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ख़ुद पर भरोसा
ग़ज़ल

ख़ुद पर भरोसा

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** बहर मीटर-१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ अरकान- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन जिसे ख़ुद पर भरोसा है किसी से वो नहीं रोता। उसे देखा है बढ़ते जो जवानी मे नहीं सोता।। नहाए कितना भी गीदड़ वो गीदड़ ही रहेगा बस। चमक रहती है जब की शेर अपना मुँह नहीं धोता।। सफ़ेदी पर न जा मेरी अगर कुछ अक़्ल है थोड़ी। बुढ़ापे में किसी का दिल कभी बूढ़ा नहीं होता।। पड़ी हो आग पर गर राख तो बस दूर ही रहना। की अंगारा कभी अपनी तपिश जल्दी नहीं खोता।। निज़ाम ऐसा करो कुछ काम दुनिया नाम ले तेरा। वही शायर है अच्छा जो कभी नफ़रत नहीं बोता।। . परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प...
लाइब्रेरी
लघुकथा

लाइब्रेरी

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजिट अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित लघुकथा) शेफाली लाइब्रेरी में कुछ किताबें ढूंढ रही थी। उसने जो कल किताब पढ़ी थी वो इसी जगह रखी थी। लेकिन अब उसे उसी जगह पर वो किताब मिल नहीं रही थी। उसने उसी विषय की दूसरी किताब उठा ली।यह सोच कर कि हो सकता इसमें वो चैप्टर उसे मिल जाए वो किताब लेकर टेबल पर बैठ गई।  तभी .....उसने वही किताब सामने वाले टेबल पर देखी। वह पहचान गई कि यह वही किताब थी उसके कवर पर पीला रंग -सा लगा हुआ था। वह पहचान गई इससे पहले वे देखती कि किताब किसके पास है वह लड़का किताब उठाकर लाइब्रेरी से निकल गया। वह उसका चेहरा भी नहीं देख पाई। मन में यह सोच कर कि चलो, वह पढ़ के किताब रख देगा। लाइब्रेरी से वह आज नहीं तो कल किताब ले लेगी। अगले दिन वह फिर किताब ढूंढने गई क्योंकि जो किताब उसन...
प्रीत का रोग
कविता

प्रीत का रोग

जसवंत लाल खटीक देवगढ़ (राजस्थान) ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित कविता) प्रीत का रोग लगा मुझे, नींदे उडी रात की। तुम अलबेली शाम हो, मेरे प्यारे गाँव की।। प्रेमरस में खो जाता, इंतजार में कटे रतिया। हे खुदा उससे मिला, बरसती है ये अंखिया।। चाँद देख उसे याद करू, तारों की मैं सैर करु। तेरे प्यार में पागल हूँ, सपनो में तेरी मांग भरु।। तेरी एक झलक पाने, दिन भर मैं राहे तकता। पागल प्रेमी आवारा मैं, खाना पीना भी तजता।। तुझसे मैं आँखे मिलाता, शर्म से नैन झुक जाते। कोमल हाथो के स्पर्श से,रोम-रोम मेरा महकाते।। तेरे ख़ातिर जीवित हूँ मैं, तेरे ही सपने बुनता। चलता अगर मेरा राज, हमसफ़र तुझे चुनता।। सुनो तुम मेरी बन जाओ, परी बना कर रखूंगा। जीवन के इस सफर में, पलकों पे बैठा के रखूंगा।। बारिश का मौसम सुहाना, आ गयी बरसात भी। तुम ...
पिता की याद
कविता

पिता की याद

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** दुनिया के गम को हंसकर झेल लेती हूं, सहेजकर रखी यादों को तस्वीर में समेट लेती हूं पिता की याद में अक्सर छिपकर रो लेती हूं । जिंदगी के लम्हों में यादों को ताज़ा करती हूं चेहरे की झुर्रियों में, सदियां खोज लेती हूं, पिता की याद में अक़्सर रो लेती हूं। घर पहुंचकर ठिठक जाती हूं, अचानक फिर तस्वीर देख लेती हूं। चौखट पर सर को झुकाकर नमन कर लेती हूं,,................. पिता की याद........ स्मृतियां क्षण-क्षण सामने आती हैं, फिर उनके हौसले को सलाम कर लेती हूं। कलम थमने सी लगती है शब्द फिर बटोर लेती हूं पिता की याद,..... गमगीन जिंदगी की उदासी भरी शाम और दर्द से भरी सुबह के आभास में पिता की कर्मठता, धैर्य ,विवेक और साहस फिर खोज लेती हूं। पुरुषार्थ की कर्म गीता पढ़ लेती हूंl पिता की याद में अक्सर छिपकर रो लेती हूं। परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शि...
श्रापित गुड़िया
कहानी

श्रापित गुड़िया

आदर्श उपाध्याय अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश ******************** वह ७ जुलाई २०१७ का दिन था, जब मैं पहली बार किसी शहर के लिए रवाना होने वाला थ। जैसा कि हमारे गांवों की रीति है कि जब कोई अपने घर से दूर प्रवास के लिए जाता है तो जाने से पहले मां, बहन, बुआ, भाभी आदि लोग रास्ते में खाने पीने के लिए कुछ ना कुछ तल भुनकर दे देती हैं ताकि मेरा बेटा, भाई, भतीजा, देवर रास्ते में भूखा ना रहे। ठीक ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। जब मैं नहा धोकर तैयार हो गया तो मम्मी और भाभी ढेर सारी पकौड़ी तैयारी मेरे लिए रख दिया लेकिन मेरी इन सब चीजों को साथ ले जाने की बिल्कुल भी रुचि नहीं थी और मेरी पलकें भीगी हुई थी क्योंकि पहली बार जन्म देने वाली मां और जीवन प्रदान करने वाली जन्मभूमि को छोड़कर कहीं दूर जा रहा था। जैसे तैसे मैं अकबरपुर रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया। भैया ने ट्रेन का समय बता दिया था लेकिन जब मैं स्टेशन पर पहुंच...
गुरू मंत्र निराला
कविता

गुरू मंत्र निराला

अंजली सांकृत्या जयपुर (राजस्थान) ******************** मेरे पथ का साथी हैं, पाखी मेरे हूनूर का... गुरु संग क़दम बढ़ाते चल, गुरु द्रोण की तस्वीर बन... मैं मुसाफ़िर, मँझधार में... मेरे उड़ान को भरते चल... क़िस्मत का खेल ना बन, कर्म का भाग्य बन।। मैं उदय हो जाऊँ सूरज सा, ऐसा उत्साह भरता चल... तूँ परछाईं बनाता चले, मै संग रास्ते चलता चलूँ।। गुरु हैं सफ़लता का मंत्र, थामे उसका हाथ चल।। मेरे ज़ुनून की आग को, पाक नज़रो ने तराशा हैं.. मैं हीरा तेरे कक्ष का, मंज़िल का साथी बन।। क़िस्मत की आँखे दिए, हवाओं को सन्न करता चल... गड़गड़ाहटों के दोर का, मेरा हिस्सा बनता चल... क़लम तूने सिखाई हैं, हवाओं में रूत आइ हैं.. छेड़खानिया मेरे सपनो से, शैतानिया बढ़ाई हैं।। तूँ संग मेरे जलता गया, मैं लोहे जेसे पिघलता गया।। मैं हथियार, तेरी धार का.. तेरा नाम जहांन में करता गया... तेरा ...
कलयुग के भगवान
गीत, भजन

कलयुग के भगवान

संजय जैन मुंबई ******************** तुम हो कलयुग के भगवान गुरु विद्यासागर। तुम हो ज्ञान के भंडार गुरु विद्यासागर। हम नित्य करें गुण गान गुरु विद्यासागर।। बाल ब्रह्मचारी के व्रतधारी सयंम नियम के महाव्रतधारी। तुम हो जिनवाणी के प्राण गुरु विद्यासागर। हम नित्य करे गुण गान गुरु विद्यासागर।। दया उदय से पशु बचाते भाग्योदय से प्राण बचाते मेरे मातपिता भगवान गुरु विद्यासागर । हम नित्य करे गुण गान गुरु विद्यासागर।। जैन पथ हमको चलाते खुद आगम के अनुसार चलते। वो सब को देते विद्या ज्ञान गुरु विद्या सागर। हम नित्य करे गुण गान गुरु विद्यासागर। तुम हो कलयुग के भगवान गुरु विद्यासागर। ज्ञान के सागर विद्यासागर हम नित्य करे गुण गान गुरु विद्या सागर।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर क...
आत्म  मंथन
कविता

आत्म मंथन

अनुराग बंसल जयपुर राजस्थान ******************** जब भी अकेला बैठता हूँ, शुन्य की गहराइयों मैं यह सोचने लग जाता हूँ। क्या खोया और क्या पाया समझ नहीं पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ, अतित की गहराइयों मैं डूबने लग जाता हूँ। क्या गलत किया और क्या सही का हिसाब नहीं लगा पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ , खुद से ही बाते करने लग जाता हूँ। क्यों हो रहा हैं ये का जवाब ढूंढ नहीं पाता हूँ।। जब भी अकेला बैठता हूँ, कुछ हसीन लम्हे याद आ जाते है, फिर दिल को ये समझाता हु, जो होना था हो गया, और आगे बढ़ने की कोशिश करने लग जाता हूँ।। . परिचय :- अनुराग बंसल निवासी : जयपुर राजस्थान शिक्षा : एम.टेक. (स्ट्रक्चर), बी.टेक (सिविल) घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्...
जीत निश्चय है हमारी
कविता

जीत निश्चय है हमारी

अमर सिंह राठौड़ राजसमन्द राजस्थान ******************** कोरोना वुहान से आया, लगता इसे प्राप्त वरदान। मानवता का है ये शत्रु, तोड़ देंगे इसका अभिमान। विश्व की भांति भारत को, इस जंग से लड़ना है। हर जंग में हुआ विजेता, ठान फिर से करना है। हमे है कोरोना से लड़ना, मानव तुम करो एकता। अनेकता में होती एकता, ये भारत की विशेषता। समाजिक दूरी रखना है, ये जीत हमे दिलवाएगी। आखिर ये बकरे की माँ, कब तक खैर मनाएगी। बीमार से न लड़ना हमे, कोरोना से लड़ लीजिये। जंग की दवा बस दुआ, योद्धा सम्मान कीजिये। मूल धर्म क्या है? अपना, जरा तुम यह सोचना। धर्म, जाति और पार्टीवाद, ये पड़ेगा अब छोड़ना। आत्मविश्वास व संकल्प से, जीत निश्चय है हमारी। इस भारत के गौरव का, गान करेगी दुनिया सारी। . परिचय :- अमर सिंह राठौड़ पिता : मोखम सिंह जी निवासी : कनावदा "राजसमन्द" राजस्थान शिक्षा : १२वी विद्यार्थी रा.उ.मा.वि.देवपुरा र...
हद कर दी आपने
कविता

हद कर दी आपने

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर मध्य प्रदेश ********************  सारा माल हजम, कुछ तो करो शरम, नोट लगे छापने, हद कर दी आपने ! खोटे तुम्हारे करम, माल उड़ाते गरम, कमा रखा था बाप ने, हद कर दी आपने ! कुछ तो पालो धरम, भ्रष्टाचारी घोर चरम, पीढ़ियां लगेगी धापने, हद कर दी आपने ! मत पालो अब वहम, पापी नारकी बेशरम, क्या डस लिया सांप ने, हद कर दी आपने ! प्रभु की मार बड़ी मरम, किसी दिन बिकेंगे हरम, फिर लगोगे यहीं कांपने, हद कर दी आपने ! हिस्सा खाते दूसरों का, पाप घड़ा भरा अपनों का, जल्दी कंडे लगोगे थापने, हद कर दी आपने ! बगुला भगत बनते हो, स्वांग मदारी धरते हो, माला लगते जापने, हद कर दी आपने ! परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकत...
वारिस
दोहा

वारिस

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उ.प्र.) ******************** वारिस बुद्धू सिद्ध हो गया माता जी भी फेल सभी सूरमा हाथ मल रहे ख़त्म हो रहा खेल फूट डाल गद्दी हथियाना रही सर्वदा नीति सब के सब हैं भारतवासी नहीं चलाया रीति तख़्त ताज की अभिलाषा में भारत हुआ विभक्त लाखों लोग शहीद हो गए बहा असीमित रक्त हिंदी चीनी भाई भाई का लगवाया नारा लूट लिया इज़्ज़त ड्रैगन ने नेहरू हुए बेचारा चीन ने हड़पा तिब्बत कश्मीर को पाकिस्तान दंश झेलता आज भी इसका अपना हिंदुस्तान माया ममता और मुलायम ने जो तीर चलाया धीरे धीरे दुर्ग ढह गए हाथ काम न आया चेता नहीं अभी तक कुनबा गई भैंस मँझधार सारे साहिल ध्वस्त हो गए हो कैसे बेड़ा पार . परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी :जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि : पुस्तक लेखन, सम्पादन, कव...
एक रात यूँ ही
कविता

एक रात यूँ ही

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** एक रात यूँ ही मै ठिठक कर सहम गया अस्मा की ओर हाथ बढ़ाकर लपक गया। निस्तब्ध शांत रात में क्या दीवाली माना रहे हो अपने घर मे तुम महा पटका उड़ा रहे हों। तोपो की जैसी गरज आवाज में तिमिर की प्रकाश में तुम महदीपवाली माना रहे हो बोलो बदलो तभी उत्तर में कुछ बूंदे टपकी। अचानक अंधकार की घानाआवरण सम्पूर्ण दिशा में फैल गयी। मालूम हुआ कि कम्पन से सम्पूर्ण दिशा ही हिल गयी। तिमिर की प्रकाश सभी मीठे दिख पड़े सभी स्वच्छ निरभ्र शांत। ईस्वर की तरफ से यह ओमकार ध्वनि होता है प्रार्थना रूपी साक्षात्कार होता है। वर्षा की रात सुहानी झींगुर की गुंजन दादुर की टर टर की आवाज में यह रात शोभायमान होती है परी रूपी बदलो की समूहों से वर्षा की बूंदो रूपी पुष्पो से मातृ भूमि की अभिषेक होती है जन जीवन मे फिर से नव गीत की संचार होती है। . परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक म...
निर्दयी
लघुकथा

निर्दयी

डॉ. चंद्रा सायता इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************                गांव के एक स्कूल में टीचर पांचवी कक्षा को पर्यावरण का पाठ पढ़ा रहे थीं। सभी बच्चे शांत भाव से सुन रहे थे, किंतु पलाश कुछ ज्यादा ज्यादा ही उत्साही लग रहा था। टीचर जी मेरी दादी भी पेड़ पौधों और पशु पक्षियों की सुंदर-सुंदर कहानियां सुनाती है। मुझे ऐसी कहानियां सुनना बेहद पसंद है। "बहुत बढ़िया बेटा।" दादी की कहानियां सुनते समय आस पड़ोस के बच्चों को भी बुला लिया करो।" टीचर ने पलाश से कहा। इतने में प्यूयू ने आकर टीचर को संदेश दिया "मैडम जी। आपको प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं।" अंतिम पीरियड की समाप्ति में अभी पाँच मिनट बाकी थे अतः बच्चों की छुट्टी कर दी गई वे अपने अपने बसते बंद कर खेल के मैदान की ओर चल दिए। स्कूल से बाहर का रास्ता खेल के मैदान से होकर ही गुजरता था सभी बच्चे घर जाने की खुशी में भागे जा रहे थे पलाश थोड़...
फिर खुशी नाचेगी
ग़ज़ल

फिर खुशी नाचेगी

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** क्यों जमाने के सितम यूं बेवजह हमको लड़ाये, हम सियासत की बिसातें दूर पीछे छोड़ आये। साफगोई से यहाँ बच कर निकल जाना भला, उलझनों के जाल बुनने की किसे अब होड़ भाये। सरहद के उस पार दुश्मन ,हैं बड़े इस पार भी, देखना होगा कोई अपना ही घर ना तोड़ पाये। फैसला मुश्किल हुआ किस डगर का रुख करें, ज़िंदगी की राह में कितने ही ऐसे मोड़ आये। इस फरेबी, मतलबी दुनिया में अक्सर ये हुआ, झूठ का हर ठीकरा सच के ही सर फोड़ आये। दिल की ही बातें सुनी, अनसुनी करके विवेक, टीस जो बाकी रही नाता उसी से जोड़ आये। फिर खुशी नाचेगी आंगन में अंधेरा दूर होगा, आस्था का एक दीपक हम जलाकर छोड़ आये। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका...
मानवता
लघुकथा

मानवता

रोशन कुमार झा झोंझी, मधुबनी (बिहार) ******************** मानवता मतलब मानव जो अपने घर परिवार समाज के लिए जो भलाई करता, इसके प्रमुख रूप दया, प्रेम, सहनशीलता, संघर्ष आदि है। यहाँ हम मानवता से सम्बंधित रचना प्रस्तुत किये है। :- बात हम बग़ल वाली की ही कर रहा हूँ, वही कोमल, बेबी, मीना की, उसकी नहीं उसकी मानवता की, वह तीनों मानव सेवा को पूजा पाठ और अपना धर्म मानती, तीनों अंधेरा में रोशन, दुख में सुख करके आनंद करने वाली, कुछ देकर तो कुछ अपनी मधुर वचन से वह कैसे तो जानिए, उन तीनों की घर की आस पास राखी नाम की ग़रीब लड़की रहती रही, बेचारी पढ़ना चाहती पर कैसे पढ़ती, लेकिन पढ़ी भी वह कैसे? तो वही कोमल, बेबी, मीना, राहुल, राजन के सहयोग से, पांचों मिलकर राखी की विद्यालय की शुल्क जमा करते, उसे किताब कॉपी खरीदकर देते और अरुण निःशुल्क ही पढ़ाते, इस तरह राखी बारहवीं तक पढ़ी, उन लोगों के सहयोग से। तो इस लघु कथा से ...
कृषक
कविता

कृषक

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** धरती माता के आँचल में, हरियाली जो बोते। अमन चमन की, खुशियाली को, श्रम का बोझा ढोते। वो किसान होते। शीत धाम आंधी वर्षा में हँसते कदम बढा़ते। खेत और खलिहानों के हीं गुण गोरव ये गाते। पले धूल मिट्टी में जन्मे इस में ही मिल जाते। अर्द्ध नग्न तन भूखे रत हैं किन्तु नहीं कुम्लाते। अन्न देश को जुटा रहें हैं ये किसान कहलाते। लगे जूझनें संघर्षों से, वे विश्राम न पाते। माँ समेट लेती गोदी में ये तो श्रम के है दीवाने। नमन उन्हें मे करती, उनकी व्यथा कोन जाने। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ...
मजदूरों की आंखें
कविता

मजदूरों की आंखें

पायल ‌पान्डेय कांदिवली, पूर्व- मुंबई ******************** इन मजदूरों की आंखें नम हैं, ज़रा, पूछों इनसे, इन्हें क्या ग़म है? नेत्रों से अश्रु धारा बही जा रही है, लग रहा है, जीवन जैसे वीरान वन‌ है। मीलों दूर चल रहें हैं, अधर जैसे एक मुस्कान के लिए तरस रहे हैं, इक आस में छोड़ कर अपना घर-बार, सुकून कि तलाश में ये इतना भटक रहे हैं। पैरों में थकन बेशुमार है, ह्रदय में पीड़ा अपार है, ये कैसा समय आया है, दर दर की ठोकरें खाने के लिए, ये मजदूर बेबस और लाचार हैं। सरकारी राहतों की योजना भी, अब इनके मन की व्यथा नहीं मिटाती, जल की शीतलता भी, अब इनकी प्यास नहीं बुझा पाती। लाचारी का इतना बेबस आलम है की, शरीर की काया भी अब इनका साथ छोड़ती जाती! मंजिल तो अभी दूर है, फिर भी अपने कर्मों में प्रयत्नरत इनका तन है! कभी तो बदलेगी यह स्थिति भी, इसी आस में बीतता, अब इनका जीवन है। इन मजदूरों की आंखें नम हैं, ...
कोख की आवाज़
कविता

कोख की आवाज़

अनुराधा बंसल गुप्ता जयपुर, राजस्थान ******************** आज माँ में तेरी कोख में आयी हूँ देखा है ना तूने मुझे, देख तुझसा ही निर्मल चेहरा लिए आयी हूँ माँ आज तूने छुआ मुझे तेरे इस चूँभन में संसार की हर ख़ुशी के बड़कर सुख पाया हैं मेने.. इस संसार का दीदार तो किया नहीं फिर भी तुझमें इस संसार को पाया हैं मेने देख माँ आज हाथ बने है कल लकीरें भी जल्द बनेगी फिर मेरे हाथो में तू हमेशा हमेशा संग रहेगी .. माँ तू यू चुप क्यू है बोल ना ये खोफ़नाक आदमी कोन है ?? जो बार तुझे बेबस करके मुझसे दूर ले जाने की कोशिश करता है माँ बनाकर ख़ुद को बेबस नहीं छोड़ेगी न तू मुझे हर पल तो मेरा अटूट अहसास तूने अपनी साँसो में पाया है.... बोल ना मेरी ग़लती है क्या ? क्यू देना चाहता है ये ज़माना सज़ा? तू भी तो इक बेटी है तेरी भी तो इक माँ थी फिर क्यू ये सज़ा मुझे मिली ? क्यू मेरी चीख़ तुझे सुनायी ना दी ? क्यू तू बेबस लाच...
हिमालय से आती आवाज
कविता

हिमालय से आती आवाज

डॉ. पुष्प कुमार राय बांका बिहार ******************** उठो, वीर सैनिकों सुनो, भारत मां की पुकार आज हिमालय से आती आवाज। गौर करो, युद्ध की मानो हो आगाज रखना मां के दूध का लाज हिमालय से आती आवाज। कह दो, वीरों दुश्मनों से बात ये तुम आज इक्कीसवीं सदी का है भारत आज हिमालय से आती आवाज। याद करो, वीरों बासठ का वह चीनी खाज हर भारतीय बदला लेंगे आज हिमालय से आती आवाज। प्रण कर, वीरों तू बारंबार आज लहू से रंगीन हो ना हिम आज हिमालय से आती आवाज। बढ़े चलो मुड़कर देखो पीछे ना आज होगी तेरे सिर पर ही विजयी ताज हिमालय से आती आवाज। उठो वीरों उत्साहित है जननी लाखों आज करने भव्य श्रृंगार तेरी आज हिमालय से आती आवाज। मत भूलो, वीरों शहीदों की भूमि ये विशाल निकल पड़ो तिरंगा लेकर आज हिमालय से आती आवाज। घबराओ मत वीरों हमको है तेरी शौर्य पर नाज फूंक दो पाञ्चजन्य शंख तुम आज हिमालय से आती आवाज। हे वीरों रौंद डालो...
चाय
लघुकथा

चाय

मनोरमा पंत महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** कलेक्टर बेटा आफिस से लौटा तो देखा, माँ जमीन पर पालथी मारे, इतमीनान से प्लेट में चाय डालकर सुड़क सुड़क की आवाज के साथ पी रही थी। आसपास नौकरों का मजमा जमा है और सबके हाथ में चाय की प्याली है। माँ का चेहरा खुशी से दमक रहा है। गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया, उसे देख सारे नौकर नौ दो ग्यारह हो गये। माँ से पूछा- "जमीन पर क्यों बैठी हो जवाब मिला- नहीं आसन पर बैठे हैं। बेटे ने फिर प्रश्न उछाला और ये प्लेट में चाय क्यों डालकर पीती हो माँ बोली जिंदगी गुजर गई बस्सी (चीनी की प्लेट) में ही चाय डालकर पी, कोप (कप) में बहुत गरम रहती है।और यह सुड़क-सुड़क की आवाज ? माँ खुशी से किलकती हुई बोली-" तू भी एक दिन बस्सी में चाय डालकर पी, सुड़क-सुड़क की आवाज से ही चाय पीने की तृप्ति होती है। बचपन में तू भी ऐसे ही चाय पीता था। भूल गया?" बड़ी मनुहार के ब...
इंतजार
कविता

इंतजार

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** मेरे इश्क के समंदर को फिर बेचैन कर गया कोई, ठहरे हुए जज्बात में फिर हलचल कर गया कोई, पत्थर मारा था उठाकर फिर किसी ने समंदर में, मेरे इश्क के शांत समंदर में फिर हिलोरे दे गया कोई। मौत को आकर देखो इस हद तक जी गया कोई, कि जीने से पहले अपने आप को हरसू कर गया कोई, उदास आंखों में फिर समंदर का सैलाब उमड़ा है , मौत से पहले ही लहरों सा आकर समंदर में पैगाम दे गया कोई। आज आंखों को बेइंतहा इंतजार दे गया कोई, आंखों से अश्कों को इस कदर बहता छोड़ गया कोई, क्या समझाऊं दिल को उसके इंतजार की वजह, दिल में उठते तूफान में फिर कसक जगा गया कोई। वक्त के पिंजरे को खोल कर सांसो का परिंदा उड़ा गया कोई, दिल में उठते तूफान को हर पल थाम गया कोई, सिमट जाती है एक-एक करके ख्वाहिशें सारी दिल में, जिंदगी की कशमकश से दूर श्मशान में इंतजार कर रहा है कोई। दर्द बढ़...
योग
कविता

योग

हंसराज गुप्ता जयपुर (राजस्थान) ******************** पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. नित्य सब लोग, करेंगे योग. होंगे बलवान सुखी नीरोग, युक्ति युक्त सोयें, खेलें खायें, ईश गुण गायें, ना कहीं विरोध... पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. सत्कर्म, ज्ञान, समर्पित भक्ति, प्राणायाम व्यायाम की शक्ति, प्राकृत न्याय, हों सभी सहाय, करें स्वाध्याय, परमात्मबोध.... पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. सभी निर्दोष, मन में संतोष, हर हाथ काम, पूरा परितोष. तितिक्षा तप दान, निधि धान विधान, रहे सबका ध्यान, वैश्विक अवबोध... पतंजली का चित्तवृत्ति निरोध, योगेश्वर कृष्ण का समत्व बोध. शुद्ध जल जीवन, पवन उपवन, साफ आकाश, आनन्द हवन. सिंचित सोंधी माटी, आँचल बाल गुलाटी, चमन भवन चौपाटी, हरी हर पौध.... पतंजली का चित्तवृ...
युद्ध थोपने वालों की हम
गीत

युद्ध थोपने वालों की हम

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** मानवता के साथ यकीनन, ऐसा करना है गद्दारी। युद्ध थोपने वालों की हम, करें न लोगों पैरोकारी।। ***** युद्ध जहां पर महिलाओं को, बेवा बना दिया जाता है। युद्ध जहां पर गोदी सूनी, करके खून पिया जाता है।। अगर नहीं जीवन दे पाते, जीवन लेने का क्या हक है। हत्या करने या करवाने, वाला सचमुच नालायक है।। भले रहनुमा हो या राजा, उसकी भी है हिस्सेदारी। युद्ध थोपने वालों की हम, करें न लोगों पैरोकारी।। ***** क्या जनता पर निर्मम होना, काम नहीं बोलो शैतानी। महल बनें खुद के नित नूतन, खोली उनके लिए पुरानी।। तनपर भले न उनके कपड़े, हाथों में हथियार थमा दें। हिम्मत करें प्रश्न करने की, हंटर भी दो चार जमा दें।। भक्ति काआश्रय लेकर हम, बोझ न उनपर लादें भारी। युद्ध थोपने वालों की हम, करें न लोगों पैरोकारी।। ****** युद्ध युद्ध होता है भाई, सतपथ पर चलना आराधन। खून खराबा...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २१
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २१

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** महाकाल मंदिर का अहाता चारों ओर से बहुत बड़ा और बहुत बड़ा कच्चा सा विशाल प्रांगण। दिन भर प्रांगण में धूल होती। मंदिर प्रागंण में दिन भर इक्का दुक्का लोग ही दिखाई देते। सुबह शाम ज्यादा लोग होते। रोज भीड़ नहीं होती। हां श्रावण मास में और हर सोमवार एवं महाशिवरात्रि समेत अन्य तीज-त्यौहारों पर भीड़ होती थी। महाकाल के दर्शन और पूजा अभिषेक हेतु आते रोज दो चार भक्त अपने-अपने पुरोहित के साथ दिखाई दे जाते। जब मंदिर में भीड़ नहीं होती उन दिनों हम उधमी बच्चों को महाकाल का विशाल प्रांगण धिंगामस्ती करने के लिए मिल जाता। पाठशाला में बीच के अवकाश में या पाठशाला छूटने के बाद हम बच्चें मंदिर प्रांगण में खूब खेलते। अब मेरे मित्र भी बढ़ गए थे। राजाभाऊ का वीनू, कृष्णाचार्य गुरूजी का मुकुंदा। कुलकर्णी का विजय। पुरोहित मास्टरजी के दोनों बेटे दिनकर और अरुण। खेर चाची...
वेलकम कोरोना
लघुकथा

वेलकम कोरोना

अमोघ अग्रवाल गढ़ाकोटा, सागर (मध्य प्रदेश) ******************** आज सुबह लगभग सात बजे की बात है। एक छोटा सा लड़का चौराहे पर सफेद रंग से कुछ लिख रहा था। जैसे उसका लिखना खत्म हुआ वहाँ भीड़ लग गई और कुछ लोग उस लड़के को डाँटने लगे। डाँट के कारण वह लड़का वहाँ से भाग गया साथ में सफेद रंग भी ले गया। मैंने भी उसका पीछा किया और देखा वही कार्य उसने दूसरे चौराहे पर भी किया। मैं उसके पास गया और पूछा कि "क्या मैं तुम्हारी मदद करूँ और तुम यह वेलकम कोरोना क्यों लिख रहे हो?" वह गुस्से से मुझे घूरता देखता है और फिर कहने लगा कि लोगों को समझ नहीं आ रहा है, इतने समय से नेता, अभिनेता, पुलिस सब परेशान है, सब हाथ जोड़कर निवेदन करते है। और अपने गाँव के लोग सबकी मेहनत पर पानी फेरते है। न मास्क लगाते है और न ही बीड़ी, गुटखा, पान मसाला, सोशल डिस्टेंस आदि के बारे में कुछ जानकारी रखते हैं। इसलिए मैंने सोचा कि...