चोट छुपती नही
संजय जैन
मुंबई
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गीत लिखते हो तुम,
गीत गाता हूँ में।
सुन कर मेरा गीत,
मुस्कराते हो तुम।
मेरे धड़कनो में,
बस गए हो तुम।
दिल मेरा अब,
मेरे बस में बिल्कुल नही।
कैसे तुम को बताऊं,
हा ले इस दिल का।
चोट दिल पर लगी,
जो छुपती नही।
कुछ दवा या म्हलाम,
तुम लगा दो इस पर।
हम तेरी शरण में,
आये है जानम।।
अब रहा जाता नहीं,
तेरे गीतों को गा के।
दिल बहुत बैचैन,
मेरा हो जाता है।
तेरे दिल में,
जो भी चल रहा है।
एक बार तुम आकर,
तुम मुझसे कहा दो।
शायद दोनों के दिल,
एक हो जाएंगे।
एक नया इतिहास,
हम दोनों लिख जाएंगे।
और मोहब्बत अपनी,
अमर कर जाएंगे।।
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लेखक परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं हिंदी रक्षक...











