दुनिया का कुछ भान नहीं था
रशीद अहमद शेख 'रशीद'
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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दुनिया का कुछ भान नहीं था,
सभी लोग लगते थे अपने।
नवयौवन के मादक दिन थे,
नित आते थे सुन्दर सपने!
प्रेम अनल ने घेर लिया था,
नयनों से बहता था पानी!
सुध-बुध सारी बिसराई थी,
बैठी थी सिर पर नादानी।
प्रेम रोग के कारण हरदम,
तन-मन बहुत लगे थे तपने!
नवयौवन के मादक दिन थे,
नित आते थे सुन्दर सपने!
मानव मन की मर्यादा है,
सहनशीलता की भी हद हैं!
कष्ट और कठिनाई हों तो,
डगमग-डगमग होते पद हैं!
जब दुख की आँधी चलती थी,
लगता था उर अधिक तड़पने!
नवयौवन के मादक दिन थे,
नित आते थे सुन्दर सपने!
टूट गए थे बाँध सब्र के,
आशा के दीपक कंपित थे!
रुका हुआ था भाग्य सितारा,
नियति के निर्णय लंबित थे!
संकट की छाया में प्रायः,
ईश नाम लगते थे जपने!
नवयौवन के मादक दिन थे,
नित आते थे सुन्दर सपने!
परिचय - रशीद अहमद शेख 'रशीद'
साहित...
























