विरह वेदना
विवेक रंजन 'विवेक'
रीवा (म.प्र.)
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(राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता विरह वेदना में प्रथम विजेता रही कविता)
गाल हथेली पर रख के मैं तनहा सी बैठी रहती,
उस पर भी खामोशी जाने क्यों मुझसे रूठी रहती।
याद तुम्हारी तो तन मन में कस्तूरी सी बसती है,
तुम तो होते पास नहीं हर रात विरह की डसती है।
धीर रखती हूँ बहुत पर नीर पलकों से छलकते,
दर्द कातर हो उजागर कांपने लगते फलक से।
जब मिलन के गीत कोई झुरमुटों के पार गाता,
पीर के अतिरेक में फिर आह निकलती हलक से।
अब नहीं अभ्यर्थना में मेघ बनकर दूत आते,
गर्जना घनघोर करते और रह रह कर डराते।
चांद की भी क्या कहूं ऐसे तिल तिल कर जलाये,
ज्यों सुहानी रात हो फिर भी कुमुदिनी खिल न पाये।
अब किसी टहनी के दिल से फूल मैं ना तोड़ सकती,
वेदना क्या है विरह की अब बिछुड़ कर मैं समझती।
अपने साजन के बिना सचमुच मुझे कु...
























