सैलाब
सरला मेहता
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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सैलाब, विचारों का हो
चाहे मनोभावों का हो
बवंडर सा घिर जाता है
दिलोदिमाग पे यकायक
विचारों के भ्रमजाल का
एक बोझ लद जाता है
समेट लें कागज़ पर तो
नवसृजन बन जाता है
जब बाड़ में जलस्तर
नदी का निजी स्वरूप
किनारों का अस्त्तित्व
आगोश में भर लेता है
इसे संग्रहित करें हम
तालों जलाशयों में तो
खेत वनों व उपवनों में
पर्ण प्रसून खिला देता
जब समन्दर में जल का
सैलाब तटों को तोड़कर
तूफ़ानी लहरें उठा देता
एक जलजला आ जाता
इसीको प्रलय कहते होंगे
क्यों न हम जंगल बढ़ाएँ
रोककर जल तांडव को
स्वर्ग सी धरा को बचालें
परिचय : सरला मेहता
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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