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मेरी साइकिल, मेरा भविष्य
संस्मरण

मेरी साइकिल, मेरा भविष्य

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ******************** मैंने जिस शहर में बचपन व्यतीत किया वहाँ पर उन दिनों इण्टरमीडिएट तक ही विद्यालय थे। आगे की शिक्षा के लिये या तो प्राइवेट विद्यार्थी के तौर पर परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती थी या छात्रावास में रह कर अध्ययन करना होता था। मेरी बड़ी बहनों ने प्राइवेट बी.ए. किया था, शायद मैं भी वही करती परन्तु हाई स्कूल और इण्टरमीडियेट में मेरे अंक बहुत अच्छे होने के कारण यह निश्चय किया गया कि मुझे किसी संस्था से बी.ए. करवाया जाये। लखनऊ में मेरी एक बहन रहती थीं अत: लखनऊ में मेरी शिक्षा जारी रखने का निश्चय हुआ। लखनऊ जा कर वि.वि. में प्रवेश तो ले लिया पर बहन के घर से वि.वि. बहुत दूर था। पहले दो किलोमीटर तक रिक्शा से दूरी तय करने के बाद दो बसें बदलनी पड़ती थीं तब जा कर वि.वि. पहुँचा जा सकता था। इस सब में बहुत समय नष्ट होता था अतः साइकिल लेने का निश्चय किया...
कागज की नाव
कविता

कागज की नाव

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** बारिश में पानी भरे गड्ढों में कागज की नाव चलाने को मन बहुत करता हम बड़े जरूर हुए ख्यालात तो वो ही है हुजूर रिश्तों के पेचीदा गणित में उलझ जाकर पहचान भूल जाते घर आंगन जो बुहारे गए धूल भरी आंधी सूखे पत्तो संग कागज के टुकड़ों को बिखेर जाती तूफानी हवा सूने आंगन में सोचता हूं कागज की नाव बना लू. गढढो में पानी को ढूंढता हूं किंतु पानी तो बोतलों में बंद बरसात की राह ताकते नजरें थक सी गई जल की कमी से नाव भी अनशन पर जा बैठी जल का महत्व केवट और किसान ज्यादा जानते बचपन में कागज की नाव चलाते और लोग बाग कागजों पर ही नाव चला देते ख़ैर, जल बचाएंगे तभी सब की नाव सही तरीके से चलेगी आने वाली पीढ़ी जल की उपलब्ता से नाव बनाना और चलाना सीख ही जाएगी। . परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :-...
चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना
आलेख

चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना

डॉ. ओम प्रकाश चौधरी वाराणसी, काशी ************************                                     कभी यह गाना हमारे बहुत ही अजीज अच्छू बाबू (श्री अच्छेलाल राजभर) प्रायः गुनगुनाया करते थे। आज सुबह-सुबह अच्छू बाबू की याद आयी और यह गीत अनायास ही मेरी जुबान पर आ गया। मन बड़ा बोझिल हुआ। आज इस कोरोना वायरस से उत्पन्न हुई महामारी के कारण जो पूरे देश में भारतीय गरीब मजदूरों का देश के कोने-कोने से पलायन हो रहा है यह काफी दर्द भरा एवं खौफनाक मंज़र है। यह मंजर कभी हमारे पुरनियों ने १९४७ में भारत विभाजन के दौर में अपने आंखों से देखा था। उसमें से श्री लालकृष्ण आडवाणी जी जैसे महानुभाव भी अभी हैं, जो विभाजन में यहां आ गए थे। उस खौफनाक मंज़र को हमलोगों ने तो फिल्मों में ही देखा या सुना है। वह मंज़र देख कर दिल दहल जाता है। आज वही मंज़र जब भारत स्वतंत्र है तब देखने को मिल रहा है। बस अंतर यही है कि...
हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव
आलेख

हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव

मंगलेश सोनी मनावर जिला धार (मध्यप्रदेश) ********************** हिंदू साम्राज्य दिनोत्सवम ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी का यह दिन कोई सामान्य दिन नहीं था। मुगलों अफगान तुर्कों के अत्याचार भरे शासन के कई दशक बीत जाने के बाद एक हिंदू सम्राट के राज्याभिषेक का स्वर्णिम अवसर है ऐसा समय जब तुर्कों से युद्ध का विचार भी करना, देश में अपराध माना जाता था। राज्य धन संपदा को समाप्त करने वाला माना जाता था। राज्य के वैभव और यश व कीर्ति से समझौता करना माना जाता था। ऐसे प्रतिकूल समय में छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक, मुगलों व तुर्कों के शासन के कब्र में अंतिम कील ठोकने के समान था। देश में यह दिन अनन्य उत्साह से मनाया जा रहा था, कई दशकों बाद एक हिंदू राजा अपने स्वाभिमान से एक बड़े भूभाग पर राज्य कर रहा था, उसका क्षेत्र तो महाराष्ट्र आंध्र प्रदेश तक सीमित था किंतु शिवाजी राजे की नजरें दिल्ली पर टिकी थी, कई मर...
कमाल कर दिया
कविता

कमाल कर दिया

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** बिखरे परिवार को तुने एकता की माला से पिरो कर घर की मर्यादा को तुने पल भर में ज्ञात करा दिया समाजिक दुरी की महत्ता हम सबको बता दिया वह ! रे कोरोना तुने कमाल कर दिया... युवा पीढ़ी को मंदिरापान से दूर कर निशा मुक्त समाज का मार्ग प्रशस्त कर दिया... वह ! रे कोरोना तुने कमाल कर दिया... मानव की बेवजह ईच्छाओ में पाबंद कर जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक रोटी , कपड़ा और मकान की महत्ता हम सबको बता दिया वह ! रे कोरोना तुने कमाल कर दिया... अंधविश्वास भेदभाव घटा कर विज्ञान चिकित्सा के प्रति विश्र्वाश कायम कर दिया धैर्यवान आपसी तालमेल संतोष पूर्वक जीवन जीने की नई राह दिखा दिया वह ! रे कोरोना तुने कमाल कर... किसान, सैनिक, चिकित्सकों के प्रति सम्मान का भाव जगा दिया पडौ़स संगा संबंधी आमजन में आपसी भाईचारे की भावना बढ़ा दिया दानवीरता की भावना बढ़ा ...
सत्य बानी
कविता

सत्य बानी

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मेरा मन अटका जा किली से, ते बच गया दो पाटन झमेले से, जब रँग लिया खुद तेरे निर्मल रँग, ते क्यो कर भागें मन रँगरेज से... *** क्या सँग तेरे आया इस जग में, ते ले जायेगा क्या सँग इस जग से, बिन पट आया तू किया रुदन बहुत, ते काहे मोह राखे तू इस मलमल से... *** ये चंद लम्हों की ही कहानी हैं, ते पढ़ ले मन भर फिर रवानी हैं, जब मसि घुल जायेगी दृगजल से, ते बन्द पौथी अपनो ने सजानी हैं... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित क...
अन्तर्मन
कविता

अन्तर्मन

जितेन्द्र गुप्ता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** संभल जाती है वो जब भी आती है कोई चिट्ठी, या आता है कोई फोन। सिमट जाती है वो जब भी..... हंसते सब हैं घर में... या बनते हैं पकवान.…. समझ जाती है वो फिर कोई आयेगा..... सपना दिखाया जायेगा.. नये जीवन का.. उम्मीद का संवारी जाती है वो.. सजायी जाती है वो... बेजान पुतलों सी... फिर होगी नापतौल.. मोल तोल...। सहम जाती है वो... सिहर जाती है वो... अगले पल को सोच फिर.... फिर.... फिर... होती है नापसंद और बिखर जाती है वो... और फिर शुरू हो जाता है.. इंतजार....... इंतजार... बस इंतजार..!!!!!! . परिचय :- जितेन्द्र गुप्ता निवासी : इंदौर म.प्र. आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानिया...
दो जून रोटी खातिर
कविता

दो जून रोटी खातिर

वीणा वैष्णव कांकरोली ******************** दो जून रोटी की खातिर,जान बाजी लगा रहा। यह दुनिया एक रंगमंच,वह करतब दिखा रहा। अपनों की परवाह उसे,दर-दर ठोकर खा रहा। आएंगे शायद अच्छे दिन,इसी उम्मीद जी रहा। दो जून रोटी खातिर................. बड़े-बड़े बंगले देख,वो मन ही मन खुश हो रहा। कितना सुकून होगा उसमें, वो नादान सोच रहा। तभी किसी ने आवाज लगाई, काम करोगे क्या। मीठे सपनों से जागा,जी आया हुकुम कह रहा। दो जून रोटी की खातिर............. दो जून रोटी के खातिर, वह कितना तरस रहा। रोटी चीज नहीं है छोटी,महत्व अब समझ रहा। अपने बच्चों के आंसू देख,वो खून आंसू रो रहा। गरीब होने की सजा,देखो बहुत ज्यादा पा रहा। दो जून रोटी खातिर ............... अपना देश छोड़, रोटी तलाश विदेश जा रहा। लाखों व्यर्थ लूटा देंगे, गरीब न कोई सुन रहा। सारे गुनाह इसी के पीछे, वह मासूम कर रहा। कहे वीणा दो जून रोटी लिए,जहा भटक रहा...
नई पारी
कविता

नई पारी

खुल जाएंगे आज शहर खुल जाएंगी गलियां सारी खुल जाएगा उजियारा छंट जाएगी अंधियारी क्या खुल जाएगी सोच वही जो लेकर हम सब बंद हुए थे ? क्या खुल जाएगी सोच वही जो जिससे चेहरे मंद हुए थे ? खुल जाएगी किस्मत क्या उस बुढ़िया चेहरे की लाठी ? खुल जाएगी बचपन की वो खेल खिलौनों की काठी ? या फिर से बंद हो जाएगा अंधियारा इस तूफान का क्या जुड़ पाएगा दूरियों में नाता फिर इंसान का ? क्या खुशियां फिर से खेलेंगी या ग़म के बादल छाएंगे ? जो बिछड़ गए हैं अपनों से क्या फिर से वो मिल पाएंगे ? अब समय नहीं है बंद सोच का, बस वही बदलने की बारी। लेकर आशाओं के दीप शुभम, हम खेलेंगे अब नई पारी। हम खेलेंगे अब नई पारी।   परिचय :- दीपक कानोड़िया निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
आपदा और प्रेम
आलेख

आपदा और प्रेम

कोरोना ने दिखा दिया कि हम भारतीय सच में प्रेम की परिभाषा ठीक से समझते हैं। दया, करुणा, फ़र्ज़, लगभग हर जगह दिखे। नाम की चाह रखने वालों ने दान खूब किया और तस्वीरों के जरिये दिखाना चाहा कि वो मानवतावादी हैं। होड़ लग गई थी प्रदर्शन करने में। कुछ तो दान लेकर दान देते दिखे। पैकेट किसी के वाहबाही कोई दूसरा ले गया। लेकिन काम तो जोरदार हुआ। जरूरतमंद वंचित तो नहीं रहे। कुछ धूर्त भी निकले। ज़रूरत से ज़्यादा मुफ्त का माल जमा कर लिया। समूचे देश में एकता दिखी। लॉक डाउन में तमाम महानुभाव बोर होते दिखे, उबासी लेते दिखे, छटपटाते दिखे, ग़मगीन दिखे, मलीन दिखे। क्योंकि उनके अंदर प्रेम नहीं था। क्रोध, ईर्ष्या, घमंड, ईगो, के कारण ऐसे लोग प्रेम न कर सके। माँ, पत्नी, भाई, बहन, पुत्र, पुत्री, मित्रों से दिल खोलकर बातें न कर सके। घर में कार्य करने वालों के प्रति दयालु न बन सके। प्रेमी प्रेमिकाओं ने अपार दुख झेले। मोबाइल...
कान्हा बनाम खान नदी
कविता

कान्हा बनाम खान नदी

मोहब्बत को ही इंसानियत की शान कहते हैं अध्यापक हूं शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का गुरान में मुझे "आशु कवि" के.पी. चौहान कहते है कान्हा नदी का उद्गम स्थान है इंदौर जिले का मुंडी गांव जीसे आज लोग खान कहते हैं राजवाड़ा इंदौर की कृष्णपुरा छत्री पर संगम हुआ सरस्वती नदी से और त्रिवेणी में शिप्रा नदी मैं हुआ संगम जिसे शनि मंदिर पर त्रिवेणी का घाट महान कहते हैं कान्हा नदी कहूं तुझे या खान क्या कहकर करूं मां सरिता तेरा गुणगान तट पर बैठा हूं तेरे और कविता की पंक्तियों में लिख रहा हूं मां तेरा बखान मेरे गांव को कहते हैं गुरान निश दीन कल-कल करती स्वच्छ और निर्मल जल की धारा बहा करती थी जो तेरी महानता की कहानी कहा करती थी तेरे ही तट पर अपना बचपन जिया मैंने जिसका पानी कई बार पिया मैंने अब देख कर दुर्गति इस अमृत जैसे दूषित जल की भूल गया हूं मैं वह नदी बीते हुए कल की आज मैं कैसे तेरा गुणगान करूं अब कैस...
अबतो मंदिर खोलदो
कविता

अबतो मंदिर खोलदो

अबतो मंदिर खोलदो....केवल उसका सहारा है। बहुत हो गए दूर उससे अब होता नही गुज़ारा है। क्या मालिक को पता नही हमसब उसके बन्दे है। उजड़ गए कइयों के घर......बन्द पड़े सब धंधे है। देखने दो उसको भी थोड़ा बाहर कैसा नज़ारा है। अबतो मंदिर खोलदो...केवल उसका सहारा है। डॉक्टर है भगवान... हमारी संस्कृति बतलाती है। दवा से ज्यादा दुआ हमे.....ज्यादा काम आती है। धर्म, आस्था, संतो का..भारत ही एक ठिकाना है। इन्ही तीन के दम पर इस महामारी को भगाना है। करता हूँ करबद्ध निवेदन..... ये कर्तव्य हमारा है। अबतो मंदिर खोलदो...केवल उसका सहारा है। कहीं बाढ़, भूकंप कहीं तो बमबारी हो जाती है। दुष्कर्म, हत्याएं अक्सर कई सवाल कर जाती है। कुप्रथा और दहेज की बलि बेटियां चढ़ जाती है। कहीं भुखमरी और तंगी से आफत बढ़ जाती है। कुछ तो हुआ अनर्थ आपसे प्रकृति का इशारा है। अबतो मंदिर खोलदो...केवल उसका सहारा है। देशव्यापी महामारी का पहले भ...
सबला की तैयारी है
कविता

सबला की तैयारी है

https://www.youtube.com/watch?v=pZkz9vc2bFI अबला बनकर क्या पाया, बस तुने नीर बहाया है, वनिता होकर भी तो अश्कों, का सागर ही लहराया है। शिक्षा शस्त्रों का संधान करो तुम, सबला की तैयारी है....। दुनियां देखे शिक्षित नारी, रूप बड़ा सुखकारी है। कमजोर नहीं है कर तेरे, कंगन जिनमें सजते हैं, अधरों पर मधुगान रहे जो, हाला से ही लगते है। कंगन वाले हाथो को अब, कलम लगे बड़ी प्यारी है, शिक्षा शस्त्रों का संधान करो तुम, सबला की तैयारी है.....। अधरो से बहा तू अक्षर गंगा, हाला से मनोहारी है, दुनियां देखे शिक्षित नारी रूप बड़ा सुखकारी है। सबला की तैयारी है, सबला की तैयारी है। क्यों आस करे तू गोविंदा, तेरी लाज बचाएंगे, अग्निपरीक्षा देकर ही तुझको निर्दोष बताएंगे। याज्ञसैनी तू अग्निशिखा बन दुनियां तुझसे हारी है, शिक्षा शस्त्रों का संधान करो तुम, सबला की तैयारी है....। चीर बचना सीखो अपना, अब ना तू बेचारी ह...
कड़वे अंगूर
लघुकथा

कड़वे अंगूर

(हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजिट अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित लघुकथा) कोरोना के चलते अभी-अभी लॉक डाउन खुला ही था कि एक फेरी वाला अपनी ठेला गाड़ी लेकर फल बेचने निकला। उसे रोकते हुए मैंने आवाज लगाई भइया अंगूर है क्या? मुंह पर मास्क लगाए, हाथो में दस्ताने पहने फेरी वाला बोला हां है बाबू जी। मै उसकी ठेला गाड़ी के करीब पहुंचा ही था कि उसने झट से सेनिटाइजर की बॉटल आगे करते हुए मेरे हाथ धुलवाकर बोला अब आप अंगूर आपकी पसंद से छांट लो। मीठे तो है ना, मेरे सवाल के जवाब में वह बोला आप अंगूर धो के चख लो बाबूजी। ठीक है भाई, क्या भाव लगाओगे। ₹ ३५ के एक किलो वो बोला। ₹३५ देकर ठीक है एक किलो दे दो भाई। अंगूर लेकर मैंने श्रीमती को दिए, उसने अंगूर लेकर धो कर फ्रिज में रख दिए। दोपहर में जब थोड़े अंगूर खाने के लिए फ्रिज से निकाले, श्रीमती ने अंगूर का पहला दाना खाते ही, ये क्या ? कड़वे अंगूर ...
ऐ मेरे प्यारे घर
कविता

ऐ मेरे प्यारे घर

ऐ मेरे प्यारे घर, मेरे सपनों के महल, तुझे छोड के जाउँ, मेरा दिल नही करता, एक बार देखूँ, बार बार देखूँ, पर जी नही भरता... अभी कल ही कि तो बात है, मेहमानों का आना जाना, उनका तुझे जी भर के निहारना, तेरी तारीफो के पुल बाँधना, सब अच्छा लगता था, अच्छा ही तो लगता था.... मेहमानों के स्वागत मे, वो मेरा पलके बिछाना, वो हँसना वो मुस्कुराना, उनकी तिमारदारी मे, खुद को भूल जाना, सब अच्छा लगता था, अच्छा ही तो लगता था ..... फिर विदाई की घडी आई, रुखसत हुए मेहमाँ, और रह गई तन्हाई, अब तो शेष है वो खुशनुमा पलों की यादें, जो दिल की गहराई मे भीतर तक समाई.... अब तो बस वापस जाना है, जीवन की आपाधापी मे, फिर से रम जाना है, पर तेरे साये मे गुजारे वो पल, तेरी यादें हमेशा संग चलेंगी, फिर से कुछ पल बिताने की तमन्ना हमेशा रहेंगी.... . परिचय :- प्रशांत कुमार श्रीवास्तव "सरल" निवासी : भिलाई आप भी अपनी कविताएं, क...
धरती का सम्मान
कविता

धरती का सम्मान

पेट की आग बुझाने को मजबूर हैं, जनसंख्या का बड़ा भाग मजदूर है, लाकडाउन में भूखे प्यासे सो जाते हैं, अपने घर, गांव, शहर से दूर हैं। चिलचिलाती धूप में नंगे पांव चले, छालों की चिंता किए बिना मजदूर चले, सिर पर गठरी, हाथ में सामान लिए, बच्चों के संग सड़क नापते कोसों दूर चले। कहीं मीनार चढ़े, तो कहीं, मंदिर के नींव में दबे, दर्द सहा गालियां खाई और अपमानभी सहे, पसीने की हर बूंद भी बहा दिया हमने, अभावों में अधनंगे चिथड़ो से तन ढके। जीवन जीने को शहर आए थे, जिंदगी बचाने को घर लौट चले, दर्द की पुकार कोई सुने नहीं, बेबस, दुखी और लाचार हो चले। एक दूजे का हाथ पकड़कर जाएंगे, रोटी के लिए भगवान से भी लड़ जायेंगे, अपनी भुजाओं पर भरोसा है हमको, दो जून की रोटी प्रेम से कमा कर खाएंगे। . परिचय :- श्रीमती शोभारानी तिवारी पति - श्री ओम प्रकाश तिवारी जन्मदिन - ३०/०६/१९५७ जन्मस्थान - बिलासपुर छत्तीसगढ़ शिक्षा - एम...
बहिन
कविता

बहिन

सिर्फ किसी रिश्ते का नाम नहीं बल्कि है इस धरती पर विधाता का पैगाम पवित्रता का, विश्वास का अटूट बंधन है यह अविराम निश्छलता का चाहे वह छोटी हो या बडी शरारतों के पिटारे से एक सच्चे दोस्त के रिश्ते तक जिंदगी के हर मोड पर राज उसी का होता है। कभी लडाई, कभी पढाई, माता पिता से बचाने में सहयोग उसी का होता है। पैसे हो या कपडे सब पर पहला अधिकार है। समझदारी और शरारत के समन्वय से बढता भाई बहिन का प्यार है। . परिचय :- मुकुल सांखला सम्प्रति : अध्यापक राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, खिनावडी, जिला पाली निवासी : जैतारण, जिला पाली राजस्थान आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.comपर अणु...
नवतपा
कविता

नवतपा

लागि नवतपा जिन्हा ते आगी सूरज बरसाय रहे प्राणी पंछी की कहे कौन बिरवा बिरछा तक सुखाय रहे का कही हालु या बिजुरी का भूतवा कसि खम्भा दिखाय रहे आँखि तरेरी रही बैहर तमन ते जगती अकुलाय रहै का कही फलाने या समयआ जीवन पै कइसन संकट छाय रहे ऊ बैठि ओसारी मा भुनकय लरिका गरमी म बिलबिलाए रहे निनचव घर मा न चैन परे भितरे बाइबे कै दुपहरि बिताय रहे लागि नवतपा जिन्हा ते आगी सूरज बरसाय रहे शब्दार्थ नवतपा - मृगशिरा जिन्हा -जी दिन से ओसारी - बरामदा . परिचय :- तेज कुमार सिंह परिहार पिता : स्व. श्री चंद्रपाल सिंह निवासी : सरिया जिला सतना म.प्र. शिक्षा : एम ए हिंदी जन्म तिथि : ०२ जनवरी १९६९ जन्मस्थान : पटकापुर जिला उन्नाव उ.प्र. आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित कर...
तंबाकू से जिंदगी
कविता

तंबाकू से जिंदगी

तंबाकू से जिंदगी बचाएं जिंदगी तंबाकू की हवा में मत उड़ाएं। आज जिसे पी रहे .......??? एक नशे..... एक उन्माद में, ऐसा ना हो यह जिंदगी पी जाएं। जिंदगी तंबाकू की हवा में मत उड़ाएं। जिंदगी के एहसास को, लंबी-लंबी सांसो में जी जाएं। ऐसी सांस तंबाकू के साथ ना लें। जिससे जिंदगी काले धुएं में खो जाएं। . परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें … और अपनी कविताएं, लेख पढ़ें अपने चलभाष पर या गूगल पर www.hindirakshak.com खोजें...🙏🏻...
प्रीत की पाती
कविता

प्रीत की पाती

(हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित कविता) भाव ह्रदय के पन्नों पर उतार प्रीत की पाती भेजी है आज शब्द नहीं हैं दिल के जज़्बात कुछ अनकहे से हैं अल्फाज़ "तुम क्या जानो तुम बिन दिन बीतें ना बीतें रतियां रहा शेष ना इक भी दिन रोए बिन रही हों अखियाँ हारी मैं तारे भी गिन-गिन करें ठिठौली सब सखियाँ राह तकूँ मैं हर पल-छिन होंगी फिर से मीठी बतियाँ" अश्रुपूरित से नेत्रों का भार सँभाले नहीं सँभलता आज टकटकी लगाए बैठी मैं द्वार ले पुनर्मिलन की अब आस . परिचय :- किरण बाला पिता - श्री हेम राज पति - ठाकुर अशोक कुमार सिंह निवासी - ढकौली ज़ीरकपुर (पंजाब) शिक्षा - बी. एफ. ए., एम. ए. (पेंटिंग) यू जी सी (नेट) व्यवसाय - टी. जी. टी. फाईन आर्ट्स (राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, मौली जागरण चण्डीगढ़) प्रकाशित पुस्तकें - ३ साँझा काव्य संग्रह प्रकाशित और ३ प्रकाशाधीन सम्मान ...
क्या लिखूं
कविता

क्या लिखूं

तुम्हें जीवन की आस लिखूं, या जीवन का प्रकाश लिखूं चंचल मन की अभिलाषा, या अधर की प्यास लिखूं,। हृदय के होते स्पंदन में, तुम्हें प्रेम प्रतीक लिखूं। चंचल चितवन या हकीकत, या ख्वाबों में प्रेमरूप लिखूं। तुम मेरी देह में बसते हो, अपने हृदय के श्वासो में लिखूं। मेरे नैनो के बसते ख्वाब का, या मधुरिम एहसास लिखूं। हृदय के भावों में समाहित, तेरे प्रेम का गुणगान लिखूं। तुमको मन मंदिर में बसाकर, तेरा हर एक एहसास लिखूं। तेरी मेरी जुडीं भावना, उस पर मैं प्रेम गीत लिखूं मन स्वर्णिम स्मृतियों को, रक्त से अपने छंद लिखूं। तुम्हे मीत या प्रीत लिखूं, या अपने दिल का गीत लिखूं तुम्हे ख्वाब या तुम्हे हकीकत, या मधुरिम एहसास लिखूं। नेहदेव का रिश्ता अनोखा, या पार्थ की मैं नेह लिखूं। मनमंदिर की श्रद्धा से, तुम्हें प्रीत का पार्थ लिखूं। तुम्हें वेदना का पतझर या, तुम्हें मिलन की आस लिखूं तुम्हें प्रेम की अभिलाषा सा, ख...
नैसर्गिक सुख
लघुकथा

नैसर्गिक सुख

(हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित लघुकथा) ‘’कल्‍लो....कल्‍लो...।‘’ चिल्‍लाते-चिल्‍लाते, मेरी पत्नि धड़धड़ाते हुई, मेरे पास आकर पूछने लगी, ‘’कहॉं है कल्‍लो!ˆ मेरे उत्‍तर की परवाह किये बिना वह घर में ही भड़-भड़ाकर ढूँढने लगी, ‘’किधर हो कल्लो-कल्‍लो!’’’ ‘’...यहाँ हूँ... मेम साब!’’ करता हुआ काम छोड़कर ‘’ हाँ मेम साब...? ‘’मेरे लिये दूघ गरम कर के, लाओ।‘’ आदेशात्‍मक लहजे में, ‘’बैडरूम में हूँ।‘’ ‘’पहले डिनर लगाऊँ; मेमसाब ?’’ ‘’नहीं! पार्टी में खा चुकी हूँ।‘’ कुछ नरम होकर कहा, ‘’बहुत नींद आ रही है, जल्‍दी ला।‘’ .....ये है, श्ष्टिाचारी, संस्‍कारी, सम्‍पन्‍न, सम्‍पूर्ण अर्धान्‍गिनी! ....मैंने पैग भरा। बैठ गया खिड़की खोलकर। आज कुछ ठण्‍डक है। शायद वर्षा होने वाली है। बाहर देखा, पानी गिरने लगा। थोड़ी देर में जोर की बरसात होने लगी। सामने बीरान खण्‍डहर पड़ी...
जीवन साकार करो
कविता

जीवन साकार करो

मनु जन्म मिला क्यों, आज थोड़ा तुम विचार करो। जागो गहरी नींद से, मीठे सपनों में ना खराब करो। कीचड़ में कमल खिलता, वैसे ही तुम खिला करो। दूर भगाकर दुष्कर्म को, तुम मानवता से प्यार करो। काम कर निष्काम, तुम कर्म पथ आगे बढ़ा करो। मान अपना कर्तव्य, हर काम को बस किया करो। बीत रहा है समय यह, खुद भी थोड़ा विस्तार करो। धन दौलत चकाचौंध में, तुम इतना ना बहका करो। भूल भुलैया है यह जीवन, गलती ना बारंबार करो। चार दिनों की चांदनी में, जीवन ना तुम बेकार करो। सत्कर्मो की नाव बना, जीवन नैया तुम पार करो। मन आए विकारों को, गुणी जनों संग बैठ दूर करो। मनु जीवन सौभाग्य मिला, थोड़ा तुम विचार करो। तेरी मेरी कर, अनमोल जीवन अपना ना व्यर्थ करो। कहती वीणा, प्रभु श्रेष्ठ रचना जीवन सार्थक करो। बहुत कम बची सांसे, सोच समझ कर खर्च करो। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष्णव "रागिनी" वर्तमान में राजकीय उच्च माध्यमिक ...
मैं हूं भी, नहीं भी
कविता

मैं हूं भी, नहीं भी

मैं हूं पर कहां? यह मेरा नाम है। जिस ओहदे से जाना जाऊं वह मेरा काम है। संबंधों में बिखरा है वह मेरा अस्तित्व है। खुद को जानने ढूंढ बना वह जीवन स्पंदन है। मेरी शिक्षा, परवरिश, आयु शरीर में मुझे समझने का जरिया है। पंचतत्व से बना उसी में विलीन होकर माटी का पुनर्निर्माण किया। मुझे जानने की अनंत यात्रा में मैं हूं भी नहीं भी हूं। दिखता है वह मैं नहीं हूं जो नहीं दिखता वह मैं हूं। मैं शरीर नहीं हूं, मैं मन भी नहीं हूं। सिर्फ मैं ही मैं हूं हर जगह चराचर जगत में। जीवन की अनंत यात्रा में मैं हूं भी नहीं भी हूं। . परिचय :- अनुराधा बक्शी "अनु" निवासी : दुर्ग, छत्तीसगढ़ सम्प्रति : अभिभाषक मैं यह शपथ लेकर कहती हूं कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
मानवता
लघुकथा

मानवता

उस समय की बात है जब संदीप ओर उसके दोस्त गुजराती कार्मस महाविधालय इन्दौर में वर्ष २००६ में बी.कॉम द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत थे, संदीप ओर साथी दोस्त अधीकतर रेल परिवहन से देवास से इन्दौर अध्ययन हेतु प्रतिदीन आना जाना किया करते थे, उनको घर से कभी जरुरत पड़ने व नाशते पर खर्च हेतु ३० रु. दीये जाते थे। महाविधालय में परीक्षा के नामांकन प्रपत्र जमा होने के कारण रेल अपने नियत समय से स्टेशन से निकल चुकी थी, व दूसरी रेल २ घण्टे बाद चलने वाली थी, संदीप ओर उसके दोस्तों द्वारा बस परिवाहन से इन्दौर से देवास जाने का निश्चय किया, बस में पुरी सीट भर जाने के कारण खड़े खड़े जाना पड़ा, जहॉ संदीप खड़े थे उसके समीप वाली सीट पर एक बुजुर्ग बैठे थे, मुख पर निराशा के भाव व चिंता की लकीर अलग ही प्रतीत हो रही थी। बस अपने गंतव्य स्थान देवास के लिये निकल गई, करीब १०-१२ किलोमीटर के सफर तय करने के बाद बस कंडक्टर का बस किरा...