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पहली बारिश
कहानी

पहली बारिश

मारोती गंगासागरे नांदेड (महाराष्ट्र) ********************                                      जून माह प्रारंभ हो चूँका था, खेत खलियानों की सभी धरा तप-तपकर व्याकुल सी हो गई था। सूरज की अग्नि में जल-जलकर अवस्था विरहणी सी हो गई थी, वह अपने दिलदार का इंतजार कर रही थी, याने की बदल कब आएंगे वर्षा के साथ मिलने और मेरी यह तपन कब मिटाएंगे इसी सोच मे धरा जी रही थी। मृग नक्षत्र भी निकल भी निकल ने वाला भी हैं। ऐसा पता चलते ही सभी किसानों में अपनी खेती भी अच्छी जोतकर रखी थी और कुछ किसानों की बाकी थी। इसी दौर में शहर में पढ़ाई के लिए गया हुआँ राज गाँव लौट आया था। बारिश न होनेक कारण धूप भी हँस-हँस कर चमक रही थी इसी बीच राज खेत मे घूमने गया था। दोपहर का समय ढल चूँका था फिर भी सूरज की ज्वाला कम न हुई थी। इसी बीच हवा ने भी छुटी ली थी। शहर से आया हुआँ राज पसिने से तरबतर हो गया था। मैं कई करूँ यह स...
देश द्रोह से डरना बाबू
गीत

देश द्रोह से डरना बाबू

डॉ. कामता नाथ सिंह बेवल, रायबरेली ******************** कैसे जीना मरना बाबू अब ये बात न करना बाबू रूखी पलकों में, बन्जर सपनों को यहां ठहरना बाबू जिसे सीखना,उनसे सीखे वादे और मुकरना, बाबू शहर हादसों के भूले हैं हंसना है कि सिहरना,बाबू एक दूसरे के दिल में, है मुश्किल काम उतरना, बाबू इतने नाजुक रिश्तों पर, अब कौन भरोसा करना, बाबू सुना कि देश तरक्की पर है, रोटी पर क्या मरना बाबू रोजगार की बात न करना, देश द्रोह से डरना बाबू परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह निवासी : बेवल, रायबरेली यह मेरी स्वरचित, मौलिक और अप्रकाशित रचना है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके ह...
बचपन
कविता

बचपन

मुकेश गाडरी घाटी राजसमंद (राजस्थान) ******************** सबसे अनोखी ये अवस्था ना कुछ करना ना कुछ पड़ना गलियोंमें गुमते ग्याला बनते खेल -खेल में जो लेते मजा कभी ना हम दिल में चुभाते दोस्ती में ना भेदभाव का चलन........ ऐसा था हम सब का बचपन... माँ -पिता के साथ जो रहते बारिश का हमको खुभ लुभाना, मिट्टी से जो घर बनाना दादी से कहानियां सुनते ननिहाल के लिए हम तो रोते, छोटी सी मुस्कान से आंगन मेरा भर जाता गलती जब हम करते, माँ के आँचल मे जा छिपते माँ की ममता का तब होता मिलन..... ऐसा था हम सब का बचपन... पता नहीं ये कोनसा युग है छुपा है बचपन को लेकर आई एक तकनीक एसी सपनों में होते जेसे घूम, हो गयें उस तकनीक में बूम चलो कुछ एसा करते, जिसका कभी ना आदि-अन्त करना हमको ऐसा प्रचलन.... ऐसा था हम सब का बचपन.. परिचय :- मुकेश गाडरी शिक्षा : १२वीं वाणिज्य निवासी : घाटी( राजसमंद)...
रस्ता ठहरा-ठहरा क्यों है
ग़ज़ल

रस्ता ठहरा-ठहरा क्यों है

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. रस्ता ठहरा-ठहरा क्यों है। घर के बाहर पहरा क्यों है। सोच रही हैं आँखें भारी, रात बिना तम गहरा क्यों है। सबके मुश्किल हालातों में, उनका ख़ाब सुनहरा क्यों है। इंसानों की तो हद न कोई, इंसा हद पर ठहरा क्यों है। तन, मन, धन वालों का जमघट, लगता आख़िर सहरा क्यों है। आमजनों की सुनवाई में, मुंसिफ़ इतना बहरा क्यों है। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@...
वक्त के साथ
कविता

वक्त के साथ

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** वो गलिया, वो दरवाज़े बदल जाते है। बचपन के चाव, जवानी आते-आते ठहर जाते है। कहाँ ढूँढे कोई, यादों के घरों को, यह तो चेहरे -दर-चेहरे वक्त के साथ बदल जाते है। हर एक का, हर एक से, निश्चित है समय। बीते वक्त में, अब जा के कही कोई मिलता है कहाँ वो दोस्त मेरे, वो भाई मेरा, वो छोटी बहनें एक छोटा -सा घर मेरा। एक सपना था मेरा। मां-बाप तक ही, यहाँ सारी, दुनिया सिमट जाती थी। मेरे घर से छोटी -सी सड़क शहर तक भी जाती थी। वक्त गुजरा, सब बदल गया। कोई मोल न था, जिन लम्हों का आज लगता है कि, सब वे-मोल गया। मैं बदला, सब बदल गया। मैं हूँ वही, पर अब वो सब। वो नहीं कहीं। वो गलिया, वो दरवाज़े, अब बुलाते नही। वक्त के साथ, उन से मैं, मुझसे वो अनजान सही। क्योंकि वो चेहरे पुराने अब कहीं नज़र आते नही। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २४
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग- २४

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** मेरा सारा ध्यान अंदर की बातचीत पर ही था। अण्णा ने नानाजी की चिट्ठी पढ़ कर एक तरफ रख दी। चिट्ठी सुनकर थोड़ी देर के लिए माहौल गंभीर हो गया था। अण्णा के बाद नानाजी की चिठ्ठी दादा ने भी पढ़ ली और उसके बाद दादा माँजी से बोले, ‘बाळ अभी छोटा है, उसमे भलेबुरे की समझ नहीं है और फिर अभी हाल ही वह आपके पास आया है। एक दूसरे को जानने और समझने में वक्त लगेगा। थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा इसलिए इन बातों की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए।’ ‘पर बाळ के नानाजी तो बच्चें नहीं है। नासमझ नहीं है? उन्हें तो अच्छे बुरे की समझ है।‘ अब सुशीलाबाई बोली। वें गुस्से में थी। ‘मुझे उन्हें चिट्ठी लिखने का अधिकार ही क्या है? और तो और उन्होंने मुझे पराया भी लिखा। मैं इन बच्चों को पराया समझती हूं क्या?‘ क्या मैं पराई हूं?‘ अब उन्हें रोना आ गया। अब माँजी भी भडक गयी, ‘इसमें...
महिमा मंडन
ग़ज़ल

महिमा मंडन

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उ.प्र.) ******************** महिमा मंडन की चाहत में रोज़ हो रहा खून उजड़ रही रिश्तों की बगिया जीवन होता चून आशक्ति ने बदल दिया है रिश्तों का संसार प्रेम समर्पण बीती बातें स्वार्थ का बस अम्बार हम जो कह दें ब्रह्म वाक्य है यही आज का दौर नारद मोह से ग्रसित ज़माना नही सोचना और अहंकार प्रतिकार का ऐसा चढ़ा हुआ है भूत वाह वाह जो नहीं करेगा होगा वही अछूत रिश्ते भी अब चक्रव्यूह हैं संभल के करो प्रवेश जीना मुश्किल हो जाता है मिले अनंत कलेश स्वहित साधन हुई साधना यही आज का खेल तुच्छ स्वार्थ के लिए हो रहा दुश्मन से भी मेल मित्र बनाने से पहले खूब लीजिए ठोंक बजाय साहिल मान रहे हैं जिसको कहीं मुकर न जाय परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि : पु...
सवाल क्यूं हैं
ग़ज़ल

सवाल क्यूं हैं

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गर हैं तलाश-ए-वजुद तो, इतना बवाल क्यूं हैं, एक सांस ही तो ली हैं, हजार सवाल क्यूं हैं... हैं हसरत-ए-परवाज और हौसले बुलंद भी, जब आँधिया भी साथ तो, गगन गेरो सा क्यूं हैं... हो मुबारक-ए-अजान औ सज़दे नबी के तुम्हें, हैं ख़ुदाई इश्क़ मेरा, जहांन को शिक़वे क्यूं हैं... दौर-ए-ज़ोर-ए-आज़माईश, ख़ुदी से हैं "निर्मल", हैं हवा भी सँग लौ फिर, ख़ौफ-ए-स्याह क्यूं हैं... परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, ...
भूली बिसरी यादें
कविता

भूली बिसरी यादें

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** जब हम सब शाला जाते थे, तब पानी बाबा भी आते थे। वो जुलाई की पहली तारीख, तब झूम-झूम होती बारिश। पानी बाबा आया रे और ककड़ी भुट्टा फिर लाया रे। छप-छप चलते जाते थे, हम जोर-जोर से गाते थे। तब पानी बाबा आते थे। जब हम सब शाला जाते थे। वो नई-नई कॉपी किताब, वो नया-नया होता लिबाज़। वो प्रार्थना सभा की पंक्ति में, वंदेमातरम का छिड़ता राग। फिर निश्चिन्त हो जाते थे, हम गा-गाकर इतराते थे। तब पानी बाबा आते थे। जब हम सब शाला जाते थे। रोशनी शिक्षा की आ जाती, वह गाँव-गाँव मे छा जाती। खुली दीवारों सी पुस्तक पर फिर सुंदर चित्र सजाते थे। जब कागज की नाव बनकर, पोखर में चला कर आते थे। तब पानी बाबा आते थे। जब हम सब शाला जाते थे। ना वो सावन के झूले न्यारे, न कजरी-तान, न अमिया-डारे। बदल गए परिवेश, पढ़ाई से, अब बदल गई सब शालाएँ। खेल-खेल में गुरुजी पढ़ते थे, ह...
तूने जो दिया ज़ख्म
ग़ज़ल

तूने जो दिया ज़ख्म

दामोदर विरमाल महू - इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** तूने जो दिया ज़ख्म तो नासूर बन गया। धोखा और दिल तोड़ना दस्तूर बन गया। मुझको तू दिखाती रही मजबूरियां सभी...२ मैं भी उन्ही को देखकर मजबूर बन गया। तूने जो दिया ज़ख्म तो नासूर बन गया। बनते हो क्यों शरीफ गुनहगार हो तुम्ही...२ जो दिखाया आईना तो ये कसूर बन गया। तूने जो दिया ज़ख्म तो नासूर बन गया। दुनिया की चमक तुमको मुबारक हो मतलबी...२ तुमको सनम बता के मैं मशहूर बन गया। तूने जो दिया ज़ख्म तो नासूर बन गया। परिचय :- ३१ वर्षीय दामोदर विरमाल पचोर जिला राजगढ़ के निवासी होकर इंदौर में निवास करते है। मध्यप्रदेश में ख्याति प्राप्त हिंदी साहित्य के कवि स्वर्गीय डॉ. श्री बद्रीप्रसाद जी विरमाल इनके नानाजी थे। हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान एवं आपके द्वारा अभी तक कई कविताये, मुक्तक, एवं...
प्रीत की पाती
कविता

प्रीत की पाती

रागिनी सिंह परिहार रीवा म.प्र. ******************** (हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित कविता) लिखती हूँ पाती नैनन से, आ जाओ अब मेरे मोहन। बहुत बर्ष बीत गए हैं अब, याद बहुत सताती हैं। दो दिन तक कह कर गये थे तुम, अब तक सावरे तुम नही आये। ये प्रीत की पाती लिख लिख कर, नैनन से अश्क बहाती हूँ मोहन। आ जाओ अब मेरे दिलवर, तेरी याद बहुत तडपाती है। जब चिड़िया करलव करती है, नदिया जब कल कल बहती है। तब याद तुम्हारी आती मोहन। आ जाओ अब मेरे मोहन, तेरी याद बहुत तडपाती है। मैं प्रीत की पाती लिख लिख कर, मनमीत तुम्हे भेजवाती हूँ। हृदय वेदना लिख कर, नाथ तुम्हे बुलाती हूँ। नैनन से नीर बरसता हैं, आ जाओ अब मेरे मोहन। परिचय :- रागिनी सिंह परिहार जन्मतिथि : १ जुलाई १९९१ पिता : रमाकंत सिंह माता : ऊषा सिंह पति : सचिन देव सिंह शिक्षा : एम.ए हिन्दी साहित्य, डीएड शिक्ष...
गाँव में
कविता

गाँव में

मिथिलेश कुमार मिश्र 'दर्द' मुज्जफरपुर ******************** झेलता हूँ गाँव को। खेलता हूँ गाँव को। खेलना सरल नहीं। गाँव है तरल नहीं। उलझनों की बाढ़ है। संकट बड़ा ही गाढ़ है। मित्र शत्रु बन रहे। षड़्यंत्र में मगन रहे। रहा न गाँव गाँव है। स्नेहहीन छाँव है। चलता रहा मैं धूप में। जलता रहा मैं धूप में। छाले पड़े हैं पाँव में। रहना कठिन है गाँव में। रहना कठिन है गाँव में। परिचय :- मिथिलेश कुमार मिश्र 'दर्द' पिता - रामनन्दन मिश्र जन्म - ०२ जनवरी १९६० छतियाना जहानाबाद (बिहार) निवास - मुज्जफरपुर शिक्षा - एम.एस.सी. (गणित), बी.एड., एल.एल.बी. उपलब्धियां - कवि एवं कथा सम्मेलन में भागीदारी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन अप्रकाशित रचनाएं - यज्ञ सैनी (प्रबंध काव्य), भारत की बेटी (गीति नाटिका), आग है उसमें (कविता संग्रह), श्रवण कुमार (उपन्यास), परानपुर (उपन्यास), अथ मोबाइल कथा (व्यंग-रचना) आप भी ...
अभिमान क्यों करूँ मैं
कविता

अभिमान क्यों करूँ मैं

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** तत्वों के संगठन पर अभिमान क्यों करूँ मै? माटी के तन-बदन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? थम जाएँ कब, कहाँ पर मुझको ख़बर नहीं है गिनती के कुछ श्वसन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? बिजली है, आंधियाँ हैं, तूफ़ान है, ख़िज़ा है हंसते हुए चमन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? कल के महल-हवेली अब हो गए हैं खंडहर अपने किसी भवन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? आएगी जब क़यामत, हो जाएंगे फ़ना सब नश्वर धरा-गगन पर अभिमान क्यों करूँ मै? ओढ़े हुए कफ़न जब रहना है क़ब्र में तो अपने रहन-सहन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? मुरझाएगा कभी तो, उड़ जाएगा कहीं पर सुन्दर सुखद सुमन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? टिकता नहीं है जो भी आता है इस जगत में ख़ुशियों के आगमन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? जाना 'रशीद' जग से है ख़ाली हाथ आख़िर फिर माल और धन पर अभिमान क्यों करूँ मैं? परिचय -  रशीद अहमद शेख ...
उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग – २३
उपन्यास

उपन्यास : मैं था मैं नहीं था : भाग – २३

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** दूसरे दिन स्कूल जाते वक्त सुशिलाबाई मुझे एक बार फिर स्कूल जाने का बोल कर गयी। मैंने उनकी बात का कोई जवाब ही नहीं दिया पर स्कूल के समय चुपचाप तैयार होकर सुरेश के साथ स्कूल गया। बीच की छुट्टी में मैंने सुरेश को सब बताया। मैं सुरेश को एक तरफ ले गया और उससे कहा, 'तुम्हें मालूम है क्या कि इन सुशिलाबाई की इच्छा अपने दादा से शादी करने की है?' 'करने दो। अपने को क्या करना है?' सुरेश का जवाब मुझे निराश करने वाला था। 'अरे, पर इससे तो वें हमारी सौतेली माँ हो जाएंगी?' 'होने दो। हमें क्या फर्क पड़ने वाला है?' अरे, पर वो तो घर का कुछ भी काम ही नहीं करती?' तो माँजी होती है ना साथ में। वही तो करती है सब काम।' सुरेश बोला। 'पर मुझे वें दोनों बिलकुल अच्छी नहीं लगती।' मैंने कहां। 'पर दादा को तो ताई अच्छी लगती है? एक दिन दादा राजाभाऊ को कह रहे थे की उन्हें व...
जन्मदिन
लघुकथा

जन्मदिन

डॉ. अलका पांडेय मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** रामअवतार जी आज ७० साल के हो गये थे पर जब से उनकी धर्मपत्नी चल बसी उन्होने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया, मनाता भी कौन एक ही बेटा वह भी शहर में सर्विस करता था छुट्टियों में आता रहता कभी-कभी ... पर इस बार पता नहीं क्यों बार बार लग रहा था कोई तो उनका जन्मदिवस मनाऐ ... सालों से वो अकेले रह रहे थे परन्तु इस बार बच्चे जनता कर्फ़्यू में आये थे मिलने पर लाकडाऊन की वजह से जा नहीं पाये .. बहुत दिनों बाद रामअवतार जी के घर में रौनक़ आई थी यही कारण था की वो मन ही मन अपना जन्मदिन मनाना चाह रहे थे पर सुबह के दस बज गये बहू बेटे किसी ने उन्हें बधाई नहीं दी न पैर ही छुआ, था तो वो थोडा मायूस से हो गये, कामवाली से बोले कला ज़रा चाय बना दे छत पर टहल आता हूँ आज तारिख कौन सी है, कला बोली क्यों बाबू जी तारिख का क्या करोगे कुछ नहीं पेपर नहीं आ रहा है न तारिख ...
सन ६२ का काल नही
कविता

सन ६२ का काल नही

राकेश कुमार साह अण्डाल, (पश्चिम बंगाल) ******************** भारत-चीन ना कभी हो सकता भाई-भाई, सरकार हमारी, करे अब इसपर कड़ी करवाई। सन ६२ का काल नही अब, सरकार हमारी बेकार नही अब। आँख झुकाना बहुत हुआ, आँख मिला कर बात करो अब। वक़्त बुरा था, कमजोड़ थें हम, फिर भी हिम्मत ना हारे थें। अब तो है देश समृद्ध हमारा, मातृभूमि हमे है सबसे प्यारा। विश्व पटल पर हिन्दूस्तान के वीर गाथाओं की धूम मची है। देश की रक्षा में, बेटे क्या, बेटियाँ भी सीमा पर खड़ी है। हम कसम लें खुद से, चीन के सामानो का बहिष्कार करेंगे। मिल कर पुरे देश में स्वदेशी का प्रचार और प्रसार करेंगे। भले हमारी संसकृति की पहचान सौहार्द्र और शान्ति है। परन्तु देश के सम्प्रभुता की माँग, फिर एक स्वदेशी क्रांति है। परिचय :-राकेश कुमार साह निवासी : अण्डाल, पश्चिम बंगाल घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी...
आती जाती रहेगी बाधा
कविता

आती जाती रहेगी बाधा

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** बाधाओं पर आती बाधा, इधर उधर से आती बाधा। हुआ थकन से चूर चूर तन, शूल डगर में और भी ज्यादा। अँधियारी घनघोर घटायें, कितना भी लहराकर आयें। बहलायें या फिर धमकायें, फुसलायें, पथ से भटकायें। लक्ष्य के पथ पर सजग रहो, खुद मंज़िल परवान चढ़ेगी। अम्बर को छूकर आने की पंछी को वही उड़ान मिलेगी। इच्छाशक्ति विश्वास प्रबल हो, सफल ही होगा अटल इरादा। ओढ़, छोड़कर सभी लबादा, आती जाती रहेगी बाधा। परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में विभिन्न सीमेंट संस्थानों से समबद्ध हैं। आप भी अपनी कविताएं, कहानि...
हरफनमौला कवि बाबा नागार्जुन की १०९ वीं जयंती के अवसर पर विशेष
आलेख

हरफनमौला कवि बाबा नागार्जुन की १०९ वीं जयंती के अवसर पर विशेष

डॉ. यशुकृति हजारे भंडारा (महाराष्ट्र) ******************** जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं जन कवि हूँ मैं साफ कहूंगा क्यों, हकलाऊं                                        जन कवि कहे जाने वाले बाबा नागार्जुन की यह पंक्तियां उनके व्यक्तित्व, जीवन दर्शन तथा साहित्य में भी चरितार्थ होते दिखाई देती हैं। अपने समय की प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना पर तेज तर्रार कविताएं लिखने वाले क्रांतिकारी बाबा नागार्जुन ने अनेक विधाओं में अपनी लेखनी चलाई तथा जन आंदोलनों पर भी उनका महत्वपूर्ण प्रभाव रहा। बाबा नागार्जुन का जन्म ३० जून १९११ ज्येष्ठ पूर्णिमा अपने ननिहाल तथा ग्राम जिला मधुबनी में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री गोकुल मिश्र तथा माता का नाम उमा देवी था। इनकी चार संतान हुई लेकिन वे जीवित नहीं रह पाए। इनके पिता भगवान शिव की पूजा आराधना करने बैजनाथ धाम (देवघर) जाकर बैजनाथ की उपासना शुरू कर दी। इस प्रकार अ...
धन्यवाद कोरोना
आलेख

धन्यवाद कोरोना

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** आप सब सोंच रहे होंगे कि जहां एक ओर पूरी दुनिया इस कोरोना नमक महामारी से हड़कंप मची हुई है लोग कोरोना के नाम से डरे सहमे नज़र आ रहे हैं वहाँ इसे क्या सूझी जो कोरोना के लिए धन्यवाद ज्ञापन किया जा रहा है। हम सभी यह अच्छी तरह जानते एवं मानते हैं की हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। हमने कोरोना के नकारात्मक पहलू को देखा, सुना और समझा पर इसके दूसरे पहलू पर यदि गौर फरमाएँ तो इसके कुछ फायदे हमें दिखते हैं। आइये देखते हैं कैसे :- प्रकृति का शुद्धि करण हुआ – पूर्ण लॉक डाउन के चलते जब सारे फैक्ट्री, कारखाने, मोटर गाड़ी वो सारी चीजें पूरी तरह बंद हो गई जिनसे हमारे वातावरण में प्रदूषण फैल रहा है और रिपोर्ट बताते हैं की ५० साल के इतिहास में इतनी स्वच्छ न ही नदियां रहीं और न ही इतनी प्रदूषण मुक्त हवाएँ जिसमे खुलकर सांस लिया जा सके। फिज...
खटखटाने दो
कविता

खटखटाने दो

डाॅ. राज सेन भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** खटखटाने दो द्वार दुःखो को हम खुशियों में चूर रहे। व्यस्त रहकर सदा सद् कर्मों में हम बुराइयों से दूर रहे।। ईश्वर देखकर लिख रहा हरपल कर्मों का खाता हमारा जरूरी नहीं कि हम दुनिया के दिलों में भी मशहूर रहे। चल रहे हैं यदि सबसे अलग हटकर सद् मार्ग में हम तो मिलेगा कम औरों से पर होगा सुखद याद ये जरूर रहे। सौंप दिया जब स्वयं को प्यारे प्रभु के हाथों में विश्वास कर तो उसके दिये फूल और हमारे उगाऎ काँटें मंजूर रहे। बदला न लें बदल कर दिखाऎं‌ अंश मात्र भी जो बुरा है किसी का किरदार ही बुरा हैं तो हम भी क्यों क्रूर रहे। ना रख उम्मीद जमीं के रहने वालों से स्वर्गिक सुख लेने की उड़े हल्का होकर दिव्य गुणों की खुशबू से भरपूर रहे। रहना हैं तो 'राज़' खुशियाँ बाँटे बस यही राह श्रेष्ठ है दुःख देने वाले को भी दे दुआ हमारा तो यही दस्तूर रहे।। परिचय : डाॅ. राज...
मेरे पापा
कविता

मेरे पापा

डॉ. मिनाक्षी अनुराग डालके मनावर जिला धार (मध्य प्रदेश) ******************** मेरे पापा मैं मुस्कुराऊ तो खुद मुस्कुराते, मैं रोऊ तो खुद भी रोने लग जाते, मेरी खुशी में खुश होते, मेरे गमों में मुझे समझाते ऐसे मेरे पापा..... अभी तो मैंने पापा बोलना भी नहीं सीखा, लेकिन जब बोलूंगी, तो जो खुशी से झूमेंगे और मुझे अपनी बाहों में ले लेंगे ऐसे मेरे पापा... जिनकी उंगली पकड़कर में चलना सिंखुगी जिनके आवाज लगाते दौड़ी चली आऊंगी बिना मेरे कुछ मांगे जो मुझे दिला दे जो मेरी हर इच्छा पूरी करवा दे ऐसे मेरे पापा... मैं ही उनकी दुनिया उनकी दुजी ना कोई इच्छा बस हमेशा मेरे लिए प्यार ऐसे मेरे पापा.... परिचय : डाॅ. मिनाक्षी अनुराग डालके निवासी : मनावर जिला धार मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि...
उनकी इस महफ़िल में
कविता

उनकी इस महफ़िल में

मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव बिजनौर, लखनऊ ******************** रौनक भरी उनकी इस महफ़िल में, उनके लिए मेरा मन क्यों उदास है? खड़ें हैं सामने उनके सभी भीड़ में, नहीं वो क्यों मेरे पास हैं? चारों ओर शोर ठहाका नजारों में, पर होंठ क्यों मेरे चुपचाप हैं? सभी व्यस्त इधर उधर की बातों में, हम बतियाते क्यों अपने आप हैं? मुंह फेर कोई बात ना करे हमसे, हमें फिर क्यों उनका इंतजार है? हर कोई दोस्तों से घिरा, मगर अकलेपन में हमें क्यों उनकी तलाश है? न बात करते हों मुझसे वो अब, फिर मुझे क्यों उनसे ये आस है? उनके बेरुखे व्यवहार में किस्सा कोई जरूर है, मगर कसूर क्या मेरा, मसरूफियत क्यों मुझसे है? बेशक रूठकर मुझसे दूर वो चलें जायें, दूर होकर भी मुझे क्यों उनसे हीं फरियाद है? उनके लिए मेरा मन क्यों उदास है? . परिचय :-  मनोरंजन कुमार श्रीवास्तव निवासी : बिजनौर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश घो...
वर्षा आई
कविता

वर्षा आई

राम शर्मा "परिंदा" मनावर (धार) ******************** रिमझिम-रिमझिम वर्षा आई चिड़िया रानी खूब नहाई। कभी धूल में लोट लगाती फिर पानी में लौट आती शेम्पू--साबुन नहीं लगाई चिड़िया रानी खूब नहाई। चीं-चीं कर चिड़िया गाती गाती जैसे प्रेम की पाती मौसम आया बड़ा सुखदाई चिड़िया रानी खूब नहाई। पानी में ही दौड़ लगाती दाना भी पानी में खाती आज खुशी उसने है पाई चिड़िया रानी खूब नहाई। परिचय :- राम शर्मा "परिंदा" (रामेश्वर शर्मा) पिता स्व. जगदीश शर्मा आपका मूल निवास ग्राम अछोदा पुनर्वास तहसील मनावर है। आपने एम.कॉम बी एड किया है वर्तमान में आप शिक्षक हैं आपके तीन काव्य संग्रह १- परिंदा, २- उड़ान, ३- पाठशाला प्रकाशित हो चुके हैं और विभिन्न समाचार पत्रों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन होता रहता है, दूरदर्शन पर काव्य पाठ के साथ-साथ आप मंचीय कवि सम्मेलन में संचालन भी करते हैं। आपके साहित्य चुनने का कारण - भ...
हमारी पहचान
कविता

हमारी पहचान

प्रेमचन्द ठाकुर बोकारो (झारखण्ड) ******************** सिमट जाती हैं हमारी आत्माएँ कहीं कोने में वेदना की प्रहार से, निशब्द हो जाते हैं हमारे चेहरे पितृसत्ता के समक्ष, सजल हो जाते हैं हमारे नयन परिजनो की निश्छलता के कारण। कभी हम अभिमान बन जाते हैं तो कभी अपमान, हमारी न कोई पहचान। दहलीज़ हमारे बदल जाते हैं माथे पर सिन्दुर लगते ही, प्रथा है शायद हम अबलाओं के लिए। हमें हर क्षण सहिष्णुता का स्वयंसेवक बनाया जाता है और यही हमारी पहचान। हमें किस-किस रूप में और दिखाएँ जाएंगे कभी रावण की कैद में "सीता", तो कभी कौरवों के अपशब्दों की झोली में "द्रोपदी", तो कभी प्रणय पावन की अभिशाप में "शकुन्तला" और आज दरिन्दो की बुरी निगाहों में "कठपुतली"। परिचय :- प्रेमचन्द ठाकुर निवासी :  बिरनी, जिला-बोकारो, झारखण्ड घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां...
जिंदगी एक बार तो बता देती
कविता

जिंदगी एक बार तो बता देती

प्रवीण कुमार बहल ******************** वह कौन है जो मुझसे नफरत करता है क्यों मेरे बगीचे में उसका हल्ला चलता रहता है उसे ना तो कयामत का डर को नफरत थी मुझसे मैं तो उसकी तमन्ना पूरी करता रहता तकल्लुफ.. क्यों करते मैं तो रोज ही आकर कह देता अपने दरबार में रोज बुला लेता ताकि तुम चंद लोगों के आगे मेरी हसरतों का जनाजा ना पीटते मुझे देखना था.. वह कौन है जो मेरे से नफरत करता है मेरे पास आता.. मैं तुम्हें खुद आंखों पर बिठा लेता मैं तो सामने आने वालों से प्यार करता हूं जिंदगी एक बार तो बता दे..वह कौन है जो मुझसे नफरत करता है परिचय :- प्रवीण कुमार बहल जन्म : ११-१०-१९४९ पिता : डॉ. मदनलाल बहल व्यवसाय : सेवानिवृत- मैनेजर, इंडियन ओविसीज बैंक निवासी : गुरुग्राम (हरियाणा) उपन्मास : रिश्ता, ठुकराती राहें काव्य संकलन : खामोशी, दिशा, चिराग जलते रहें, आंसू बहते रहे, आदि १० पुस्तकों का प्रकाशन। पुरस्कार ...