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कविता

रघुराम कहाँ से लाऊँ
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रघुराम कहाँ से लाऊँ

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** दुनिया में चारों तरफ रावण-ही-रावण है, मैं मर्यादा पुरुषोत्तम रघुराम कहाँ से लाऊँ। असत्य, अधर्म और पाप का बोलबाला है, सत्य, धर्म दृढ़ कर राम राज्य कैसे बनाऊँ।। बहन-बेटियों के चैन और सुकून को छीनने, दस सिर लिए कई रावण घूमते गली-गली। बहला-फुसलाकर, जोर-जबरदस्ती करते, गौरव नारी को हर कर मचाते हैं खलबली।। कौन कहता है लंका पति रावण मारा गया, वह तो लोगों के मन में अभी भी है जिंदा। बुरे विचारों को शातिर मस्तिष्क में पनपाते, कहीं बलात्कार और हत्या करते हैं दरिंदा।। यदि कोई मनुष्य फिर बन गया रावण कहीं, हर साल दशहरे के दिन आग से जलाएंगे। बुराई पर अच्छाई की जीत सदा होती रहेगी, कलियुगी रावण को, राम बन मार गिराएंगे।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : सहायक शिक्षक सम्मान : मुख्यमंत्री शिक्...
जिंदगी की रेलगाड़ी
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जिंदगी की रेलगाड़ी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां जिंदगी एरोप्लेन या रेलगाड़ी नहीं, पर घिसट-घिसट कर चल रही, एक्सप्रेस, सुपरफास्ट तो नहीं कह सकता, पर पैसेंजर रेल सा ही बहता, कभी सिग्नल नहीं मिल पाता, कभी टाइमिंग के इंतजार में खड़ी रह जाती है जिंदगी, कभी जबरन जीवन में घुस आये नेता या रिश्तेदारों की तरह खड़ी कर दी जाती है घंटों जंगल में, नहीं पड़ रहा रंग में भंग पर रुकावटें रौद्र रूप लिए खींच रही अपनी ओर फुफकारते बाधा डाल रहे अपने मंगल में, समझ ही नहीं आ रहा जियें, जीने की आस छोड़ दें, या जिये जायें घिसटते कीड़ों जैसे, बचे उम्र दिखाएंगे रंग कैसे कैसे, कभी चल पड़ती है जिंदगी तो पता नहीं क्यों भयंकर दर्द का अहसास करने लगते हैं सारे के सारे रिश्तेदार, क्या मालूम ये वेदना है या खुशी की खुमार, एक बात तो जान पाया कि कहने के लिए होती है जिंदगी हसीं,...
दीवारें
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दीवारें

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** दीवारें सब सुनती हैं, सहती है आत्मसात करती हैं खिलखिलाहट और दर्द की राज़दार होती हैं घर की दरकती दीवारें, रिश्तों के टूटन का आभास कराती हैं कभी बुने थे हजारों सपने कई आकांक्षाये कुछ कढ़ गए हैं कहानी में कशीदाकारी की तरह पुरखों की यादे समेटे स्वयं में ये दीवारें हमसे तुमसे कुछ कहना चाहती हैं समय मिले तो जरूर आकर मिलना, इन दीवारों से जिसकी नींव चुनी थी पूर्वजों ने अपने खून पसीने से संदेश सुनने को तरस रही हैं आज ये दीवारें झुक चुकी हैं, फिर भी टूटी नहीं हैं, खड़ी हैं गर्व से सिर उठाए अपने दम पर हैं इंतजार में कि गूंजेगी खिलखिलाहट और संगीत के स्वर फिर एक बार किलकारियों से सुखद अनुभूति कराएंगी नई फसले फिर से आंगन रोशनी से जगमगा उठेंगे इस कल्पना ने नए प्राण फूंक दिए हैं मानो इन...
अपने-अपने रावण
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अपने-अपने रावण

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हर जीवात्मा में होते सदा रावण या सदाचारी श्रीराम बुराई का प्रतीक है रावण तो अच्छाई दर्शाते श्रीराम काम, क्रोध, लोभ, मोह व मद जो दे देते तिलांजलि इनको वे हैं राम जैसे ही चरित्रवान लिखा जाते इतिहास में नाम पाँच विकारों के वशीभूत जो बन जाते दुष्ट दुराचारी सिया-हरण सा पाप करते जग में कहलाते हैं ये रावण मानव स्वकर्मो से ही बनता जो भी चाहे, रावण या राम क्यूँ न हरा दें इस रावण को बन जाएँ मर्यादा पुरुषोत्तम हराकर दशाननी विकारों को दशरथसुत राम ही बन जाएँ करके स्थापना रामराज्य की धरा पर स्वर्ग ही अब उतार दें आज सबके हैं अपने रावण रिश्तों, कुर्सी की मारामारी में अत्याचार, अनाचार, आतंक में महाभारत का ही बोलबाला है परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि ...
पावन विजय-दशहरा
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पावन विजय-दशहरा

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** है असत्य पर सत्य की, विजय दशहरा पर्व। पराभूत दुर्गुण हुआ, धर्म कर रहा गर्व।। है असत्य पर सत्य की,विजय और जयगान। विजयादशमी पर्व का,होता नित सम्मान।। जीवन मुस्काने लगा, मिटा सकल अभिशाप। है असत्य पर सत्य की, विजय दशहरा ताप।। है असत्य पर सत्य की, विजय लिए संदेश। सदा दशहरा नम्रता, का रखता आवेश।। है असत्य पर सत्य की, विजय लिए है वेग। विजयादशमी पर्व है, अहंकार पर तेग।। नित असत्य पर सत्य की, विजय खिलाती हर्ष। सदा दशहरा चेतना, लाता है हर वर्ष।। तय असत्य पर सत्य की, विजय बनी मनमीत। इसीलिए तो राम जी, लगते पावन गीत।। नारी का सम्मान हो, मिलता हमको ज्ञान। है असत्य पर सत्य की, विजय दशहरा आन।। है असत्य पर सत्य की, विजय सुहावन ख़ूब। राम-विजय से उग रही, धर्म-कर्म की दूब।। यही सार-संदेश है, यही मान्यता न...
प्रेम है अनमोल न्यारा
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प्रेम है अनमोल न्यारा

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** छंद मनोरम २१२२ २१२२ प्रेम है अनमोल न्यारा, ईश का उपहार प्यारा।। प्रीत बिन जीवन अधूरा, विश्व हो रस सिक्त पूरा। प्रेम रस जिसने पिया है। धन्य जीवन को किया है। नित्य बरसे स्नेह धारा। प्रेम है अनमोल न्यारा।। पियु सुहाना प्यार ऐसा। रस अमिय का सार जैसा। चार नैना बात करते। प्रीत हिय की दाह हरते। साँस में अनुराग सारा। प्रेम है अनमोल न्यारा।। हो हृदय में भाव निर्मल। तब पनपता प्रेम हरपल। बाग खुशियों का महकता। मोर मन का है गहकता। प्रीत बिन संसार खारा। प्रेम है अनमोल न्यारा।। प्रिय बहुत मुझको सुहाता। प्यार उनका है लुभाता। मीत जब-जब बात करता। दिव्य झर-झर प्रेम झरता। नैन का है मीत तारा। प्रेम है अनमोल न्यारा।। परिचय :- डॉ. भावना नानजीभाई सावलिया माता : वनिता बहन नानजीभाई सावलिया पिता : नानजीभाई ...
जान तेरी
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जान तेरी

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** बिछुड़न तेरी तड़प मेरी धड़कन तेरी आह! मेरी सौदाई तेरी मोहब्बत मेरी यादें तेरी इंतजार मेरा बेवफाई तेरी वफ़ा मेरी भूलना तेरा यादें मेरी लड़ाई तेरी प्रेम मेरा धोखा तेरा विश्वास मेरा फटकार तेरी मिलान मेरा महबूबा तेरी हमदर्द मेरा जान तेरी दिल मेरा सांसे तेरी तू मेरा .... परिचय :-  सीमा रंगा "इन्द्रा" निवासी :  जींद (हरियाणा) विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ हेतु प्रचार, रक्तदान शिविर में भाग लिया। उपलब्धियां : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से प्रशंसा पत्र, दैनिक भास्कर से रक्तदान प्रशंसा पत्र, सावित्रीबाई फुले अवार्ड, द प्रेसिडेंट गोल्स चेजमेकर अवार्ड, देश की अलग-अलग संस्थाओं द्वारा कई बार सम्मानित बीएसएफ द्वारा सम...
शिक्षा और चेतना
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शिक्षा और चेतना

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** लोग इस धरा पर आते गए, अपनी पहचान खातिर कुछ न कुछ बनाते गए, पर बुद्धि और विज्ञान के अनुयायी अपने किये कराये पर धरे रह गए, कैसे भयंकर बदलाव सह गए, आर्यों का हुजूम इस धरती पर आया, अपने लिए मंदिर बनाया, मुगल लोग आये, अनेकों मस्जिद बनाये, गोरे भी आये, साथ में चर्च भी लाये, पर शोषितों, वंचितों के जीवन में ज्योतिबा आया, ज्योति पुंज लाया, मां सावित्री आई, स्त्री शिक्षा लाई, बाद भीमरावआया, संघर्षों से तपकर संविधान लाया, इंडिया इज भारत बताया, जिनके कारण हम ऊंचा सर करते हैं, हाथों में किताबें और तन में कपड़े धरते हैं, और फिर कांशी आया, सत्ता से दूर बैठे सहमें अभागों में राजनीतिक चेतना जगाया। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि ...
कृष्ण पथ
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कृष्ण पथ

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** प्रेम पथ पर मुझे भी चलना है चल कान्हा मुझे भी अब तेरे संग चलना है। रंग जाऊं तेरे रंग में सांवरिया ऐसा प्रेम अब मुझे भी तुमसे करना है। मिट जाए अब मन की हर अभिलाष मुझे भी तेरे संग ऐसा योग नाद करना है। अपने पराये का भेद मुझे भी अब नहीं करना है सुनकर तुमसे गीता का ज्ञान अब महा ध्यान करना है। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्...
भुखमरी
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भुखमरी

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** चरम पर कलियुग है भावनाओं की भुखमरी है पुरुषार्थ बदल रहा है ह्रदय की आराजकता, बिखरी हुई मानसिकता मानवता को खाया जा रहा‌ है लोलुपता की दृष्टि भी लोलुप है उदात्तभाव की भुखमरी है जिधर देखो उधर खाया ही जा रहा है रिश्वत तो आराम से खाया जा रहा है। वस्त्र, राशन, अखबार, इंसान सबको मिलावट का रंग खाएं जा रहा है वासना स्वच्छंद है पुरुषार्थ निर्बाध, निर्द्वंद्व है उठते थे हाथ असहाय, दीन, मातृशक्ति की रक्षा पर वहीं हाथ उनके भक्षक‌ नजर ही नजर में गिर गई मर चुकी है आत्मा स्त्रीत्व को खाया जा रहा है पुरुषार्थ का अर्थ बदल रहा है । किताबें तो अब पढी‌ नही जातीं वो भी दीमक खाए जा रहा है कामना नहीं है वश में भौतिकता पूर्णतः हावी है आध्यात्मिकता की भुखमरी है इंसान इंसान को, इंसान को घुन खाए जा रहा है इ...
मेरे मालिक
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मेरे मालिक

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** इनकार न कर पाएंगे, स्वीकार न कर पाएंगे। मेरे मालिक इससे ज्यादा, हम प्यार न कर पाएंगे। इनकार न कर पाएंगे, स्वीकार न कर पाएंगे। हम अज्ञानी ये क्या जाने तू कितना निराला है..2 मिल गया तू जिसको वो तो समझो किस्मत वाला है..2 कितना दयालु है इसका उदगार न कर पाएंगे, इनकार न कर पाएंगे, स्वीकार न कर पाएंगे। मेरे मालिक इससे ज्यादा, हम प्यार न कर पाएंगे। इनकार न कर पाएंगे, स्वीकार न कर पाएंगे। सबकी जीवन नैया तो तेरे हीं सहारे है...2 हार-फूल कुछ पास नहीं ले हृदय पधारें हैं...2 सब कुछ तेरा ही है दिया अधिकार न कर पाएंगे। इनकार न कर पाएंगे, स्वीकार न कर पाएंगे। मेरे मालिक इससे ज्यादा, हम प्यार न कर पाएंगे। इनकार न कर पाएंगे, स्वीकार न कर पाएंगे। दया करो हे दयानिधि हम दर पर आए हैं...2 कब होगा दर्शन तेरा ये आ...
नौजवानों उठो, जागो
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नौजवानों उठो, जागो

महेन्द्र साहू "खलारीवाला" गुण्डरदेही बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** हे नौजवानों उठो, जागो अपने शौर्य को जानो तुम। तुम ही देश के हो कर्णधार अपनी प्रतिभा पहचानो तुम।। तुमसे ही देश समृद्ध, गुलज़ार है तुमसे ही देश का बेड़ापार। तुम ही देश की ताकत हो हो तुम ही देश का आधार।। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हो तुम ही देश के पहरेदार। कच्छ से कामरूप तक हो तुम ही देश के चौकीदार।। तेरे हिम्मत से दुनिया टिकी है हो तुम ही देश के असल कर्मवीर। तुमसे ही देश की नींव सुदृढ़ है, निचोड़ सकते हो पत्थर से नीर।। तुम ही कृषक उत्साही हो तुम ही देश के सिपाही हो। हो तुम ही देश के पालनहार हो भाग्यविधाता, तारणहार।। परिचय :-  महेन्द्र साहू "खलारीवाला" निवासी -  गुण्डरदेही बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरच...
छीन लो अपना हिस्सा
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छीन लो अपना हिस्सा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जगह जगह रख छोड़े हैं इंसानों ने गुलाम, जिसके अंग-अंग पर नजर आ जाती है प्रतीक गुलामी के, मस्तिष्क में सजा हुआ है आस्था के ताज, जिसे वे मान रहे रिवाज, माथे पर सुहाग की निशानी, नाक में नकेल, गले में सुहाग सूत्र, बांह में बहुटा, कमर में करधन, पैरों में बेड़ियां, क्षमा कीजिये प्यारा नाम पायल, तन को पूरी तरह लपेटते, ढंकते साड़ी, घूंघट, बुरखे, किसी से सीधे नजर न मिलाने की ताकीद, और भी बहुत सारी बंदिशें, जिन्हें जरूरी और कीमती बता धकेला गया कई बरस पीछे, ताकि न मिला सके वो कदम से कदम, की गई है बराबरी न कर पाने की अनेक कुत्सित साजिशें, हतप्रभ हूं उधर से क्यों नहीं की जा रही है विद्रोह की रणभेरी का आगाज, जबकि उनके साथ खड़ा है अशोक स्तंभ की तरह संविधान, पढ़ो, जानो और वैधानिक तरीकों से छीन ...
ज़ल
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ज़ल

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** दोगले दाग़दार होते हैं। फिर भी वे होशियार होते हैं।। सावधानी यहाँ जरूरी है, चूकते ही शिकार होते हैं।। आप जितने सवाल करते हो, तीर से धारदार होते हैं।। जिन पलों में कमाल होता है, बस वही यादगार होते हैं।। दाँत होते नहीं परिन्दों के, क्यों कि वे चोंचदार होते हैं।। चोर शातिर मिजाज ही होंगे, या कहो आर - पार होते हैं।। शूल क्या आजकल बगीचे के, फूल भी धारदार होते हैं।। वार करते न सामना करते, इसलिए ही शिकार होते हैं।। नोंक तीरों की रगड़ पत्थर पर, तब कहीं धारदार होते हैं।। बालकों को अबोध मत समझो, वे बड़े होनहार होते हैं ।। "प्राण" कहते न बोलते उनके, हर जगह इन्तजार होते हैं।। परिचय :- गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाण...
शक्ति आराधना
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शक्ति आराधना

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शक्ति सिध्दि की बात से दम्भी रावण हुआ प्रसन्न व्यथित राम हुए हार से सारे शमशीर हुए विफल जामवंत इक युक्ति सुझाई कमल एक सौ एक लेकर मन में धारे अटल विश्वास राम बैठे करने देवी- जाप रात्रि से भोर तक प्रभु किए पद्म अर्पण चरण कमल में पुष्प एक की कमी हुई जब प्रभु की चिंता गहराने लगी माँ शक्ति ने परीक्षा के लिए युक्ति से एक कमल छुपाया प्रभु को माँ कौशल्या सर्वदा राजीवलोचन ही बुलाती थी तीर उठाया यही सोच प्रभु ने क्यूँ न नयन ही अर्पण कर दूँ माँ शक्ति ने तब दर्शन देकर थामा हाथ स्व प्रिय भक्त का अमर शक्ति का वरदान पाकर प्रभु किया दुष्ट दशानन संहार आओ हम सब फ़िर मिल करके करें माँ शक्ति का आज आव्हान परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित...
गुनाह
कविता

गुनाह

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ये जो गुनाह हुआ मोहब्बत का ऐसे तो नही हुआ होगा किसी से तो इश्क़ हुआ होगा। तभी गुनाह हुआ होगा मोहब्बत का। कुछ तो चाहत होगी दिल में कुछ तो अपनापन होगा मन में तभी गुनाह हुआ होगा मोहब्बत का। कुछ तो सोचा होगा दिल से कुछ तो चाहा होगा मन से तभी गुनाह हुआ होगा मोहब्बत का। कुछ तो रूह में हुआ होगा कुछ तो सुकू में खलल हुआ होगा तभी गुनाह हुआ होगा मोहब्बत का। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाच...
कारनामें नेताओं के
कविता

कारनामें नेताओं के

हितेश्वर बर्मन डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आजकल के कुछ नेता ऐसे काम करते हैं, अपने बारे में बताना हो, तो सिर्फ अच्छाई ही बताते हैं। और जब वे दूसरे नेताओं के बारे में बात करते हैं, तो अच्छाई को भी तोड़- मरोड़ कर बुराई बताते हैं। नेताजी जनता के नजर में सिर्फ़ नेता ही होते हैं पर असल में वे पहुंचे हुये वैज्ञानिक होते हैं। कब किसके बारे में बुराई करना है, और किसको कब नीचा दिखाना है इन सब बातों के लिए वे बहुत बड़े ज्ञानी होते हैं। धनुर्धर की ताकत उसके तीर-कमान में होती है जब चाहे किसी पर लक्ष्य साध ले। नेताओं की ताकत उनकी जबान में होती है जब चाहे तब कहीं भी दंगा भड़का दे। आजकल के नेता सिर्फ नेता ही नहीं होते हैं वे एक अच्छे उन्नतशील व्यापारी भी होते हैं। पैसे लगाकर चुटकी में ओहदे प्राप्त कर लेते हैं ओहदे से पैसे को कई गुना बरकरार र...
बड़े आराम से
कविता

बड़े आराम से

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** ब्रम्हांड भी छोटा लगे माता पिता के सामने, गोल घेरा में गणेश प्रथम बड़े आराम से। पढ़ना सुनना बोलना लेखन कला सूत्र होते, मां शारदे कृपावश समर्थ बड़े आराम से। विचार सोचकर बोलने तैयार हों जब तलक, बेबाक इंसा बोल जाते हैं, बड़े आराम से। काम करने की हिम्मत जुटा पाते जब तलक, कारगुजार निपटा जाते हैं बड़े आराम से। वतन चौकसी जवानों का दुष्कर सुरक्षा दौर, कुछ भूलते हैं गर्व सम्मान बड़े आराम से। माखन मटकी रखने की दुविधा जसोदा को, नटखट कन्हैया चट करते, बड़े आराम से। दोस्ती पैगाम ऊपरी ऊपर दमदारों का शौक, सुदामा मित्र मानें द्वारकेश बड़े आराम से। परम वीर पराक्रमी आजमाते रहे शिव धनुष, शक्ति कामना से राम तोड़ें बड़े आराम से। आदिशक्ति नवरात्रि पर्व उपासना साधनारत, मनकामना पूर्ण दयारूपेण बड़े आराम से। परिचय :- वि...
स्त्री और रंग
कविता

स्त्री और रंग

माधवी तारे लंदन ******************** दुनिया की आधी आबादी की, अटल अमिट शान है स्त्री जीवन को रंगीन बनाने वाली, चिर प्रेरणादायिनी है स्त्री कभी चांद सी शीतल, कभी सूर्य सी दाहक, प्रेम इज़हारी, दंडदायिनी है स्त्री. कभी पदार्थाभाविनि, रसस्वादिनी, पाकगृह की कुशल, स्वामिनी है स्त्री शिव की शक्ति, हरि की चरण दासी, समर क्षेत्र में रणरागिणी है स्त्री संत विद्वानों की जन्मदात्री, रत्न प्रसविनी है स्त्री रंग उसका हो कौन सा भी, रस रंगहीन है स्त्री बिन जिंदगी प्रातः स्मरणीय पंच कन्याओं की स्मृति, पंच रंगयुता पाप विनाशिनी है स्त्री परिचय :- माधवी तारे वर्तमान निवास : लंदन मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट...
अकस्मात नहीं होता
कविता

अकस्मात नहीं होता

सीताराम पवार धवली, बड़वानी (मध्य प्रदेश) ******************** रिश्ते हमें मिल जाते हैं मगर यह फरिश्ते नहीं मिलते साहित्य के सफर में गर तुम्हारा यह साथ नहीं होता। फिर हमारे झुके कंधों पर किसी का हाथ नहीं होता। तुम्हारे ही शीर्षको ने साहित्य का ये जहां दिखाया है तुम्हारी बेरुखी होती तो दिल मे जज्बात नहीं होता। मेरे लिए जो दुश्वारियां उठाई मुझे इसका एहसास है दिल से दोस्ती है इसमें कभी विश्वासघात नहीं होता। रिश्ते हमे मिल जाते हैं मगर यह फरिश्ते नहीं मिलते अगर मिल जाए फरिश्ता वह जाने हयात नहीं होता। मेरे शब्दों से अगर कोई ठेस पहुंची हो तो माफ करना दिल से निकली ये दुआ से कभी आघात नहीं होता। ये तो मेरा नसीब है कि तुम्हारा यहां मुझे साथ मिला नसीब से मिला ये साथ कभी भी खैरात नहीं होता। रिश्ता हमने वजूद से नहीं तुम्हारे दिल से बनाया है दिल का रिश्ता दिल से है यह अकस्म...
जल राशि
कविता

जल राशि

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जल राशि कभी लगती मचलती सी कभी लगती उबलती सी कभी लहराती, कभी इठलाती। रवि किरणो मैं नहाती सी। किरणों से बतियाती सी क्या कहुं तुझे अगाध जल राशि अन अनेक करतब दिखाकर करती थी प्रकृति को श्रृंगारित। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तमान में इंदौर लेखिका संघ से जुड़ी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है...
उनकी याद में
कविता

उनकी याद में

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** उनकी याद में ऑखें लगी, बरसात हो गई! बीते सपनों से मुझे जगा, ये 'रात' सो गई !! यही रात जो प्यासे जग की किस्से सुनती थी यही रात जो चॉदनियों में हॅस-हॅस मिलती थी यही रात कि जिसमें छत पे पायल छमके थे यही रात जो अभिसारों में खोकर रहती थी यही रात आज ऑसुओ की लड़ियॉ पिरो गईं! बीते सपनों से मुझे जगा, ये रात सो गई!! यही रात जिसमें सब-लुटकर तुमको पाया था यही रात जिसमें गीतों-से हृदय सजाया था यही रात जिसमें अम्बर में तारे बिखरे थे यही रात, रूप से तेरे, हम भी निखरे थे यही रात आज हर सुख पे संघात हो गई ! बीते सपनों से मुझे जगा, ये रात सो गई !! यही रात है जिसमें तुमको अपलक देखा था यही रात है जिसने तुमसे विधि को लेखा था यही रात में रूपवती इक सजनी सोई थी यही रात है जिसने मीठी यादें बोई थी यही रात आज विरहों-भरी इक...
प्राण का अक्षरजाल
कविता

प्राण का अक्षरजाल

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** "उठ विषज्ञ फणधर थम अञ्चल, इस ऊपर भय ऋक्ष शङ्ख दह। औघड़ कई छत्र तज आए , बढ़ डग ऐन ओढ झट अं अ:।।" अर्थात - विष के स्वाद को जानने वाले हे नागराज! रुको और उठकर सुनो। इस क्षेत्र के ऊपर जंगली रीछ, गहरे पानी के भँवर और उनमें बसने वाले शंखों का भय है। इस कारण ही कई औगढ अघोरी सन्त, जिन्हें श्मशान में भी भय नहीं लगता है वे भी अपने - अपने छत्र त्याग कर डग बढ़ाते हुए अंग वसन स्वरूप 'अं अ:' अर्थात जो न तो स्वर हैं और न व्यंजन हैं, को ओढ़कर यहाँ आ गए हैं। इसलिए तुम भी उधर मत जाओ। विशेष - ===== उक्त पँक्तियों में हिन्दी की पूरी वर्णमाला है। केवल व पर इ की मात्रा है जो शक्ति की और ङ और ञ स्वर रहित औघढ़ सन्तों के प्रतीक हैं जो अपने छत्रों को छोड़कर चले आए हैं। शेष सभी स्वर सहित व्यंजन हैं या पूर्ण स्वर हैं जो सां...
अब कोई भी गीत न होगा
कविता

अब कोई भी गीत न होगा

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** दूर न जाओ मुझसे प्रियतम! अब जीवन-संगीत न होगा! अब ना कोई कविता होगी अब कोई भी गीत न होगा! जिस प्रकृति में चित्र है तेरा वो अब कितना रिक्त रहेगा जिस पानी में दर्पण तेरा उन झीलों को कौन सहेगा जिन झरनों में कभी नहाए उनमें कैसे विम्ब भरेंगे जिन वृन्तों को छूते थे तुम वो कैसे अब हरे रहेंगे कैसे तुम्हें बताऊॅ प्रियतम! तुम सा कोई मीत न होगा! दूर न जाओ मुझसे प्रियतम! अब जीवन-संगीत न होगा।। सूने पनघट पर कब जाने गोरी तेरे पॉव पड़ेंगे अतृप्त हुए यदि मानस-हंसा कैसे उनके दिन बहुरेंगे जिन बागों की तुम्हीं मोरनी उनमें कैसे स्वर बिखरेगा जिन डालों पर कूजी कोयल उनमें कैसे बौर भरेगा कैसे तुम्हें बताऊॅ प्रियतम! तुम बिन मौसम-शीत न होगा। दूर न जाओ मुझसे प्रियतम! अब जीवन-संगीत न होगा!! शरद-चॉदनी में कब जाने ...
मेरी आस
कविता

मेरी आस

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** रवि रश्मि से लेकर शिक्षा बढ़ते रहो घने तम में तिमिर दूर होगा एक दिन तो शांति मिलेगी जीवन में। शीतल, श्वेत, स्वच्छ, अंतर मन तू जैसे चंद्र का शीतल प्रकाश जीवन रण में उज्जवल हो तुम यही एक मेरी आस। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तमान में इंदौर लेखिका संघ से जुड़ी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं ...