मूक क्रांति हो
अर्चना अनुपम
जबलपुर मध्यप्रदेश
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भार ज्यों धरा उठा रही पवित्र पातकी।
क्लेश ना ही द्वेष हिय समान भाव मातृ सी।
हो सशक्त नारी तो ना बंदिनी वो वंदनीय।
अवनि के आलोक से करे प्रभा आकाश की।।
बन कुमुद है शोभती जो दामनी सी कौंधती।
रोड़ो को स्वयं वधे वैधव्यता को बांधती।
कर दमन आडंबरों का शांत व्यंग्य रागिनी।
भेदभाव भस्म यूँ करे कोई दावाग्नि।।
निश्चयों को दृढ़ करे सुमार्ग पथ स्वयं वरे।
लक्ष्य पक्ष में करे वो दिव्यता को धारती।
तर्क भेदी शूल कुप्रथाएं सारी धूल हों
चित्त शांति व्यक्त तृप्त आत्माभिमान की।।
सूर्य के समान तेज वायु सा प्रचंड वेग।
फूल सी खिली हो फिर भी अग्नि में तपी हो जो।
झेलती चली हो रूढ़ि और सारे बंधनो को।
उठ खड़ी बेबाक उनको रौंदती बढ़ी हो वो।।
राह में हों कितने कष्ट लोग हो चले हों रुष्ट ।
हों अनन्य दुष्ट एक क्षण भी ना डिगी हो जो।
इस धरा ...

























