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मान
लघुकथा

मान

आशा जाकड़ इंदौर म.प्र. ******************** अरी  सुलक्षणा कल "हरतालिका तीज" है, याद है ना। अरे माँ मैं तो भूल ही गई थी। अच्छा हुआ आपने याद दिला दिया, ठीक है कर लूँगी। "अरे माँ आपने अभी तक चाय नहीं बनाई सुबह-सुबह किसको फोन करने बैठ गयीं?" सीमा अपनी माँ के गले में हाथ डालते हुए बोली।" तेरी भाभी को ही फोन लगा रही थी, उसे याद दिला रही थी कल हरतालिका तीज है, व्रत कर लेना "और भाभी ने कहा होगा ठीक है मैं कर लूंगी। "हां तेरी भाभी बोल रही थी कि माँ मैं तो भूल ही गई थी अच्छा हुआ आपने याद दिला दिया।"  देख मैं उसे याद दिला देती हूं तो निधि बड़ी खुश हो जाती है। पर माँ आपको पता है न कि भाभी व्रत नहीं कर पाती हैं, उन्हें भूख सहन नहीं होती है। फिर क्यों याद दिलाती हो? अब उसकी इच्छा होगी तो कर लेगी नहीं तो कोई बात नहीं है। मैंनें अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। पर देख बेटा मेरा मान तो रख लेती है। कभी म...
मेज के उस पार की कुर्सी
लघुकथा

मेज के उस पार की कुर्सी

अर्चना मंडलोई इंदौर म.प्र. ******************** सुनों आज भी मैं खिडकी के पास रखी कुर्सी पर बैठी हूँ। बाहर बगीचे में ओस से भीगा आँवले से लदा पेड हरे काँच की बूँदों सा लग रहा है। इन दिनों गुलाब में भी बहार आई हुई है। सुर्ख लाल गुलाब पर मंडराती रंग-बिरंगी तितलियां मौसम को और भी खुशनुमा बना रही है। मौसम भी इस बार कुछ ज्यादा ही उतावला है नवम्बर में ही गुलाबी ठंड ने दस्तक दे दी है। ये गर्म काँफी मुझे अब वो गर्माहट नहीं देती क्योंकि मेज के उस पार खाली कुर्सी और काँफी मग का वो रिक्त स्थान तुम्हारी कमी महसूस करवा रहा है। मै अपनी बेबसी ठंडी कर काँफी के हर घूँट के साथ पीती जा रही हूँ। जानते हो ये हवा जो ठंड से भीगी हुई है, ये अब भीगोती नही है। भीगना और गीले होने का अंतर तुम्हारे बिना समझ में आया। मैं हथेलियों की सरसराहट से उस गर्माहट को महसूस करना चाहती हूँ, जो कभी तुम्हारी हथेलियों ने थाम कर गर्मा...
मैं कवि नही
कविता

मैं कवि नही

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** मैं कवि नही कविता मेरे बस की नही मन के भावों को मुझे पिरोना आता नही मुझे कविता लिखना आता नही मैं पाखंडी लिंगहीन शिखंडी प्रेम करना आता नही हो कैसे सृजन पता नही मुझे कविता लिखना आता नही मैं घृणा फैलाने वाला मन का काजल से काला किसी को सुहाता नही मैं किसी को भाता नही मुझे कविता लिखना आता नही दम्भी हु अभिमानी हु मूढ़ हु अज्ञानी हु पीठ किसी की खुजलाता नही मुझे कविता लिखना आता नही मुझे कविता लिखना आता नही . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिं...
पथ और पथिक
मुक्तक

पथ और पथिक

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** जीवन पथ पर दिशा-दिशा पग-पग उलझन है। कैसे कोई चयन करे मग-मग उलझन है। ढल जाता है हलाभिलाषा में ही जीवन, संतों ने उपदेश दिया है, "जग उलझन है।" जो शक्ति ईश ने दी है उसे निवेश करें। परोपकार की जग में मिसाल पेश करें। न इन्तज़ार करें अब नहीं निहारें राह, बढा़एं अपने क़दम आप श्रीगणेश करें। कोई पैदल है, सवार कोई वाहन में! कोई आबादी में तो कोई कानन में! जन्म-मरण के मध्य यात्रा है अनिवार्य, हर मानव ही यायावर है इस जीवन में! वही बढ़ते हैं जो गंतव्य को पहचानते हैं। पूर्ण संकल्प वही करते हैं जो ठानते हैं। यूं तो आती हैं डगर में अनेक बाधाएँ, जिनमें साहस है, कभी हार नहीं मानते हैं। . परिचय - साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और...
सच को समझे
कविता

सच को समझे

संजय जैन मुंबई ******************** समय बदल देता है, लोगो की सोच को। पैसा बदल देता है, उसकी वाणी को। प्यार बदल देता है, इर्शा और नफरत को। पढ़ाई बदल देती है, उसके बुधिक ज्ञान को। मिलने मिलाने से, मेल जोल बढ़ाता है। तभी तो लोगो में, अपनापन बढ़ाता है। जिससे एक अच्छे, समाज का निर्माण होता है। और लोगो मे इंसानियत का, एक जज्बा जगता है। जिससे लोगो के दिलो में, इंसानियत आज भी जिंदा है। माना कि परिवर्तन से, प्रगति होती है। परन्तु पुरानी परंपराओं से, आज भी संस्कृति जिंदा है। इसलिए भारत देश, विश्व मे सबसे अच्छा है। तभी तो सारे दुनियां की, नजरे भारत देश पर टिकती है। विश्व का सबसे बड़ा, बाज़ार हमारा इंडिया है। यहां के पढ़े लिखे लोगो को, विदेशी उठा ले जाते है। और उन्ही के ज्ञान से, विश्व बाजार को चलाते है। और दुनियाँ की महाशक्ति कहलाते है। और हम उनकी कामयाबी पर, भारतीय मूल का तम्बा लगते है। और इसी में खुश ह...
क्या महिलाएं सशक्त हो गयी है?
आलेख

क्या महिलाएं सशक्त हो गयी है?

विश्वनाथ शिरढोणकर इंदौर म.प्र. ****************** स्त्री और पुरुष उस सर्वशक्तिमान की अमूल्य भेंट है। आजतक के विकास में स्त्री और पुरुष की समान हिस्सेदारी भी है। इतना होते हुए भी हर समय यश, प्रसिद्धी, मानसन्मान, निर्णय लेने का अधिकार हमें हरस्तर पर आज पुरूषों के लिए ही दिखाई देता है। देश में हर स्तर पर महिलाओं के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए परन्तु ३३ प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव भी पुरूषों के अड़ियल और महिलाओं के प्रति उनके नकारात्मक द्रष्टिकोण के कारण अनेक वर्षों से लोकसभा में लंबित था। वैसे भी वर्तमान में महिला सशक्तिकरण की अनेक योजनाये कार्यरत है, परन्तु लचर मानसिकता और भ्रष्टाचार के कारण वांछित परिमाण देश में दिखाई नहीं दे रहे है। पुरुष सत्तात्मक समाज में आज भी महिलाओं को पुरूषों के बाद का ही दर्जा दिया जाता है। समानता को स्वीकार करने की मानसिकता ही दिखाई नहीं देती। मजे की बात ...
अपना घर
लघुकथा

अपना घर

सीमा निगम रायपुर (छत्तीसगढ़) ******************** अपने घर का सपना सबका रहता है और आज मेरे घर का सपना पूरा होने जा रहा है तो आप अम्मा-बाबूजी को साथ चलने के लिए मत कहना। "मानसी अपने पति अमित को सख्त लहजे में बोल रही थी। "ये कैसी बात कर रही हो तुम एक ही शहर में अम्मा बाबूजी को अलग छोड़कर रहेंगे तो लोग क्या कहेंगे" अमित ने समझाया पर मानसी जिद में अड़ी रही अम्मा-बाबूजी ने दुखी मन से जाने की इजाजत दे दी। पिछले साल ही किश्तो में कर्ज लेकर नई कालोनी में घर लिये थे नये घर मे आकर मानसी उसे सजाने संवारने में लग गयी। गृहप्रवेश भी बहुत धूमधाम से किया। नये घर का आकर्षण अकेले रहने का रोमांच मानसी को लग रहा था कि जिन्दगी में सुख ही सुख है। हर रविवार को अमित अम्मा-बाबूजी से मिलने जाता व उनकी दवाई और जरूरी सामान रख आता।                    अपने घर में रहते मानसी को छः माह हो गए। धीरे-धीरे आर्थिक समस्या ह...
माता-पिता का आशीष
कविता

माता-पिता का आशीष

वीणा वैष्णव कांकरोली ******************** घने वृक्ष छांव से, घनी मात पिता आशीष छाया। पड़कर लोभ लालच मनु, सौभाग्य यह गवाया।। पत्नी प्यार अंधा हो, मात पिता को ठुकराया। जीवन लगा दिया, तूने उन्हें वृद्धाश्रम पहुंचाया।। तेरी बारी भी आएगी, क्योंकि तूने भी पुत्र जाया। जैसा देखा वैसा किया, यही विधाता की माया।। पुत्र वह तेरा है लेकिन, पत्नी बाहर से वो लाया। होगा एहसास, जब खेल यही तेरे संग दोहराया।। सुख दुख दोनों सहता, मात पिता आशीष छाया। श्रवण जैसा क्यों ना बना, बना विभीषण भाया ।। मात-पिता वचन पूरा करने, राम ने वन पाया। सुख दुख सहे बहू, तभी तो जग ना बिसराया।। इतिहास अमर हो गया, राम संग लक्ष्मण भाया। कैकयी को कुयश मिला, नाम न कोई दोहराया।। माता पिता आशीष छाया, जिसने जीवन में पाया। स्वर्ग सुख धरा पर, उस परिवार ने ही सदा पाया . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष्णव वर्तमान में राजकीय उच्च माध...
उतरन
लघुकथा

उतरन

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ******************** देवकी सुनो, जी दीदी चलो मेरी मदद करो। दीपावली की साफ सफाई करनी में, चलो पहले मेरा कमरा साफ करते हैं। ऐसा करो मेरी अलमारी पहले साफ कर दो। अलमारी के सारे कपड़े निकाल लो, और जो पुराने हैं उन्हें अलग रखना, और जो नये हैं उन्हें अलग। फिर आवाज आई, देवकी देख तो यह सलवार सूट कितना सुंदर है? हाँ दीदी बहुत सुंदर है। तो ऐसा कर इसे अपनी बेटी ममता के लिए ले जा। इसे पहनकर ममता बहुत सुंदर लगेगी। और यह उसे  आ भी जाएगा। मैं तो केवल एक-दो बार ही पहनीं हूं। दीदी पर अरे ! पर वर कुछ नहीं, प्यार से दे रही हूं ना तो रख ले। यह  बात नहीं  है दीदी, मैं तो आपकी दी हुई हर साड़ी पहन लेती हूं, कभी मना नहीं करती। पर अपनी बेटी को उतरे हुए कपड़े नहीं पहनाऊंगी दीदी। देवकी के मुंह से यह बात सुनकर प्रभा के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। . परिचय :- श्रीमती शोभारानी तिवा...
कब तक
कविता

कब तक

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** कब तक करता रहूंगा मैं घृणा, ईर्ष्या, क्रोध कब तक उलझा रहुगा मोह, माया, काम मे कब तक रहूंगा अमानवीय, पशुवत, अहंकारी कोई तो सिमा तय होगी मेरे अपराधों की। क्यो नही उबारता मुझे कुकर्मो से मैं अज्ञान के अंधकूप में समझ रहा हु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, जान कर भी ये सब कुछ मिथ्या है मानता नही हूँ। सत्य से परे कब तक रखेगा मुझे अपनी ही अग्नि में जलने लगा हूँ। जीना चाहता हूँ मैं जीने दो मुझे जगा कर मेरे भीतर प्रेम व करुणा सहज सामान्य कर सृष्टि का अंग बना दो मुझे। . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अप...
मेरे लबों को
कविता

मेरे लबों को

चेतना ठाकुर चंपारण (बिहार) ******************** मेरे लबों को छूकर तूने- बहुत बड़ी गलती कर दी। अब न सोंऊगी मैं - न नींद तुझे आयेगी। रात रात भर जगूंगी मैं- और आंख लाल तेरी हो जाएगी। ना हूं तुम्हारे पास फिर भी - तेरा एहसास करूं। न जाने कैसी है प्यास- ना मिटे किसी द्रव ना पानी से मिट सकती है बस- तेरी मेहरबानी से। श्याम की मीरा शिव की सती- देवों के देव्यायनी बना दी। एक सीधी सी लड़की को- दीवानी बना दी। मेरे लबों को छूकर तूने...... . परिचय :-  नाम - चेतना ठाकुर ग्राम - गंगापीपर जिला -पूर्वी चंपारण (बिहार) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.comपर अणु डाक (मेल) की...
तीसरी लहर
कविता

तीसरी लहर

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** तीसरी लहर आ रही है इस मानवी शताब्दी मे हर ओर है और होगी नयापन इस सभ्यता की तीसरी लहर मे वासनाए घुरेगी इस तीसरी लहर मे फैसन नहीं नंगापन श्रृंंगार नहीं शरारत इस तीसरी लहर मे अंग प्रदर्शन पहले भी हुआ करती थी अंजता की गुफाओं मे पर्दे के अन्दर छुप छुपकर। यादगार विज्ञान की सूत्र मे विज्ञान नहीं सिखाती मिट्टी मिल जाओ। अपनी संस्कृति की धज्जि उड़ाओ शराब पीना हानीकारक हैं फिर भी पीते है अधिकाशं आधुनिकता के पोषक। इस तीसरी लहर मे अंग प्रदर्शन अपराध के जनक है आए दिन ऐसी खबर समाचार पत्र भी देती है अपराध बढती जा रही है इस मानवी शताब्दी मे। कुछ अटपटी तेवर बदल रहे है शस्त्रों की होड़ मे जी जान तोड़ के एटोमिक रिएक्टर मे एटम हाइड्रोजन बम बन रहे है दुरमारक प्रक्षेपास्त्र से विनाशकारी लीबास हम सज रहे है अंधकार की गहन कूप मे धीरे धीरे खिसक रहे हैं। . लेखक...
परवरिश
लघुकथा

परवरिश

केशी गुप्ता (दिल्ली) ********************** कॉफी हाउस से गुस्से में उठ स्नेहल बदहवास सी बिना रुके चलती ही जा रही थी स्वाति ने आवाज दी स्नेहल रुक जाओ मगर स्नेहल अनसुना कर वहां से निकल गई उसे मंजिल की खबर नहीं थी। ना जाने वह किस बात की सजा खुद को दे रही थी? आनंद और स्वाति कुछ ना कर सके। स्नेहिल जिंदगी से खफा थी सब कुछ होते हुए भी जिंदगी में कड़वाहट थी। मां बाप के बीच की दूरी ने उसके अंदर एक अजब अहसास पैदा कर दिया था। जाने अनजाने कब वह दोनों से दूर हो गई पता ही नहीं चला। स्वाति ने स्नेहल के पैदा होने पर अपनी दुनिया को बहुत छोटा कर लिया था। उठते बैठते उसे सिर्फ और सिर्फ स्नेहल का ख्याल था। जी जान से उसकी परवरिश में खो गई यहां तक कि नौकरी भी छोड़ दी मगर फिर भी स्नेहल को बांध ना सकी। बच्चों की परवरिश में कितना ही समय दो मगर बात फिर वही जन्मों के संबंधों और किस्मत के लिखे पर आ जाती है, चाहे अनचा...
एहसास
कविता

एहसास

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** क्यों होता है एहसास तुम्हारे होने का, हर आहट पर क्यों लगता है, तुम हो...... मुझे पता है, तुम आहट में तो क्या... इस जमीन पर भी नहीं हो, फिर भी क्यों होता है एहसास, तुम्हारे होने का, हवा की आंधी से, पत्तों की आहट से, क्यों होता है एहसास, तुम्हारी बातों का, कदमों की आहट से, दिल में बढ़ती धड़कन से, क्यों होता है एहसास, तुम्हारे आने का, अंतिम विदाई दी थी हमने, अपनी इन भीगी पलकों से, फिर भी क्यों होता है एहसास, तुम्हारे होने का....!! . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, हिमालिनी नेपाल, हिंदी रक्षक मंच (hindiraksh...
घोर आतंक
कविता

घोर आतंक

मनोरमा जोशी इंदौर म.प्र. ******************** कैसा ये आतंक मचा, असहनीय आत्मघाती। हर दिशा से रूदन, की आवाज आती। जर्जरित  अवसाद से, प्रत्येक छाती। कामनाओं की पिपासा, हैं सताती, यह दशा दयनीय मानव, को रूलाती। हम बनायें सुखद पथ , नव जिन्दगी का, शांन्ति पा जाये मनुज, उस राह चलकर। गूँज जायेगी गिरा, संदेश बनकर, थम जायेगा कहर , संदेश सुनकर । . परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी का प्रकाशन होता रहा है। राष्ट्रीय कीर्ति सम्मान सहित साहित्य शिरोमणि सम्मान और सुशीला देवी सम्मान प्रमुख रुप से आपको मिले हैं। उपलब्ध...
चले जाओ
कविता

चले जाओ

शिवम यादव ''आशा'' (कानपुर) ******************** छोड़ कर चले जाओ मुझे कोई गुरवत नहीं मगर दिल के खातिर एक दुआ दे दो अभी मैं हूँ अकेला अकेला देखना अब तुम्हें है नहीं मैं जिन्दा हूँ या मुर्दा हूँ ये अब न सोचना कभी क्या क्या मुझपे बीता कैसे कैसे हूँ मैं जीता फ़िकर हूँ करता नहीं खुल से मुँह मोड़ता नहीं . लेखक परिचय :-  आपका नाम शिवम यादव रामप्रसाद सिहं ''आशा'' है इनका जन्म ७ जुलाई सन् १९९८ को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात ग्राम अन्तापुर में हुआ था पढ़ाई के शुरूआत से ही लेखन प्रिय है, आप कवि, लेखक, ग़ज़लकार व गीतकार हैं, अपनी लेखनी में दमखम रखता हूँ !! अपनी व माँ सरस्वती को नमन करता हूँ !! काव्य संग्रह :- ''राहों हवाओं में मन" आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी ...
दादा
कविता

दादा

गोरधन भटनागर खारडा जिला-पाली (राजस्थान) ******************** जो हर बात पर टोके, कामयाबी पर झूमे। जो पास बैठा-कर पढाए अनेकानेक कहानियां सुनायें।। ये सब सिखलाते जो बोले....। बेटा बाहर मत जा, तु बैठ जा। खाना खाया या नहीं? हर बात को जो पूछे। जो आँखो की नमी को पढ ले।। जो जीवन की सीख दे, अपने अनुभव खूब बताते। हर छोटी सी बात बताते। जो हमको गीत सुनायें।। आ बैठ मेंरे पास,अपना हाल जो हर जो हर पल पुछे। अपना हर दर्द जो जाने धीरे-धीरे हर बात को बतलाएँ। नफा नुकसान सब सिखलाते। स्कुल गया या नहीं, आ बैठ। वो अनपढ़ ही सही हर बात, समझते हैं।। सच कहूँ मैं, ये ईश्वर का रूप होते हैं। देखा नहीं मैंने ईश्वर कैसा होता हैं, मगर वो झलक दादा में देखी हैं। सही गलत का अहसास कराये। पिता के पीटने पर छुड़ाए। दादा खुदा की खूब बनावट हैं। सच कहूँ ये ईश्वर का छोटा सा रूप, हैं धरती पर।। . परिचय :- नाम : गो...
उठो क्रांति का ले मशाल
कविता

उठो क्रांति का ले मशाल

ओम प्रकाश त्रिपाठी गोरखपुर ********************** उठो क्रांति का ले मशाल, फिर से ज्वाला दिखला डालो। सडे गले इस सिस्टम से, अब अपना पिंड छुडा डालो।। इस सिस्टम को इन नेताओं ने, स्वयं हेतु निर्माण किया। अपने हित को साध सके, इसका खूब बिधान किया।। तीस साल पढने मे बिताओ, पैतीस मे रिटायर हो जाओ। कहते बैंक से कर्जा लेकर, रोजीरोटी मे लग जाओ।। पर अपनी रिटायरी के उम्र का कोई कानून नहीं लाया। सत्तर के भी हो जाने पर मंत्री पद को इसने पाया।। जनता का हित करना हो तो पैसे इनके पास नही। अपना वेतन बढता है जब होती कोई बात नहीं।। आना जाना दवा व दारू इनका सब कुछ जनता पर। पता नहीं फिर वेतन भी क्यों लदता है फिर जनता पर।। कहते हैं सब जन समान हैं भारत की इस भूमि पर। फिर असमान कानून यहां क्यों बनते भारत भूमि पर।। इसीलिए तो कहता हूँ कि उठो बाण संधान करो। एक और क्रांति के खातिर जन जन का आह्वान करो।।जय हिन्द।। . लेखक...
घोर कलयुग
कविता

घोर कलयुग

वीणा वैष्णव कांकरोली ******************** देखो मेरे देश में, गुनहगार खुलेआम घूम रहे हैं। बेगुनाह नहीं मिली जमानत, सजा काट रहे हैं।। एनकाउंटर को गलत, कुछ मनचले ठहरा रहे हैं। देश की कानून व्यवस्था को, सही बता रहे हैं।। हम क्या करेंगे फिर, न्यायाधीश यह कह रहे हैं। तारीख पर तारीख, देने के सिवा कर क्या रहे हैं।। कर गुनाह पहुँच वाले, जमानत पैसों से पा रहे हैं। बेगुनाह के मां-बाप, कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं।। जिंदगी गुजर गई, फिर भी जमानत नहीं पा रहे है। घर खेत सब बेच दिए, नेताओं के पैर पकड़ रहे हैं।। कत्ल बलात्कार करने वाले, सरेआम घूम रहे हैं। इनको देखकर ही तो, दुष्कर्म देश में बढ़ रहे हैं।। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष्णव वर्तमान में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय फरारा में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। कवितायें लिखने में आपकी गहन रूचि है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आद...
बात की बात पर चतुष्पदियाँ
कविता

बात की बात पर चतुष्पदियाँ

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** भाव के ज्वार में नहीं बहना। क्रोध की आग में नहीं दहना। बात कहना हो जब कहीं कोई, देर तक आप सोचते रहना। ग़ुस्से में हो नदी तो किनारों से बात कर। ग़ायब हो चांदनी तो सितारों से बात कर। पाबंदियों के ज़ुल्म से चुप हो अगर ज़ुबाँ, आंखों से,उंगलियों से,इशारों से बात कर। कठिनाई का हल आवश्यक होता है। आग लगे तो जल आवश्यक होता है। केवल बातों से ही बात नहीं बनती, सीमाओं पर बल आवश्यक होता है। परिपक्वता विचार में आए तो कुछ कहूँ। उपयुक्त शब्द भावना पाए तो कुछ कहूँ। संक्षिप्त सारग्राही सरल शुभ कथनसमूह, अधरों को अपना मित्र बनाए तो कुछ कहूँ। सभी की बात सुनी जाए आज। तर्क की रूई धुनी जाए आज। अब समस्या नहीं रही बच्ची, चदरिया हल की बुनी जाए आज। . साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्र...
लिखते रहेंगे
कविता

लिखते रहेंगे

मो. जमील अंधराठाढी (मधुबनी) ******************** हम लिखते रहेंगे अन्याय के खिलाफ मेरी कलम हमेशा चलेगी मैं सच्ची बात लोगों तक पहुंचाऊंगा मेरी कलम लोगों को फायदे पहुंचाएगी मैं अपनी कलम से नफरत को जड़ से मिटाकर रहुंगा मैं अपनी कलम से लोगों को जागरूक करुंगा मेरा काम है लिखना पढ़ना और लोगों तक प्रेम की बातें पहुंचाना जिसकों अभी तक इंसाफ नहीं मिला मैं अपनी कलम के माध्यम से इंसाफ दिलाऊंगा मैं कविता लेख के माध्यम से लोगों को जागरूक करुंगा मैं अपनी कलम से बलात्कारी जैसी घिनौनी हरकत को खत्म करके रहुंगा मैं अपनी कलम से नारी को सम्मान दिलाऊंगा मैं अपनी कलम से बुराइयों को दफन करके रहुंगा मैं अपनी कलम से चहुंओर खुशियाँ पहुंचाऊंगा अपनी कलम से बेसहारा को सहारा दिलाकर रहुंगा मैं अपनी कलम हमेशा चलाता रहुंगा। . परिचय :-  मो. जमील अंधराठाढी (मधुबनी) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां,...
मौत का पैगाम
कविता

मौत का पैगाम

सुरेखा सुनील दत्त शर्मा बेगम बाग (मेरठ) ********************** जिंदगी क्या है, एक महासागर, जिसमें, हजारों गम है, हजारों खुशियां, और....... कभी ना खत्म, होने वाला इंतजार, जो हमेशा, आने वाले गम का, सामना करने के लिए, तैयार रहता है, उस खुशी का स्वागत, करने के लिए, जो उसके जीवन में, बहार बनकर आने वाली है, नहीं करता वो "इंतजार" केवल "मौत" का, और वक्त अचानक, दस्तक देता है, उसके दरवाजे पर, हवा बनकर, "मौत का पैगाम लेकर", जिसका उसे, एहसास भी नहीं होता, "और वक्त", इस शरीर की सीपी से, मोती सी सांस निकालकर ले जाता है।। . परिचय :-  सुरेखा "सुनील "दत्त शर्मा जन्मतिथि : ३१ अगस्त जन्म स्थान : मथुरा निवासी : बेगम बाग मेरठ साहित्य लेखन विधाएं : स्वतंत्र लेखन, कहानी, कविता, शायरी, उपन्यास प्रकाशित साहित्य : जिनमें कहानी और रचनाएं प्रकाशित हुई है :- पर्यावरण प्रहरी मेरठ, हिमालिनी नेपाल, हिंदी रक्षक...
मुझको आता नहीं बिखरना,
कविता

मुझको आता नहीं बिखरना,

गोरधन भटनागर खारडा जिला-पाली (राजस्थान) ******************** मुझको आता नहीं बिखरना, यू गिरना मैंने सीखा नहीं । चलता हूँ, मैं बीना रूके, रूकना मेंरी आदत नहीं ।। मुझको आता नहीं बिखरना......। देखा नहीं अभी तो जीवन, जीना है, बहुत अभी । उम्र नहीं हैं, अभी मेरी , मुझको आता नहीं बिखरना.....। अभी कैसे रूक जाऊ , कैसे मैं थक जाऊ। कुछ देखा नहीं अभी तो, जीने की भी नहीं चाहत। मुझको आहट सी लगती हैं ।। मुझको आता नहीं बिखरना.....। कुछ कर गुजरने की ताकत हैं, मुझमें । बस! वो दिखाने आया हूँ । मुझको आता नहीं बिखरना.....। . परिचय :- नाम : गोरधन भटनागर निवासी : खारडा जिला-पाली (राजस्थान) जन्म तारीख : १५/०९/१९९७ पिता : खेतारामजी माता : सीता देवी स्नातक : जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित कर...
समय की चक्रधर
कविता

समय की चक्रधर

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** समय की चक्रधर घूम-घूम कर, नियति की हाथों का स्पर्श पाकर, वही सुकोमल, कभी भाव बिहवल। कभी अनेकों-कर्म बल से जुड़कर, कभी अपनापन कुछ पाकर, कभी कुछ खोकर। पा लिया था एक सुघड़ अंतस, बस बसना था एक सुंदर सा घर, जहां शांति और, अटूट प्रेम था। तभी झंझावात की, थपेड़ों ने, बिखरा दिया उसकी स्वप्निल- नीर का तिनका तिनका, आश्रय हिन बना दिया- उसे पंख हीन बना दिया। किसी की बेसुरी चैन ने- शायद उसे बेचैन बना ही दिया। लेकिन आज भी उसे याद है- फरियाद और आह है- उसे देख कर अपराध बोध में- खो जाता हूं उदासी देखकर। वह और बेचैन होकर फिर- बीते समय की चक्र में गुमसुम हो जाती है। मुझे देख कर एक लंबी उच्छ्वास लिए, करुण ऐकटक निहार वेदना पूरित नेत्रों से पुकार कर जाती है। . लेखक परिचय :-  नाम - ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम - गंगापीपर जिला -पूर्वी...
चोट छुपती नही
गीत

चोट छुपती नही

संजय जैन मुंबई ******************** गीत लिखते हो तुम, गीत गाता हूँ में। सुन कर मेरा गीत, मुस्कराते हो तुम। मेरे धड़कनो में, बस गए हो तुम। दिल मेरा अब, मेरे बस में बिल्कुल नही। कैसे तुम को बताऊं, हा ले इस दिल का। चोट दिल पर लगी, जो छुपती नही। कुछ दवा या म्हलाम, तुम लगा दो इस पर। हम तेरी शरण में, आये है जानम।। अब रहा जाता नहीं, तेरे गीतों को गा के। दिल बहुत बैचैन, मेरा हो जाता है। तेरे दिल में, जो भी चल रहा है। एक बार तुम आकर, तुम मुझसे कहा दो। शायद दोनों के दिल, एक हो जाएंगे। एक नया इतिहास, हम दोनों लिख जाएंगे। और मोहब्बत अपनी, अमर कर जाएंगे।। . लेखक परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं हिंदी रक्षक...