कहाँ गई तुम दीदी
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
********************
घर के नींव की
ईंट थी दीदी तुम
सहसा पतझड़ी हवा ने
बिखेर दिए हर
ईट इस घर की,
विरान कर गई वो आंगन
जिसमें तुम्हारी मुस्कुराहटें
खिलखिलाती थी!!
हम एक वृक्ष से उत्पन्न पत्ते,
नहीं जानते थे, कहाँ जाते
है शाख से टूटकर
धरा पर सूखे पत्ते सा कर
गई जीवन हम सबका,
नहीं समझ पाये तुम्हारा
यूँ चले जाना आजतक !!
जिंदगी के हर उतार-चढाव
की साथी थी तुम,
आज भी आंखों की
नमी हो तुम,
मेरी हंसी में कौन
हॅसेगा साथ मेरे,
दुःख में कैसे मुस्कराते हैं,
सिखाती थीं तुम !!
तुम्हारा चले जाना
पिताजी सह ना सके ,
टूट कर बिखरे हम अब
तक जुड़ ना सके
थोड़ा तो ठहर जाती
साथ हमारे
माँ को कैसे ऐसे
छोड़ गई तुम ??
आज भी हर एक के
हृदय में बसी हो तुम,
मुझे पता है मेरे
आसपास ही हो तुम,
बार बार दिल कहता है
कहीं से लौट ...






















