Saturday, March 14राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

कविता

तुझमें है काबिलियत
कविता

तुझमें है काबिलियत

महेन्द्र साहू "खलारीवाला" गुण्डरदेही बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** नापना हो डगर तुझे, लांघ जाना हो पर्वत। मुश्किलों से ना घबराना, आ जाए कोई आफत।। राह में तेरे रोड़े अटकाए, बाधाएं अनगिन टकराए। साहस कभी ना खोना तुम, आ जाए कोई मुसीबत।। दोगले भी मिलेंगे राहों में, आदमी की परख कर लेना। पग नापना फूँक-फूँक कर, चाहे कोई दे तुम्हें नसीहत।। रौंदे जाते यहां ईमान-धरम, सत्य का पैर जमाए रखना। पहचान भीड़ में बना जाना, तुझमें ही है इंसानियत।। मुकाबला जरा डटकर करना, बन जाना अभिमन्यू तुम। तोड़ जाना चक्रव्यूह,कौरवों का, है तुझमें ही काबिलियत।। परिचय :-  महेन्द्र साहू "खलारीवाला" निवासी -  गुण्डरदेही बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
हमारा लोकतंत्र
कविता

हमारा लोकतंत्र

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** हिम्मत, ताक़त, शौर्य विहँसते, तीन रंग हर्षाये हैं। सम्प्रभु हम, जनतंत्र हमारा, जन-जन तो मुस्काये हैं।। क़ुर्बानी ने नग़मे गाये, आज़ादी का वंदन है। ज़ज़्बातों की बगिया महकी, राष्ट्रधर्म -अभिनंदन है।। सत्य,प्रेम और सद्भावों के, बादलतो नित छाये हैं। सम्प्रभु हम, जनतंत्र हमारा, जन-जन तो मुस्काये हैं।। ज्ञान और विज्ञान की गाथा, हमने अंतरिक्ष जीता। सप्त दशक का सफ़र सुहाना, हर दिन है सुख में बीता।। कला और साहित्य प्रगतिके, पैमाने तो भाये हैं। सम्प्रभु हम, जनतंत्रहमारा, जन-जन तो मुस्काये हैं।। शिक्षा और व्यापार मुदितहैं, उद्योगों की जय-जय है। अर्थ व्यवस्था, रक्षा, सेना, मधुर-सुहानी इक लय है।। गंगा-जमुनी तहज़ीबें हैं, विश्व गुरू कहलाये हैं। सम्प्रभु हम, जनतंत्रहमारा, जन-जन तो मुस्काये हैं।। जीव...
मानवता
कविता

मानवता

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** एक संपूर्ण मानवीय गुण है मानवता, जिसमें भरा होता है, सौहार्द, बंधुत्व, समता और समानता, इसमें समाहित रहता है सद्भाव, प्रेम, सदाचारिता और सद्चरित्र, यहीं भाव होता है मानव में पवित्र, सुख समृद्धि एवं शांति से जीवन हो परिपूर्ण, मानवता के लिए ये विचार महत्वपूर्ण, इसमें मानवीय जीवन निरर्थक और उद्देश्यहीन नहीं, जो है सर्वथा उपयुक्त व सही, लोकमंगल की भावना तथा उत्कृष्ट विचार, ये सब मानवता के परिवार, भौतिकता से ऊपर है आदर्शों का स्थान, सिर्फ अपने सुख की चाह नहीं छुपा इसमें सबका मान सम्मान। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कवि...
बेरंग होते रंग
कविता

बेरंग होते रंग

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** छंदमुक्त रचना सच, कितना कठिन, दूभर होता है एक स्त्री के लिए ख़ुद को समझना उससे भी कठिन औरों को समझाना ज़िन्दगी के हर रंग में एकरस हो जाना नदी सी यात्रा कर सागर में समा जाना जन्म से तो मिलता प्यारा गुलाबी रंग असमानी रंग आने से धुंधलाने लगता अधिकारों पे कर्तव्य हावी होने लगते भूल जाती है गुड़िया हक़ का प्यार वार देती भय्यू पर सारा लाड़ दुलार लाल रंग की चूनर ओढ़े जाए पियाघर कड़छुल बन जाती दाल हिलाने को वार त्योहार पर ही ओढ़ती चुनरिया फ़िर बरसों सन्दूक में ही रखी रहती समा जाता लाल रंग काल के ग्रास में वह सोचती है सबके लिए दिल से ही ख़याल रखती सभी का हर तरह से फ़िर फोड़ा जाता है बुराई का ठीकरा बस और बस उसी के सिर पर आख़िर व सारे वो सुहाने रंग बदरंग होते जाते पेट भरती है बचा खुचा खाकर ही सबको खिलाकर गर्म घी वाले फुलके स...
द्वयक्षरीय रचना
कविता

द्वयक्षरीय रचना

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** हे हरिहरी ! राहु रारी है, रह-रह हरा रहा है राह। हीरे राही हार रहे हैं , हेरो हार हरो हुर्राह।। हाहा हीही हूहू हेहे, होहो हूँह हो रही रार। रो - रो रहा हरे हर राही, राहें हेर - हेर हर हार।। अर्थात - हे विष्णु भगवान ! राहु बड़ा ही झगड़ालू है, वह रह - रह कर हर रास्ते में सबको सता रहा है। इसलिए इस रार में होने वाली हार को देखो और उसको हरो अर्थात हार से बचाओ, क्योंकि जीवन पथ पर चलने वाले हीरे जैसे हर राहगीर को यह हार बहुत ही कष्ट कारी हो गई है। चारों ओर हा-हा ही-ही हू-हू हे-हे हो-हो हूँ-हूँ की त्राहि-त्राहि मची हुई है। हे हरि ! हर राह का हर राहगीर अपनी हार देख - देख कर बुरी तरह रो रहा है। परिचय :- गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि म...
तो उपकार हमारा होता …
कविता

तो उपकार हमारा होता …

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** कुछ हम कहते, कुछ तुम सुनती, कितना सरल सहारा होता... प्रिये, कभी जो बात पूछती, तो उपकार हमारा होता।। तीसो दिन जो साथ कभी था, अब इक-दिन भी पास न आए, कहाँ गया वह निष्ठुर होकर, कहाँ भाग्य ने खेल दिखाए, कभी-कभी जो दर्शन होता, तो संसार हमारा होता...! प्रिये, कभी जो बात पूछती, तो उपकार हमारा होता।। जब से मुझसे दूर हुई तुम, मैं एकांत से निकल न पाया, तेरे दर्शन को उर तरसे, मन व्याकुल होकर बौराया, संग व्यतीत की याद न आती, तो भी गुजर हमारा होता...! प्रिये, कभी जो बात पूछती, तो उपकार हमारा होता।। सावन-बरसा, कजरी आयी, तुमको कब मेरी सुधि आयी हम तो जरे-बरे भादौ में, तुझे क्वार की बात न भायी, चौमासे की बूंँद बिसारी, तन-मन जाए प्यासा-रोता...! प्रिये, कभी जो बात पूछती, तो उपकार हमारा होता।। कतकी-पूनो,...
बेटी
कविता

बेटी

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** तप है बेटी त्याग है बेटी राधा और सीता है बेटी। ध्यान है बेटी योग है बेटी, गवरा और गायत्री है बेटी। भक्ति बेटी संस्कार है बेटी, "मीरा" भक्ति का वरदान है बेटी। साहस बेटी शक्ति है बेटी, रणचण्डी "लक्ष्मी" है बेटी। क्षमा और शील बेटी हे, देवी अहिल्या सी पावन और पवित्र है बेटी। माधुर्य ममता रक्षा है बेटी, ज्योति पुँज आयु है बेटी। आँगन की तुलसी है बेटी, पायल की झंकार है बेटी। मान सम्मान और स्वाभिमान है बेटी। संयम प्रतीज्ञा और परिक्षा है बेटी, राम की प्रतिक्षा "अहिल्या" है बेटी। माता का अभिमान है बेटी, पिता का स्वाभिमान है बेटी। किरण-विजय के लबो पर रहती, प्यारी सी मुस्कान है बेटी। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ...
पुरानी यादें
कविता

पुरानी यादें

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पुरानी यादों में कहां खो गई तुम अतीत के अनुभव रोमांचित व सुखद है देखो कहीं डूब उतरना नहीं उन परछाइयों के साथ नहीं तो वृत की छाया दामन छुड़ाकर भाग जावेगी। चक्र में घूम जाओगी। जड़ चेतन के साथ समय को रीता मत छोड़ो यही अतीत का रक्षक बन तुम्हें डरा देगा और तुम वृत पकड़ने के लिए फिर तुम नहीं सुबह या रात की शीतल चांदनी में झिझकतीं चली जावोगी, घुटजाओगी और पुनः वृतमें आने के लिए तुम्हें इस समय को पकड़ना ही पड़ेगा दौड़कर, गिरकर। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले...
वो लड़की हूँ
कविता

वो लड़की हूँ

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हाँ मैं एक लडक़ी हूँ हाँ मैं वो ही लडक़ी हूँ जो अपनी हो तो चार दीवारी में कैद रखतें हो। किसी ओर की हो तो चार दीवारी में भी नज़रे गड़ाए रखतें हों। हाँ मैं एक लडक़ी हूँ हाँ मैं वो ही लडक़ी हूँ जो अपनी हो तो घर की इज्जत समझते हो। किसी ओर की हो तो सरेआम चार लोगों के बीच उसकी इज्जत उछालते हो। हाँ मैं एक लडक़ी हूँ हाँ मैं वो ही लडक़ी हूँ जो अपनी हो तो प्यार,मोहब्बत से दूर रखते हो किसी ओर की हो तो मोहब्बत के नाम से उसके जिस्म की ख्वाहिश करते हो। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
नेता जी
कविता

नेता जी

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** फिर आया मौसम चुनावों का। नेता करेंगे अब दौरा गांवों का। कैसे हाथ जोड़कर ढोंक लगाते, प्यारे नेता शहर गली चौबारे का। कभी पांच साल में हाल ना पूछें, यूं कहते जन सेवक जनता का। सदा चमचमाती लाल मर्सिडीज, धूल उड़ाता काफिला कारों का। भोले बगुले सी पोशाक पहनकर, गले महके हार सजीले फूलों का। कितने जय जयकारे जोर लगाते, संग झुंड छुठ भैया नेताओं का। कभी वादे इनको याद नहीं रहते, रहे यह चश्मा लगाकर लोभ का। चुनाव में पैर पकड़ते अम्माजी के, यूं साष्टांग दंडवत करते ताऊ का। कितने भोले - भाले देश के नेता, पल-पल रंग बदलते गिरगिट का। यह लोकतंत्र के रोबीले राजा, क्यों सगे कहां कब जनता का। सरोकार नहीं विकास से इन्हें, नेता बस ध्यान रखेंगे जेबों का। जीत चुनाव पाते जादूई छड़ी, माल दोनों हाथ बटोरें देश क...
हां, हूं नशे में …
कविता

हां, हूं नशे में …

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उस नशे का कोई मोल नहीं जो किसी और दुनिया की सैर न कराए, दूसरी दुनिया का एक एक बंदा अपनी बात लेकर न टकराए, मैंने भी किया है नशा जिस नशे में मैं चूर रहता हूं, जिसका लिए हरदम सुरूर रहता हूं, इस नशे के कारण मैंने एक और बहुत बड़ी दुनिया जाना, जहां बना लिया अपना ठिकाना, वो दुनिया है बेबस मजबूर लोगों का, पाई पाई के लिए कशमकश करते भूखे,प्यासे मजदूर लोगों का, जिन्हें नहीं पता अपना हक़, लिए घूम रहे हैं माथे पर मिथक, खा रहा है कोई जिनके हिस्से की रोटी, जिन्हें पड़ रहा बार बार सीना लंगोटी, उन्हें खबर ही नहीं बहुत लोग खड़े हैं चोरी करने किसी और की टोंटी, हां है मुझे लोगों को जागरूक करना, क्योंकि अभी भी है मुझमें नशा हावी, साहू-फुलेवाद का, अम्बेडकरवाद का, पेरियारवाद का, संविधानवाद का, और यहीं नशा मुझे सैर क...
व्यथा मणिपुर की
कविता

व्यथा मणिपुर की

प्रतिभा दुबे ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** मूक बधिर हुआ धृतराष्ट्र द्वापर जैसी फिर चूक हुई सत्ताधारी अब चुप क्यों है, राज सभा क्यूं अब मुक हुई।। लोक तंत्र की आड़ न लेना क्या बोटो के ही सब गुलाम है या द्वापर जैसी सभा हुई एक पांचाली आज भी समक्ष सबके निर्वस्त्र हुई सरे आम है।। क्या कोई पुरुष नही हुआ होगा या कलयुग का ही सारा काम है क्या कृष्ण नही किंचित भी कही धर्म धारण करने का क्यूं फिर स्वांग है।। कलयुग में क्या धर्म यूंही हर पल पग से कुचला जाएगा क्या स्त्री के सम्मान की खातिर अब कोई पुरुष न कभी आएगा।। क्यूं चुप थे सभी पुरुष पुरोधा, आज मानवता हुई शर्मसार हैं हैवानियत देखो ये कैसी थी कि, आज हर स्त्री फिर क्यूं लाचार हैं।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : म...
ओ साहेब इधर-उधर मत देख
कविता

ओ साहेब इधर-उधर मत देख

नरेंद्र शास्त्री कुरुक्षेत्र ******************** ओ साहेब इधर-उधर मत देख। चांद पे भारत जाता देख।। देख सोमनाथ की शोभा न्यारी। वृंदावन एक नगरी प्यारी।। कृष्ण को माटी खाता देख। चांद पे भारत जाता देख।। उत्तर में देख हिमालय को। अमरनाथ केदारनाथ शिवालय को।। दक्षिण में शिवलिंग राम बनाता देख। चांद पे भारत जाता देख।। गंगा यमुना की निर्मल धार देख। क्षमाशील मेरा हथियार देख।। यही सूरज को पहली किरण बरसता देख। चांद पे भारत जाता देख।। परिचय :- नरेंद्र शास्त्री निवासी : कुरुक्षेत्र घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर...
सत्य की कठोरता को
कविता

सत्य की कठोरता को

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** सत्य की कठोरता को कौन झेल पाता नित्य, काव्य में रसत्व का आनन्द नहीं होता तो।। रूखे सूखे ज्ञान को भी सरस बनाता कौन, कवि जो स्वतन्त्र स्वच्छन्द नहीं होता तो।‌। लय में लालित्य नाद, भाव माधुरी में राग, मिट जाते कविता में, छ्न्द नहीं होता तो।। कटता न काटे एक पल ऊब जाते "प्राण" लोगों को कवित्व जो पसन्द नहीं होता तो।‌। परिचय :- गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानि...
अभिवादन धरा का
कविता

अभिवादन धरा का

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** रवि का स्वागत करने हेतु, ओस लाऐ रजत हार तरु हंसते मन्द हास्य छोड़कर मधुर राग। खिलती कलियां महकते फ़ूल बढ़ाते उपवन का सौन्दर्य। मद मस्त पवन के झोंकों का उपवन में खिलते फूलों का मानव मन करता रसास्वादन। करता झुक कर धरा का अभिवादन। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तमान में इंदौर लेखिका संघ से जुड़ी हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्ष...
लगता ये मन भी पागल है
कविता

लगता ये मन भी पागल है

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** तेरे मौन से तड़प उठा हूॅ, हृदय आज फिर-से घायल है। रूप की प्यासी ॲखियों संग- लगता ये मन भी पागल है। जाने क्या तुझमें भाषित है, प्रिये-कल्पना कुछ शासित है; अन्यमनस्क तुझको देखा हूॅ, भाग्य, प्रेम पर फिर हासित है! कैसे खुद को समझाऊॅ मैं, छिना प्रेम का ज्यों ऑचल है। रूप की प्यासी ॲखियों संग- लगता ये मन भी पागल है।। उच्च भाल पे शिकन पड़ी है, भौंह बीच इक बूॅद जड़ी है; स्वर्णहार गलहार- सुशोभित, कीर-नासिका-नथन-लड़ी है; कर्णफूल हैं लटके जैसे- श्रवणद्वार पे इक सॉकल है। रूप की प्यासी ॲखियों संग- लगता ये मन भी पागल है।। 'दृढ़-छरहरी, सुन्दरी-काया, रंग-ढंग की मोहक-माया; खुला-केश करधन तक बिखरे.. जैसे नाग-मणि की छाया'; अब ना श्रद्धा इन बातों में- बिछिया-चुप, मुखरित-पायल है। रूप की प्यासी ॲखियों संग- लगत...
बेटी
कविता

बेटी

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** मेरे जीवन की प्रथम कविता १६.०४.२०२० बेटा और बेटी तराजू के दो पलड़े हैं, बेटी प्रकृति का वरदान है, बेटी प्रभात की किरण की मुस्कान है, बेटी ना होती तो दुर्गा पूजा कहां होती, बेटी तू दुर्गा है बेटी वृषभान दुलारी है, बेटी जनक नंदिनी है, बेटी मीरा भक्ति का वरदान है, बेटी कृष्ण की कर्मा है, बेटी लक्ष्मीबाई तलवार की धार है। बेटी तो प्रतिभा की खान है, बेटी इंदिरा है बेटी विलियम हे, बेटी शक्ति है बेटी साहस हे, बेटी ममता ललिता और रमन है। बेटी तो मां की आत्मा और पिता के दिल का टुकड़ा है, बेटी बिन जग अधूरा है। बेटी ज्योति है बेटी दाऊ है बेटी ममता की छांव है, बेटी आँगन मे पायल की झंकार है, बेटी लाल चुनरी में दीपक का प्रकाश है, बेटी आयु है बेटी निधि है, बेटी तो आंगन में तुलसी सी बहार है। बेटी किरण की मुस्कान है,...
क्रोध क्षमा की म्यान
कविता

क्रोध क्षमा की म्यान

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** शब्द लघु हैं गुस्सा क्षमा, व्यापक है प्रभाव। एक म्यान में एक का, चलता है स्वभाव।। द्वंद्व इनमें ना रहे, गुण विशेष का ताज। अति दोनों की है बुरी, गुम हो जाती लाज।। सटीक व्याख्या क्रोध की, करना हो श्रीमान। भिन्न स्वरूप जांचिए, बहुत जरूरी ज्ञान।। गलत सदा अवमानना, जिद चले प्रतिकूल। छोटे बड़े काज जहाँ, वृहद लघु भी भूल।। बिन गलती या डांट से, ना पले व्यवहार। अनुशासन के नियम ही, देते हैं संस्कार।। जब गलती खुद आपकी, होता क्रोध फिजूल। अन्य किसी पर थोपना, अवश्य रहे निर्मूल।। संत ऋषि मुनि गण सभी, दिखलाते आवेश। सुंदर भविष्य के लिए, समय समय आदेश।। दुर्वासा परशुराम का, तप बल ही वरदान। खूबी बगैर क्रोध का, अनुचित है अरमान।। त्रेता युग में ’राम’ का, सागर से अनुरोध। अवमानना पयोधि की, तब भड़का था क्रोध।। करते रहो ...
हम भी क्या सोचे
कविता

हम भी क्या सोचे

हरिदास बड़ोदे "हरिप्रेम" आमला बैतूल (मध्यप्रदेश) ******************** कोई तो होगा इतना वफा करे क्यों, वो बेचैन रहे हरदम हम भी क्या सोचे। इतना भी करे कोई मिलने को तरसे, आस उनकी भी रही हम भी क्या सोचे। ऐसी लागी उनसे लगन अच्छा हुआ, मिलने को आतुर हुए हम भी क्या सोचे। जहां में इतना तो कोई प्यारा होगा, मोहब्बत क्यों उम्मीद करे हम भी क्या सोचे। सलोनी सी सूरत क्या ऐसे देंखे, मनचले से पूंछो तो कोई हम भी क्या सोचे। ये समां कोई जलाए भी तो ऐसे, परवाना पूंछे क्या उनसे हम भी क्या सोचे। चांद के पार चले जाना तो कोई, रुक ना जाए राहों में हम भी क्या सोचे। वो आए भी क्या इस तरह जहां में, सोचा हमने भी ऐसा सही हम भी क्या सोचे। कोई तो होगा अपना अब प्यारा, खिलौना हो गया सपना हम भी क्या सोचे। 'दीया' ने क्या दिया जिसे दिया जब, आस के भरोसे मांगे सिर्फ हम भी क्या सोचे। ...
क्या वो दिन आयेंगे …?
कविता

क्या वो दिन आयेंगे …?

विश्वम्भर पाण्डे "व्यग्र" गंगापुर सिटी (राजस्थान) ******************** मैं सदियों से शोभा थी तेरे आंगन की तू सजाता/सॅवारता/बचाता आया दुनियां के हर संताप से पर, आज मैं खरपतबार समझ, आंगन से हटा दी गई जैसे जन्म से पहले नष्ट कर दी जाती बिटिया और बिसार दी गई 'वो रीति' दकियानूसी समझ। मेरा स्थान पा लिया है अब उन गंधहीन 'कैक्टसों' ने जिन्हें, तू पाल रहा है, आज सुपुत्रों की तरह, जो दे नहीं सकते, तुझे सुवास, सिवाय काँटों के। मैंने तुझे पहचान दी तेरी बचाई जान जिसे तू जानता और जानता विज्ञान पर हाय! इस बात को तू कब समझेगा? हटाकर कटीले झाड़ मुझे फिर से आंगन में रोपेगा! सच बता, क्या वो दिन आयेंगे?? जब मैं आंगन में, तेरे लहलहाऊंगी और एक बिटिया की तरह सुखद अहसास कराऊँगी... परिचय :-  विश्वम्भर पाण्डे "व्यग्र" निवासी : गंगापुर सिटी (राजस्था...
आस्तीन के सांप
कविता

आस्तीन के सांप

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हमारे देश में वैसे तो हर तरह के सांप पाये जाते हैं, सामने आ जाये तो डर से मारे जाते हैं या भगाये जाते हैं, सांप तेजी से डसते हैं, इसलिए लोग इससे बचते हैं, पर दुनिया का सबसे खतरनाक सांप आस्तीन के सांप होते हैं, इससे रूबरू होने से कोई नहीं बचते हैं, ये हर पल आपके साथ रहेंगे, साथ सुख दुख सहेंगे, मगर अपना असली रंग ये तब दिखाता है, जब कोई खास मौका आता है, ये किसी को भी डस सकता है, डस कर ये भागता नहीं बल्कि सबको स्पष्ट नजर आता है, तब आप झुंझलाने के सिवा कुछ भी नहीं कर सकते, इसका गर्दन या पूंछ कुछ भी नहीं धर सकते, वैसे तो इनसे बचकर रहना चाहिए पर बच नहीं पाएंगे, आप संगठन वाले हों, मिशन वाले हों इनसे बिल्कुल बच नहीं पाएंगे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ...
परायापन
कविता

परायापन

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक एक शब्द तुम्हारा भेद़ गया। मन की कोमल दीवारों को मां के भाव शूलसे चुभ गए क्षण भर में स्तब्ध रह गई मस्तिष्क अवरुद्ध हो गया। एकाएक मन ने जागृत किया झकझोरा मुझे कहा उसने सच है, सही तो कहा उसने तुम, तुम पराए हो तू मुढ हो इस जग में। भावुक, विक्षिप्त होते हैं वह लोग जिन्हें वेअपना कहते हें। और जगहमें पराया कहता है शायद यही अति, श्रुति, रीति है जगती की।। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं...
वह पद और मद में चूर हो गए
कविता

वह पद और मद में चूर हो गए

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** वह पद और मद में चूर हो गए। उनको लगा वह मशहूर हो गए।। गर सच्चाई कुछ और ही निकली आज वह अपनों से ही दूर हो गए।। वह पद और मद में चूर हो गए। जो कहते थे कि मन है उसका कोयले से भी काला आज उनकी नजर में भी वह कोहिनूर हो गए।। वह पद और मद में चूर हो गए। "अरविंद" कहे वक्त नहीं रहता सबका एक सा वक्त की मार से वह भी चकनाचूर हो गए। वह पद और मद में चूर हो गए। परिचय :-  अरविन्द सिंह गौर जन्म तिथि : १७ सितम्बर १९७९ निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) लेखन विधा : कविता, शायरी व समसामयिक सम्प्रति : वाणिज्य कर इंदौर संभाग सहायक ग्रेड तीन के पद में कार्यरत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय ह...
कितने क्यों मौन हो
कविता

कितने क्यों मौन हो

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** कितने क्यों मौन हो क्या आती नही अभिव्यक्ति ? या फिर जाती नही अब भी अहम भक्ति ? छोड़ दो न छंदों अलंकारों को कम से कम करो न आत्म अभिव्यक्ति। या फिर जाती नहीं अब भी शकी अभिव्यक्ति ? हिंदू हिंदुस्तान की शान है थोड़ा तो सम्मान रख लो आता नहीं रस तो भाव ही अभिव्यक्त कर लो या फिर आती नहीं भाव की अभिव्यक्ति भी? परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी र...
कौन हूँ मैं….?
कविता

कौन हूँ मैं….?

गोपाल मोहन मिश्र लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) ******************** कौन हूँ मैं.....ऐ जिंदगी तू ही बता, थक गया हूँ मैं खुद को ढूँढते-ढूँढते I अब कोई ख्वाहिश नहीं पालता मन में, विरक्ति हो गई है नित एक ही ख्वाब बुनते-बुनते I सुनता हूँ जीवन में फूल भी हैं, काँटे भी हैं, मेरा जीवन बीत गया काँटे ही चुनते-चुनते I तानों कलंकों के बीच, जिंदगी से हारा नहीं हूँ मैं, लोगों की चुभती बातों से, धैर्य टूट जाता सहते-सहते I किसी से शिकायत नहीं अपनी व्यथा पर, मुझे चले जाना है दुनिया से यूँही चलते-चलते I ऊपरवाला भी व्यथित होगा मेरी नियति पर, रो रहा होगा, मेरी करुण-वेदना सुनते-सुनते I परिचय :-  गोपाल मोहन मिश्र निवासी : लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, ल...