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भारत ही हमारा धर्म
कविता

भारत ही हमारा धर्म

रवि कुमार बोकारो, (झारखण्ड) ******************** ना जात-पात मे खेद यँहा ना रंग-रुप मे भेद, ना धर्मों की कोई गिनती यँहा यहाँ धर्म मिले अनेक। कन्ही 'राम' हे कन्ही 'रहीम' कन्ही 'कृष्णा' तो कन्ही 'करीम ईस धरती पे ना जाने कितने विरो ने जन्म लिए, ईस भारत माँ के खातिर कितनों ने 'सर' कल्म किये,, जिसनें भी देखा नजर उठा के उनको भी सहनी हार पड़ीं 'भारत' ही हमारा धर्म है बस यही हमे संस्कार मिली।। परिचय :- रवि कुमार निवासी - नावाड़ीह, बोकारो, (झारखण्ड) घोषणा पत्र : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अ...
सावन की फुहार
कविता

सावन की फुहार

तेज कुमार सिंह परिहार सरिया जिला सतना म.प्र ******************** सावन भादो केरि बहार बदरा बरसै मारि फुहार मान करै पिय से नवल नारि संग सखियन के कजरिया गावै डागरोहिंन के दिल धड़कावाई मघा बूंद मनसिज उपजावै दादूरि बोल उद्दीप्त करावै मोरिल बोलि बिरहिन सुन पावै हुकि करेजे तकि चलि जावै जे बड़भागी पिया संग, गावै मधुर मल्हार अमृत सी बरखा लगे, सावन केरि फुहार परिचय :- तेज कुमार सिंह परिहार पिता : स्व. श्री चंद्रपाल सिंह निवासी : सरिया जिला सतना म.प्र. शिक्षा : एम ए हिंदी जन्म तिथि : ०२ जनवरी १९६९ जन्मस्थान : पटकापुर जिला उन्नाव उ.प्र. घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, ले...
अनमोल खेल
कविता

अनमोल खेल

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. झूम उठे संसार ये सारा, प्रभु ऐसा खेल दिखा अनमोल। जहाँ जहाँ पर नजर घुमायें मस्ती का आलम हो, लग जायें खुशियों के मेले अपने आप बिदा गम हो। ऐसी तान छेड़ दो प्रभुजी मचल उठे पूरा भूगोल। ऐसा खेल दिखा अनमोल... मन में चंदन लगे महकने, दिल गंगा सा पावन हो, केवल घर ही नहीं हमारा, भारत भी वृन्दावन हो। जिससें गिरे धरा पर अमृत, ऐसे हमें सुनादे बोल। ऐसा खेल दिखा अनमोल... पूनम सी खिल उठे जिंन्दगी, पुलक उठे सारा माहोल, ऐसा खेल दिखा अनमोल... परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का प्रकाशन होता रहा है। राष्...
माध्यम वर्ग का अजब पहाड़ा
कविता

माध्यम वर्ग का अजब पहाड़ा

राजकुमार अरोड़ा 'गाइड' बहादुरगढ़ (हरियाणा) ******************** आओ पढ़ें, मध्यम वर्ग का ये अजब पहाड़ा। सँघर्ष है जिसकी नियति, न कभी जीता, न हारा।। अमीर-गरीब के बीच पिस रहा मैं ही कर्णधार हूँ। हर टैक्स की अदायगी की मैं ही तो पतवार हूँ। मेरा जीवन नीति से नहीं, नीयत से चलता है। न जाने क्यों, हर शासक मुझे ही छलता है।। चुप रह जाना हर बार मेरी विवशता मत समझो। स्वयं ही कुछ महसूस करो, जानो और परखो। रख स्वाभिमान बरकरार कैसे हमारी जिंदगी है कटी। उजली दिखती कमीज़ के नीचे है हमारी बनियान फटी।। जुटा हिम्मत, कर व्यवस्था आराम के साधन जुटा लेते है। न बन पाये कभी बात तो अपनी जरूरत घटा लेते हैं। हर बार ही तुमने हमें थकाया है, भरमाया है । हर संकट में जबकि मध्यम वर्ग ने ही तुम्हें बचाया है।। जिन पर लुटा दिया तुमने लाखों करोड़ों का अम्बार। भाग गये विदेश वो, कर के तुम्हें पूरी तरह से लाचार।। मत भूलो हम ही हैं,...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २८
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २८

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** अगले रविवार बड़ी प्रसन्नता से मैं गणपत के साथ हाट में ग्रामपंचायत का कर वसूलने गया। इस बार सब विक्रेता मुझे जानते थे और छोटा होने के कारण सब मेरे साथ हंसी मजाक भी करने लगे। संयोग रहा कि इस बार भी मेरे द्वारा ही सबसे ज्यादा कर वसूला गया था। शाम को हम सब घर वापस लौटे। पिछला अनुभव होने के कारण इस बार हिसाब किताब जल्द ही निपट गया था। गणपत ने उसके दो मित्रों को उनका मेहनताना देकर रवाना किया फिर मुझे भी एक रूपया दिया। अब मेरे पास तीन रुपये जमा हो गए थे। हम सब जब घर वापस आए थे उस वक्त माँजी, सुशीलाबाई और सुरेश गाव में ही किसी के यहां किसी कार्यक्रम में गए थे। घर में बेबी और उनका दो वर्ष का बेटा ही थे। गणपत ने बेबी को सारे रुपये सम्हाल कर रखने को दिए। गणपत का दो वर्ष का बेटा सुदर्शन जिसे सब शुंडू नाम से पुकारते थे मेरे पास आकर बैठा। मैं उसके साथ ख...
स्वतंत्रता इस मिट्टी की
कविता

स्वतंत्रता इस मिट्टी की

उषा शर्मा "मन" बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) ******************** १५ अगस्त को आता भारत का स्वतंत्रता दिवस। भारतवासी जिसे शान से मनाता हर वर्ष।। इसी दिन उन गोरे लोगों से भारत हुआ स्वतंत्र। ७३ वर्ष पूर्व ना था भारत में लोकतंत्र।। अतः सब भारतवासी लोकतंत्र का अर्थ समझे। पैसे, भाई भतीजावाद के लिए अपना मत ना बेचे।। इसी देश को विदेशों में कहते सोने की चिड़िया। सत्य, अहिंसा की कुंजी जहां की माया।। अनेक जाति हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई। एकता, अखंडता है जिस देश की मूल इकाई।। देश का तिरंगा ही बतलाता जिस धरती को। मोदी, अमित नेता जहाँ, छोड़ो सारी निराशा को।। एकता संबल जहां, टूटे अभिमान वहां। मातृभूमि की गंध जिस मिट्टी में, वह है यहां।। त्यागे सब धर्म, अपनाएं देश भक्ति का धर्म। जन - जन ऐसा जिसमें हो त्याग का कर्म।। ऐसी मिट्टी है हमारी मातृभूमि भारत माता की। परिचय :- उषा शर्मा "मन" शिक्षा : एम.ए. व बी...
जलदेवियाँ
लघुकथा

जलदेवियाँ

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************  नारी उस वृक्ष की भाँति है जो विषम परिस्थिति में तटस्त रहते हुए परिवार के सदस्यों को छाया देती है। नारी अबला नहीं सबला है। पुरुष वर्ग शायद नहीं जानते कि नारी कोमलता एवं सहनशीलता के साथ यदि वह दृढ निश्चय करे तो वह कुछ भी सम्भव कर सकती है। इस बात के असंख्य उदाहरण हैं जिसमें से एक कहानी आपके सम्मुख प्रस्तुत है। गंगाबाई और रामकली ये दोनों आदिवासी खालवा विकास खंड लंगोटी की रहने वाली थीं। इस आदिवासी विकास खंड की पहचान सुदूर आदिवासी अंचल के नाम से थी क्यूंकि ये दुनिया से एक सदी पीछे था। इस विकास खंड के पंद्रह गाँव आज भी पहुँच विहीन हैं। पानी के अभाव से जीवन अत्यंत जटिल था। गंगाबाई और रामकली के साथ पार्वती, लछमी, ललिता, मीरा, चमेली, टोला और चम्पा ये सारी स्त्रियाँ हर रोज सुबह शाम तीन किलोमीटर तापती नदी पर जाकर झिरी खोद कर पानी भर कर लातीं थ...
रक्षा बंधन
कविता

रक्षा बंधन

संजय जैन मुंबई ******************** हर सावन में आती राखी। बहिना से मिलवाती राखी। बहिन-भाई का अनोखा रिश्ता। बना रहे ये बंधन हमेशा।। जो भूले से भी ना भूले। बचपन की वो सब यादे। बहिन-भाई का अटूट प्रेम। सब कुछ याद दिलाती राखी।। भाई बहिन का पवित्र रिश्ता। हर घर में खुशियां बरसाता। बहिना सब के दिलमें बसती। क्योकिं घर की वो है लक्ष्मी।। मन भावन क्षण लाती राखी। एक दूसरे की रक्षा की याद दिलाती राखी। वचन हमेशा याद दिलाती बहिन भाई को ये राखी। इसलिए हर साल ये आती स्नेह प्यार सब का बढ़ाती।। भैया भाभी वचन एक देना, कभी न छोड़ोगे मातपिता को। यही वचन है भाई मेरा राखी का उपहार भी मेरा। घर घर में लायेगा ये वचन खुशियां अपरम्पार। देखो आया बहिन भाई का, रक्षा बंधन का त्यौहार।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपन...
प्यासा परिंदा
कविता

प्यासा परिंदा

सौरभ समर महराजगंज (उत्तर प्रदेश) ******************** यह सोच भटका हुआ मंजिल परख जायगा कही ना कहीं तो हर सड़क जायगा सबको पता है उसका ठिकाना घोसला ही होगा परिंदा आसमा छूते छूते जब थक जायगा चिंगारी दरकार नही मोहब्बत ए आतिश को महज एक दीदार से ये शोला भड़क जायगा बेअदब है ये लोग नजरे नही झुकायेंगे बदन से जो दुप्पटा सरक जायगा किसी बेघर को घर मे सुलाकर कर के देखो घर का कोना कोना महक जायगा और छज्जे पर रख देना आब का प्याला कोई प्यासा परिंदा चहक जायगा परिचय :- सौरभ समर निवासी : महराजगंज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवान...
अफवाह
कविता

अफवाह

अमोघ अग्रवाल गढ़ाकोटा, सागर (मध्य प्रदेश) ******************** कान जो सदा घिरे होते थे सुंदर-सुंदर बालियों से, झुमकों से। काली-काली, घनी-घनी, लटों से, घटाओं से, छुपे होते थे। आज वह, इस तरह घिरे हैं, अफवाहों से, कि बोल उठते हैं, चीख़ उठते है, मुझे फट जाने हो, कट कर कहीं, गिर जाने दो... परिचय :- अमोघ अग्रवाल साहित्यिक नाम : "इंतज़ार" पिता : स्व. बी. के. अग्रवाल माता : श्रीमती आशा अग्रवाल जन्म : ०५ सितंबर १९९१ निवासी : गढ़ाकोटा, सागर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.ई. कार्यरत : निजी व्यवसाय लेखन : शांत, करुण, श्रृंगार रस, कविता, कहानी, हाइकू, टांका और अन्य सम्मान : "शतकवीर" सम्मान, "काव्य कृष्ण" सम्मान, निरंतर १२ घंटे काव्य में सम्मान, राष्ट्र कवि गुरु सत्त नारायण सत्तन जी द्वारा दो बार सम्मानित। रंजनकलश इंदौर ईकाई मीडिया प्रभारी, कई पत्र पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित।...
तुम्ही बताओ
कविता

तुम्ही बताओ

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** उसकी बंदिश में कब तक रहता तुम्ही बताओ, मैं उसके जुल्म कब तक सहता तुम्ही बताओ! जहर पीता रहा मैं अब तक खामोशी से यारों, आखिर कब तक कुछ ना कहता तुम्ही बताओ! जो छलती रही सदा अपना कह-कह के मुझको, मैं एक बार उसको क्यों ना छलता तुम्ही बताओ! मेरी उन्नति से भी वो जलती रही अंदर ही अंदर, फिर मैं ही उससे क्यों ना जलता तुम्ही बताओ! सफर में साथ छोड़ के वो बदल दी हमसफ़र, अपने वादों से मैं क्यों ना बदलता तुम्ही बताओ! गुजर गया अनमोल समय बेमतलब के रिश्ते में, बर्बाद हुआ समय क्यों ना खलता तुम्ही बताओ! परिचय :- आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशव...
बीत गये कितने दिन
कविता

बीत गये कितने दिन

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये बोले।। मन में कुछ आना, कुछ कहना, फिर अपने में दहते रहना, वृश्चिक-दंश कभी अपनों, अपने जैसों का सहते रहना, रोम-रोम रिस-रिसकर सबके जीवन में अमृतरस घोले।। बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये, बोले ।। एक पांखुरी खिलने से झरने तक कितनों को क्या देती, कितने पुण्य बांटती फिरती है संगम की पावन रेती, गुणा गणित या जोड़ घटाना फ़ुरसत कहां कि नापे तोले।। बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये, बोले।। जब-तब नेह भरी आंखों से, कितने सपने झर जाते हैं, जिम्मेदारी की लू से अंखुवाये सपने मर जाते हैं, बिना समय की मर्जी कब अपनी मर्जी से हीले डोले।। बीत गये जाने कितने दिन, बिन खुद से बतियाये, बोले।। परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली घोषणा पत्...
तिरस्कार से आहत मन
कविता

तिरस्कार से आहत मन

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** तिरस्कार से आहत मन तो, कुंठा की हर चोट छिपाता। पर मैं विचारों की नदी के, पार जाकर लौट आता। तब सदा अनुभूत शांति, क्रोध की ज्वाला दबाती। पछतावे के आंसुओं का, बोझ मन पर लाद जाती। नीरवता फिर रात ढले ही, बात किया करती सांसों से। सुनती है, कुछ भी न बोलती, अंतर्मन रह रह कर टटोलती। बुद्धि का अवरोध हटाकर हौले हौले मन भीतर जाता। पर चकराता देख नज़ारा, बड़े मज़े में खुद को पाता। द्वेष दम्भ के, अहंकार के, सभी मुखौटे पड़े धरा पर। लोभ, लालच के प्रपंच भी, हैं खड़े सिर को नवा कर। निर्मल शीतल नीर झील का, मन पर ऐसा असर दिखाता। ईर्ष्या, द्वेष सभी बह जाते, छल प्रपंच भी नज़र न आता। बुद्धि का अहम ही हमें सताता, मतिभ्रम से मन को उलझाता। कलुषित कुछ ना भीतर पाकर, सब खेल समझ मन ऊपर आता। बुद्धि का कोई उपक्रम अब, जब भी मन में शोक जगाता। मैं फिर विचारों की नदी के पार ज...
यह कैसा संभाषण
कविता

यह कैसा संभाषण

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ******************** यह कैसा संभाषण है ! प्रायोजित अभिभाषण है !.. यह ज्ञान ध्यान सब भूले हैं, दंभ अज्ञान में फूले हैं, मंत्रणा दुखदायक हैं, यंत्रणा भय कारक हैं, पूर्वाग्रही दुःशासन है !... यह अपनों पर आघाती हैं, सपनों पर प्रतिघाती हैं, पीठ पर वार किए हैं, हाथों पर हार लिए हैं, भीतर घाती विभीषण हैं !... यह शतरंज बिछात बिछाते हैं, प्यादे जाल लगाते हैं, शह मात का खेला है, मंत्री संत्री का रेला है, यह कैसा शीर्षासन है !.... यह राजनीति का मेला है, छल नीति का खेला है, देश हित को दूर किया है, स्वहित का साथ दिया है, कहने का अनुशासन है !... यह लूट तंत्र हावी है, भ्रष्ट तंत्र प्रभावी है, प्रजातंत्र की खिल्ली है, खंभा नोचें बिल्ली है, यह कैसा सुशासन है !... यह परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्...
जाने क्यों
कविता

जाने क्यों

रुचिता नीमा इंदौर म.प्र. ******************** जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग कि समझना ही नहीं चाहते खुद को, या फिर बन्द कर लेते है आंखों को देखकर भी नादान बने रहते है आजकल लोग जाने क्यों ऐसे हो रहे....? कोई गलत कर रहा, उसे करने दो.... कभी मन्दिर के नाम पर, कभी मस्जिद के नाम पर, बेवज़ह मुद्दों को खींचकर, बस अपनी रोटी सेंक रहे है लोग न धर्म बच रहा, न ईमान बच रहा.... अब तो ऐसा लग रहा कि कहा इंसान बच रहा....? बिक रहे बाजार में जानवर भी, इंसान भी और ईमान तो बहुत सस्ता बिक रहा.... जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग....? यहाँ हर चीज की बोली लग रही.... शरीर का हर अंग तक अब बिक रहा.... लेकिन फिर भी जीवन का मोल खो गया, जो छोटी छोटी बातों पर जान गवाने लग गए है लोग.... जाने क्यों ऐसे हो रहे है लोग....? क्या इनकी तन्द्रा भी कभी टूटेगी, या ये जिंदगी फिर ऐसे ही छूटेगी। इनका जाग...
संकल्प
कविता

संकल्प

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** अंग्रेजी के शब्दों से हो रहा हिंदी के इंद्रधनुष के साहित्य शाला का रंग फीका। मानव देख रहा धुंधलाई आँखों से और व्यथित मन सोच रहा लिखने, पढ़ने में क्यों? बढ़ने लगे हिंदी में अंग्रेजी के मिलावट के खेमे। शायद, मिलावट के प्रदूषण ने हिंदी को बंधक बना रखा हो। तभी तो हिंदी सिसक-सिसक कर हिंदी शब्दों की जगह गिराने लगी लिखने, पढ़ने ,बोलने में तेजाबी अंग्रेजी आँसू। साहित्य से उत्पन्न मानव अभिलाषा मर चुकी अंग्रेजी के वायरस से। कुछ बची वो स्वच्छ ओंस सी बैठी हिंदी विद्वानो की जुबां पर। सोच रही है आने वाले कल का हिंदी लिखने, पढ़ने, बोलने से ही तो कल है हिंदी से ही मीठी जुबां का हर एक पल है। संकल्प लेना होगा हिंदी लिखने, पढ़ने,बोलने का आज हिंदी को बचाने का होगा ये ही एक राज। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९...
वह तपता सूरज ही मेरी छाव
कविता

वह तपता सूरज ही मेरी छाव

दीपक अनंत राव "अंशुमान" केरला ******************** वह पसीना नमकीन बहा दिया जनम भर, मीठी बन गई हैं जिन्दगी हमारी, जिनके नाम पर है सफर और मंज़र, हे परम पिता तू ही मेरी पूजा है। युग युगों से चलती है, प्यार कोख का और सुरक्षा पितर का इस धरा में जागते-गूँजते महिमा अपार, वह ही ये स्थूल सूक्ष्म का, हे परम पिता तेरी भुजाओं का बल धरती पर आँचल की प्यार भरी एक कहानी, तपते सूरज की प्रज्वलित महिमा की एक कहानी गोदी से प्यार और कंन्धे से ताकत मज़बूत, लेकर चलती रहती यह समाज निरंतर, हे परम पिता तू ही मेरे दिखावनहार मैं एक कवि हूँ, बेटा हूँ तुम्हारी छाव में खड़ा हूँ, प्यार में पला हूँ हिमवन में बैठ दुनिया को मज़बूत मन से निहारता हूँ, सामना करता हूँ, जीत रहा हूँ, हे परम पिता मैं हूँ सदा तुम्हारा परिच्छेद परिचय :- दीपक अनंत राव अंशुमान निवासी : करेल...
निगाहे इश्क़ में
ग़ज़ल

निगाहे इश्क़ में

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ अरकान- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन कैसी निगाहे इश्क़ में तासीर हो गई। जिस पर पड़ी नज़र तेरी तस्वीर हो गई।। निकला न ख़ून जिस्म से घायल हुआ हुँ यूँ। क़ातिल नज़र थी ऐसी जो शमशीर हो गई।। बाहों मे बंध के हो गया क़ैदी किसी का मैं। माला गले की पांव में ज़ंजीर हो गई।। घर में बचा है कुछ न जरूरत है कुछ मुझे। दीवानगी मेरी मेरी जागीर हो गई।। कल तक सभी थे साथी जहाँ में "निज़ाम" के। तन्हा हूँ आज कैसी ये तक़दीर हो गई।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।  आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीयहिंदी रक्...
तीज
कविता

तीज

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** सावन शुक्ल तृतीया, कहाए पर्व तीज, हरियाली चहुं ओर, टिड्डे जाते हैं रीझ, पूरे देश में पर्व मनाते, परंपरा है पुरानी, शिव पार्वती की पूजा, सुनते हैं कहानी। सावन के झूले पड़े, मन में उठे हिलौर, झूला देती सखियां, छुप हुआ चितचोर, सावन की घटा छाई, नाचे मन का मोर, पानी लेने चल पड़े, बिजली चमके घोर। हरियाली तीज आई, मिलती मिठाई घेवर, आपस में बात करते, भाभी संग में देवर, बतासों का उपहार, आये बेटी के ससुराल, नई नवेली दुल्हन के, मन में एक सवाल। दादुर सुर में गा रहे, टिड्डे छेड़े राग मल्हार, साजन सजनी तरस रहे, ऑँखों में है प्यार, एक साथ पड़ रही, नभ से बूंद कई हजार, चकवा चकवी ताक रहे, अब डूबेंगे प्यार। विरह में डूबी हुई, एक नवेली झूला झूले, सोच रही क्या बात हुई, साजन हमको भूले, आये ना यह विरह की रात, करती है बेचैन, जब विदेश से साजन आये, तब ...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २७
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २७

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** दूसरा दिन एक नयी सुबह लेकर आया। गणपत कल रात घर आया ही नहीं था। बेबी ने दोनों गाय का दूध निकालने के बाद खुद ही राधा और यशोदा को खूंटे से आजाद किया। मैं भी जागने के बाद तख़्त पर बैठ गया था। बेबी ने मुझे देखा और बोली, 'बाळोबा, आज अकेले ही घूम के आओं और आने के बाद बाहर से ही आवाज लगाना। मैं आकर कुएं से दो बाल्टी पानी निकाल कर तुम्हारे सर पर उड़ेल दूंगी।' आज मुझे तालाब पर अकेले जाने में मुझे कोई संकोच ही नहीं था पर सुशीलाबाई के डर के कारण मैं जाने से पहले अपने नहाने की पूरी तैयारी कर के गया। पथरिया गाव मुझे भा गया था और अच्छा भी लगने लगा था। बुरहानपुर जैसा यहां दिन रात काम करने का माँजी का फरमान भी नहीं था। महत्वपूर्ण यह था कि माँजी और सुशीलाबाई की सेवा बेबी कर ही रही थी इसलिए माँजी को भी आराम सा था। मुझे तो दोनों समय खाना और सोना। बस यही काम था...
इन्तजार
ग़ज़ल

इन्तजार

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** इन्तजार में तेरा आशियाँ बनाती रही दरवाजे पर यूँ बंदनवार लगाती रही लौट ही आयेगा दिल की जमी पर खुद को झूठी दिलासा दिलाती रही सूरत यार की दिल में सजा रखी है अपनी चाहत शिद्दत से निभाती रही इस बात का यकीन है तू नहीं मेरा तेरा ही नाम की मेंहदी रचाती रही मुहब्बत का अहसास ऐसे जताया जमी पर ही जन्नत दिखाती रही गुम हुई हूँ इस तरह विरानियो में दुनिया से खुद को ही छुपाती रही तुझे इल्म नहीं है मेरी मुहब्बत का तेरे अश्क़ मेरी आँखों से बहाती रही खुद में ही खुदा को पा लिया है "मधु" पत्थरों से ये झूठा रिश्ता निभाती रही परिचय :-  मधु टाक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा स...
परिवार हो साथ तो कैंसर की क्या ओकात
संस्मरण

परिवार हो साथ तो कैंसर की क्या ओकात

सपना बरवाल कांटाफोड़ देवास (मध्य प्रदेश) ******************** मेरी ज़िंदगी मै सब कुछ ठीक था। और अचानक एक तूफान आया और सब कुछ बिखर गया। केंसर से लडने मै परिवार की जरूरत, रेखांकित करता एक आप बीता संस्मरण। ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत ओर कीमती है, ये तब समझ आता है, जब आपकी ज़िन्दगी मै सब कुछ उलट-पुलट हो जाता है। यकीन मानिए डॉक्टर द्वारा कहे तीन शब्द "आपको केंसर हैं" आपकी ज़िन्दगी मै तूफान ले आते है। मुझे जब पता चला मुझे आखिरी अवस्था का कैंसर है, ऐसा प्रतीत हुआ जैसे अब सब कुछ ख़तम हो जाएगा। ओर बचपन से देखा हुआ सपना इस तूफान की आंधी मै बह जाएगा। कैंसर की परीक्षा की इस घड़ी मै मेरा परिवार मेरी ढाल बनकर खड़ा रहा। इलाज के लिए अस्पताल को चुनना, पेसो की व्यवस्था करना, मुझे हर हाल में सहारा देना। हर कदम पर मेरे मम्मी पापा मेरे साथ थे। मेरे भाई बहन ने मेरा भरपूर सहयोग किया। मेरे दोस्त, पड़ोसी, रिश्तेदारों न...
रिश्तो की डोर
लघुकथा

रिश्तो की डोर

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ******************** मां के ना रहने के बाद रक्षाबंधन में पहली बार सुनीता ४ वर्ष के बेटे देवांश के साथ अपने मायके जा रही थी। अंदर ही अंदर एक अजीब सा डर और घबराहट हो रही थी, कि पता नहीं भैया और भाभी मेरे साथ कैसा व्यवहार करेंगे। मेरा वैसा सम्मान होगा भी या नहीं, जैसे मां के रहने पर होता था। इसी सोच में डूबी थी, कि स्टेशन आ गया। जैसे हीइधर उधर नजर दौड़ाई वैसे ही कुछ परिचित आवाज कानों में सुनाई दी।सुनीता लाओ सामान मुझे दे दो। जैसे ही आगे बढ़ी तो सामने भैया को देखकर अच्छा लगा। घर पहुंचते ही भाभी ने बहुत अच्छा व्यवहार किया। राखी के दिन सुनीता मां की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर खड़ी थी, तभी भैया ने आवाज लगाई और उस उसकी आंखों से अश्रु धारा बहने लगी। भैया ने दुलारते हुए कहा, बहना हमारे रहते हुए तुम अपने को अकेला मत समझना। उसने भैया को राखी बांधी। भैया, भाभी के ...
ज़िंदगी बदल देगी यह पुस्तक : ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा
साहित्य

ज़िंदगी बदल देगी यह पुस्तक : ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा

पुस्तक : ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा लेखक : शिखर चंद जैन मूल्य : २५० रुपये प्रकाशक : प्रखर गूँज प्रकाशन,दिल्ली समीक्षक : कुमार संदीप ज़िंदगी में कई ऐसे मोड़ आते हैं जब हम ज़िंदगी से मिले दर्द व तकलीफ़ से पूरी तरह टूट जाते हैं, निराश हो जाते हैं। उस वक्त हमें सबसे बड़ी ज़रूरत होती है साहस की धैर्य की। इस अवस्था में यदि हमें एक ऐसी पुस्तक यदि पढ़ने को मिल जाए जो हमारे अंदर अथाह साहस का संचार कर दे तो फिर ज़िंदगी सार्थक हो जाती है। जी हाँ, एक अच्छी पु्स्तक न केवल पढ़ने में ही अच्छी लगती है अपितु आपकी ज़िंदगी बदलने की शक्ति भी रखती है।आपने सुना भी होगा कि अन्ना हजारे एक बार आत्महत्या करने जा रहे थे,इस बीच उन्होंने एक किताब पढ़ ली और अपने उस निर्णय को सदा सर्वदा के लिए त्याग दिया। ऐसी ही प्रेरणादायक व रग-रग में कुछ अलग करने की चाह जागृत करने वाली पुस्तक है "ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा"। इस पुस्तक में लिखित हर आ...
हरियाली तीज
कविता

हरियाली तीज

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** गिरिराज किशोरी पुत्री नें शिवनाथ सो ब्याह रचावन कों हरियाली सो श्रृंगार रच्यों हरियाली तीज मनावन कों सब सखियन संग श्रृंगार कियो श्रावण कों मास सज्यो झूला हरियाली तीज करों री सखी शिव पार्वती कों मिल्यो दूल्हा हिल मिल सखियन संग गाऊँगी श्रद्धा सो तीज मनाऊँगी बन पार्वती मैं भोले की भस्मी मैं आज रमाऊँगी परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) विशेष : कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रदेश सचिव - अ.भा.वंशावली संरक्षण एवं संवर्द्धन संस्थान म.प्र, रचनाएँ : हम हिन्दुस्तानी, नई दुनिया, पत्रिका, नवभारत देवभूमि, दिन प्रतिदिन, विजय दर्पण टाईम, मयूर सम्वाद, दैनिक सत्ता सुधार में आए दिन लेख एवं रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। घोषणा पत्र : म...