विराम चाहिए
विजय गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे,
बाकी जगह विराम चाहिए।
अंतर्मन से सृजनशील रहे,
तन को कुछ विश्राम चाहिए।
गुजरे वक़्त के कर्मकार में भी
कर्मठता का जलवा था
दायित्व बोध और मंशा को
वाक्य-विन्यासों का हलवा था
जीवन चक्र का मर्म यही है,
अवरोध विरोध अविराम चाहिए।
हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे,
बाकी जगह विराम चाहिए।
संस्कार मिले सबको ऐसा
ना बने कभी मुखौटा जो
तन धन साथ रहे ना रहे,
वाणी का ना टोटा हो।
वक़्त रहते ना संभले तो,
क्या पूरा कोहराम चाहिए।
हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे,
बाकी जगह विराम चाहिए।
पुतले भांति-भांति के जग में,
हमलों के कई आकार हैं
गमले अलौकिक बगिया के
ग़ज़लों के कितने प्रकार हैं
पुतले-हमले गमले-गज़लें
बस नितांत अभिराम चाहिए
हृदय स्पंदन ही अपवाद रहे,
बाकी जगह विराम चाहिए।
राम चलवाये बड़े जतन से,
कु...

























