Wednesday, October 21राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

BLOG

अलविदा
कहानी

अलविदा

डॉ. विनोद वर्मा "आज़ाद"  देपालपुर ********************** आज उसके घर के बाहर भीड़ लगी थी, लोग तरह -तरह की बातें कर रहे थे। ७० साल के भगवानदास कह रहे थे, लालची है ये लोग, बेचारी को पति सुख की चाह थी पर इन लोगों के लिए तो वह सोने की मुर्गी थी, हर माह मोटी रकम उसे मिलती थी, बेचारी की इच्छाओं की किसी को भी परवाह नही थी। रोज-रोज फरमाइश, पर उसके विवाह की किसी को चिंता नही थी। पहले पति की प्रताड़ना का शिकार हो वह अपने वालों के बहकावे मे आकर तलाक ले चुकी थी। १० वर्ष हो चुके थे। दोबारा शादी के लिए इतने फजिते होंगे ये वो जानती तो शायद तलाक ही न लेती ! किराने वाली सुशीला मां कहने लगी, वो भी मुवा ठीक नही था री। किसी की बेटी को ले गया और छोड़ दी केवल काम करनेवाली व "सोने का अंडा देने वाली" बाई बनाकर। उसकी बचपन की सहेली जिसने ज्योत्स्ना के साथ अंतिम क्लास तक पढ़ाई की थी, बबली जो उसी की उम्र की थी कहने लगी, ...
देश राग
लघुकथा

देश राग

श्रीमती लिली संजय डावर इंदौर (म .प्र.) ******************** तेरी मिट्टी में मिल जावां, गुल बनके मैं खिल जावां.. इतनी सी है दिल की आरज़ू.... .. दीदी आज तो आपने सबको भावुक कर दिया, आप कितना मीठा गाती हो, प्रीति का गाना पूरा होते ही पास में खड़े बिट्टू ने प्रीति से कहा और सभी ने अपने अपने घरों से तालियां बजायीं। प्रीति कॉलेज में प्रोफेसर है, गरीब बस्तियों के बच्चों की शिक्षा पर भी काम करती है साथ ही अच्छी गायिका भी है। लॉक डाउन के दौरान आसपास वालों की फरमाइश पर वो रोज शाम को अपने घर के सामने ट्रैक पर माइक और स्पीकर लगाकर सभी को गाने सुनाती है। आज जब उसने ये गीत गाया तो सभी लोग देश प्रेम की भावना से ओत प्रोत होकर भावुक हो गए। गाते गाते प्रीति की आंखें भी भीग गयीं, दीदी मुझे भी गाना सीखना है, आप मुझे सिखाओगी, बिट्टू ने माइक और स्पीकर उठाते हुए पूछा, हाँ हाँ बिट्टू क्यों नहीं? जरूर, प्रीति ने...
उपन्यास : मै था मैं नहीं था : भाग-०४
उपन्यास

उपन्यास : मै था मैं नहीं था : भाग-०४

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** रात्री के सात बजे मेरे नानाजी दाई को बुलाने जो घर के बाहर निकले, वे परिवार में सबका खाना निपटने के बाद भी वापस नहीं लौटे थेI बाद में सबके सोने का भी समय हो गया और सब सोने भी चले गए, तब तक भी नानाजी का कही पता नहीं था। नानी जरुर खूब परेशान और चिंतित हो गयी। नींद का तो सवाल ही नहीं था। मेरी माँ के पास बैठे उसे लगातार धीरज दिए जा रही थी। शायद अब शीघ्र ही सबसे मेरी मुलाकात का समय हो चला था। माँ का दर्द असहनीय हो चला था। वेदनाएं अलग थी। इधर नानाजी का पता ही नहीं था, इसलिए दुर्गाबाई दाई की भी किसी को खबर नहीं थी। माँ तो रोने ही लगी। "अक्का …। धीरज रख। मै माई को बुला कर लाती हूं। "इतना कह कर नानी कमरे के बाहर गयी। अब माई का परिचय भी आपको करवाना ही चाहिए। माई मतलब मेरी माँ की सौतेली दादी। सखारामपंत की दूसरी पत्नी गोपिकाबाई। मेरी नानी की सास।...
गुल्लक
लघुकथा

गुल्लक

अर्चना मंडलोई इंदौर म.प्र. ******************** माँ आशा आंटी का फोन है... बेटा मुझे फोन देते हुए बोला... मैने पोछा बाल्टी में फेकते हुए दुपट्टे से हाथ पोछे और बेटे के हाथ से फोन झपट लिया। कैसी हो दीदी उधर से आवाज आई ! .ठीक है हम सब तू कैसी है? और तेरे परिवार के लोग.....मैं एक सी सांस मे कह गई? नहीं दीदी...वह रूकती हुई बोली - पर आपको सब काम हाथ से ही करना पड रहा है ना? और आपके पैरो का दर्द कैसा है? उधर से बुझी सी आवाज आई। हम लोग मिलजुल कर मैनेज कर रहे है। बच्चें भी काम मे हाथ बँटा रहे है.... वो सब तो ठीक है पर तू बता तुम लोग गाँव तो नहीं गए ना? और तेरे पति क्या अभी भी सब्जी बेचने जाते है? मै उसकी खैरियत पूछने के लिए एक सांस मे सब कह गई। वो दीदी मालिक मकान किराया मांगने लगा था। और फिर हमारे घर में खाने का सामान भी इन आठ दिनों मे खतम होने लगा था। आटा दाल का इंतजाम तो करना ही था सो जान जोख...
स्वप्न सुनहरे
कविता

स्वप्न सुनहरे

कु. हर्षिता राव चंदू खेड़ी भोपाल म.प्र. ******************** हर ढाल बनकर जो खड़े हैं अपनें-परायों से लड़े हैं। विश्वास बनूंगी मैं उनका इतिहास रचूंगी इस युग का।। इक तड़ित सा तेज़ बनकर माता पिता का ओज बनकर। पर्वतों के जैसे तनकर, उनके जैसे ही मैं थमकर।। जाग जाऊं सुबह बनकर शांत हो जाऊं निखरकर। क्रांति लाऊंगी जो अब मैं अपने जीवन के सफ़र में।। रोशन हो जाऊं कहर में जीत जाऊं हर लहर में। रोशन होकर जगमगाऊ, इक नई सुबहो जगाऊं।। . परिचय : कु. हर्षिता राव पिता - श्री रमेश राव पेंटर (प्रेरणा स्त्रोत) निवासी - चंदू खेड़ी भोपाल म.प्र. शिक्षा - एम.ए.हिंदी साहित्य में अध्ययनरत, राष्ट्रीय सेवा योजना (एन.एस.एस) की स्वयं सेविका एवं सामाजिक कार्यकर्ता। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, ल...
बचपन
कविता

बचपन

डॉ. प्रभा जैन "श्री" देहरादून ******************** क्या बचपन का जमाना था ना अपना, ना पता क्या सुहाना था भागते कभी तितली के पीछे कभी उड़ाते, छत पर पतंग। कभी झूलते सावन के झूले कभी रिमझिम वर्षा में नहाते, बना कागज की नाव बहाते रख पैर रेत में घर बनाते। कोई तोड़ता कट्टी क़र जाते मन था निर्मल गंगा समान, फिर से हप्पा क़र जाते था तनाव रहित जीवन। बदला समय, जीने का ढंग जन्म लेता आज बच्चा, समय बाद ए बी सी डी करने लगता, लाद भारी बस्ता स्कूल जाता दादी-नानी से कहानी सुनता बचपन। देख जिन्हें दिल खिल जाता भंवरों की तरह मचल जाता, बड़ों की तरह बात करता बचपन कुछ का बचपन सड़क पर सोता स्कूल का सपना चाँद का सपना हर चीज में दो समय की रोटी दिखती कहीं छोटी-छोटी टोकरी में नींबू धनिया बेचता बचपन। क्यूँ होता अपहरण क्यों चौराहे पर फैला हथेली खड़ा बचपन। कहाँ खो गया वो मासूम सहज सरल बचपन, कहाँ खो गया देखते-देखते वो गु...
होमियोपैथी….  प्रयोग नहीं विज्ञान
आलेख

होमियोपैथी…. प्रयोग नहीं विज्ञान

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** विश्व होमियोपैथी दिवस’ प्रत्येक वर्ष १० अप्रैल को सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाता है। होमियोपैथी के आविष्कारक डॉ. हैनीमैन की जयंती १० अप्रैल को विश्व होमियोपैथी दिवस के रूप में मनायी जाती है। होम्योपैथी के संस्थापक जर्मन चिकित्सक डॉ. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सैमुअल हैनीमैन महान विद्वान, भाषाविद् और प्रशंसित वैज्ञानिक थे। होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति दुनिया के १०० से अधिक देशों में अपनाई जा रही है। भारत होम्योपैथी के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी देश है कई महामारियो का उपचार होम्योपैथी से संभव है। लेकिन अभी तक इसका पर्याप्त इस्तेमाल नहीं हो सका है। होमियोपैथी को लोकप्रिय बनाने का आयोजन किया जाता है। होमियोपैथी के उपचार का आधार खासतौर पुराने तथा असाध्यय कहे जाने वाले रोगों के लिये रोगी की केस हिस्ट्री लेते समय उनके लक्षणो को प्राथमिकता...
कोरोना वियोग
कविता

कोरोना वियोग

एम एल रंगी पाली राजस्थान ******************** हम इधर है और वो उधर है, कोरोना के कारण मिलन दूभर है ....!! करे तो करे भी क्या इस लॉक डाउन में, वियोग इधर है तो इंतजार उधर है ...!! दोनों और पलता है प्रेम, इस घोर विकट घड़ी में अथाह ... ...!! मन मे मिलन की है पराकाष्ठा, पर संक्रमण काल मेअधूरी है चाह . .!! लॉक डाउन बाद खुलेगी शायद, मिलन की कोइ न कोई राह .. ....!! होगी नजरे इनायत भी और, उमड़ेगा पारावार प्रेम का अथाह . ...!! होंगें फिर प्यासे दिलो के, गिले-शिकवा भी दूर सभी ........!! खाएंगे कसमे की, विकट हालातों में, फिर रहेंगे न दूर कभी .............!!! हाँ मितवा रहेंगे न दूर कभी .....!!! . परिचय :-  एम एल रंगी, शिक्षा : एम. ए., बी. एड. व्यवसाय : अध्यापक जन्म दिनांक : २३/०६/१९६५ निवासी : सांवलता, जिला. - पाली राजस्थान आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच ...
नव भोर की ओर
कविता

नव भोर की ओर

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चमक रहा वो, देख! शीर्ष, हैं ज्योत्सना मुसकाई, महक रहा हैं धीर मेघपुष्प, चल वैतरणी पार लगाई... मचल उठा मन मयूर सा, नयन निहारें, विहंगम दृश्य, वारिधर भी रहे मचल हैं, थिरके अर्श, अंशु अदृश्य... मस्ती में झुमें हैं, तरुध्वज, जल-थल चर, विहंग सारे झुम रही सँग, मंद समीरण, तृण, टीप "निर्मल" पे वारे ... बिखर रही, रौशनी राहों में, नई उमंगें सँग भर बाहों में, तज तिमिर, बन नई चमक, जा निकल सँग नई राहो में उपमाएँ : शीर्ष-आसमा/ज्योत्सना-चाँदनी/धीर-शांत/मेघपुष्प-जीवन,जल/वैतरणी-ब्रह्म नदी/वारिधर-मेघ/अर्श-नभ/अंशु-किरण/तरुध्वज-ताड़,वृक्ष/चर-प्राणी विहंग -पँछी/समीरण-वायु/तृण,टीप-घास से शाख तक परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौ...
महँगाई की मार
कविता

महँगाई की मार

गोरधन भटनागर खारडा जिला-पाली (राजस्थान) ******************** महँगाई की मार है, पैसा है तो कार हैं। करते सब इनकार हैं, महँगाई की मार है।। आलू हूआ बीमार गोभी को आया बूखार। पालक ने सीना ताना, तोरी ने रूख अपनाया सख्त। बोलो महँगाई की------------।। शक्कर बोली दाल से बहिन क्या हैं, हाल! दाल बोली आज-कल तो दाल ही दाल, ऐसा मेरा हाल।। बोलो महँगाई की ----------।। क्योंकि तेल चढा पहाड़ है, चावल का बंटाधार। गेहूँ थोड़ा उदास हैं, देखो ऐसा वार है।। बोलो महँगाई की --------।। गाँव-गल्ली और नुक्कड़ में, शहरों के चोराहो में। भरे हुए बाजारो में, आज के ये हाल हैं।। बोलो महँगाई की --------।। न चाल हैं, न ढाल हैं, लोग बिचारे बेहाल हैं। अंगूरों की देखभाल है, चीकू- संतर 'आम 'हैं।। बोलो महँगाई की -------।। क्योंकि 'घी' आपे के बाहर हैं, कोने में बैठा अनार हैं। देखो ऐसा वार है। बोलो महँगाई की ---------।।...
शौर्य गाथा
कविता

शौर्य गाथा

विमल राव भोपाल म.प्र ******************** वीर रस भगवा रक्त बहे इस तन में माँ ऐसा वरदान दो। दुष्टों का संहार कर सकुं ऐसा तीर कमान दो।। वीर शिवाजी सा रणकौशल राणा सा वो भाल दो। चेतक सा बल शौर्य मुझे दो गुरु गोविंद सिंह: कृपाण दो श्री रामकृष्ण जी परमहँस सा मुझको हृदय विशाल दो। रौद्र रुप धर सँकु युद्ध में वह देह मुझे विक्राल दो।। मंगल पाण्डे सा बल दो माँ डटा रहूँ रणभूमी में। भगत सिह: सा साहस दो माँ हँस कर झूलुं सूली में।। दो शक्ति आज़ाद सी मुझको मात्र भूमी पर मिट जाऊँ। संत विवेकानंद बनु तन भूमि माथ लिपट जाऊँ।। मर - कर फ़िर जनमु भारत में माँ ऐसा वरदान दो। दुष्टों का संहार कर सकुं ऐसा तीर कमान दो।। . परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) कवि, लेखक, सामाजि...
तूने गजब कर डाला
कविता

तूने गजब कर डाला

जसवंत लाल खटीक देवगढ़ (राजस्थान) ******************** वाह रे, कोरोना ! तूने तो गजब कर डाला, छोटी सोच और अहंकार को, तूने चूर-चूर कर डाला।। वाह रे, कोरोना ! ...... पैसो से खरीदने चले थे दुनिया, ऐसे नामचीन पड़े है होम आईसोलोशन में, तूने तो पैसो को भी, धूल-धूल कर डाला।। वाह रे, कोरोना ! ...... धुँ-धुँ कर चलते दिन रात साधन, लोगों की चलती भागमभाग वाली जिंदगी, तूने एक झटके में सारा जहां, सुनसान कर डाला।। वाह रे, कोरोना ! ...... दिहाड़ी करने वाले मजदूर, खेत पर काम करते गरीब किसान, तूने तो इनको बिल्कुल, कंगाल कर डाला।। वाह रे, कोरोना ! ...... अमीरी मौज कर रही बंद कमरों में, गरीबों को अपने घर आने के खातिर, कोसों पैदल चलने को, मजबूर कर डाला।। वाह रे, कोरोना ! ...... लोग कहते थे सौ-सौ रुपये लेती है पुलिस, देखो ! सुने चौराहों पर खड़ी हमारी सुरक्षा खातिर, हम सब लोगों का, विचार बदल डाला।। वाह ...
गृहणि
कविता

गृहणि

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** बढ़ गया है बोझ उस पर देहरी पर जो खींच दी है लक्ष्मण रेखा। घर के भीतर कोई नही आता घर के भीतर कोई नही जाता उसे ही रखना है सारे काम का लेखा जोखा। घर का फर्श, फर्नीचर जब चमक उठते है। आवाज़ देते है किचन में रखे बर्तन। बर्तनों की चीख पुकार बंद होते ही। वाशिंग मशीन में कैद कपड़े फुसफुसाने लगते है। कर उनकी धुलाई टंग जाते है वे रस्सियों पर करते है हवा से अठखेलियाँ एक गहरी सांस खींच भी पाती है की। गमले में उगा मोगरा, गुलाब, निशिगन्ध उसे याचक की नज़रों से देखते है। दे कर पानी गमलों में जैसे ही पोछती है वो स्वेद कण जो दव बिंदुओं के समान उसके माथे पर मोतियों से उभर आए है। तभी उसके कानों में पड़ती है मेरी आवाज कुछ तो काम किया करो मुझे अभी तक चाय नही मिली। . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म...
कोरोना वायरस का प्रभाव
आलेख

कोरोना वायरस का प्रभाव

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया (गुजरात) ******************** सारे विश्व में कोरोना के कहर ने हंगामा मचा दिया है। अंबर और अवनि पर सन्नाटा छाया हुआ है। प्रदूषण फूँकते वाहन के पहिए थम गये हैं। सड़कों, दुकानों, मोल, शाला-कॉलेजों, ऑफिसों, कंपनियों, उद्योगों, मण्डी-बाजारों, आदि भीड़ वाले स्थान एक ही रात के आह्वान से कुछ ही घंटों में शून्य सा नजर आ गया है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक वातावरण के साथ ही प्राकृतिक वातावरण भी शांत हो गया है। लोग अपनी, परिवार की और देश की जान बचाने के लिए अपने घरों में बैठकर देश को सहयोग दे रहे हैं। लोगों में निरंतर सावधानी जागृत करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया के माध्यम से मीडिया कर्मी सतत सूचना देते रहते हैं। लोगों को मुश्किलें कम हो इसके लिए जितना हो सके उतना समाज सेवकों और सरकार द्वारा खयाल रखा जाता है। लोगों की जान बचाने के लिए अपनी जान, ...
दीवाना दिल
कविता

दीवाना दिल

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** ये दीवाना दिल अब मेरी सुनता कहां है, मेरी धड़कनों में जो धड़क रहा है। तनहा सफर मेरा अब गुजरता कहां है, यादों में तेरी अब तड़प रहा है। जिस्म से जान निकल जाएगी कहां है, बता इसमें मेरी खता कहां है। चांद आज पूर्णिमा का निकला है शायद, या छत पर किसी की उतर गया है। तेरे बिना अब वक्त कटता कहां है, दर्दे ए दिल अब बढ़ता जा रहा है। मचलते सागर में उफान आ गया है, जो लहरों की दीवानगी बढ़ा रहा है। हर शाम पर अब चांद ढलता नहीं है, ये दीवाना दिल अब मेरी सुनता कहां है।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा साहित्यिक : उपनाम नेहा पंडित जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, ...
मजदूरिन
कविता

मजदूरिन

सीमा रानी मिश्रा हिसार, (हरियाणा) ******************** जिधर देखो उधर नववर्ष की धूम है, फिर भी कुछ लोग उदास व गुमसुम हैं। पुराने वर्श को विदा करने की नहीं आतुरता, केवल कुछ रूपए पाने की है उत्सुकता। हम ठंड से ठिठुर रहे थे जहाँ, वहीं वह श्रम बिंदुओं से रत थी। उसे नए-पुराने वर्ष का गम न हर्ष था, वह तो अधिकाधिक ईंटें ढोने में व्यस्त थी। दो जून की रोटी की चिंता जितनी कल थी, उतनी ही उसे आज और शायद कल भी होगी। पर उसके मैले आँचल में कभी तुम, कुछ रूपए यूँ ही रख मत देना। उसकी आँखों में असीम दुख के अश्रु देख, कहीं तुम भी संग उसके भावुक हो रो मत देना। न ही उसकी गरीबी पर तरस खाकर, तुम भिक्षा देने की भूल ही करना। वह जीवन से लड़ना जानती है, उसको कभी निर्बल न समझना। वह नन्हें शिशु को नौ माह पेट में, और डेढ़ साल पीठ पर रखती है। वह भरी दोपहरी में सूर्य की ताप, और सदिर्यों में शीत लहर को झेलती है। जब उसका प...
कुछ ऐसा करो न
कविता

कुछ ऐसा करो न

डॉ. बी.के. दीक्षित इंदौर (म.प्र.) ******************** जहाँ करोना फैल रहा, क्षेत्र वहाँ का सील करो। हटकर नई योजना हो...और नहीं अधीर करो। खोल दुकानें दो सारी, दूरी ज़्यादा से ज्यादा हो चालू हों उद्योग, कमसे कम आधा तो फ़ायदा हो। चंद रईशो की संपत्ति से देश नहीं चल पायेगा। बंद हुए व्यापार सभी, तोकैसे हल मिल पायेगा? वेतन, बिजली, टैक्स आदि, बहुत ज़रूरी होते हैं। कुछ लोग आपदा में भी तो बहुत गरूरी होते हैं। खण्ड-खण्ड भागों में, अब कर्फ़्यू सख़्त लगा दो। जहाँ न फैले कोरोना.....उस जगह छूट दिला दो। मजदूरों से कहो की, वो सब कार्य करें कारखानों में। घर नहीं जायें तीन महीने, रहें वो उन्हीं ठिकानों में। दो मीटर की दूरी हो, अनुशासन कड़ा दिखाना है। बीमारी भी दूर रहे, और मिलकर हाथ बटाना है। जामाती की जेल बनाओ, नित्य पिटाई होती हो। जो-जो अकड़ दिखाए उसकी खूब सुताई होती हो। खुली छूट सेना को दे दो, सील इलाके...
मरना अचल-अटल है
ग़ज़ल

मरना अचल-अटल है

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** जग में कोरोना के डर से ऐसा अदल-बदल है! सड़कों पर सन्नाटा पसरा घर में चहल-पहल है! अब सतर्क हो गया आदमी साये से भी डरता, अपने ही घर-आँगन में अब चलता संभल-संभल है! क़ुर्बत गुमसुम आज हुई दूरी ने जश्न मनाया, तीन-तीन फुट का अन्तर अब सबके अगल-बगल है! औरत हो या मर्द सभी के चेहरों पर है पर्दा, नज़र-नज़र दर्शन को तरसे हसरत विकल-विकल है! 'रशीद' कोरोना है कारण जाना एक दिवस है, जब तक जीवित रहें सुरक्षित, मरना अचल-अटल है! . परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी• एड•, एलएल•बी•, साहित्य रत्न, कोविद कार्यक्षेत्र ~ सेवानिवृत प्राचार्य सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन औ...
जनता जनार्दन
कविता

जनता जनार्दन

गोविंद पाल भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** झूठ के पीठ लदे "सत्यमेव जयते" की लाशें आंखों पर पट्टी बंधी कानून के लाशघर के फ्रीजर में बंद है जरूरत के मुताबिक जिसका किया जाता है पंचनामा, कभी-कभी चीरघर में उसका पोस्टमार्टम होता है इसके बाद मरघट में शुरू होता है लाशों का धर्मिय बहस की इसे जलाया या दफनाया जाय, इधर इंसानियत ओढने की नुमाइशे जोरो पर चलती है इस ताक में बैठे कुछ जन विरोधी प्यादे भी बहती गंगा में धो लेते हैं हाथ इस मौके की ताक में बैठे कुछ लोग अपने को इश्वर होने की घोषणा कर देते हैं, हर तरफ इस अवसरवादी कानफोड़ू शोरगुल में अंदर की सच्चाई कब दफ्न हो जाती है उसका अहसास भी नहीं कर पाती जनता जनार्दन। . परिचय :-गोविंद पाल शिक्षा : स्नातक एवं शांति निकेतन विश्व भारती से डिप्लोमा इन रिसाइटेशन। लेखन : १९७९ से जन्म तिथि : २८ अक्तूबर १९६३ पिता : स्व. नगेन्द्र नाथ पाल, माता : स्...
उदर
कविता

उदर

राम शर्मा "परिंदा" मनावर (धार) ******************** मनुष्य यूं दर-बदर नहीं होता तन संग अगर उदर नहीं होता मछली को भी पानी ना मिलता अगर खारा, समंदर नहीं होता बांट देती है सबको चार-दीवारी दीवार बिन कोई अंदर नहीं होता गर कोई लिखता नहीं इतिहास याद कोई, सिकन्दर नहीं होता नशा न होता दौलत का जग में विद्वानों का अनादर नहीं होता छोटे-बड़े कर लेना पैर 'परिंदा' पैर के अनुसार चादर नहीं होता परिचय :- राम शर्मा "परिंदा" (रामेश्वर शर्मा) पिता स्व. जगदीश शर्मा आपका मूल निवास ग्राम अछोदा पुनर्वास तहसील मनावर है। आपने एम.कॉम बी एड किया है वर्तमान में आप शिक्षक हैं आपके तीन काव्य संग्रह १- परिंदा, २- उड़ान, ३- पाठशाला प्रकाशित हो चुके हैं और विभिन्न समाचार पत्रों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन होता रहता है, दूरदर्शन पर काव्य पाठ के साथ-साथ आप मंचीय कवि सम्मेलन में संचालन भी करते हैं। आपके साहित्य चुनने...
प्रेम इबादत है पूजा है
गीत

प्रेम इबादत है पूजा है

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** प्रेम लोक परलोक सुधारे, मेरा तो अनुमान यही है। प्रेम इबादत है पूजा है, भक्ति यही भगवान यही है।। प्रेम को जिसने भी पहिचाना, उसने सबको अपना माना। रब का रूप देखकर सबमें, सबको सेवा लायक जाना।। तम में कर देता उजियारा, लासानी दिनमान यही है। प्रेम इबादत है पूजा है, भक्ति यही भगवान यही है।। प्रेम नाव, पतवार बना है , प्रेम स्वर्ग का द्वार बना है । सुख सम्पत्ति की रक्षा के हित, ये ही पहरेदार बना है।। नग्न बदन को ढकने वाला, सदियों से परिधान यही है। प्रेम इबादत है पूजा है, भक्त यही भगवान यही है ।। प्रेम बगावत करने वाला, प्रेम का विष भी अमृत प्याला। सोच समझ का काम नहीं ये, करताहै इसको दिलवाला।। विश्वासो का निर्झर है ये, कहते सब धनवान यही है। प्रेम इबादत है, पूजा है, भक्ति यही भगवान यही है।। प्रेम राह है प्रेम आस है, प्रेम तबाही में उजास है। प...
बेग से मिली मन की विषालता
कहानी

बेग से मिली मन की विषालता

डॉ. सुरेखा भारती *************** दरवाजे के बरामदे में अपने जूते निकालकर, वह बैठक वाले कमरे में ही सौफे पर दोनों पैर पसार कर लेट गया। लेटे-लेटे ही उसने अपने टाॅय को खोलकर एक तरफ पटक दिया। आँखें बंद की और आवाज दी। नीत....नीता ऽ जरा पानी लाना.... नीता हाथ में ग्लास थामे उसी और आ रही थी लो...... मुझे पता था आप आ गए है, मैंने पैरों की आहट जो सुन ली थी। यह कह कर उसने ग्लास रोहित के हाथों में थमा दिया। रोहित उस की ओर देख कर बोला - ‘आज मैें इतना थक गया हूँ,...... दिल्ली वाले बाॅस जो आए थे, उन्हें शहर में शापिंग करवानी थी और किसी अच्छे रेस्टारेंट में जाकर लंच करवाना था। हाँ बिल की पेमन्ट तो मिल जाएगी, पर उनकी बातें सुनते-सुनते मैं बहुत उब गया हूँ....।, रितेश को कहा था की तुम बाॅस के साथ चले जाओ...। तो सुना.. उसने भी बहाना बना दिया - ‘मेरी तबीयत ठीक नहीं हेै, वैसे भी तुम्हे करना क्या है, उनके साथ ...
जुदा कौन करेगा
कविता

जुदा कौन करेगा

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** हकदार बहुत हैं तेरे पर सच्चा हक अदा कौन करेगा महफ़िलो में खोए होंगे सब, तब याद सदा कौन करेगा! जान-जान कहने वाले, बेजान मिलेंगे आशिक बहुतेरे, जरूरत पड़ने पर सोचो, तुमपे जान फिदा कौन करेगा! साथ तुम्हारे गुजर रहे जो वो पल अनमोल ख़ज़ाने मेरे हम दोनों एक बनेंगे तब फिर बोलो जुदा कौन करेगा! जो भी हों मसले बड़े सब बेहिचक कहा करो मुझसे, यदि तुम ही खामोश रही तब सोचो निदा कौन करेगा! तेरे हुस्न की हरारत से ही, मेरी धड़कनें हरकत में हैं, इतने प्यारे महबूब को बताओ, अलबिदा कौन करेगा!   परिचय :- कवि आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आक...
ज़ख्म
हिन्दी शायरी

ज़ख्म

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** ज़ख्म सबके बराबर हैं, तेरे हों या मेरे हों, रेशमी ताकत भी यहां, मजबूर है बताना चाहती थी। चारों तरफ खोफ़ है,सन्नाटा है पर, यकीनन बिखरे हुए पत्तों को जोड़ना चाहती थी। मां आसुओं की पहचान रखती है, दो दिन पहले भी बहे हों तो जान लेती है। वही है जो जिंदगी के हर दर्द जानती है। हर रिश्ते तराशने के गुर जानती है। कोई दौलतमंद नहीं है, और न कोई रंक है। सब सिकंदर हैं यहां वो ये बताना चाहती थी।   परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शिक्षा :- एम. फ़िल. (हिन्दी), एम. ए. (हिंदी), विशारद (कंठ संगीत) रुचि :- कविता, लेख, लघुकथा लेखन, पंजाबी पत्रिका सृजन का अनुवाद, रस-रहस्य, बिम्ब (शोध पत्र), मालवा के लघु कथाकारो पर शोध कार्य, कविता, ऐंकर, लेख, लघुकथा, लेखन आदि का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी ...
मीरा
कविता

मीरा

मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) ******************** वो छोटी सी मीरा, वो न्यारी सी मीरा जग की दुलारी, माँ की प्यारी सी मीरा! वंशीधर के प्रीत में उलझी सी मीरा जीवन के रहस्यों से सुलझी सी मीरा! सत्य पथ से कभी ना भागी थी मीरा विघ्नों में भी धैर्य ना त्यागी थी मीरा! बेरहम वक़्त की ठेस, सहती थी मीरा रोती भले पर ना कुछ कहती थी मीरा! ना मिले मोहन तो स्वयं छल गई मीरा कृष्ण भक्ति में ही देखो ढल गई मीरा! हंसकर हलाहल विषों का, पी गई मीरा राणा ने ढाए जुल्म फिर भी जी गई मीरा! निज उर की वेदना भी छिपाती थी मीरा आठो पहर कान्हा-कान्हा गाती थी मीरा! . परिचय :- मीना सामंत एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने ह...