चेहरा
रुचिता नीमा
इंदौर म.प्र.
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बहुत मुश्किल है रुचि...
इस दुनिया को समझना...
कि लोग .....
मन मे कुछ ...
और जुबा पर कुछ और रखते है...
लोग अपने अंदर ही अनेक किरदार बसा रखते है
खुद क्या है,
ये कभी जान ही नहीं पाते
और दूसरों को समझने के दावे हजार करते है
जिस तरह लगा रखे है चेहरे पर चेहरे...
असली को जानने के भी आईने हजार लगते है...
देखते है जब वो
खुद की सूरत को आईने में...
हर बार सीरत के मायने हजार निकलते है...
बहुत मुश्किल है रुचि...
इस दुनिया को समझना
कि एक इंसान से ही हजार निकलते है...
बेहतरी यही है कि छोड़ दु मैं
अब इस दुनिया को समझना...
और जो जैसा है उसे वैसे ही कबूल करना।...
पर उसके भी पहले जरूरी है यही कि
खुद को ढूंढकर, खुद को समझना...
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लेखिका परिचय :- रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जू...



















