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प्रेम की पाती
कविता

प्रेम की पाती

(हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रेषित लघुकथा) पुरुष के अलग-अलग भाव इस कविता के माध्यम से। पिता जब लौटे दफ्तर से छोड़ चिंता की पोटली घर आंगन में आतें हैं, जैसे ही दस्तक किया प्रवेश द्वार को बस बट गई वहीं से प्रेम प्रीत की पाती।१ छोड़ हाथ मा का दौड़ कर पिता की गोद में चढ़ गए हैं बच्चे, प्रीत का पहला कदम हंसी उल्लास से मन मोहित कर देता है।२ वह जाकर सीधा बैठा बड़ों की छत्रछाया में, चिंतामय आवाज में बोली आने में देर हुई कब से देख रही थी घड़ी को। ममता की छांव में सारे दर्द मिट जाते हैं। ३ लो झट से आई चाय का प्याला लिए, बैठ गए सब साथ-साथ रंग जमा है माहौल बना है, लगा है जैसे बरसों बाद मिले हैं।.४ यह त्रिवेणी के संगम जैसा लगता है, बस बार-बार इसमें गोते लगाऊं सारे दुख दर्द मिट जाए, इतना पवित्र है यह संगम।५ ऐसी प्रेम की पाती मुझे बहुत भावे है २ . ...
नया ठिकाना
लघुकथा

नया ठिकाना

आज सुबह से बच्चे के जोर-जोर से रोने की आवाज से मीरा बहुत बेचैन थी आखिर बाहर आकर देखा। नए मकान के चौकीदार की झोपड़ी के बाहर टूटी खटिया पर उसका ९ वर्षीय बेटा गब्बू बिलख-बिलख कर रो रहा था। क्यों गब्बू इतनी जोर-जोर से क्यों रो रहे हो? कब से रोए जा रहे हो, क्या हुआ? गब्बू और जोर से क्रंदन करने लगा। उसके माता-पिता अपना बोरिया-बिस्तर बांधने में भिड़े हुए थे। माँ बोली- "का करे मैडमजी इहा अब मजूरी नाही सो गाँव जा रहे हैं। ई गब्बू कहत है इस्कूल जावेगा, गाँव मे पड़ई छूट जावेगी देख लेव कईसा रो रवा है। मीरा बोली - "तो मत जाओ ना! कुछ समय की बात है सब ठीक हो जायेगा। इतने में पिता झुंझलाया- "पेट की आग नाही रुक सके है बेनजी। मीरा बोली- "पर बच्चा कब से रो रहा है मुझे घबराहट होने लगी तुम पिता होकर.....इत्ताई घबराट है तो रख लेव इका। पढ़ाया करियो। मूक होकर मीरा घर मे चली गई। पेपर पढ़ रहे पति को दुखी होकर सब बात बता...
जिंदगी
कविता

जिंदगी

चलती फिरती काया की उड़ान है जिंदगी एक कुरुक्षेत्र है जिंदगी कभी वक्त के थपेड़ों में डूबती उत्तराआती नाव सी जिंदगी साहिल की तलाश में भटकती हुई जिंदगी कभी फूलों की गुलजार बाग सी महकती जिंदगी कभी पतझड़ में पेड़ की टूट सी खड़ी जिंदगी कैलेंडर की तारीखों सी बदलती हर पल जिंदगी सपनों का महल खड़ी करती जिंदगी टूटते सपनों का दंश झेलती जिंदगी बहुत बेमिसाल है जिंदगी कभी हाथों में ठहरती नहीं जिंदगी आंखों में सुनहरे पल की आस लिए जिंदगी जीवन के खट्टे मीठे लम्हों से भरी जिंदगी हर पल एक नया अनुभव देती जिंदगी . परिचय :- लखन लाल यदु अभिभाषक जन्मतिथि : ७.८.१९५८ निवास : दुर्ग छत्तीसगढ़ आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां,...
हम सबका भला होगा
लघुकथा

हम सबका भला होगा

डॉ. अपराजिता सुजॉय नंदी रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** आज सुबह ही खबर मिला कि रमा की मौसी अब नहीं रही। मां के जाने के बाद रमा के लिए एक मौसी ही तो थी उसकी पूरी दुनिया, उसके अलावा रमा के पास था ही कौन। रमा का तो रो-रो कर बुरा हाल हो गया। खबर मिलते ही सीमा भी पहुंची, जाकर देखी कि लोगों का आना-जाना लगा हुआ था। एक ओर कुछ लोग दुखी भाव से कह रहे थे कि रमा की मौसी को हार्टअटैक आया था, घर में तनाव भी था, बीपी का दवाई भी तो लेती थी। तो दूसरी ओर कुछ लोग अर्थी सजाने की तैयारी में थे, वहां एक पंडित भी अर्थी के पास खड़े होकर कुछ समझा-बुझा रहा था। एक और पंडित पंचांग निकालकर कुछ देख रहा था गणना कर रहा था। पैर के पास परिवार के कुछ लोग बैठे थे। पंडित जी ने कहा मौसी को कोई दोष लगा है जो घर के लिए अपशगुन होगा। इससे बचने के लिए पूजा-अर्चना करवानी पड़ेगी करीब ११००० रुपए तो दक्षिणा ही होगी। पूज...
वेदना
कविता

वेदना

शरद सिंह "शरद" लखनऊ ******************** टूटे अरमानो का जबाब कौन देगा? जो बिखरचुका उस दिल के, टुकडो का हिसाब कोन देगा? ख्वाबो के हसीन नजारो के, बिखरने का हिसाब कौन देगा? पल पल जो अश्क बहाये.. उन अश्को कााहिसाब कोन देगा? जो भूल गयी गिनते गिनते रातो को... उन तारो का हिसाब कौन देगा? चाद भी रोया था जब मेरे साथ साथ उस कृन्दन का जबाब कौन देगा? होठोपे कभी जो आ न सकी.. उन मुस्कानो का जबाब कौन देगा? कौन देगा कौन देगा? कौन देगा कौन देगा? . परिचय :- बरेली के साधारण परिवार मे जन्मी शरद सिंह के पिता पेशे से डाॅक्टर थे आपने व्यक्तिगत रूप से एम.ए.की डिग्री हासिल की आपकी बचपन से साहित्य मे रुचि रही व बाल्यावस्था में ही कलम चलने लगी थी। प्रतिष्ठा फिल्म्स एन्ड मीडिया ने "मेरी स्मृतियां" नामक आपकी एक पुस्तक प्रकाशित की है। आप वर्तमान में लखनऊ में निवास करती है। आप भी अपनी कविताएं, कहा...
दूर मुझसे न जा
ग़ज़ल

दूर मुझसे न जा

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़ज़ल - २१२ २१२ २१२ २१२ अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन दूर मुझसे न जा वरना मर जाऊँगा। धीरे-धीरे सही मैं सुधर जाऊँगा।। बाद मरने के भी मैं रहूंगा तेरा। चर्चा होगी यही जिस डगर जाऊँगा।। मेरा दिल आईना है न तोड़ो इसे। गर ये टूटा तो फिर मैं बिखर जाऊँगा।। नाम मेरा भी है पर बुरा ही सही। कुछ न कुछ तो कभी अच्छा कर जाऊँगा।। मेरी फितरत में है लड़ना सच के लिए। तू डराएगा तो क्या मैं डर जाऊँगा।। झूठी दुनिया में दिल देखो लगता नहीं। छोड़ अब ये महल अपने घर जाऊँगा।। मौत सच है यहाँ बाकी धोका निज़ाम। सच ही कहना है कह के गुज़र जाऊँगा।। . परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने...
तकदीर
ग़ज़ल

तकदीर

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** नज़रे इनायत हो तो तकदीर संवर जायेगी आँखों के आईने में ये सूरत निखर जायेगी इक दफा जो दूर से तू पुकार ले मुझको जिस्म से फना होती रूह भी ठहर जायेगी इस तरह से न देख शोख नजरों से मुझको मेरी सांसो की चलती रफ्तार सुधर जायेगी कभी तो पेश आ गुलों की तरह मेरे हमनवा संग तेरे खारों की चुभन भी ईश्क़ कर जायेगी जब भी रिश्तों का ताना बाना खुल जायेगा घर के आँगन में फिर उदासी भर जायेगी इन्तजार में तेरे खुद को काँधे पे लिये बैठी हूँ इश्क के इस अंजाम से मौत भी डर जायेगी दिल पर लगी हुई चोट भी यकीनन गहरी है तसव्वुर से तेरे "मधु" लम्हा लम्हा भर जायेगी . परिचय :-  मधु टाक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
ये वक़्त गुजर जाएगा
कविता

ये वक़्त गुजर जाएगा

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** उदास ना हो ये मुसाफिर के धीरे-धीरे सब सवंर जाएगा। चिंता ना कर इस बुरे वक़्त की ये भी कल गुजर जाएगा। सुख-दुःख तो मेहमान है, आते और जाते रहेंगे। हँसते रहना तुम सदा, रुलाने वाले रुलाते रहेंगे। कर मेहनत हासिल हो मंजिल चेहरे का रंग निखर जाएगा। चिंता ना कर इस बुरे वक़्त की ये भी कल गुजर जाएगा। खुश रहना तू हर घड़ी, दुःख से बहुत ही दूर है तू कर परख पहचान अपनी, हीरे से बढ़ कोहिनूर हैं तू भूल जा इन गुजरे पल को, आने वाला कल बेहतर जाएगा। चिंता ना कर इस बुरे वक़्त की ये भी कल गुजर जाएगा। करके मेहनत इस जग में, ऊँचा नाम कामना तूम चेहरे पे खुशियां हो और मेहनत की रोटी खाना तुम अच्छे कर्म करोगे तब चेहरे का रंग निखर जाएगा। चिंता ना कर इस बुरे वक़्त की ये भी कल गुजर जाएगा।   परिचय :- विशाल कुमार महतो, राजापुर (गोपालगंज) आप भी अपनी क...
आधुनिकता
लघुकथा

आधुनिकता

ममता रथ निवासी : रायपुर ******************** सीमा का मन आज बहुत उदास है, पति राजेश के बार-बार समझाने पर भी वो समझ नही रही की उसकी इकलौती बेटी उसे तुक्ष्छ मानती है । आज सीमा की बेटी मिताली के दोस्त घर आए थे। सीमा के व्यवस्थित घर व खाने की सभी ने खूब तारीफ की, सीमा ने भी कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी ,पर बात जब अंग्रेजी भाषा बोलने की आई तो सीमा मात खा गई। दोस्तों के जाते ही मिताली मां पर बरस पड़ी, पता नहीं आज के ज़माने में आप जैसे पिछड़े लोग कहा से आ गए हैं, मेरे दोस्त क्या सोच रहे होंगे। मन्नतो के बाद मिली बेटी पर नये जमाने का रंग चढ़ गया था। रात कटनी थी कट गई। मिताली अपने विश्वविद्यालय जल्दी चली गईं, सीमा भी काम में व्यस्त हो गई। मीताली कल की बात से दुखी हो सभी से नजरें चुरा रही थी। आज विश्वविद्यालय में बहुत भीड़ थी, आज कवि सम्मेलन था। सभी मंच के पास पहुंच गए। मंच पर अपनी मां को देख कर मिताल...
भारत की ललकार
कविता

भारत की ललकार

डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर (म.प्र.) ******************** खून खौलता रणवीरों का, आँख दिखाना बंद करो। सबा करोड़ भारतीय हैं हम, जयचंदों तुम डरा करो। बाँसठ वाला देश नहीं है, बच्चा बच्चा राणा है। अवसर पाते मिट जायेंगे, प्रण हम सबने पाला है। खुद में तू महामारी है, चौतरफ़ा है घिरा हुआ। श्वान सरीखे भौंकों मत, मन से तू है मरा हुआ। पिल्ला भी तो भौंक रहा है, भूख उसे अधमरा किये है। दुनिया भर के चाट कटोरे, मुँह वो अपना सड़ा किये है। सिय के पीहर वालो तुम, भूल गए उपकारों को। रामचंद्र की शक्ति को, और धनुष बाण प्रहारों को। शिव की कृपा नमो की ताक़त भूल नहीं तुम पाओगे। जब भी संकट तुम पर आये, हर जगह हमीं को पाओगे। बिजू की ललकार यही है, नव भारत से डरा करो। बदल चुका है देश हमारा, नहीं बखेड़ा खड़ा करो।   परिचय :- डॉ. बी.के. दीक्षित (बिजू) आपका मूल निवास फ़र्रुख़ाबाद उ.प्र. है आपकी शिक्षा कानपुर में ग्रहण की ...
मोहे देखन दे
गीत

मोहे देखन दे

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** मोहे देखन दे असीघाट को गए छोड़ गोस्वामी जी, जाने गए वो किधर ढूंढे सबकी नजर, मोहे देखन दे, गुरु महिमा देखन दे पहली बार श्री कबीर दास जी ने काशी (लहर तालाब) में लिया अवतार हो... ऐकश्र्वरवादी विश्व में फैले ऐसा किया विचार हो... ईश्वर एक है दूजा न कोए जाना सब संसार ऐसा हुआ उदगार मोहे देखन दे, गुरु महिमा देखन दे... दुसरी बार श्री तुलसीदास जी ने जग में अवतार हो... सपना जो स्वामी जी का था उसको किया साकार हो... रामचरितमानस सबके सनमुख आये जाना सब संसार ऐसा हुआ उदगार मोहे देखन दे, गुरु महिमा देखन दे... तीसरी बार श्री घासीदास जी ने जग में लिया अवतार हो... सर्वधर्म - समभाव विश्व में फैला ऐसा किया प्रचार हो जाना सब संसार मोहे देखन दे गुरु महिमा देखन दे...   परिचय :-  खुमान सिंह भाट निवासी : रमतरा, बालोद, छत्तीसगढ़ आप भी अपनी ...
सूखती घास
कविता

सूखती घास

वचन मेघ चरली, जालोर (राजस्थान) ******************** अरे! ओ घमंड़ी बादल। तू हो तो न गया पागल। सब लगाएं तेरी आस। देखो ये सूखती घास।। तू सबसे निराला है तेरा वर्ण काला है जीवन का रत्न खास। देखो ये सूखती घास।। मेघ जलद घन तेरे नाम बिन तेरे बने न कोई काम तेरी अनुपस्थिति सबको अहसास। देखो ये सूखती घास।। बहुत बरसे तो अतिवृष्टि कम बरसे तो अनावृष्टि दोनों से होता विनाश। ये देखो सूखती घास।। जोर जोर से गरजता है फिर भी नहीं बरसता है लोगों का टूटता विश्वास। देखो ये सूखती घास।। महीना जब आता है सावन का लगता बहुत मनभावन का साजन नही सजनी के पास। देखो ये सूखती घास।। सबको तू तरसाता है बहुत कम जल बरसाता है मिटती नही इससे प्यास। देखो ये सूखती घास।। जब सावन ही जाए सूखा कैसे रहें कोई प्यासा और भूखा करने लगे लोग प्रवास। देखो ये सूखती घास।। जिस जिस ने बीज बोएं बाद में पछताएं और रोएं फसलो का होता हृास। देखो ये ...
वह यादें
कविता

वह यादें

दीपाली शुक्ला कसारडीह दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** वह यादें....... ठहरी हुई है रफ़्तार आज सामने वाली सड़क में, पर वह तो मुझे उन गहराइयों से मिलने बुलाती है, वह यादें समंदर से बनी है या समन्दर यादों से पता नहीं, उथल पुथल तो इसलिए मची है कि वह जरिया किसे बनाती है कभी तहरीर की नाव मुझे मंज़िलों तक पहुंचाती है, तो कभी तस्वीरों की उड़ान सीधे वहां छोड़ जाती है, कभी पतंगों के धागे के साथ चढ़ जाती हूँ, तो कभी आंसुओं की धार में ही दूर बह जाती हूँ, कभी धुल भरी साईकल स्कूल छोड़ने जाती है, कभी मिटटी की खुश्बू कागज के नाव बनाती है, कभी वो गुड़िया उन गर्मियों में ले जाती है, तो कभी गर्मियाँ उन खिलौनों की बात बताती है, कभी पुरानी किताब के अन्दर से दुनिया पाती हूँ, कभी उसके भीतर सालों बिताकर घंटों में लौट आती हूँ, कभी उन यादों को मुझ जैसा पाती हूँ, तो कभी उसका जादुई ताज पहन कायनात से खो जाती हूँ...
नदी
लघुकथा

नदी

रंजना फतेपुरकर इंदौर (म.प्र.) ******************** हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में पंचम विजेता (प्रोत्साहन) रही लघुकथा गुनगुनाती, छलछलाती नदी की अथाह जलराशि की एक-एक बूंद उमंग से थिरक रही थी। नदी की धाराओं में संगीत और नृत्य का अद्भुत मेल था। सागर में अपना अस्तित्व विलीन करने की सुखद अनुभूति से वह अभिभूत थी। कभी वह किनारे के सुगंधित, रंगबिरंगे पुष्पों की कोमल पंखुरियों को और कभी विशाल वृक्षों से लिपटी लताओं को अपनी फुहारों से भिगो रही थी। प्राची की अरुणिमा ने अपने प्रतिबिम्ब से जैसे नव-वधु सी नदी को लाल चूनर ओढ़ा दी थी। आज नदी सारी बाधाओं को पार कर अपने आराध्य प्रियतम, सागर से मिलना चाहती थी।कभी इस मोड़ पर झूमती, कभी उस मोड़ पर नाचती नदी बही जा रही थी। लेकिन नदी जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही थी, उसकी काया क्षीण होने लगी। नदी की धड़कनों की गति धीमी होने...
घर वापसी
लघुकथा

घर वापसी

जितेन्द्र गुप्ता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में चतुर्थ विजेता (प्रोत्साहन) रही लघुकथा "अरे चलो, चलो जल्दी!" हंसते खिलखिलाते वे किशोर फटाफट अपने बेग्स लेकर उस एसी बस में चढ़ने लगे! सबके सब दुसरे स्टेट के रहने वाले थे और पढ़ाई के लिए इस शहर में रह रहे थे मगर महामारी के कारण लगे लॉक डॉउन में फंस गये थे। इनकी सुरक्षित घर वापसी हेतु एसी बसें लगाई गई थी। उनको रास्ते में खाने हेतु लंच पैकेट और पानी बोतलें भी थी। सभी हंसते, बतियाते, जा रहे थे। "अरे, देखो, देखो जरा!" सुमित ने जोर से कहा। पचासों पुरूष, महिलाएं सामान उठाये और बच्चों को गोद में या कंधे पर बैठाये सड़क किनारे-किनारे चले जा रहे थे। पसीने से लथपथ, थके-थके...। "बेचारे......." उनमें से एक किशोर अकड़ से बोला, "अरे मेरे पापा ने तो अपनी युनियन के द्वारा एड़ी च...
समीकरण
लघुकथा

समीकरण

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में तृतीय विजेता रही लघुकथा "मां, मैं भी कॉलेज जाऊंगी, मैं आगे पढ़ना चाहती हूं" बेटी ने अपना निर्णय सुना दिया। "नहीं, जितना पढ़ना था, पढ़ चुकीं" मां ने कहा। "इसे कौन सा डॉक्टर या इंजीनियर बनना है, शादी के बाद, चूल्हा ही तो फूंकना है, उस के लिए १२ वीं तक कि पढ़ाई काफी है", भैया ने अपनी समझदारी झाड़ी, जो सोफे पर मां के पास ही बैठा था। "क्यों, मैं इंजीनयर क्यों नहीं बन सकती? मैं ने गणित विषय लिया है। मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक है" बेटी ने रुआंसे से स्वर में कहा। "और आप लोग हैं कि मुझे पढ़ने देना ही नहीं चाहते। मां तो पुरानी पीढ़ी की हैं, उन का ऐसा सोचना स्वभाविक है, भैया, पर तू तो नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है, फिर भी तू उन्हीं के पक्ष का समर्थन करता ह...
मजदूर दिवस
लघुकथा

मजदूर दिवस

ललित समतानी इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में द्वीतीय रही लघुकथा पूरे देश में लाक डाउन के कारण आज भी मजदूर चौक पर अभूतपूर्व सन्नाटा पसरा हुआ है। शहर में चारों और श्मशान जैसी शान्ती पसरी हुई है। न कोई ठेकेदार मजदूरों को लेने के लिए आया है और न कोई कारीगर मजदूरी के लिए आया हुआ है। दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं है कि, इस माह भी लाॅकडाउन समाप्त होगा। दूरदर्शन पर आज मुख्यमंत्री का एक मई 'मजदूर दिवस' पर सन्देश प्रसारित हो रहा था। मुख्यमंत्री कह रहे थे कि, 'कोई मजदूर उनके राज्य में भूखा नहीं रहेगा। सरकार सभी की देखभाल कर रही है।' राम सिंह ने जब मुख्यमंत्री का यह भाषण सुना तो, वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा, "सरकार तो यह सोच रही है कि, मजदूरों के घर में खजाना गड़ा है। यह नहीं जानते कि दिन भर मेहनत करने पर शाम की रोटी आती ...
पुरवाई
लघुकथा

पुरवाई

श्रीमती अंजू निगम जाखन, (देहरादून) ******************** हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में प्रथम विजेता रही लघुकथा "अरे !!! रमेसी!! कब आया सहर से?" काका की आवाज खुशी से चमक रही थी। "आये तो पंद्रह दिनो से ऊपर हो गये। पर यहाँ आये के पहले, वो नजदीक का अस्पताल वाले धर लिये। वही चौहद दिनो का वनवास काट के कल ही गाँव आये गये रहेन। सोचे खेतो की तनिक सुध ले लूँ।" "अच्छा हुआ भईया, जो खेत बेच के न गये। कौनो ठौर तो रही अब। बढ़िया किये जो वापसी कर ली।" "हाँ कक्का!! खाने रहने सब का जुगाड़ खतम हो गया था। परदेस में कोई हाथ थामने वाला न बचा। सोचे, मरना ही हैं तो अपनो के बीच मरे। कोई मिट्टी देने वाला तो हो।" "ऐसा असुभ न निकालो रमेसी। तुमको मालूम, तुम्हारे बाद कितना लड़कन सहर की ओर भाग गये रहे। आधा गाँव खाली हुई गया था। तुम भी तो पलट कभी गाँव का सुध न लियो। चलो, अब धीमे...
उपन्यास : मै था मैं नहीं था भाग : १६
उपन्यास

उपन्यास : मै था मैं नहीं था भाग : १६

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** मेरी दूसरी कक्षा की परिक्षाएं ख़त्म हो चुकी थी। कक्षा में मेरा पहला क्रमांक आया था और मैं पढाई में एक पायदान ऊपर तीसरी कक्षा में पहुच चुका था। अब मैं सिर्फ अपने पिता के ग्वालियर आने का इन्तजार कर रहा था। इसी बारे में सोचता रहता। इसके अलावा कही भी मेरा मन ही नहीं लगता। यहां इस घर में मेरी नानी कई दिनों से मेरे नाना के पीछे लगी थी कि उन्हें परीन्छा की यात्रा करने की बहुत इच्छा है। वहां निम्बालकर की गोठ में स्थित अन्ना महाराज के गुरु सरभंगनाथ महाराज का मंदिर था और हर वर्ष चैत्र महीने में वहां होने वाले उत्सव में सैकड़ो भक्त श्रध्दा और भक्ति से दर्शन हेतु जाते। काकी ने बताया मुझे कि एक बार नानाजी की तबियत बहुत खराब हो गयी थी, बचने की उम्मीद नहीं थी उस वक्त नानी ने मन्नत मांगी थी और प्रण किया था कि नानाजी की तबियत ठीक होने के बाद एक बार वह पर...
मैं ही मैं हूं
कविता

मैं ही मैं हूं

जितेंद्र शिवहरे महू, इंदौर ******************** मैं महान हूं मुझे समझना होगा तुम्हें अपने अभिमान को परे रख मेरी हर बात सुनो तुम तुम क्या हो? मेरे आगे तुम्हारी कोई अस्तित्व नहीं मेरे आगे मेरी धन-वैभव-संपदा को देखो तुम्हारे पास भी होगा सबकुछ किन्तु मेरे जितना नहीं इन प्रसाधन की गुणवत्ता और मात्रा तुमसे कहीं अधिक है मेरे संसाधन आलौकिक है इन्हें साष्टांग प्रणाम करो मेरा घर, घर नहीं एक महल है तुम्हारे पास भी होगा किन्तु मेरे जितना भव्य नहीं तुम्हारी राय का कोई मुल्य नहीं तुम्हारी में कभी नहीं सुनूंगा मेरा ज्ञान सर्वज्ञ है तुम जानते ही कितना हो? तुम्हारा ज्ञान शुन्य है मेरे आगे मेरी महत्ता सार्वभौमिक है तुम नगण्य हो तुम शून्य हो और मैं अनंत मेरी संतान ही संसार का कल्याण करेगी क्योंकी वो मेरा अंश है इसलिए वो भी महान है उसका किसी से कोई मुकाबला नहीं वो सर्वशक्तिमान है मेरी तरह वह भी प्रार्थनीय...
जिंदगी की जद्दोजहद
ग़ज़ल

जिंदगी की जद्दोजहद

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** अभी तो जिंदगी की सुबह हुई ही है। फिर क्यों मै बहुत दूर नजर आया। अभी तो मुश्किलों से पीछा छूटा ही था। फिर सामने कोरोना नजर आया। वतन से मुहब्बत की थी या पलायन का अफसोस। मुझे हर मजदूर घर लौटता नज़र आया। दुनिया इमारतों की तरफ देखती रही। मुझे उसके पांव का छाला नज़र आया। जिदंगी डर है, मायूसी है, संघर्ष है, वीरानी है। पहली बार हर इंसान बेबस नज़र आया। माफ़ कर सकता है तो कर दे मुझ। मै खुदगर्ज हूं ये अब नज़र आया। तू ना लौटा तो क्या होगा मेरा ? मै इस बोझ से दबता नज़र आया। मै तेरी सुरक्षा की हर कोशिश करूंगा। बहुत देर से सही पर अब नज़र आया। भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। यही सोचकर वो शहर वापस आया।   परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शिक्षा :- एम. फ़िल. (हिन्दी), एम. ए. (हिंदी), विशारद (कंठ संगीत) रुचि :- कविता, लेख, लघुकथा लेखन, पंजाबी पत्रिका ...
आवश्यक कार्य
लघुकथा

आवश्यक कार्य

नीलेश व्यास इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** ”रुको भैया”..... ! यह आवाज सुनकर मुक्तिधाम के कर्मचारी उस समय ठिठक गये जब वह कोराना की वजह से मरने वाली एक महिला का अन्तिम संस्कार करने जा ही रहे थे, चारों व्यक्तियों ने पास आकर बताया कि यह उनकी माँ है। ”हम समय पर आ गये” चारों के मुख से बोल फुटे। फिर उन्होंने यह कहकर कि हमें अति आवश्यक कार्य करना है मृतक के पास जाने की अनुमति प्राप्त कर ली, उन्हें अत्यन्त दुखी देख, कर्मचारी भी भावुक हो गये ओर यह विचार कर की कोरोना पीड़ित को छुना तो दुर कोई देखना भी पसंद नहीं करते, यह माँ कितनी भाग्यशाली कि चारों पुत्र श्रद्धाजंली देने, मुख में जल डालने के लिये अपनी जान पर खेल कर आये है, पर यह क्या उन चारों ने फटाफट शव का कव्हर खोलकर शव के पहने गहने उतार लिये, फिर कर्मचारीयों से कहा कि ”भैया हमारा काम तो हो गया, अब आप...
गुरु वंदना
गीत

गुरु वंदना

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** गुरु तो ईश्वर का साकार रूप होता है अंधाररुपी जीवन में प्रकाश पुंज होता है! गुरु की वाणी में रहती छिपी प्रखर ज्ञान, प्रज्ञा ज्ञान की चिंगारी! गुरु की कृपा मात्र से यह नश्वर जीवन अमर शाश्वत बन जाता! इस अलौकिक जीवन की यात्रा- अति-सरल सुगम बन जाता! गुरु अंदर की-दिव्यता को- जगा कर इस जीवन पथ को आलोकित कर जाता! निज पशुता को भगाकर दिव्य चेतना लाता मनुज मात्र के लिए उज्जवल प्रकाश पुंज फैलाता! सदियों से है गुरु कृपा की अनेकों दिव्य कहानी! महामूर्ख कालीदास सदृश एक दिन 'महाकवि' बन जाता! महान योद्धा अशोक सम्राट बौद्ध भिक्षुक बन जाता! 'आर्यभट्ट' ब्रह्मांड के ज्ञाता कोई 'कणाद' सदृश्य अनु ज्ञाता बन जाता! कोई चाणक्य कृपा को पाकर महान सम्राट बन जाता! मैं मूरख भी निश-दिन गुरु वंदना गाता! . परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम...
फिर आगोश में तुमको मिलेगी
कविता

फिर आगोश में तुमको मिलेगी

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** धुआँ-धुआँ हर तरफ धुआँ, किस ग़म ने यूँ तुम्हें छुआ। अंधियारे में सिमट गये तुम, नशे की सोहबत बना धुआँ। मत डूबो स्याह समंदर में, बस टूट गया दिल इसी बहाने। प्रखर रश्मियाँ आ बैठी हैं, शिविर तिमिर का दूर हटाने। इस धुयें की गर्त को अब तो नकारो, धूप फिर आगोश में तुमको मिलेगी। भले ना पथ अनुकूल मिले, पर आशा के तो फूल खिलें। धूल धूसरित स्वेद लपेटे, अब कितने भी शूल मिलें। ये सफ़र ऐसा कि जिसमें, खुद का चलना बड़ा जरूरी। अपने पास ही तो जाना है, खुद से ही कम करना दूरी। तुम भी थोड़ा इसी पंथ की बाट निहारो, धूप फिर आगोश में तुमको मिलेगी। यह अनुभूति बड़ी अनूठी, यूँ ही पास नहीं आयेगी। पहले ये तुम्हें छकायेगी, कदम-कदम अजमायेगी। वीतराग करने को प्रेरित अंतर्मन अनल जलायेगी। फिर देगी वह अपनी प्रतीति, और तुमको गले लगायेगी। तुम मन से तो उसका नाम पुकारो, धूप फ...
अपने हुए पराये
कविता

अपने हुए पराये

डॉ. प्रतिमा विश्वकर्मा 'मौली' आमानाका कोटा रायपुर (छत्तीसगढ) ********************** जी भर के देख भी ना पाये प्यार की इन्तहा क्या सुनाये रहे मझधार साहिल ना पाये नाखुदा ने खूब याराने निभाये तूफ़ान दिल में इतने दबाये जलजले बने अपने हमसाये चले साथ कभी मिल न पाये तासीर दो किनारों सी लाये सितम गैरों के क्या बताये जब अपने हुए हैं सब पराये .... . परिचय :-  डाँ. प्रतिमा विश्वकर्मा 'मौली' जन्म : २० अप्रैल माता : श्रीमिती रामदुलारी विश्वकर्मा पिता : श्री रामकिशोर विश्वकर्मा निवासी : आमानाका कोटा रायपुर (छत्तीसगढ) शिक्षा : ऑनर्स डिप्लोमा इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (एक वर्षीय कंप्यूटर डिप्लोमा) बी. एड., एम. ए.(भूगोल), एम. फिल. (नगरीय भूगोल), पी-एच. डी.(कृषि भूगोल)। प्रकाशन : राष्ट्रीय एवं अंतरास्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं एवं पुस्तको में शोध-पत्रों का प्रकाशन, जनसंदेश समाचार पत्र मध्यप्रदेश, दैनिक भास्कर , ...