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पद्य

नारी तुम बदल न पाओगी….
कविता

नारी तुम बदल न पाओगी….

डॉ. संगीता आवचार परभणी (महाराष्ट्र) ******************** नारी तुम बदल न पाओगी! सबकुछ सौंप जीवनसाथी को, तुम जोगीनी बन जाओगी, नारी तुम बदल न पाओगी! फूल सी नाजुक काया को, नारी तुम सम्भाल न पाओगी! पुरुष पर जान लुटाने मे ही, तुम अपना सुकून पाओगी! नारी तुम दुनिया के बदलाव को! ग़र अपनाना भी चाहोगी, तो पुरुष के खयाल मात्र से ही, तुम भ्रमित सी हो जाओगी! नारी तुम अपने सुख चैन को, पुरुष पे न्यौछावर कर जाओगी! सूद बुध अपनी खो बैठोगी, खुद को देख ही न पाओगी! पाकर अनमोल जीवन को! नारी तुम जी न पाओगी, दूसरों के लिए जीने मे ही, अपना अस्तित्व लुटाओगी! दुनिया के छल कपट को! नारी तुम समझ ही न पाओगी, सीधी राह चलते हुए भी, समझौतों पर उतर आओगी! इस पत्थरदिल दुनिया को, नारी तुम पहचान न पाओगी! मोम सी पिघल ही जाओगी, हसते ज़ख्म सहती जाओगी! पहचानकर लोगों के स्वार्थ को, ना...
बिछड़ रहे हैं हम
कविता

बिछड़ रहे हैं हम

आदर्श उपाध्याय अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश ******************** बिछड़ रहे हो तुम बिछड़ रहे हैं हम, फिर भी दिल से दिल मिला रहे हैं हम। ये जुदाई भी नस़ीब वालों को ही मुकम्मल होती है, तभी तो आँखों में समन्दर होठों पर मुस्कान लिए हैं हम। हमारी उल्फ़तों ने इक ऐसे मुकाम पर हमें खड़ा कर दिया, की सबकुछ याद करके भी भूल रहे हैं हम। मोहब्बत के इस शज़र पर कभी कोयल गाया करती थी, आज कौवे कि कर्कश ध्वनि सुन रहे हैं हम। तुमको फिर से मोहब्बत से ज्यादा मोहब्बत मिले, यही "वर" महादेव से माँग रहे हैं हम। नज़ाकत तुम्हारी हमेशा यूँ ही बनी रहे, इसीलिए तो तुमसे जुदा हो रहे हैं हम। कभी तुम्हारी आवाज से ही हमारी सुबह-शाम होती थी, आज उसी को याद करके जी रहें हैं हम। पिया घर जाओगी आँगन महकाओगी, यही हर रोज अब सोच रहे हैं हम। अब बाहों में तुम्हारी न हमारा हक होगा, बस ...
दर्द की दास्तां
कविता

दर्द की दास्तां

डॉ. तेजसिंह किराड़ 'तेज' नागपुर (महाराष्ट्र) ******************** दुनिया के गमों में बंटी ये जिंदगी अपनों से पटी ये बेरूखी बंदगी दर्द की दास्तां हैं हर घर की कहानी किसको बयां करें ये अपनी जुबानी हालात के मारे हैं हम बेबस हैं जिंदगी रब से गिला नहीं बस पाक रहे जिंदगी तन का बोझ भी अब संभलता नहीं मन की बातें दिल से कोई कहता नहीं जिंदगी के टूटें अरमानों को आंखों में सहेजकर रखा हैं। मुसीबतों के दर्द को चेहरें की मुस्कराहट में छिपाएं रखा हैं। मैं कोसो दूर से एक उम्मीद लिए इस शहर में आकर बसा हूं। कहना मुश्किल हैं यहां पर पता नहीं कब पहले खुलकर हंसा हूं। एक दर्द हैं जो दिखाई नहीं देता हैं रोज की जिंदगी में तन्हा हूं मैं। दोस्त की तलाश का इंतजार हैं मुझें कहीं फिर से यहां भटक ना जाऊ मैं। ये कमबख्त उम्र भी कुछ ऐसी हैं अब गिला करू तो किससे करू मैं। मुझें समझ सकें...
मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत
ग़ज़ल

मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत

अब्दुल हमीद इदरीसी मीरपुर, कैण्ट, (कानपुर) ******************** मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत। न भरपूर मुझको मिली तुमसे उल्फ़त। है बाक़ी अभी देखना हमको हमदम, कहाँ जा रुकेगी ये नाक़िस सियासत। वो करते रहे हैं वो करते रहेंगे, है हासिल उन्हें बस इसी में महारत। नहीं बाल बाँका कोई कर सकेगा, रहेगी जो यकजा बड़ी इक जमाअत। लड़ा दुश्मनों से हमीद उस घड़ी तक, रही जब तलक तन बदन में हरारत। परिचय :- अब्दुल हमीद इदरीसी  निवास - मीरपुर, कैण्ट, (कानपुर) साहित्यिक नाम : हमीद कानपुरी घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने छायाचित्रएवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हि...
धरती की पुकार
कविता

धरती की पुकार

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** गरमी बढ़़ रही जैवमंडल में, मच रही है हाहाकार। अपने खातिर मुझे बचालो, कर रही धरती यही पुकार।.... देख तपिश ऐसा लगता, मानों बरस रही है आग। ग्लोबल वार्मिग के कारण, जीवमात्र के हुए बुरे हाल। समय रहते कर प्रायश्चित, रे मनुज शीघ्र करलें चेत। कुछ न बचेगा मुझ पर जब, चिड़ियाँ चुग जायेगी खेत। पौधारोपण से लो संवार, गरमी बढ़ रही............। बदलती जीवन शैली बढ़ता औद्योगिकीकरण, विलासिता पूर्ण अनियंत्रित नगरीकरण। वर्षों से बोझ निरंतर बढ़ रहा, मानवीय भूलों का दंश सहा, बदइंतजामी आलम भर रहा हुंकार, गरमी बढ़ रही.........। भावी पीढ़ी के बेहतर भविष्य की ठाने, भूल विलासिता पूर्ण आदतों की माने। संरक्षण के प्रति समझे अपनी जिम्मेदारी, सोचे उसकी जो है अपनी महतारी। प्रति पल बढ़ रहा जो अत्याचार, गरमी बढ़ रही.........
विदाई
कविता

विदाई

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** रीति ये कैसी जग ने बनाई है कल तक थी जो अपनी आज हुई वो पराई है दिल के टुकड़े की आज कर रहे विदाई है। खुशी की है बेला मगर आंख सबकी भर आई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। किसी से मिलन है किसी से जुदाई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। छुप-छुप कर रोए भैया मां सुध-बुध बिसराई है बाबुल की भी आंखें डबडबाई हैं घड़ी विदाई की आई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। कलेजे पर रख पत्थर लाडली की कर रहे विदाई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्तर-प्रदेश घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित कर...
जनक वंदना
कुण्डलियाँ, छंद

जनक वंदना

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** जनक वंदना करीये, जनक महेश समान। हमेशा सलाह लिजिये, करनी हो आसान। करनी हो आसान, कभी नाहीं दुख होवे। जो रोजे संतान, जनक चरणा में सोवे। जग में नितिन पाये, आशीषा देता चमक। देव वंदन गाये, होते जी ऐसे जनक।। परिचय :- नितिन राघव जन्म तिथि : ०१/०४/२००१ जन्म स्थान : गाँव-सलगवां, जिला- बुलन्दशहर पिता : श्री कैलाश राघव माता : श्रीमती मीना देवी शिक्षा : बी एस सी (बायो), आई०पी०पीजी० कॉलेज बुलन्दशहर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से, कम्प्यूटर ओपरेटर एंड प्रोग्रामिंग असिस्टेंट डिप्लोमा, सागर ट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट बुलन्दशहर से कार्य : अध्यापन और साहित्य लेखन पता : गाँव- सलगवां, तहसील- अनूपशहर जिला- बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश)। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
सच्चे अच्छे है
कविता

सच्चे अच्छे है

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** दिलके आंगन में कुछ तो बातें है। जिसमें कभी खुशी तो कभी गम है। इन गमो को दूर करने दोस्त होते है। जो स्नेह प्यार से दुखदर्द हर लेते है।। कुछ तो है तुम्हारी बेचैनी का राज। जो तुम्हारे चेहरे पर झलक रहा है। हम से कहो तुम अपने दिल की बात। ताकि तुम्हारे चेहरे की उदासी को मिटा सके।। अपने दिल पर तुम परते मत जमाओं। दिल की बात दिल वालो को बताओं। दिल वाले तो रेत पर आशियाना बना लेते है। और खुद को मीरा और कान्हा मान लेते है।। जो भी है बात खुलकर कह दीजिये। और अपने दिल को हल्का कर लीजिये। हम है वो शिल्पकार जो तुम्हें तराश देंगे। और निर्जीव मूर्ति को बोलता हुआ बना देंगे।। हम उन्हें ढूँढ़ते है जो सच्चे और अच्छे है। भले ही हमने उन्हें कभी देखा नहीं। पर रिश्तों में वो बहुत सच्चे होते है।। परिचय :- ब...
इंसानियत भूला इंसान
कविता

इंसानियत भूला इंसान

राजीव रंजन पांडेय राजधनवार गिरिडीह (झारखंड) ******************** इंसानियत भूला इंसान चौराहों पे बिका ईमान भाईचारे की अब बात नहीं प्रेम विश्वास अब बचा नहीं घृणा द्वेस अब भरा पड़ा है स्वार्थों में मन डूबा हुआ है पल में बदलते स्वभाव यहां पल में बिकते विश्वास यहां इंसानों का अब मोल नहीं झूठ फरेब का अब तोल नहीं इंसान कहीं जब घायल होता इंसान ही मजे से वीडियो बनाता इंसान यहां कोष भंडारण हेतु तत्पर रहते हैं एक दूसरे को लूटने को हमेशा तैयार रहते हैं परिचय :-  झारखण्ड प्रदेश के गिरिडीह मंडलान्तर्गत राजधनवार क्षेत्र में रहने वाले राजीव रंजन पाण्डेय पिता संजय कुमार पाण्डेय की शैक्षिक योग्यता संस्कृत से स्नातकोत्तर और बी.एड है जो कि बिनोवा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग से पूर्ण हुई है। आप लगभग दो साल तक राज्य सरकार द्वारा अनुदानित एक विद्यालय में संस्कृत शिक्षक के रूप में सेव...
विराम चाहिए
कविता

विराम चाहिए

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे, बाकी जगह विराम चाहिए। अंतर्मन से सृजनशील रहे, तन को कुछ विश्राम चाहिए। गुजरे वक़्त के कर्मकार में भी कर्मठता का जलवा था दायित्व बोध और मंशा को वाक्य-विन्यासों का हलवा था जीवन चक्र का मर्म यही है, अवरोध विरोध अविराम चाहिए। हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे, बाकी जगह विराम चाहिए। संस्कार मिले सबको ऐसा ना बने कभी मुखौटा जो तन धन साथ रहे ना रहे, वाणी का ना टोटा हो। वक़्त रहते ना संभले तो, क्या पूरा कोहराम चाहिए। हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे, बाकी जगह विराम चाहिए। पुतले भांति-भांति के जग में, हमलों के कई आकार हैं गमले अलौकिक बगिया के ग़ज़लों के कितने प्रकार हैं पुतले-हमले गमले-गज़लें बस नितांत अभिराम चाहिए हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे, बाकी जगह विराम चाहिए। राम चलवाये बड़े जतन से, कु...
खुद की पहचान
कविता

खुद की पहचान

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** अब वो दौर आ गया खुद की पहचान बनाते हैं ऐसे दौर में खुद के लिए कुछ कर दिखाना हैं देखे है खुली आंखों से जो सपने उनको सच कर दिखाना हैं सपने भी पूरे होंगे रास्ते का भी पता है रास्ते में आने वाली मुश्किलो का भी पता है खुद की पहचान बनाना कुछ करके दिखालाना मंजिल को भी पाना है खुद को उसके काबिल भी बनाना जब उस मंजिल को पा लूंगी तो मुझको भी बहुत खुश होंगी मेरे परिवार को भी खुशी मिलेगी मेरे चेहरे पर रौनक और होठों पे होगी मुस्कान जब मिलेगी खुद की पहचान अब वो दौर आ गया है खुद की पहचान बनाते हैं ऐसे दौर में खुद के लिए कुछ कर दिखाते हैं परिचय : संध्या नेमा निवासी : बालाघाट (मध्य प्रदेश) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख...
इश्क की बीमारी
कविता

इश्क की बीमारी

नन्दलाल मणि त्रिपाठी गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** जिंदगी में बीमारी कम नहीँ, औकात बता देती है, अच्छे खासे इंसान को जिंदा लाश बना देती है।। कहूँ कैसे मैं बीमार हूँ खासा नौजवान हूँ, फिर भी हुश्न के इश्क का शिकार हूँ लगता नही मन कहीं भी भूख प्यास अंजान हूँ।। माँ बाप को फिक्र ये बीमारी क्या वैद्य कहता है मैँ बीमार नही इसका कोई इलाज नही शर्म आती है बताऊँ कैसे मुझे क्या हुआ मैं बीमार हूँ।। इश्क ने खोखला कर दिया, सिर्फ चाहत का दीदार ही इलाज है, नज़र इबादत इश्क की आती ही नही शायद वह भी बीमार बेजार है।। अब तो जिंदगी की सांसे धड़कन चाहत के इश्क का जुनून जिंदगी का इंतज़ार है।। गर न मिली मेरी बेबाक चाहत कि मुहब्बत उसके ही दुपट्टे ओढे कफन जनाजे बे चढ़ने को बेकार हूँ।। चढ़ गया है इश्क का शुरुर इस कदर कहती दुनियां इश्क का बुखार है।। ना सं...
कौन सा वक्त
कविता

कौन सा वक्त

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** न जाने कौन सा वक्त है जो वक्त के साथ सब कुछ डलता जा रहा है। न जाने कौन सा वक्त है जो वक्त के साथ सब कुछ बदलता जा रहा है। न जाने कौन सा वक्त है जो वक्त के साथ सब कुछ खामोश करता जा रहा है। न जाने कौन सा वक्त है जो वक्त के साथ सब कुछ ठहरता जा रहा है। न जाने कौन सा वक्त है जो वक्त के साथ जो सब कुछ छीनता जा रहा है। न जाने कौन सा वक्त है जो वक्त के साथ सब कुछ नजर अंदाज करता जा रहा है। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपन...
सीढ़ियां खिड़की तक
कविता

सीढ़ियां खिड़की तक

रोहताश वर्मा "मुसाफिर" हनुमानगढ़ (राजस्थान) ******************** बेड़ियां है अभी तक.. न खुलेगी ना खोली जाएगी, यूं ही घसीट कर पांव रखने होंगे। ऐ उम्मीद ! तू बस जिंदा रह, पीढ़ी दर पीढ़ी उजागर करने को, ये रिसते घाव रखने होंगे। यदि उठा देती हूं आवाज... इन अपनों के खिलाफ, रिश्तों की बनी दीवारें ढहेंगी। ये घर प्राची-रिवाजों का है, सीढ़ियां खिड़की तक ही रहेगी।। खुले आसमां के तले फैला नहीं सकती बांहें। पर्दे की ओटन में छुपी झुकती रहे सिर्फ निगाहें। निकल न सकती चौखट से सांसें भी दास बनी है। ढोंगी ये शिक्षित समाज रुढ़ि-तलवार गले टंगी है। हूं अबला युगों की भोगी पीड़ा, यातना यूं ही सहेंगी। ये घर बुढ़े-नातों का है, सीढ़ियां खिड़की तक ही रहेगी।। परिचय :- रोहताश वर्मा "मुसाफिर" निवासी : गांव- खरसंडी, तह.- नोहर हनुमानगढ़ (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि स...
जामुन
कविता

जामुन

अखिलेश राव इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खास खाये या आम ले लो कम दाम में। जामुन है बदनाम ले लो कम दाम में।। रंग रूप में श्याम सलोनी देख मुख में आ जाये पानी खाओ सुबह और शाम ले लो कम दाम में।। रोगों को ये जड़ से मिटाये मधुमेह पर काबू पाये कहते हकीम लुकमान ले लो कम दाम में।। मखमली सी कोमल काया मनवा देख इसे ललचाया बारिश की ये शान ले लो कम दाम में।। खास खाये या आम ले लो कम दाम में जामुन है बदनाम ले लो कम दाम में।। परिचय :- अखिलेश राव सम्प्रति : सहायक प्राध्यापक हिंदी साहित्य देवी अहिल्या कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय इंदौर निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प...
एक वो भी था ज़माना
कविता

एक वो भी था ज़माना

प्रीति जैन इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** वो पाकीज़ा बचपन था कितना सुहाना। कागज़ की कश्ती चलाना, बारिश में भीग जाना। मिट्टी के खिलौनों संग भी, आनंद की अनुभूति पाना। फिर दौर कुछ बदला, कुछ भी ना आज संभला। शिक्षा तो है पा ली, न संस्कारों के नामोनिशां। मां बाप और गुरु के आगे बच्चों ने खोली ज़ुबां। क्या मोड़ ले रहा बचपन, हुआ करता जो सुहाना‌। एक आज का ज़माना, एक वो भी था ज़माना। ना घर अलग-अलग थे, एक छत के नीचे ठिकाना। सुख दुख थे एक सबके, गुलज़ार था आशियाना। बुज़ुर्गों के साए में, ना हम राह कभी भटकते। अपने पराए सभी, थे दिलों में आकर बसते। अपनों के आंसू, मुस्कुराहट से बचा न कोई वास्ता। मतलब में जी रहा इंसान, भटक गया है रास्ता। आज खून भी अपना, हो रहा क्युं बेगाना। एक आज का ज़माना, एक वो भी था ज़माना। घर की बहू बेटी, होती थी घर की लाज। रहती थी मर्याद...
ये भी विकलांगता है
कविता

ये भी विकलांगता है

अशोक शर्मा कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** नर मूर्तियाँ बना प्रभु ने, किया काम उत्तमता है। रह गयी कुछ कमियाँ, जग कहे अपंगता है। ये भी विकलांगता है। पाँव एक ही होकर भी, गिरी राज लांघता है। जो है दो पैरों वाला, देखो टाँग खींचता है। ये भी…। पैदा हुआ है मंद बुद्धि, खामोश ही रहता है। जो ज्ञान का सागर बन, गर समाज बाँटता है। ये भी…। जिनके हैं चक्षु दुर्बल, ना साफ दिखता है। वह आंखें है मक्कार, जिनका पानी गिरता है। ये भी…। हाथ अंग भंग हों पर, पद भोजन कराता है। मजबूत बाहुबली आज, अबला चीर हरता है। ये भी…। अपंग हस्त पाद चक्षु, मन झकझोरता है। और भूखों न्याय मांगे, सत्ता से न मिलता है। ये भी …। देखो यह सवाल हमें, भी रोज सालता है। होगी दुनिया से दूर कब, ये विकलांगता है। ये भी…। परिचय :- अशोक शर्मा निवासी : लक्ष्मीगंज, कुशीनगर, (उत्तर प...
राम नाम की महिमा
भजन

राम नाम की महिमा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** नाम जपते चलो "राम" गाते चलो... नाम जपते चलो राम गाते चलो, मुक्ति के मार्ग पर पग बढ़ाते चलो। बोलो राम बोलो राम... नाम जप तेरे अंतर को पावन करे, नाम जप ही तेरे मन में भक्ति भरे। पकड़कर नाम जप की ही पतवार को, अपनी नैय्या किनारे लगाते चलो। बोलो राम बोलो राम... राम ही सत्य है मान पायेगा जो, डूबकर राम ही राम गायेगा वो। जग की आशक्ति से मुक्त होना है तो, राम रस में ही मन को डुबाते चलो। बोलो राम बोलो राम... नाम में डूब तुलसी मगन हो गए, लिखके मानस वो जैसे गगन हो गए। "प्रेम" तुम भी रहो "राम" में ही मगन, उनकी सेवा से सांसें बढ़ाते चलो। बोलो राम बोलो राम... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं,...
जो आसमां को छूने के ख्वाब देखते हैं।
ग़ज़ल

जो आसमां को छूने के ख्वाब देखते हैं।

मईनुदीन कोहरी बीकानेर (राजस्थान) ******************** जो आसमां को छूने के ख्वाब देखते हैं। हम तो उन्हें दर-दर ठोकरें खाते देखते हैं।। हम तो सदा अपनी औकात में ही रहते हैं। क्योंकि हम तो ख्वाहिशें ही नहीं रखते हैं।। नजूमियों के चक्कर मे न पड़ मेरे दोस्त । हम तो मेहनत व दिमाग से काम करते हैं।। दुनियां में धन-दौलत की तो कमी नहीं । हम तो किस्मत के लिखे पर विश्वास रखते हैं।। "नाचीज़" हम मज़हब के घेरे से कोसों दूर हैं। हम तो सर्वधर्म-समभाव में विश्वास रखते हैं।। परिचय :- मईनुदीन कोहरी उपनाम : नाचीज बीकानेरी निवासी - बीकानेर राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन...
खुद को गढ़ना…. होगा
कविता

खुद को गढ़ना…. होगा

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** अपनी तकदीर से, अब तुम को, खुद ही लड़ना होगा। तुम हाथों की, कठपुतली नही। अपने अस्तित्व को, खुद ही गढ़ना होगा। खुद ही लड़ना होगा। अपनी तकदीर से, अब तुम को, युगों-युगों से, हाथों के कारागृह बदलते आये है। तुम को कैसे जीना है। यह सीखाने वाले, बस नाम बदलते आयें है। अपने नाम को, नारी तुम... आयाम नये भर दो। खोखले आडंबरों पर, पलट अब वार जरा कर दो। खुद को गढ़ कर, अपनी पहचान बिना... किसी के मोहताज तुम कर दो। जीवन को असितत्व देती हो। तुम क्यों रहो मोहताज। खुद को गढ़ लो। फौलाद से, तोड़ दो अबला का ताज। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्...
बादल मन मेरा
कविता

बादल मन मेरा

रमेशचंद्र शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गरम रेत पर बरसता बादल मन मेरा ! बूंद-बूंद को तरसता बादल मन मेरा ! हमेशा हालात हवाओं ने बदला किए कतरा-कतरा बिखरता बादल मन मेरा ! समंदर सी खारी किस्मत बनी हमारी ऊंची लहरों से मचलता बादल मन मेरा ! काली घटाओं के साथ मिलता कभी पहाड़ों पर फिसलता बादल मन मेरा ! काली बदलियों के झुंड आकर घेर लेते बिजलियां देख गरजता बादल मन मेरा ! जलाती गर्मियों में आकाश पर चढ़ाई प्रेम सागर को भटकता बादल मन मेरा ! युगों से वाष्प बनकर खुद को छलता बार-बार मन बदलता बादल मन मेरा ! अपूर्णता से पूर्णता प्राप्ति की ललक सदा नदियों संग बहता बादल मन मेरा ! अजब आकर्षण वसुधा और व्योम में गिरता, छुपता, निकलता बादल मन मेरा ! परिचय : रमेशचंद्र शर्मा निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्व...
सिंदूरी बंधन
कविता

सिंदूरी बंधन

अर्चना लवानिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सिंदूर का यह सिंदूरी बंधन बांधे रहे तुम्हें मुझसे ... और मुझसे तुम्हें ।। चमको मेरे माथे पर बिंदिया की तरह महको मेरे तन मन में गुलाबों की तरह बिखरी हुई ये सांसे बांधे रहे तुम्हें मुझसे .... और मुझसे तुम्हें ।। बस जाओ मेरी आंखों में काजल बन कर बिखरो मेरी जुल्फों में फूलों की तरह संदली सी ये खुशबू बांधे रहे तुम्हें मुझसे और मुझसे तुम्हें ।। लिख दो मेरे आंचल पे कहानी अपनी भर दो मेरे दामन में सारी रवानी अपनी डूब जाऊं कि तेरे रंग के सिवा कोई रंग ना भाई मुझको रंगों का यह सतरंगी बंधन बांधे रहे तुम्हें मुझसे .... और मुझसे तुम्हें ll परिचय :- अर्चना लवानिया निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपन...
भंवर में सफीना
ग़ज़ल

भंवर में सफीना

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** गजल - १२२,१२२,१२२,१२२ भंवर में सफीना न हिम्मत डरी है। न गम जो झुके हैं खुशी कब झुकी है।। उधर एक कंधों पे वो जा रहा है। इधर एक दुल्हन चली आ रही है।। यही जिंदगी है मुसलसल लड़े जो। गमों में खुशी गुनगुनाती फिरी है।। महामारिया भी बहुत देख ली हैं। डरें तो डरें क्यों खुदा तो नहीं है।। खिंजा है कभी तो कभी हैं बाहरें। झरे पात शाखे शजर तो हरी है।। भले रात कितनी ही लंबी रही हो। मगर रात की भी सहर तो हुई है।। हकीकत यही है बता दो सभी को। चली कब किसी की भी दादागिरी है।। खुशी कब किसी की ऐ "अनंत" हुई है। बड़ी बेवफा है बड़ी मनचली है।। परिचय :- अख्तर अली शाह "अनन्त" पिता : कासमशाह जन्म : ११/०७/१९४७ (ग्यारह जुलाई सन् उन्नीस सौ सैंतालीस) सम्प्रति : अधिवक्ता पता : नीमच जिला- नीमच (मध्य प...
मां सरस्वती के चरणों में वंदना
कविता, भजन

मां सरस्वती के चरणों में वंदना

मंजू लोढ़ा परेल मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** देखो वसंत पंचमी का शुभ दिन आया, मां सरस्वती के अवतरण का मंगल दिन आया, सफेद वस्त्रों में सुसज्जित मुख पर असीम शांति, होठों पर मीठी मुस्कान, आंखों से छलक रहा स्नेह का निर्झर, कितनी सुंदर मेरी मां है भारती-वागेश्वरी। हाथों में है तेरे वीणा, सुरों की तु सुरीली देवी, तुझसे ही है सारा संगीत, राग-रागनियाँ और मधुर लहरियाँ, कितनी मीठी शहद सी तेरी वाणी, मेरी मां है वीणापाणी। हंस पर तु विराजित, मोतियों सी तु दमकती, तेरे चेहरे पर छलकता नूर कर देता मन का सारा संताप दूर, हर लो हमारा अज्ञान, दे दो हमें ज्ञान मेरी मां है हंसवाहिनी। तु बह्मा पुत्री-वेदों की अधिकारी, शब्द-शब्द में तु समायी, मां से शुरू हुआ संसार, तुझसे ही पाया अक्षर अंक का ज्ञान, दे दो हमें वरदान, बना लो अपना अधिकारी -वारिस मेरी मां हे शारदे...
चरित्र निर्माण
कविता

चरित्र निर्माण

कीर्ति दिल्ली विश्वविद्यालय ******************* मानव चरित्र का निर्माण कभी एक दिन मे नही होता जो गिर जाने पर दोबारा एक दिन मे उठा लोगे उम्र के कई साल निकल जाते हैं इसे मोतियो सा चमकाने में आभा होती हैं ऐसी चरित्र की जो करती है गुणगान तुम्हारे चरितार्थ का चरित्र दोष व्यक्ति के चरित्र को बहुत औछा बना देता हैं विशिष्टता चरित्र की समाज में उसको एक नया दृष्टिकोण देता हैं मुख से निकाला गया अपशब्द तुम्हारा स्थान गिरा देता हैं तुम्हारी चरित्र की शोभा को एक छण में फिर मिट्टी में मिला देता हैं सम्मान यहाँ तुम्हारा तुम्हारे रूतबे का नही घुमा लेने पर पीठ रूतबा भी यहाँ परिहास का कारण बनता हैं चरित्र हो ऐसा तेरे न होने पर भी गुणगान का कारण बनता हो। परिचय :-  कीर्ति (एम.ए) निवासी : दिल्ली विश्वविद्यालय घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक ...