अंबुज के मंजुल नैना
मीना भट्ट "सिद्धार्थ"
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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अंबुज के मंजुल नैना
रहते क्यों डरे-डरे।
लोभी भौरें घूम रहे
ताल शतदल से भरे।
हृदय मेरा क्रंदन करे
विटप -विटपी रो रहे।
कंटक भरा प्रेम पथ है,
बोझ जीवन ढो रहे।।
नित होती पलकें गीली,
विपद किससे हम कहे।
मृदु कलियाँ कहतीं नभ से,
क्यों जगत में विष बहे।।
पीर कानन क्या बताएं,
वृक्ष सूखे हैं हरे।
कंचन हिरण ढूँढते हैं,
मनुज है बौरा गया।
रुदन धरती कर रही अब,
क्यों नंद छौरा गया।।
फीकी सब चमक-दमक है,
लाश नित हम हो रहे।
कलकंठी भी मौन हुई,
पंछी सभी सो रहे।।
मुखौटे ओढ़े सब खड़े
आदमी चारा चरे।
चली विरह की आँधी है,
तड़पती भी मीन है।
अपंग जीवन कहता है,
फिर बजे क्यों बीन हैं।।
घोर छाया है तिमिर की,
शाम सुख की है ढली।
उजाले चालें चल रहे,
पथिक भी भूले गली।।
आशा की कटती पतंग,
शांत स्वर कहते खरे।
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