मिट्टी मेरे गांव की
किशनू झा “तूफान”
ग्राम बानौली, (दतिया)
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युगों युगों से रही बोलती,
भाषा जो सद्भाव की।
जन्नत से बड़कर लगती है,
मिट्टी मेरे गाँव की।
खेतों में हरियाली वसुधा,
का श्रृंगार कराती है।
एक पड़ोसन दूजे के घर,
मठ्ठा लेने जाती है।
भाईचारा सिखलातीं हैं,
गलियां मेरे गांव की ।
जन्नत से बड़कर लगती है,
मिट्टी मेरे गाँव की।
यहाँ सूर्य भी पहले आकर,
उजियाला फैलाता है।
और पिता के नाम से हर इक,
घर को जाना जाता है ।
आती यादें, चोर सिपाही,
कागज वाली नांव की।
जन्नत से बड़कर लगती है,
मिट्टी मेरे गाँव की।
गाँव में किशनू के आने को,
ईश्वर भी ललचाते हैं।
राम, श्याम, घनश्याम यहाँ,
नामों में सबके आते हैं।
चारों धामों से बड़कर है,
मिट्टी माँ के पांव की।
जन्नत से बड़कर लगती है,
मिट्टी मेरे गाँव की।
परिचय : किशनू झा "तूफान"
पिता - श्री मंगल सिंह झा
माता - श्रीमती ...

























