नई पारी
खुल जाएंगे आज शहर
खुल जाएंगी गलियां सारी
खुल जाएगा उजियारा
छंट जाएगी अंधियारी
क्या खुल जाएगी सोच वही जो
लेकर हम सब बंद हुए थे ?
क्या खुल जाएगी सोच वही जो
जिससे चेहरे मंद हुए थे ?
खुल जाएगी किस्मत क्या
उस बुढ़िया चेहरे की लाठी ?
खुल जाएगी बचपन की वो
खेल खिलौनों की काठी ?
या फिर से बंद हो जाएगा
अंधियारा इस तूफान का
क्या जुड़ पाएगा दूरियों में
नाता फिर इंसान का ?
क्या खुशियां फिर से खेलेंगी
या ग़म के बादल छाएंगे ?
जो बिछड़ गए हैं अपनों से
क्या फिर से वो मिल पाएंगे ?
अब समय नहीं है बंद सोच का,
बस वही बदलने की बारी।
लेकर आशाओं के दीप शुभम,
हम खेलेंगे अब नई पारी।
हम खेलेंगे अब नई पारी।
परिचय :- दीपक कानोड़िया
निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश
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