दिवा स्वप्न
शरद सिंह "शरद"
लखनऊ
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बिना पंख उड़ जाये गगन मे,
होड़ लगायें पंछी संग,
देखे सपने ऊँचे ऊँचे,
अलग हकीकत का है रंग!
लगें चाँद तारे मुट्ठी में,
चाहें जब भी खेलें संग,
उतरे चाँद मेरे आंगन में,
कण कण में भर देता रंग!
आता है वह सांझ सकारे,
हो जाती हूँ मैं गुम सुम!
सुबहा बेवफा हो
हो जाता है उषा के आँचल मे गुम!
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लेखक परिचय :- बरेली के साधारण परिवार मे जन्मी शरद सिंह के पिता पेशे से डाॅक्टर थे आपने व्यक्तिगत रूप से एम.ए.की डिग्री हासिल की आपकी बचपन से साहित्य मे रुचि रही व बाल्यावस्था में ही कलम चलने लगी थी। प्रतिष्ठा फिल्म्स एन्ड मीडिया ने "मेरी स्मृतियां" नामक आपकी एक पुस्तक प्रकाशित की है। आप वर्तमान में लखनऊ में निवास करती है।
आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अ...


















