छली गई शाम
डॉ. कामता नाथ सिंह
बेवल, रायबरेली
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टुकुर टुकुर ताक रही
जीवन की शाम।
पीपल की फुनगी पर
जा बैठा घाम।।
कौन यहाँ मेरा है,
समझ नहीं पाई,
चन्दा सूरज किसकी
करते भरपाई;
बार बार अपनों से
छली गयी शाम।।
नियराते दिन का तो
टूट गया चक्का,
पीछे से रजनी भी
मार रही धक्का;
कहाँ ठौर खोजे अब
बेचारी शाम?
चलना जीवन है,
चलते रहना है,
लेकिन कब तक यों
ढलते रहना है;
चल-चल के, थक-थक के
अब हारी शाम।।
टुकुर टुकुर ताक रही
जीवन की शाम।।
परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह
पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह
निवासी : बेवल, रायबरेली
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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