ऐसा बाग लगाओ माली
गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण"
इन्दौर (मध्य प्रदेश)
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ऐसा बाग लगाओ माली,
खुशबू बहे जमाने में।
लूट सके सो जी भर लूटे
कमी न पड़े खजाने में।।
उड़ें तितलियाँ रंग बिरंगी,
चिड़े चिड़ी डालों पर खेलें।
मदमाते मधुकर कुछ गायें,
पेड़ों से लिपटीं हों बेलें।।
मद्धिम-मद्धिम चलें बयारें,
मस्ती की झर उठें फुहारें,
कोई कसर न रहे प्रेम की,
परिभाषा बतलाने में।।
ऐसा बाग .... ।।१।।
थके पखेरू भली नींद लें,
सुबह मिले कलरव सुनने को।
थिरक उठे संगीत प्रीति का,
गीत चलें सपने चुनने को।।
महक उठे धरती का कण-कण,
बीते मदिर राग में क्षण-क्षण,
पत्ती-पत्ती खुली हवा में,
लग जाए इतराने में।।
ऐसा बाग .... ।।२।।
कलियों को खिल जाने देना,
फूलों को मुस्काने देना।
जो भी आना चाहे साथी,
खोलो फाटक आने देना।।
चौकीदारों से कह देना,
सबके कोप तलक सह लेना,
कोई रोक-टोक मत...







