ऋतुराज वसन्त में हूॅं
शैल यादव
लतीफपुर कोरांव (प्रयागराज)
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मैं वर्षा में, शिशिर में, ऋतुराज वसन्त में हूॅं।
मैं पूरब में, मैं पश्चिम में, मैं सारे दिगन्त में हूॅं।।
मैं गेंदा में, गुड़हल में, गुलाब और पलाश में हूॅं ।
मैं इच्छा में आकांक्षा में, मैं आप की आश में हूॅं ।।
मैं रक्षाबंधन में, दीपावली में और होली में हूॅं।
मैं कुमकुम में, चंदन में और रंगोली में हूॅं।।
मैं दोस्त में, मैं दुश्मन में, जागते में सपनों में हूॅं ।
मैं शत्रु में, मैं मित्र में, मैं पराये और अपनों में हूॅं।।
मैं अलक्तक में, महावर में,चूड़ी और कङ्गन में हूॅं।
मैं पूजन में, अर्चन में, नमन और वन्दन में हूॅं ।।
मैं भारत माता के माथे पर शोभित बिंदी में हूॅं।
मैं पंजाबी, गुजराती, मराठी और हिन्दी में हूॅं ।।
मैं युद्ध में, मैं बुद्ध में, मैं कृष्ण में, मैं राम में हूॅं।
मैं दिन में, मैं ...






















