मेरी माँ
मीना सामंत
एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली)
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अपनी जन्म दात्री माँ को कायनात
के हर एक रंग में उतरते देखा है,,
गाँव की पहाडियों पे दिन का सूरज
रात चांदनी की तरह गुजरते देखा है।
हमारी खुशियों की खातिर ब्रम्ह मुहूर्त
में पीपल को जल चढ़ाते देखा है,
वो स्कूल तो नहीं गई थी कभी मगर
जीवन का पाठ बच्चों को पढ़ाते देखा है।
लय, तुक, ताल, सा, रे, गा, मा, का ज्ञान
नहीं था बिलकुल भी मेरी जननी को,
बोझिल जिंदगी के आंगन में मैंने उसे
थिरकते संग सुर में सुर से गाते देखा है।
माँ मेरी थी सैनिक की जीवन संगिनी
रंजो गम सभी उसे छिपाते देखा है,
पल्लू में ढककर दर्द सभी जीवन के
आंखों से माँ को मुस्काते देखा है।
तिनका-तिनका सहेज कर नीड़ बना के
सफेद, लाल मिट्टी से दीवार लीपते देखा है,
जंगल, खेत, खलिहान संग गृहस्थी की
बगिया को पसीने से सींचते देखा है।
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परिचय :- मीना सामंत
एम.बी. रोड (न्य...

























