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चल मेरे साथी
कविता

चल मेरे साथी

संजय कुमार साहू जिला बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** चल मेरे साथी, दुनिया की सैर करते है, मोहब्बत की इस दुनिया में मिटाते सारे बैर चलते हैं, नवजीवन के एहसासों में, विश्वबन्धुत्व को पसारने अपने पैर देते हैं ।। चल मेरे साथी दुनिया की सैर करते है....... शाहजहां ने जैसा ताजमहल बनाया, अपनी मोहब्बत दीवारों पर लिखवाया , कुछ ऐसा ही हम करने चलते है , जीवन के महल में संगमरमर रूपी भाईचारा साथ लेकर चलते हैं।। चल मेरे साथी दुनिया की सैर करते हैं... चलो देखे सुंदरवन , पशु पक्षी के निरव रुदन, इंसान नहीं तो जानवर से ही कुछ सीख लेने चलते है मधुर मिठास हो इस जीवन में, बीज ऐसा अंकुरित करते चलते है।। चल मेरे साथी दुनिया की सैर करते हैं.... देखते है विशाल हिमालय को, अपने गर्भ में कईयों जीवन पालता है, काले, भयंकर मेघ के आगे छाती ताने खड़ा रहता है, दुनिया को कहता सीख मुझसे सभी परिस्थितियों में खड़...
अपनी जड़ें खोदते हैं
कविता

अपनी जड़ें खोदते हैं

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** समर्पित- अंधी पश्चात्य संस्कृति के अश्व पर आरूढ़ भारतीय परिवेश को। हैसे  वर्तमान की यही वेदना मानव मानवता दूर हुई। अनुभव में  यही की आज सभ्यता दृष्टिभूतढेर हुई।। कल संम्पत्ति थे मात पिता उनकी सेवा ही प्यारी। और आज दे रहा बेटा है अपने ही पता की सुपारी।। पतियों से ज्यादा बाॅयफ्रेण्ड अब पत्नी जी को भाते हैं। पत्नी की साड़ी से अच्छी गर्लफेण्ड के वस्त्र लुभाते हैं।। बस कुछ पैसों का आ जाना घर में कुत्ते पल जाना है। कुछ बुरा तो नहीं पर इसपर काहेका उतराना है? इस फोरव्हिलर की दुनिया में साइकल का कहां ठिकाना है? भूले भक्ति अरु दान पुण्य तीरथ में खूब उड़ाना है।। रोगों से छुब्ध देह किंतु मौजों में समय बिताना है। असमय मृत्यु की ओर बढ़े पर चुभता पूर्व जमाना है।। पैदल चलने वाला तो अपनी किस्मत को गरियाता है! ...
मैं और हम
कविता

मैं और हम

उषा शर्मा "मन" बाड़ा पदमपुरा (जयपुर) ******************** मैं और हम में बस इतना फर्क है, मैं अहम् को अपनाता है और हम अहम् को धिक्कारता है। मैं और हम में बस इतना फर्क है, मैं अपनेपन में जीवन चाहता है और हम अपनापन में जीवन देखता है। मैं और हम में बस इतना फर्क है, मैं संकीर्णता में सोचता है और हम व्यापकता की ओर बढ़ता है। मैं और हम में बस इतना फर्क है, मैं स्वयं के लिए जीना चाहता है और हम अपनों के लिए जीवन मांगता है। मैं और हम में बस इतना फर्क है, मैं को जानने वाला कोई नहीं रहता और हम में पूरा जगत् समा सकता है। मैं और हम में बस इतना फर्क है, मैं स्वयं से बंधे रहना चाहता है और हम सबके संग बसना चाहता है। . परिचय :- उषा शर्मा "मन" शिक्षा : एम.ए. व बी.एड़. निवासी : बाड़ा पदमपुरा, तह.चाकसू (जयपुर) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्र...
बदनाम गली
लघुकथा

बदनाम गली

जीत जांगिड़ सिवाणा (राजस्थान) ******************** हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित लघुकथा लेखन प्रतियोगिता हेतु प्रेषित की गई लघुकथा "अरे यार। मतलब हद है मुर्खता की। तुम वहां गये हो।" "गया तो कोई बात नहीं मगर इतना रिस्क कौन लेता है।, " सभी जाते हैं। तुम नहीं जाते क्या?" "जाता हूँ मगर इन महाशय की तरह पैसे बाँटने नहीं।" "खैर इनको दस बीस हजार से क्या फर्क पड़ता है? महीने भर की ही तो सेलेरी थी।" "और जब तुमको साथ चलने को कहा था तब तो तुम्हें बड़ी शराफत चढ़ रही थी।" दोस्तों द्वारा की जा रही सवालों की इस बारिश के बीच रणजीत सहमा हुआ खड़ा था। "तुम लोगों को साथ चलना हैं तो चलो वरना मना कर दो और वैसे भी मुझे कोई शौक तो है नहीं पैसे बाँटने का। उसने कहा कि मुसीबत में हूँ, कल तक लौटा दूंगी। और उसके चेहरे से और उसके आंसुओ से पता चल रहा था कि वो जरुर किसी मुसीबत में है" रणजीत ने टोकते हुए कहा। "अच्छा। तुम्ह...
वक़्त
कविता

वक़्त

आकाश प्रजापति मोडासा, अरवल्ली (गुजरात) ******************** जीवन में सच्चाइयों दिखलाता है वक़्त। दुःखों में भी सुखों का और सुखों में भी दु:खों का अर्थ समझाता है वक़्त।। वक़्त की कोई सीमा नहीं होती। कोई आये या जाये उसे किसी की परवाह नहीं होती।। वो तो अपने आप में ही एक पहेली हैं। जान जाओ तो ठीक है वरना सबकी सहेली हैं।। वक़्त इंसान को यह सिखलाता हैं। अपना काम वक़्त पर कर लो, बाद में तू क्यों पछताता हैं।। वक़्त और कुदरत का तो पुराना नाता हैं। दोनों कब आये, कब गये कौन जान पाया हैं।। वक़्त पर अभी तक कोई पाबंदी नहीं लगा पाया हैं। जीसने भी यह कोशिश की है उसने अपनी मुश्किलों को बुलाया हैं।। परिचय :- आकाश कल्याण सिंह प्रजापति निवासी : मोडासा, जिला अरवल्ली, (गुजरात) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशि...
बचपन
लघुकथा

बचपन

मनीषा शर्मा इंदौर म.प्र. ******************** आज अचानक बहुत सालों बाद एक सहेली से बात हुई। बात क्या हुई, समझ लीजिए बचपन से मुलाकात हुई। वह बेफिक्रा बचपन ना जाने कहां खो गया। जिसमें ना कोई दुख था, ना परेशानी थी, ना जिम्मेदारी, न कड़वाहट थी। सभी तो अपने थे। वह गांव की गलियां जहां निडर होकर दिन रात घूमा करते थे। गांव में एक मंदिर था। जिसके हाल में गर्मियों की दोपहरे गुजरा करती थी। गांव के सभी लोग बच्चों से प्यार करते थे। गलतियां करने पर डांट भी देते थे। पर जब डांट पड़ती तो सोचते हम कब बड़े होंगे। जब हम बड़े होंगे तो कोई हमें नहीं डांटेगा। हमारे पास पैसे होंगे। हम कहीं भी अकेले घूमने चले जाएंगे। अपनी मर्जी के मालिक हो जाएंगे। जो चाहेंगे वही करेंगे। ना कोई रोकने वाला होगा ना कोई टोकने वाला। किंतु तब कहां पता था, कि बड़े होना क्या होता है? जैसे-जैसे हम बड़े होते गए वैसे वैसे हमारी छोटी-छोटी पर...
जिंदगी
कविता

जिंदगी

सौरभ पांडे सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** सोच कर बैठ जाती है आंखें देख उसे, बातों बातों खुश हो जाता दिल सोच कर उसे। वक्त नहीं खराब किस्मत मेरी है खराब, शायद दिल बद्दुआ ना दे इसलिए पी लेता हूं शराब। पत्थर से टकरा जाता है सिर मेरा, दोष किसी और को क्यों दूं जो नहीं है अपना। क्या चाहती हो जिंदगी मुझे तुम बता दे, समय नहीं मेरे पास समय से पहले समझा दे। दुख के आंसू पी जाएंगे, मौत आने से पहले, मुझे कोई दर्द नहीं होगा तेरे जाने के बाद। . परिचय :- सौरभ पांडे शिक्षा : बी टेक एग्रीकल्चर के साथ योगा में डिप्लोमा निवासी : सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : सिंचाई विभाग प्रकाशन : बालहंस सुमन सौरभ जोश जागरण नंदन आदि पत्रिकाओं में अपने लेख के साथ-साथ समाज सेवा के साथ विभिन्न अवार्ड एवं सम्मान प्राप्त शपथ : मेरे द्वारा लिखी गजल पूर्णता अप्रकाशित है एवं सभी जानकारी पूर्णता सत्य है अ...
आंसू
कविता

आंसू

अर्पणा तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नयनों का श्रंगार हुए हैं जब, खुशियों का संदेश सुनाते हैं। दृग कोरो का भार हुए हैं जब, व्यथा हृदय की बतलाते हैं। झरते है मोती बन कर नैनो से, जाने कितने शोक मिटाते हैं। मन की सीपी के मोती है जो, यदा कदा अखियों में लहराते है। पीड़ा की अभिव्यक्ति है आंसू, बहकर मन निर्मल कर जाते है। खुशियों का उपहार भी आंसू, अधरों की मुस्कानों संग आते हैं। पावनता का पर्याय बने है आंसू, इसीलिए गंगाजल कहलाते हैं। . परिचय :- अर्पणा तिवारी निवासी : इंदौर मध्यप्रदेश शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में ट...
इश्क़ की पाकीज़गी
ग़ज़ल

इश्क़ की पाकीज़गी

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** बिछड़ कर वो मुझे अभी भूले नही होंगे खतों को भी मेरे यूँ हीं जलाये नहीं होंगे इश्क़ की पाकीज़गी को न समझा कोई हीर रांझा के फिर अब किस्से नहीं होंगे ताउम्र गुजार दी है सितारों को गिनकर रात भर वो मेरी तरह जागते नहीं होंगे तस्सवुर से तेरे मुक्कदर की चादर बुनी गर्दिश में मेरे कभी यूँ सितारे नहीं होंगे दुआ रब से तुझे अब मंजिल मिल जाये तेरे कदमों के तले कभी छाले नहीं होंगे मिटा दे दिलों में जो रंजिशे मजहब की फिर कोई भी जमाने में पराये नहीं होंगे भंवरों सा तेरा हर फूल पर मचलना कैसा मोहब्बत के कभी सलीके सीखे नहीं होंगे शक के दायरे में इश्क़ पनप नही सकता बोई है नागफनी गुल वहाँ महके नहीं होंगे मुस्कुराहट वो जादू है जो दिलों को है जोड़ती सूखे दरख़्तों पे तो परिन्दे भी टिकते नहीं होंगे नदिया के सीने पर जो लहरों की है खामोशी अपने ही हिस्से के ...
दिवास्वप्न
कविता

दिवास्वप्न

सरिता देराश्री पिपलोदा, रतलाम, मध्य प्रदेश ******************** जीवन एक दिवास्वप्न सा है, खुली आंखों से देख कर भी, सब कुछ अनदेखा सा है। जीवन एक दिवास्वप्न सा है।। मचलती आशाएं, बहती भावनाएं, पल-पल निश्चल झरने सा है। जीवन एक दिवास्वप्न सा है।। दर्द है, तड़प है, वीरह है, फिर भी अल्हड़ बचपन सा है। जीवन एक दिवास्वप्न सा है। सुख-दुख, सम्मान और अरमान, कुछअधूरी कुछ पूरी उम्मीद सा है। जीवन एक दिवास्वप्न सा है।। कभी उतार-चढ़ाव कभी मोड़ है, कभी उलझन कभी सुलझा सा है। जीवन एक दिवास्वप्न सा है।। ऊंचे पहाड़, गहरी घाटी, मैदान, सागर सा गहरा कभी चंचल सरिता सा है। जीवन एक दिवास्वप्न सा है।।   परिचय :-  सरिता देराश्री पति : मंगलेश देराश्री जन्म : ३/५/७९ शिक्षा : बी. एस . सी , एम . ए निवासी : पिपलोदा, रतलाम, मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फ...
कर्ज प्यार का
कविता

कर्ज प्यार का

ममता रथ निवासी : रायपुर ******************** सूरज की किरणें आई तो फूलों की पंखुड़ियों को खोला धरती का रस पी फूलों ने ये बोला कर्ज तुम्हारे स्नेह का वापिस किस्तों में देंगे हम खुशबु से अपने इस गुलशन को महकाते रहेंगे हम धीरे से मुस्कुरा कर धरती बोली बेटे बहुत बड़ी बात कही तेरी इसी सोच ने कर्ज प्यार का चुका दिया सभी तेरे ही कारण तो मुझे मिलता है रंग बिरंगे लिबास सभी   परिचय :-  ममता रथ पिता : विद्या भूषण मिश्रा पति : प्रकाश रथ निवासी : रायपुर जन्म तिथि : १२-०६-१९७५ शिक्षा : एम ए हिंदी साहित्य सम्मान व पुरस्कार : लायंस क्लब बिलासपुर मे सम्मानित, श्री रामचन्द्र साहित्य समिति ककाली पारा रायपुर २००३ में सांत्वना पुरस्कार, लोक राग मे प्रकाशित, रचनाकार में प्रकाशित आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्...
मुझे शर्म आती है
कविता

मुझे शर्म आती है

कंचन प्रभा दरभंगा (बिहार) ******************** कितने कितने फरेब देखे इस दुनिया के इस दुनिया के हालात पे मुझे शर्म आती है बादशाहत से जीने वाले वो बुजदिल ही होंगें उन बेदर्द बुजदिल-ए-हयात पे मुझे शर्म आती है कपड़ों से नहीं वो चमरी से चिथड़े पहने थे आलिशान महलों के सजाने पे मुझे शर्म आती है लाखों लाख बेघर जब भूखे बिलख रहे थे झूठी आस्था के उन खजाने पे मुझे शर्म आती है मंदिरों के नाले में बहा दी गई दुध की नदियाँ बेबस माँ के बिलखते लाल पे मुझे शर्म आती है सड़क पर भागती वो कार जब रोके न रुकी थी उस बेबस लड़की की बलात्कार पे मुझे शर्म आती है . परिचय :- कंचन प्रभा निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित  आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय ए...
कचरा गाड़ी
लघुकथा

कचरा गाड़ी

डॉ. स्वाति सिंह इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुम क्या सोचती हो? क्या होगा? सब कुछ ठीक होगा भी या नहीं? कब तक ऐसे ही चलता रहेगा, पता नहीं। ऊपर से वह कचरा गाड़ी में करोना का संदेश। बाप रे पूरा दिन खराब हो जाता है सुनकर। श्रुति को उसकी बातों में कोरोना का खौंफ साफ-साफ नजर आ रहा था। वह फिर भी बोली अरे सब कुछ सामान्य हो जाएगा। देखो चाइना पूरा खुल चुका है। तो हमारा देश क्यों नहीं। हालांकि श्रुति जानती थी कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाला देश, जहां न सुविधाएं हैं, न साधन। वहां क्या ठीक होगा। वह अंदर से बहुत डरी हुई थी। रोज के डरावने समाचार। ऊपर से ऑफिस वालों को इतने खौंफ में देखकर उसका मन डूबा जा रहा था। वह सोचने को मजबूर हो गई कि परिस्थितियां बहुत ही गंभीर हैं। उस दिन बात करने के बाद तो वह बहुत ही डरी हुई थी। रात को भी ठीक से सो नहीं सकी। अगले दिन घबराहट में वह जल्दी उठ गई और घर का काम...
आखरी पत्ता नहीं… बचा हुआ एक पत्ता यानि और पत्तों की उम्मीद…
गुण श्रेष्ठता, नैतिक शिक्षा, संस्कार

आखरी पत्ता नहीं… बचा हुआ एक पत्ता यानि और पत्तों की उम्मीद…

ज्योति जैन इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** https://youtu.be/VRRxrIyGRX0                           यूं तो मैं आम दिनों में भी अपनी पसंद के सारे काम कर लेती हूँ पर फिलहाल लॉकडाऊन में चूंकि बाहर नहीं जाना होता, सो और अतिरिक्त कार्य भी हो जाते हैं, जिनमें बागवानी भी शामिल है। इन दिनों माली भैया नहीं आ रहे सो पुराने सीज़नल पौधों के सूखते चले गमलों में नये रोपे लगाने बैठी थी। मुझे ध्यान आया कि पिछले दिनों चौकोर गमला माली ने एक ओर रख दिया था, ये कहकर कि उसकी वॉटर लिली सूखकर खत्म हो चुकी है। वो मेरा पसंदीदा पौधा है। वॉटर लिली ज़रा से में फैलकर अपने छोटे-छोटे गोल पत्तों से गमले की सुन्दरता और बढ़ा देती है। मैंने सबसे पहले वही गमला हाथ में लिया। वॉटर लिली सूख चुकी थी। पर ये क्या...! एक बिल्कुल नन्ही सी, गोल पत्ती उस सूखी मिट्टी से झांक रही थी। मैंने फौरन उसमें पानी डाला। पिछले दस द...
अभी तो सवेरा हुआ है
कविता

अभी तो सवेरा हुआ है

दर्शन लाड बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हर क़दम, हर पल, मत भाग हर जगह, हर राह को मत समझ अपना, निश्चित कर, संकल्प कर, अनुमान लगा, फिर देख खुशियों की बारिश, हर क़दम, हर पल, हर जगह, अभी तो सवेरा हुआ है थोड़ा ठहर... मत भाग हर राह पर एक साथ, हो जाएगी नफरत हर राह से एक साथ, मत बन अपनी नफरत का कारण, रुक जा...... अभी तो सवेरा हुआ है थोड़ा ठहर... मत भाग इतना कि ज़िन्दगी थम जाए, मत सोच इतना कि समय निकल जाए, क्यों कि....... जीतता वो नही जो तेज चलता है, जीतता वो है जो लंबे समय तक चलता है, अभी तो सवेरा हुआ है थोड़ा ठहर... हर मोड़ पर नई उम्मीद आयेगी, हर कदम पर नई राह आयेगी, हर अंधेरे में फिर एक प्रकाश होगा, हर हवा में खुशियों का पैगाम होगा, बस.... थोड़ा ठहर अभी तो सवेरा हुआ है थोड़ा ठहर.... अभी तो सवेरा हुआ है.... . परिचय :- दर्शन लाड निवासी : बुरहानपुर (म.प्र.) शिक्ष...
परत दर परत
लघुकथा

परत दर परत

राजकुमार अरोड़ा 'गाइड' बहादुरगढ़ (हरियाणा) ******************** किशना पूरे गांव में घूम-घूम कर अपनी माँ की सत्रहवीं में आने के लिये सबको कह आया था। कारज में देसी घी का खाना था। सफ़ेद चकाचक कपड़े पहने किशना गर्वित मुद्रा में सबका अभिवादन कर रहा था। ११ पण्डितों द्वारा पाठ पूजा व उनके भोजन करने के बाद गांव वालों ने खाना शुरु कर दिया था अभी दो ही घंटे बीते थे तभी गांव के सरपंच के पिता मेजर दरियाव सिंह जो फ़ौज में शहीद बेटे की विधवा बहु पोते पोती की देखभाल के लिय शहर में रहते थे आ गये, किशना के कंधे पर हाथ रख कर बोले अब माँ की सत्रहवीं पर इतना बड़ा आयोजन कर वाहवाही ले रहे हो, जब तुम सिर्फ ७ साल के थे, तुम्हारे पिता के रेल दुर्घटना में मरने के बाद, छोटी सी दुकान से तुम्हें पढ़ाया, काबिल बनाया। १२ साल तुम्हारी माँ कूल्हे की चोट का सही इलाज न होने के कारण घिसटती रही, यही पैसा जो आज तुम दिखावे में लुट...
कि वक्त ठहरा सा है
कविता

कि वक्त ठहरा सा है

अभिषेक खरे भोपाल (म.प्र.) ******************** कि वक्त ठहरा सा है जिंदगी फिर से मुस्कुराएगी धीरे-धीरे ही सही गाड़ी फिर पटरी पर आईगी मेहनत रंग दिखा रही है जिंदगी फिर से सबकी संभल जाएगी अभी अंधेरा बहुत घना है लेकिन सूरज को भी तो निकलना है। भरोसा रख अपने आप पर के जिंदगी फिर से दौड़ जाएगी। कि वक्त ठहरा सा है जिंदगी फिर से मुस्कुराएगी। . परिचय :- अभिषेक खरे सचिव - आरंभ शिक्षा एवं जनकल्याण समिति, भोपाल (म. प्र.) कोषाध्यक्ष - ओजस फाउंडेशन, भोपाल (म.प्र.) निवास - भोपाल (म.प्र.) शिक्षा - एम कॉम बी.यू. भोपाल पीजीडीसीए, एमसीयू भोपाल आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindiraksh...
अधिकार, मुक्ति, सुरक्षा
मुक्तक

अधिकार, मुक्ति, सुरक्षा

प्रवीण त्रिपाठी नोएडा ******************** अधिकार बनाम कर्तव्य.. माँगते अधिकार निज कर्तव्य भूले हम सभी। एक कर से क्या बजी संसार में ताली कभी? देश में उन्नति तभी जब काम सब मिल कर करें। जब समाज न जागता हर दृष्टि से पिछड़े तभी।।1 मुक्ति... मुक्ति शब्द विचित्र है पर अर्थ इसके हैं कई। भाव के अनुरूप इसकी नित्य व्याख्या हो नई। मुक्ति तन को, मुक्ति मन को, सँग विचारों को मिले। सत्य जब जाना उसी पल नींद जैसे खुल गई।।2 सुरक्षा... नित सुरक्षा चक्र का पालन सभी मिल के करें। दूरियाँ हों देह में विस्मृत नहीं मन से करें। सावधानी रख हमेशा युद्ध हम यह जीत लें। *संगठित हो कर कॅरोना दूर इस ग्रह से करें।। . परिचय :- प्रवीण त्रिपाठी नोएडा आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रका...
लेखक की कलम
कविता

लेखक की कलम

डॉ. रश्मि शुक्ला प्रयागराज उत्तर प्रदेश ******************** बहुत खुशियाँ और गम बाटा कलम ने बहुत मित्रऔर दुशमन बनाएँ कलम ने जीना और मरना सीखाया कलम ने शिक्षा का पाठ पढाया कलम ने व्यक्तित्व बनाया कलम ने मान सम्मान दिलाया कलम ने कवि कविता से मिलया कलम ने रिश्ते बनाये और चलाये कलम ने आजादी दिलाई कलम ने रोना और हँसना सीखाया कलम ने वतन पर मिटना सीखाया कलम ने रस में रंगना सीखाया कलम ने पर्व मनाना सीखाया कलम ने छल कपट धोखा से बचाया कलम ने मीलों का सफ़र तय किया कलम ने जीवन सफर पर साथ दिया कलम ने मातृ को नमन करनासीखाया कलमने देश विदेश को मिलाया कलम ने अनपढ़ से पढ़ा लिखा बनाया कलमने संवेदना को सजोना सीखाया कलम ने शक्ति भक्ति को सीखाया कलम ने सभी कवी सम्मेलन किया कलम ने रश्मि को जीवन दिया कलम ने . परिचय :- डॉ. रश्मि शुक्ला निवासी - प्रयागराज उत्तर प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानिय...
नज़रिया
कविता

नज़रिया

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** शहर में नया मकान किसका हैं पुराना तों गिरा दिया था ये नया बसेरा किसका हैं। रोशनी कों बंद दरवाजो से रोकने वालों क्या भूल गए ये नया सवेरा किसका हैं। सुना हैं घर बसानें से पहले हीं उजाड़ दिये जाते हैं तों संवरता हुआ ये परिवार किसका हैं। वो आग लगाने कि फिराक में घूमा करते हैं अकसर उन्हें पता नही बगल में तालाब किसका हैं। पौधो में कांटे कों देखकर कोसने वालों ये महकता हुआ गुलाब किसका हैं। . परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रदेश सचिव - अ.भा.वंशावली संरक्षण एवं संवर्द्धन संस्थान म.प्र, रचनाएँ : हम हिन्दुस्तानी, नई दुनिया, पत्रिका, नवभारत देवभूमि, दिन प्रतिदिन, विजय दर्पण टाईम, म...
चलते रहो
कविता

चलते रहो

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हैं सामने, खुला नील गगन, फिर क्यों हैं तू, थमा हुआ? खोल अपने अरमानों को, ले भर, आसमा, फैला हुआ... जब राह तन्हा, संग तेरे तो, क्यो तुझें, मंजिल की फ़िकर, हैं सूल भरी, पगडंडी तो क्या, तू चल, एकाकी, काहे का डर.. तेरे वजुद की, तुझको तलाश हैं, तेरा जमीर ही, तेरा नफ़स हैं चलते रहो, ना देख कदमों को, तेरा सफ़र, तुझ तक ही खत्म हैं... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी मे...
कान्हा
कविता

कान्हा

शालिनी सिंह जिला गोंडा (उ.प्र.) भारत ******************** मेरे आये प्रभु नंदकिशोर धाम मधुवन में। भाद्रपदा की आधी रात अंधेरी।। घन-घन-घन-घन बादर घेरी।। बिजुरी चमके चहुँ-ओर धाम मधुवन में। मेरे आये.... वह देवकी माँ आठवे लाला। कारागार का खुल गया ताला।। माया ने अस खेला खेला। बंधन मुक्त हुए वसुदेव धाम मधुवन में।। मेरे आये.... पितु वासुदेव प्रभु गोकुल लाये। देवन सज्जन के काज संवारें।। दुष्टन के जे मारन वारे। यशुमति के प्राणाधार धाम मधुवन में। मेरे आये.... यशुमति लाला पालने पौढे़। देखि-देखि यशोदा नंद हर्षे। नारद शारद शेषहि गावै। मेरे आये घन-आनंद श्याम धाम मधुवन में।। मेरे आये.... मेरे कान्ह बकईया चलन जे लागे। मोर पंख सिर शोभन लागे।। पीताम्बर तन पहिरे मुरारी। पहिरे गले गजमुक्तन माल धाम मधुवन में। मेरे आये.... अंग आभूषण पहिरे गिरधारी। लाल विशाल अंखियां कजरारी।। धनुष भौह लाल मधुराधर। अरे घुघराल...
एक एहसास ऐसा भी
कविता

एक एहसास ऐसा भी

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** क्या देंगे साथ जीवन भर, जो पल भर में उब जाते है। जनाब आप समंदर की बात करते है, यहाँ तो लोग आँखों मे डूब जाते हैं। आशा नही अब आश की, और कद्र नही विश्वास की, कीमत पानी की नही, बल्कि कीमत होती हैं प्यास की जीना मरना ये सब तो महफूज बाते हैं। जनाब आप समंदर की बात करते है, यहाँ तो लोग आँखों मे डूब जाते हैं। खुशियों की दामन छोड़कर, रिश्तों का बंधन तोड़कर, अब तो बताइये, क्या मिला अपनों की संगत छोड़कर जीने मरने की कसमें तो खूब खाते हैं। जनाब आप समंदर की बात करते है, यहाँ तो लोग आँखों मे डूब जाते हैं। क्या देंगे साथ जीवन भर, जो पल भर में उब जाते है। जनाब आप समंदर की बात करते है, यहाँ तो लोग आँखों मे डूब जाते हैं।   परिचय :- विशाल कुमार महतो, राजापुर (गोपालगंज) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अप...
उपन्यास : मै था मैं नहीं था भाग : १५
उपन्यास

उपन्यास : मै था मैं नहीं था भाग : १५

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** नानाजी अब कभी कभार मुझे उनके साथ बाहर भी ले जाने लगे। ख़ास कर रविवार को मैं उनके साथ सब्जी मंडी जाने की जिद भी करता। वे बड़ी ख़ुशी से मुझे ले जाते। नानाजी को सब्जी लेने के लिए किसी थैले की जरुरत नहीं पड़ती थी। इसके लिए उनके पास एक अलग ही मजेदार तरीका होता। सब्जीमंडी में खरीदी सब्जी रखने के लिए वे अपनी धोती का उपयोग करते। वे अपनी धोती की आगे की घड़ियाँ (कासोटा) खोल लेते और उस आधी खुली हुई धोती में सारी खरीदी हुई सब्जी भरकर धोती में गठान बांध लेते। फिर उसे अपने कंधे पर ले लेते। एक हाथ से वो मेरी उंगली पकड़ते। दिवाली बाद ग्यारस के दिन गन्ने का गट्ठा भी वें अपने कंधो पर ही लाद कर लाते। नानाजी को भी अब मुझसे लगाव सा हो गया था। रविवार को या छुट्टी वाले दिन वो मुझे अपने साथ कही न कही बाहर ले जाने लगे। कभी बाड़े पर के पार्क में या कभी दत्तमंदिर में य...
एक पत्र देश के नाम
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एक पत्र देश के नाम

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (म.प्र.) ******************** एक पत्र देश के नाम २६ मई २०२० इंदौर(म.प्र.) प्रिय देश, सादर नमस्कार🙏🏻 तुम्हारी भूमि में जन्म लेकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम भी मेरे समान आदर्श नागरिक पा कर प्रसन्न होंगे। तुम्हे विदित हो कि इस धरा पर बड़े होते हुए मुझमे तुमसे प्रेम और आत्मीयता अनायास ही सहज रूप से पनप गई है। पिछले दो दशकों में समझ नहीं आता कि तुम्हारे विकास और उन्नति का जश्न मनाऊँ या तुम्हारे मौलिक गुणों के पतन का मातम मनाऊँ। उम्र के हर पड़ाव पर मैंने तुम्हारे साथ परिवर्तन को महसूस किया है। मेरे प्यारे देश तुम्हारा वो समय जब यहाँ की बेटियाँ, लाज शर्म में रहते हुए, बेख़ौफ़ सभी में अपनापन अनुभव किया करती थी। यहाँ के बेटे नैतिक रूप से संबल थे। यहाँ का हर नागरिक आपसी बंधन में मजबूती से बंधा था। भौतिक संसाधनों और सुख-सुविधाओं को पाने की होड में हे ! भारत आज जो तुम्...