दूर से ही देखकर तुम्हें एक नजर जैसे मैं जन्नत में रहने लगा हूं नहीं कोई कामना कि गलबहियां करुं बस तुझे मुस्कराता देखना चाहता हूं रहो हर वक्त सामने यह भी नहीं चाहता बस एक बार देख लूं चाहने लगा हूं ऐसा ही खूबसूरत सपना देखने लगा हूं। परिचय :- सुधा गोयल निवासी : ...
याराना
कविता

याराना

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर लम्हा सुहाना होगा तेरा हंँसना और फिर देखकर तुम्हें मेरा मुस्कुराना होगा। माना कि हम कुछ भी नहीं मगर तुम्हारे सिर के ताज़ पर हर पल हमारा पहरा होगा। मैं हार भी जाऊं तुम्हें जीतने के लिए तो भी तेरे सपनों में एक अफसाना होगा। एक तलब है तुम्हें हर पल मुस्कुराते देखने की अगर मैं मिट भी जाऊं तो भी ये मेरा याराना होगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
इंडिया नहीं “भारत” कहें
कविता

इंडिया नहीं “भारत” कहें

मंजुला भूतड़ा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** इंडिया नहीं "भारत" कहें, गर्व से कहें, हम भारतीय हैं। शपथ हमें इस मिट्टी की, इसे चंदन-सा महकाएंगे। धूल नहीं है यह केवल, इसका माथे तिलक लगाएंगे। नए भारत के निर्माण में, फिर से अब जुट जाएंगे। विश्व के नये मानचित्र में, अब "पूरा भारत" दिखलाएंगे। राष्ट्रीय पक्षी इसका मोर, राष्ट्रीय पशु यहां बाघ है। पुष्प कमल है राष्ट्र गौरव, अशोक चक्र महान है। हिन्दी इसकी भाषा मीठी, अपनेपन की खुशबू है। राष्ट्र भाषा इसे बनाएं, यह दिल में अरमान है। इंडिया नहीं "भारत" कहें, गर्व से कहें, हम भारतीय हैं। परिचय :-  मंजुला भूतड़ा जन्म : २२ जुलाई निवास : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : कला स्नातक कार्यक्षेत्र : लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रचना कर्म : साहित्यिक लेखन विधाएं : कविता, आलेख, ललित निबंध, लघुकथा, संस्मर...
रविदास ईश प्रभु धर्मा
चौपाई

रविदास ईश प्रभु धर्मा

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** माघ मास पूनम को जन्में। भक्ति भाव था खासा जिनमें।। पितु संतोष मातु हैं कर्मा। रविदास ईश प्रभु धर्मा।। कर्मशील प्राणी रविदासा। रखता सदा ईश विश्वासा।। समाजिक सुधार थे लाए। संत शिरोमणि आप कहाए।। सामाजिक सद्भाव दिखाया । जाति पाति का भेद मिटाया॥ निश्चल धारा भक्ति बहाया। जीवन का फिर सार बताया॥ कर्म निरंतर करते रहते। ध्यान मगन रह सदा विचरते।। गंगा मैय्या आप थीं आईं। लाज भक्त की मातु बचाईं।। कभी नहीं मन मैला राखा। ईश कृपा का फल था चाखा।। धर्म कर्म की ज्योति जगाए। योगी संत सुजान कहाए।। छोटा-बड़ा कर्म नहीं माना। ईश कृपा को सबमें माना।। भटक रहा क्यों प्राणी जग में। ईश्वर तो है तेरे मन में।। मीराबाई गुरु रैदासा। सतपथ पर उनका विश्वासा।। गुरु ग्रंथ में जगह हैं पाए। भक्ति भजन रसधार बहाए। सत्य...
मेरे जाने के बाद
कविता

मेरे जाने के बाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मेरे चले जाने के बाद, मेरा अस्तित्व भी मिट जाएगा, मेरा सबकुछ मेरे साथ चला जाएगा!! ये सफ़र यूँ ही चलता रहेगा, इस भीड़ में कोई हमारा नहीं रह जाएगा!! जीवन भर अपना व्यक्तित्व शून्य रखा था, वो शून्य भी शून्य में विलीन हो जाएगा! ना किसी के पास फैलेगा मेरी हंसी का धुंआ, ना मेरी याद में कोई एक दीपक जलायेगा!! वो आंगन, वो किवाड़, वो चूल्हा चौका जिनमे हम प्यार परोसा करते थे, उनकी सिसकियाँ घर मे सुनाई देंगी!! वो चूडी वो बिंदी, कतार में सजी साडियाँ उनके आँसू मेरी अलमारी में दिखाई देंगे!! प्रकृति को संजोया था हमने जीवों की मुस्कराहट में, वो अपने आसपास हमें ढूंढा करेंगे!! इनकी आवाज मुझ तक भी पहुंच जाएगी, जब हम इस दुनिया से बहुत दूर निकल जाएगें!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा...
बारूदी बस्ती
कविता

बारूदी बस्ती

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** अरमानों की मौन अर्थियाँ, रोज निकलती हैं। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। हिंसा ने खुशियों को खाई, जब त्योहारों की। अलगू जुम्मन पूजा करते, बस हथियारों की।। समरसता से डरी पुस्तकें, आहें भरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। क्षुद्र स्वार्थ में इस माली ने, पूँजी कुछ जोड़ी। हरे-भरे सम्पन्न बाग की, मेड़ें सब तोड़ी।। कलियाँ बासंती मौसम को, देख सिहरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। डरी अल्पनाएँ आँगन से, अब मुँह मोड़ रही। हँसिया लेकर बगिया विष की, फसलें गोड़ रही।। गर्वित-गढ़ में न्याय-कुर्सियाँ, पल-पल मरती हैं।। इस बारूदी बस्ती में अब, श्वासें डरती हैं।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक ...
सरोद
दोहा

सरोद

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वादन सुनो सरोद का, सँग है सरगम ताल। मन मयूर जब नाचता, समय बदलता चाल।। वीणा और सरोद सँग, बजता मधुर मृदंग। बजती है जब भैरवी, बिखरें अनुपम रंग।। मंगल काज सँवारते, मधुर सरोद सितार। तोरण सजते द्वार पर, होता मनु सत्कार।। कृपा करें माँ शारदे, हो सरोद की तान। करता कवि फिर है सृजन, गढ़े नये प्रतिमान।। बजने लगता जब मधुर, मन का प्रेम सरोद। छंद गीत कविवर रचे, करता हिय आमोद।। नयनों में रस घोलती, मन में भरे हिलोर। धुन सरोद की भावनी, उर हरती चितचोर।। अनुपम वाद्य सरोद है, छेड़े उर के तार। अति मधुरिम संगीत से, बहे अमिय रसधार।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : ...
सतरंगी दुनिया- १७
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** आपका भव्य महल हो या छोटी-सी झोपड़ी, घर उसी को कहते हैं जहां शांति और सुकून मिले। *यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो दूसरों के जीवन में अपनी जगह ढूंढना बंद कर दो।* हमें अपनी ज़िंदगी का आनंद अपने तरीके से लेना चाहिए, लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है। स्टेटस ज़िंदगी का हो या मोबाईल का, स्टेटस ऐसा रखें कि लोग कॉपी करने पर मजबूर हो जाएँ। जब बुरा करने के बाद भी बुरा ना लगे तो समझना चाहिए कि बुराई अब हमारे चरित्र में आ गई है। आज तो मेरा तकिया और बिस्तर भी बोल पड़ा, "मालिक थोड़ा उठकर बैठ जाओ या छत पर घूम लो, हमें भी थोड़ा साँस लेने दो। एक नगर सेठ के यहाँ इन्कमटैक्स का छापा पड़ा। सारे खातों की जांच हुई। एक जगह सेठ ने लिख रखा था कि पाँच लाख की जलेबियाँ कुत्तों को खिलाई। इन्कम टैक्स वालों ने इस खर्च के लिए...
महासंत रविदास
दोहा

महासंत रविदास

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** महासंत रविदास जी, मानवता के सार। फैलाकर के जो गए, एक नया उजियार।। महासंत रविदास जी, थे समता के रूप। अपने युग को दे गए, जो सूरज की धूप।। हरिपूजा की श्रेष्ठता, धारण करके खूब। रीति-नीति की दे गए, हमको पावन दूब।। महासंत रविदास जी, गाकर के मृदुगीत। बने मनुज की चेतना, के सच्चे मनमीत।। महासंत रविदास जी, कहते थे जयराम। सत्य, कर्म का रच गए, एक नवल आयाम।। महासंत निश्छल रहे, करनी रही विशिष्ट। जीवन सादा, निष्कलुष, सच्चाई थी इष्ट।। दूर रहो हर ढोंग से, दिया हमें संदेश। महासंत ने थे हरे, सबके सब ही क्लेश।। महासंत रविदास जी, थे सच्चे युगबोध। उनकी मानवता बनी, हर युग को नव शोध।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी...
चाहतों का क्या है
कविता

चाहतों का क्या है

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चाहतों का क्या है!1030 चाहतें तो पागल होती हैं। जैसे अक्सर मैं चाहती हूँ कि नंगे धूसर पहाड़ों को बसंत के हरेपन से ढँक दूँ, नदियों को प्रदूषणमुक्त पानी से लबालब भर दूँ, घाटी के सूख चुके सोतों को फिर से जीवित कर दूँ। चाहती हूँ कि उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले क़ाबिज़ हों और फ़ैसले की पूरी ताक़त उनके हाथों में हो। चाहती हूँ बराबरी और आपसी सम्मान से भरा ऐसा प्यार जो मुक्ति का पर्याय हो और जिसकी मौन उपस्थिति में आत्माएँ संवाद करें कविता की भाषा में। जो नहीं है और जिसे होना ही चाहिए उसकी कामना में खरचती हूँ जीवन और सोचती हूँ कि दुनिया में अगर नहीं हुआ करतीं कुछ पागलपन भरी चाहतें तो मनुष्यता का भविष्य क्या होता! लेकिन सिर्फ़ चाहने से क्या होता है! इसलिए...
सिर्फ सोलह लाइन में
कविता

सिर्फ सोलह लाइन में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उसने सुझाव दिया कि अपने दिल का अरमान लिखो, अपनी चाहत, शत्रु, दिलोजान लिखो, मैंने कहा यार सिर्फ सोलह लाइन में आप ही बताओ क्या-क्या लिखूं, अपनी मर्ज लिखूं या दवा लिखूं, अपने दोस्त लिखूं या दुश्मन लिखूं, या दोस्त के खोल में छुपे स्वजन लिखूं, मेरी उन्नति के लिए उनका ढिंढोरा लिखूं, या सच में उनका बहलाता मन छिछोरा लिखूं, अपनी आन बान या शान लिखूं, या मुझे बर्बाद करने का उनका अरमां लिखूं, समाज के लिए जां लुटाना लिखूं, या उनका स्वार्थ और बरगलाना लिखूं, अब दिल चीर कर और कितना बताऊं, सोलह लाइन में क्या दिखाऊं क्या छुपाऊं। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
अवनी… अम्बर…
कविता

अवनी… अम्बर…

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुंग श्रृंग शिखर वृक्ष का सन्देश सुनाता अम्बर को कहता अवनि आश्वस्त है तप्त रवि जब किरणे फैलाता। पसरे वृक्ष छाया करते अवनी पर गोला ई, चौडा ई, चतुर्भुज, लम्बाई मे गणित बैठाती है शाखा ऐ। झुम कर दे ठण्डी पवन तपती दुपहरी मे पर्णो पर संगीत सुनाती आडी, तिरछी शाखा ऐ वृक्षो की आलिंगन करती अवनी का। मानो वृक्षशाखा ऐ कह रही है हे अवनी हन तुम्हे संभाल लेगी क्योकि नीचे की जडो का तुमही तो आधार हो वृक्षो के क ई आकार छोटे, बडे, लम्बाकार देते सदैव अम्बर को अवनि का अस्तित्वभास। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ स...
जड़कला
आंचलिक बोली, कविता

जड़कला

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) किसान मन के सोनहा धान लुआँ मिंजा के घर आगे मेहिनत के फल मिलगे कोठी डोली म धान धरा गे।। अग्घन, पूस के महीना म संगी लद-लद जाड़ जनाए कथरी, कमरा, अउ साल ओढ़े गोरसी म आगी सुलगाए।। कतको कपड़ा पुर नई आवय जड़कला हर जब आथे ताते कपड़ा अउ ताते जिनिस सबों के मन ल भाथे।। नोनी, बाबू अउ, लइका सियान जाड़ म ठिठुरत काँपय संझा बिहनिया जम्मो जुरमिल भुर्री बार के तापय।। कुहरा निकलय मुहुँ डहर ले, नहाय बर मन ढेरियाय उठत बिहनियाँ सुरुज के अगोरा घाम ह बने सुहाय।। तिवरा भाजी, राहेर के बटकर सबो के मन ल भाय चिरपोटी पताल के चटनी संग अंगाकर गजब मिठाय।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित क...