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माता अहिल्या
कविता

माता अहिल्या

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** माता देवी अहिल्या मालव प्रांत की महारानी, न्याय की प्रतिमूर्ति और जीवनदायिनी प्रशासनिक मामलों में रुचि दिखाई और इतिहास में जगमगाई देवी अहिल्या ने युद्ध का नेतृत्व किया, वे साहसी योद्धा थी और तीरंदाज भी। हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थी, और प्रजा राज्य को सुरक्षित रखती थी रानी ने पवित्र महेश्वर में अहिल्या महल बनवाया, पवित्र नर्मदा के किनारे डेरा जमाया एक बुद्धिमान तीक्ष्ण सोच की शासक थी, जो प्रजा के हृदय में जीती थी इंदौर को समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाई न्याय की प्रतिमूर्ति बनकर सामने आई शत शत कोटि प्रणाम ऐसी माता को धन्य है ऐसी इंदौर की धाता को परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल...
अहसास हार का…
कविता

अहसास हार का…

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** फलक तक आकर न लौट ए खुशी हम दीदार की आस लगाकर बैठे हैं। गम के सायों से जरा दूर रह ए खुशी इंतजार में आंसू बहाकर बैठे है। छलछलाती आखों से विदा किया था। तेरे शब्दों के कसीदे पे भरोसा किया था। जब अपने ही पराये से होने लगे, जजबातों से खिलवाड़ करने लगे होता रहे अहसास हार का रिश्तों में इशारों इशारों में किस्से लिखने लगे . परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमेंhindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें...
जन्मदाता पिता-माता
कविता

जन्मदाता पिता-माता

शुभा शुक्ला 'निशा' रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** जग के प्यारे दो इंसान देते हमको जीवन दान एक है ममतामई मा और दूजे पिता महान प्रेम करना हमे मां सिखलाती पिता परिस्थितियों का सामना मा से हम निर्मलता पाते पिता से जीवन ज्ञान एक है ममतामई मां.... ऊपर से तो सख्त ही रहते बच्चे उनके हिय में बसते अपने कवच बने रहते जो पिता सुधरढ चट्टान एक है ममतामई मां.... पिता हमारे संबल होते मनोबल अपना बढ़ाते रहते उनके दम पर ही हम पाते जग के सुख आराम एक है ममतामई मां.... जग के प्यारे दो इंसान जिनसे मिली हमको पहचान एक है ममतामई मां और दूजे पिता महान परिचय :-  शुभा शुक्ला 'निशा' जन्म - २५-६-१९६६ पति - शरद शुक्ला पिता - श्री जे एन तिवारी माता - श्रीमती श्यामा तिवारी निवासी - रायपुर (छत्तीसगढ़) शिक्षा - बी.काम,एम.ए. हिन्दी साहित्य ,पी.जी.डिप्लोमा इन कंप्यूटर साइंस संप्रति - विश्व मैत्र...
कोविड-१९ लॉक डाउन-अनलॉक डाउन- एक मनोसामाजिक विवेचन
आलेख

कोविड-१९ लॉक डाउन-अनलॉक डाउन- एक मनोसामाजिक विवेचन

डॉ. ओम प्रकाश चौधरी वाराणसी, काशी ************************                                   कोरोना वायरस मानव इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना है।अकस्मात आयी इस विपदा से निजात पाने की अनिश्चितता विश्व के समस्त देशों में है। व्यवसाय-व्यापार, निर्माण कार्य बंद हो जाने से सामाजिक-अर्थिक स्थिति परिवर्तित हुई है।लोगों में लॉक डाउन के कारण अलगाव व विवशता बढ़ी हैं। हमारे सामाजिक व मानसिक दृष्टिकोण परिवर्तित हुए हैं। सोच का दायरा, रहन-सहन, जीवन शैली, आचरण, व्यवहार में परिवर्तन आया है। घर मे लगातार पड़े रहने से लोगों में उत्तेजना बढ़ रही है। कोरोना वायरस से जो बेबसी और निराशा उभरी है, उससे हमारा शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। हम इस समय सामाजिक परिवर्तन से गुजर रहे हैं, धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक मान्यताएं, मापदंड परिवर्तित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमारा शारीरिक व मनोसामाजिक ...
क्या याद है तुम्हें
कविता

क्या याद है तुम्हें

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** आओ ना कुछ देर हमारे पास बैठो, पुरानी बातें याद करते हैं, मेरे हाथों को हाथों में लेकर , बातें करना, दुनिया से छुप छुप कर मिलना, और आंखों में डूब जाना, क्या याद है तुम्हें.... घंटों घर के बाहर घूमना, रातों को जागना, चांद को ताकना, आसमान के तारे गिनना, क्या याद है तुम्हें..... आओ ना कुछ देर हमारे पास बैठो, पुरानी बातें याद करते हैं....... दोस्तों में हो कर भी तुममें खोए रहना, वो कॉलेज बदलना वो रास्ता बदलना, क्या याद है तुम्हें..... किताबों में छिपाकर तेरा फोटो रखना, लबों पर तेरा नाम आना, अचानक किसी का आवाज लगाना, जल्दी से किताब छुपाना, क्या याद है तुम्हें..... आओ ना कुछ देर हमारे पास बैठो, पुरानी बातें याद करते हैं,...... वो तेरा दुल्हन बनना किसी और के रंग में रंगना, किसी और का होना उसके नाम की मेहंदी रचाना, तुम्हारी शादी में अप...
अजातशत्रु
कविता

अजातशत्रु

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** पुराने शहर के बगीचे में सजावट के लिए वह तोप रखी है, पता नही उसे अपने इतिहास पर गर्व है या शर्मिंदगी। पास की क्यारियों में उगे फूलों के पौधे तोप से डरते नही है, कई बार वे अपनी सुखी पत्तियों को तोप पर उछाल देते है, हवा के साथ शरारत करते हुए। एक बालक रोज आकर खेलता है तोप के साथ उसे तोप को घोड़ा बना कर उसकी सवारी करना अच्छा लगता है। उसने अपनी चॉक से कई कपोत बना दिये है, तोप पर। कभी कभी वह गाते गुनगुनाते फूल तोड़ कर भर देता है, तोप के मुँह में। फिर दूर खड़ा होकर मुस्कुराते निहारता है तोप को, उसे पिता की कही बात याद आती है, ये तोप उगलती थी आग के गोले शत्रुओं पर। वो सोचता है अब ये कैसे उगलेगी आग के गोले, मैंने तो इसका मुँह भर दिया है फूलों से। एक प्रश्न उसे बेचैन किये हुए है। क्या होता है ??? शत्रु। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९...
💐💐जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं….💐💐
जन्मदिवस

💐💐जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं….💐💐

हिन्दी रक्षक मंच hindirakshak.com की वरिष्ठ रचनाकार श्रीमती शोभारानी तिवारी जी का आज ३० जून को जन्मदिवस है ... इस पटल के माध्यम से संदेश भेजकर आप उनको शुभकामनाएं दे सकते हैं….🙏🏻
बाप के बारे में
कविता

बाप के बारे में

आकाश प्रजापति अरवल्ली (गुजरात) ******************** आज मां बाप के बारे में कुछ कहना है। सब कुछ मां बाप ने दिया तो आज उनसे क्यों दूर रहना है। चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते देखा है पिताजी को, दूसरो के घर में गंदे बरतन साफ करते देखा है मां को, इन दोनों की छाँह में तू बढ़ा हुआ है, तो फिर आज तू उनसे क्यों दूर है।। आज मां बाप के बारे में……. बचपन में तुझे आंसू न आए इसका वो कितना ख्याल रखते थे, तेरे खाने से लेकर तेरे सोने की हर चीज का वो ध्यान रखते थे, तू उनकी परवाह करे या ना करे उन्हें तेरी परवाह हैं, वो तेरे भगवान है फिर तू आज उनसे क्यों दूर हैं।। आज मां बाप के बारे में…….. तू आज भले ही मां बाप से रिश्ता तोड़ ले पर वो तुझे कभी नहीं छोड़ेंगे, तू जब भी मुसीबत में होगा तब मां बाप ही तेरे काम आयेंगे, अभी भी वक्त है तू समझ जा, उनसे प्यार कर, उनका ख्याल रख...
ओ जी कोई ना
कविता

ओ जी कोई ना

डॉ. रुचि गौतम पंत फ़रीदाबाद, (हरियाणा) ******************** ये दूर तलक पसरे मोहल्ले, ये हर चप्पे पे छायी खामोशी, सब घरों में क़ैद ज़रूर हैं, पर थमी नहीं है ज़िंदगी, इसे मजबूरी मत समझना, ये मजबूती है मेरे लोगों की, यहाँ एक एक बच्चा भी शेर सा पला है, तेरा तो पता नहीं कोरोना मेरा हिंदुस्तान जीतने वाला है। यहाँ बजती है घंटियाँ, सुबह शाम अज़ान भी है, यहाँ हर घर में बसता है भगवान, और हर इंसान को खुद पे ग़ुमान भी है, तेरा पता ग़लत है कोरोना, तू आया मेरे हिंदुस्तान में है। यहाँ बाँधती हैं बहनें, कलाइयों पे राखी, हर कलाई सिर्फ़ प्यार से चुनी है यहाँ धर्म कर्म की लड़ियों ने, हम सबके के बीच एक तार बुनी है। यहाँ अगर होली वाले हैं दिन, तो मुबारक बक़रीद की शामें भी हैं, यहाँ कोई कारण नहीं पूछता, माहोल-ए-जश्न ज़रा आम सा है। तेरा पता ग़लत है कोरोना, तू आया मेरे हिं...
एक पैगाम जिंदगी के नाम
कविता

एक पैगाम जिंदगी के नाम

अनिता शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जिंदगी की दौड़ में ऊँचाइयों की होड़ में रफ्तार में तार तार गुमनाम जब हर बार तो राही की पहचान के लिए एक नाम जरूरी होता है.. जीवन के संचार में खूबियों के भंडार में उड़ने को आकाश में निरन्तरता की आस में जज़्बे को दिशा देने के लिए हाँ थोड़ा विराम जरूरी होता है... कुछ आकलन जीवन में कुछ संकलन चितवन में सृजन के पल संजोए लम्हे को माला में पिरोए कुछ सुकूँ पलों के लिए मन पर लगाम जरूरी होता है... भागती सी जिंदगी ओर सपने सतरंगी कुछ पाने की उमंगे थी विचलित मन की तरंगे थी हाँ ठोकरों पर मलहम के लिए, थोड़ा सा आराम जरूरी होता है... चलकर रुकना रुककर चलना बिना चले तो जीवन तन्हा क्या ठहराव क्या है बहाव नियति की चाल वक्त का प्रवाह इन सबको समझने के लिए क्या ऐसा अंजाम जरूरी होता है.... परिचय :- श्रीमती अनिता शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प...
दीपावली गिफ्ट
संस्मरण

दीपावली गिफ्ट

डॉ. विनोद वर्मा "आज़ाद"  देपालपुर ********************** हेमराज वर्मा की नई-नई शादी हुई थीमोहन नागर के मकान में किराए से रहते थे। स्टेट बैंक में कैशियर के पद पर कार्यरत वर्मा जी, सहज और सरल व्यक्ति होने के साथ मन के साफ और नेकदिल इंसान थे।पटलन बाई ने उनको भाई बनाया था। सन्ध्या समय पटलन बाई, मोहनदादा, भाभी, शोभा, डीपी वर्मा, हरीश, सुनील हम सब वर्मा जी के कमरे पर इकट्ठा हो जाया करते थे। खूब हंसी-मजाक होती थी, अक्सर मोहन दादा को हम टारगेट करते थे। उनके और भाभी के बीच अक्सर झड़प होती रहती थी लेकिन वह भी हास्य रूप में। मोहन दादा को मावा खाने का शौक था। वो जब भी नागर मिष्ठान से मावा खरीदकर लाते तो भाभी उन्हें हमारे इकट्ठा होने के बाद छेड़ देती कहती- "विनोद भैया ई झूठ बोली के मावो लाय ने बैठी के चट करि जाय, ने इनको बहानों कय की म्हारे दस्त लगी गया।" तो तमारे खाने से मना कुण करे, खाव पर बहाना क...
विरह मिलन की तैयारी
कविता

विरह मिलन की तैयारी

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** आज साजन मेरे द्वारे आए मै विरह अगन की मारी रे। बचपन ब्याह रचा दी बाबुल अब बढ़ हुई सयानी रे विरह मिलन की भूख है कैसी ठीक समय पर आए बराती डोली लाए सवारी रे सोलह सिंगर सजा मेरी सखियाँ गजरा बाँध संवारी रे। कजरा नयन भरो मेरी सखियाँ ओढ़ा दे सोना जडल चुनरिया रे। सुसक सुसक मोरे बाबुल रोए भइया बैठी दुआरी रे। बाह पकड़ कर मैया रोयी भाभी अंक भर वारी रे अब धैर्य रखो मोरे बाबुल बेटी जात बिरानी रे। एक दिन रोती छोड़ सभी को चल देती ससुराली रे। छढे मंजिल पर एक कोठरिया तामे एक दुआरी रे। अहनद घहरद शहनाई जलता दिप हजारी रे। विरह मिलन में चली अकेली लगी प्रीतम की छतिया रे। निज अस्तित्व गवा मै बैठी। विरह मिलन की तैयारी रे। परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम - गंगापीपर जिला - पूर्वी चंपारण (बिहार) सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindiraks...
आगे बढ़ता चल
कविता

आगे बढ़ता चल

उषा शर्मा "मन" बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) ******************** राही आगे बढ़ता चल। ना हो परेशान, ना हो हताश, मेहनत संग आगे बढ़ता। राही आगे बढ़ता चल। निराशा दूर कर आस संजोए, विश्वास संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। उम्मीद की नई किरण जलाए, आत्मविश्वास संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। मंजिल तेरी राह देख रही, हौसलो संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। अपने लक्ष्य पर डटे रह, संयम संग आगे बढ़ता चल। राही आगे बढ़ता चल। मुश्किलों को संघर्ष से दबा के, दृढ़ संकल्प संग आगे बढ़ता चल। परिचय :- उषा शर्मा "मन" शिक्षा : एम.ए. व बी.एड़. निवासी : बाड़ा पदमपुरा, तह.चाकसू (जयपुर) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में...
अपनों ने ही मारा है
कविता

अपनों ने ही मारा है

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** समर्पित- दंगो के दौरान फर्ज निभाती निर्दोष पुलिस पर होने वाले हिंसक हमलों की अमानवीयता दर्शाने का प्रयास परसी थाली छोड़ मैंने फोन उठाया जबकि अभी हाल ही सत्तरह घण्टे ड्यूटी कर, घर आया। रात के बजे हैं एक, बच्चे लंबे समय तक राह देख, कि, पापा कुछ लाएँगे आस लगाए सो गए हैं। ना जाने पापा किस दुनियां में गुम हो गए हैं? देखकर सोते बच्चों को आँख मेरी भर आईं। हिम्मत बाँधती उसनींद पत्नी नज़दीक आई। हाँथ ही धोये की वो झट खाना ले आई। समझ गई, दौरान ड्यूटी, खाना तो आया होगा। कईलाशों के बोझ! कंधों, चीखों के कान में थे; मैंने नहीं खाया होगा। भूख लगती भी किसे है ऐंसे हालातों में? एक पुलिस रखती धैर्य उन्मादी जज्बातों में। एक ही खाया था कौर; की उस ओर; घण्टी फिर से फ़ोन की बजी। रोका संगिनी ने हाँथ थाम लिया कल ही तो देखी ...
किसी मोड पर
कविता

किसी मोड पर

आशीष कुमार पाण्डेय कानपुर उत्तर प्रदेश ******************** मै सोचता हूँ, की वो किसी मोड़ पर दिख जाये। मुझको देखे, और थोड़ा सा मुस्कुराए।। वो साड़ी में कैसी लगती होगी, वो घडी की जगह चूड़ियाँ कैसे सजती होगी। क्या वो मुझसे मिलेगी, और गले लग जाएगी, या मुझको देखते ही वहाँ से चली जाएगी।। पर कही वो मुझे भूल ना जाये। मै सोचता हूँ की वो किसी मोड़ पर दिख जाये।। वो दो चोटी वाले बाल, आज खुले होगें ना। वो आँखो में सुरमा, होंठो में लाली होगी ना।। अब वो किसी और की, घरवाली होगी ना। क्या वो यहाँ आकर बगीचे में आयेगी, मेरे बारे में सोच कर, अपने आँसुओ को बहायेगी।। क्या वो मुझको, अब भी अपनी मोहब्बत कहती होगी। या एक बुरा समय सोचकर, भूलजाने की कोशिश करती होगी।। पर मै सोचता हूँ की, कही उसे मेरा एक पुराना खत मिल जाये। मै सोचता हूँ की, वो किसी मोड़ पर दिख जाये।। परिचय :-  आशीष कुमार प...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग – २२
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग – २२

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** बुरहानपुर में महाजनी पेठ के एक किराए के मकान में पहली मंजिल पर दो कमरों में सुशीलाबाई और उनकी माँ रहती थी। सुशीलाबाई को सब ताई और उनकी माँ को सब माँजी कहते है यह दादा मुझे उज्जैन में बता चुके थे। संडास और नहाने के लिए नीचे तल मंजिल पर जाना होता था। नल भी नीचे ही थे और पानी भी नीचे से भर कर लाना पड़ता। सुशीलाबाई ने जो दो कमरें किराए से लिए थे उन दो कमरों के बीच में थोड़ी खुली छत भी थी। एक कमरें में रसोई और दूसरे में सोना ऐसी इनकी गृहस्थी की व्यवस्था थी। बगल के एक कमरें में ही दिनकर और सुभाष नामके शाहपुर के दगडू चौधरी के दो लड़के भी पढ़ाई के लिए यहां किराये से रहते थे। ये दोनों लड़के थोड़े बड़े थे और कॉलेज में पढ़ते थे। इन मा-बेटी से मेरा कोई विशेष ज्यादा परिचय तो था नही। सिर्फ उज्जैन में हुई एक दिन की मुलाकात थी पर सुरेश का उनका अच्छा परिचय ही ...
मेरा बचपन
कविता

मेरा बचपन

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** किया दिन थे जब न कुछ करना। ना ही कुछ पड़ना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! माँ के हाथ का भोजन खाना। पीता के हाथ पकड़कर चलना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! गांव की गलियों में गुमना। दोस्तो के साथ में खेलना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! माता पिता की डाट में प्यार का होना। कभी ना चाहा दिल में चुभाना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! मोह था हमे प्रसाद का खाना। हम को भी दिखता था भक्ति का आना-जाना।। ऐसा ही था मेरा बचपना! . परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी( राजसमंद) राजस्थान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आद...
ये हिन्दुस्तां हमारा है।
कविता

ये हिन्दुस्तां हमारा है।

प्रिन्शु लोकेश तिवारी रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** जगत को सीख देता है प्रभू की अमर कहानी से। पतित तरु सींच देता है प्रभू की मधुभरी वानी से। शत्रु दल कांप जाता हैं यहां की अमित जवानी से। सत्य की जीत होती है औं धरमों का सहारा है। ये हिन्दुस्तां हमारा है ये हिन्दुस्तां हमारा है। यहां की गोद में गंगा जी प्रतिदिन वास करती हैं। पतित नर का पतन वो क्षण भर में नाश करती हैं। यहां के राज धरमों में प्रजा विश्वास करती है। यहां का हर शहर हर गांव लगता कितना प्यारा है। ये हिन्दुस्तां हमारा है ये हिन्दुस्तां हमारा है। मां के सिर-मुकुट में बर्फ़ कि मणियां चमकती हैं। यहां हर पुत्र के हर रोग कि जड़ियां लटकती हैं। यहां हर एक औषधि डाल में चिड़िया चहकती हैं। हिमालय से भवानी ने रामेश्वर को निहारा है। ये हिन्दुस्तां हमारा है ये हिन्दुस्तां...
जीवनधारा
कविता

जीवनधारा

बिपिन कुमार चौधरी कटिहार, (बिहार) ******************** कोई नहीं चाहे गम यहां पर, खुशियां ही सबको है प्यारा, चलता नहीं किसी का वश, यही है धुवसत्य जीवनधारा, माया जाल में गोता लगाएं, ज्ञान, धन या रुतबा जुटाएं, कितना भी कर लें हमारा तुम्हारा, मृत्यु द्वार तक ले जाये जीवनधारा, बेचा ईमान, चाहे किया महादान, करती यह है, सबका कल्याण, सेठ, साहूकार या हो निर्धन-बेसहारा, सबकी नाव खेबे यही जीवनधारा, जन्म मृत्यु का जीवन चक्र, खुशी और गम इसका किनारा, करे चाहे हम लाख जतन, निर्बाध, उन्मुक्त यह है बंजारा, रहो चिंतामुक्त, करो सत्कर्म, रहेगा अमर, कृति और जीवन, जब तलक रहेगा चांद सितारा, यही पावन संदेश देता जीवनधारा.. . .परिचय :- बिपिन बिपिन कुमार चौधरी (शिक्षक) निवासी : कटिहार, बिहार घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक...
चराग़ घी के
ग़ज़ल

चराग़ घी के

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** रौशन चराग़ घी के। हों घर में हम सभी के हाथों का बढ़ना, अच्छा ! लेकिन हों, दोस्ती के। हैं मोतियों से मंहगे, हों अश्क गर खुशी के। जीना करेंगे मुश्किल, कुछ काम आदमी के। उन का भी कोई होगा, जब "प्रेम" हैं, सभी के। . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आदि अनेक  पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत्रिकाओं में कविता, कहानी, व्यंग्य व बुंदेली ग़ज़लो...
मोहब्बत की है
ग़ज़ल

मोहब्बत की है

दामोदर विरमाल महू - इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** शिकायत सभी ने की है उस रब से यारो, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। गुनाह करके हर शख्स परेशान सा दिखता है, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। दर्द दिखा नही सकते आंसू बहा नही सकते, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। दुनिया की नज़रों में अक्सर गिरा करते है हम, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। ज़ख्म इतना गहरा है और दवा मिलती नही, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। उम्मीद दिखती नही और साथ कोई देता नही, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। जुबां अगर खोली तो कितने राज़ खुल जाएंगे, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। ज़ख्म देना हमे भी आता है पर उन्हें खोना नही चाहते, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। ये शिकायतों का दौर तो चलता रहेगा मगर, हम खामोश है क्योंकि हमने मोहब्बत की है। . परिचय :-...
तंहा सफर में
कविता

तंहा सफर में

मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव बिजनौर, लखनऊ ******************** यादों के इस तंहा सफर में यादों के इस तंहा सफर में, मनोहर, एक हमसफर की तलाश है दुख के काले अंधियारों में, सुख के पुलकित राहों में, साथ जो निभा सके उम्र भर, मनोहर, एक हमराह की तलाश है यादों के एक हमसफर की यूँ तो चेहरे हैं कई हजार, दुनिया के इस भीड़ में, पर उन हजारों के बीच में, मनोहर, एक अपने की तलाश है यादों के एक हमसफर की जीवन के कड़े संघर्ष में, राह जो दिखा सके अंत तक, पथ प्रदर्शक बन जाये जो, मनोहर, एक उम्रदराज की तलाश है . परिचय :-  मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव निवासी : बिजनौर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख,...
पैकेट
लघुकथा

पैकेट

शिरीन भावसार इंदौर मध्य प्रदेश ******************** लछमी ओ लछमी पेशाब पानी कछु की जरूरत हो तो उतर आओ नीचे....अरे का सोच रही हो...इतना देर की बैठी हो...पाव मुरहा जाही...उतर आओ। सुरेश की आवाज़ सुन ट्रक पर सिमटी बैठी लछमी भय और पीड़ा से और भी ज्यादा सिमट गई। उस पूरे ट्रक में लछमी ही अकेली महिला थी इस विकट परिस्थिति में परेशानी अब वह कहे भी तो किससे और कैसे? लॉक डॉउन की घोषणा होने के बाद जल्दबाजी में अपने गांव वापस लौटने के लिए वे दोनो पहने हुए कपड़े और खाली टिफ़िन के साथ रात १० बजे इस ट्रक में चढ़े थे और अब दोपहर का १ बजने आया था। बढ़ते समय के साथ उसकी परेशानी बढ़ती ही जा रही थी। अपनी गन्दी साड़ी को समेटती वह गठरी सी हो गई थी कि तभी उसे बाहर एक महिला की आवाज़ सुनाई दी. वह किसी से पूछ रही थी कि क्या तुम लोगो के साथ औरते भी है ? महिला की आवाज़ सुन लछमी ने राहत की सांस ली और गर्दन बाहर कर जब उस महि...
नदी और नारी
कविता

नदी और नारी

अनुराधा बक्शी "अनु" दुर्ग, छत्तीसगढ़ ******************** निश्छल नदी में अक्सर लोग पाप धोने आते हैं। आस्था के नाम पर गंदा कर चले जाते हैं। उसकी पवित्रता को दिल में रख कर देखना। कभी जलजला, कभी किनारे मंदिर बन जाते हैं। स्त्री और नदी दोनों की पवित्रता में है समानता। दोनों के गर्भ गृह में सृष्टि का स्पंदन होता। नदी भी सृजन करता स्त्री भी सृजन करता। इनकी अमृतधारा पावन करती धरा। इनकी बाहों में अठखेलियां करते गौतम राम कृष्ण। इनके पावन तट पूजे जाते कौन हो इनसे उऋण। नारी से नर बना, नदी में नर तर जाते। नदी और नारी भक्ति का एक रूप कहलाते। दोनों की गहराई में उतरकर ही इन्हे पाया जाता है। इन दोनों का सम्मान करने वाला ही पूजा जाता है। इनके पावन चरणों में जीवन सुगम सुहाने हो जाते हैं। ऋषि मुनि पावन धरा पर इनकी वजह से पूजे जाते हैं। स्वयं को इनमें अर्पण कर दो। नदी को पूजो, नारी में समर्पण कर दो। नारी में...
पपीहे की साधना
छंद

पपीहे की साधना

प्रवीण त्रिपाठी नोएडा ******************** महाश्रृंगार छंद गगन से होती जब बरसात। धरा की बुझती है तब प्यास। सूर्य ढलने से होती रात। चाँद लाता है नया उजास।।1 मेघ को तकता चातक रोज़। नहीं मिलती उसको वह बूंद। स्वाति की प्रतिदिन करता खोज। प्रार्थना करता अँखियाँ मूंद।2 ईश का करता निशदिन ध्यान। स्वाति की बूंद एक मिल जाय। मेघ करते उसका कल्यान। बूंद पी फूला नहीं समाय।3 बुझी है जब से उसकी प्यास। प्रेम से गाता है वह गीत। अटल है प्रभु पर अब विश्वास। मानता उनको अब वह मीत।4 परिचय :- प्रवीण त्रिपाठी नोएडा आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमेंhindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक ...