बम बनाकर, बम हो गए
अशोक शर्मा
कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश)
********************
अपने भौतिक विचारों से,
और कलुषित व्यभिचारों से,
देखो ना हम क्या हो गए?
बम बनाकर, बम हो गए।
मानव का ही सोचा विस्तार,
मानवता पर ना किया विचार,
जमीन पा हम ज़मीर खो गए,
बम बनाकर, बम हो गए।
कितना चिकना सुंदर ऊपर,
सबसे बुद्धिमान है भू पर,
घृणा बीज दिलों में बो गए,
बम बनाकर, बम हो गए।
बम है विनाश का ढेला,
घृणा गद्दारी का रेलमरेला,
भर, आंखें बंद कर सो गए,
बम बनाकर, बम हो गए।
परिचय :- अशोक शर्मा
निवासी : लक्ष्मीगंज, कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कवि...






















