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पद्य

बदली आबो-हवा देख रहा हूं
ग़ज़ल

बदली आबो-हवा देख रहा हूं

शाहरुख मोईन अररिया बिहार ******************** शहर की बदली आबो-हवा देख रहा हूं, बीमारों की कतारें हाथों में दवा देख रहा हूं। मुर्दा खोर इंसानों से मिलना है तो देखिए ये बस्ती, कितने इंसानों को पूछते मैं रास्ता देख रहा हूं। खुशियों के आंसू गम के आंसू देख रहा हूं, कितने लबों पे अभी उसका चर्चा देख रहा हूं। इंसानों की लुटती दुनियां जंगली बस्ती देख रहा हूं, कदम-कदम पर पैसों को रुपए बनते देख रहा हूं। आनी जानी दुनिया में बैठा तमाशा देख रहा हूं, सोच में हूं हकीकत देख रहा हूं या सपना देख रहा हूं। बेरोजगारों की बस्ती में भुखे सियार कितने हैं, मिट्टी के इंसानों को "शाहरुख" खाते मुर्दा देख रहा हूं। परिचय :- शाहरुख मोईन निवासी : अररिया बिहार घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अप...
बसन्ती महक उठी
कविता

बसन्ती महक उठी

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** बासन्ती, महक उठी ! चंचल-प्रकृति-बीच- कोयल बहक उठी ! गुलमोहर की डालों-पे गिलहरी-लहराई ! अढ़उल की शाखों पे- गौरैया-शरमाई ! सेमल-पलास बीच दिशाऍ लहक उठी ! पीपल पे हरी-हरी बदली छिटक उठी...! पाकड़ पे 'उजास' फूटा, बरगद पे ठिठका ! मौसम का ठौर-ठौर वृक्षों पे अटका ! महुआ के गुंचो में रसना समा रही ! अमरइया की मंजरी- किसको न भा रही ! मोरों को लय-ताल तीतर समझा रहा.. कपोत कुछ आगे फिर- पीछे-को जा रहा.. ! नीम के कोतड़ में तोते आनन्द-भरें... कठफोड़वा के श्रम पे ना जरा भी गौर करें..! जामुन के फूलों पे- भवरी-लहराई ! छींट-सारी पहनाई! शिरीष की शाखों-पे कर्णफूल लटक रहे ! अमलताश अब भी- पीताभ को तरस रहे! अर्जुन ने देखो, नव-किसलय है पाया! गूलर का फूल कहॉ सबको नजर आया! अन्दर ही अन्दर 'प्रकृति', रचना अप...
निर्बल संगम
कविता

निर्बल संगम

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** व्यक्ति व्यक्ति का निर्बल संगम कर रहा मानवता को कायर बोल रही आज अमानवता कर रहे मानवता में दानवता। सत्य, स्फुरति, स्पंदन उड़ गया मानवता से जागे आज अनेक रावण करवाते नित नए क्रंदन एक पुरुष का पौरूष जागे करें क्या एक अकेला। इस नर्तन में। रक्त देख रक्त खोलता था शिराएं थी तन जाती। वर्तमनु, मनुष्य नहीं है मांगना केवल अपनी ख्याति में। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती है...
खुद को उड़ती चिड़िया कर ले
ग़ज़ल

खुद को उड़ती चिड़िया कर ले

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** टूट पड़ें बस ग्राहक इतनी मोहक पुड़िया धर ले। बेशक घटिया माल रहे पर पैकिंग बढ़िया कर ले।। हाथों हाथ बिकेंगीं तेरी चीज़ें बाजारों में, जीत भरोसा जनता का फिर काली हँड़िया भर ले।। पाँव और ये पंख सलामत दोनों रखने होंगे, उड़ना ही है तो फिर खुद को उड़ती चिड़िया कर ले।। भरी जवानी में बुढ़िया सी सूरत ठीक नहीं है, रंगत बदल और खुद को खुद कमसिन गुड़िया कर ले।। ये रनिवास महल की रौनक सब मिटने वाली है, अच्छा होगा भव्य भवन को छोटी मढ़िया कर ले।। प्राण किसी के नहीं बचे हैं लाखों ने की कोशिश, इसीलिए खुद को कागज सा उड़िया मुड़िया कर ले।। परिचय :- गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आ...
धवल चाँदनी
गीत

धवल चाँदनी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** धवल चाँदनी भी मुस्काती, रजनी भी इतराती है। मस्त मिलन की बेला आई, गोरी भी बलखाती है।। छेड़े जुगनूँ प्रीति रागिनी, दीपक आस जलाते भी। संदल खुशबू तन से आती, प्रियवर तुम्हें बुलाते भी।। अर्पित है ये जीवन सारा, साँस-साँस इठलाती है। कोण-कोण फैला उजियारा, झूम रही डाली-डाली। नभ में तारों की मालाएँ रात दिव्य प्रिय मतवाली।। तन-मन आकुल आलिंगन को, गोरी बात बनाती है। मधु-उत्सव की मदिर उमंगें, नेह नयन प्रिय बरसाते। प्रेम पालने उन्नत होते, रति जैसे हम मुस्काते।। चंदा भी अठखेली करता, निशा प्रेम की पाती है। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री :...
शत शत नमन सभी माँओं को
कविता

शत शत नमन सभी माँओं को

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** तीनों माँयें पूजनीय हैं, जिननें ऐसे लाल जने। हुए शहीद युवावस्था में, पर भारत की ढाल बने। वैदेही वन गमन हुआ जब, तब जन-जन रोया था, धैर्य देख लो उन माँओं का, जिनका सुत खोया था। धन्य धरा है, धन्य देश है, जिसमें थे तीनों जनमें। हैं सतवार धन्य माताएं, निज सुत भेजे थे रण में। भगत सिंह सुखदेव राजगुरु, तीनों की थी तरुणाई। भारत माता की रक्षा हित, ली,तीनों ने अँगड़ाई। खट्टे दाँत किये दुश्मन के, कोई पास न आता था। हर अँग्रेजी सैनिक डर से, नाकों चने चबाता था। सिंह गर्जना सुन तीनों की, गोरे भी थर्राते थे। चाँद सितारे भरी दोपहर, नजर उन्हें भी आते थे। भीषण अत्याचार किया था, गोरों ने ही झाँसी पर। माँ का फटा कलेजा होगा, लाल चढ़े जब फाँसी पर। चूमा था तीनों ने फंदा, हो बुलंद हँसते-हँसते। जैसे शाही ...
मातारानी का है आगमन
भजन, स्तुति

मातारानी का है आगमन

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** मातारानी का है आगमन हो गया, उनकी महिमा उन्ही को सुनाते चलो। पूरे नौराते माता की महिमा को गा, उनकी करुणा कृपा, नित्य पाते चलो। मातारानी का है... नौ दिनों मेरी मैय्या के नौ रूप है, रहती शीतल सदा, काली में धूप है। वो बुलाती है भक्तों को निज धाम पे, तुम भी पग उनके दर को बढ़ाते चलो। मातारानी का है.... मैय्या का भव्य होता है श्रंगार नित, वो बहाती है करुणा को भक्तों के मित। कवि को महिमा बताती, वो लिखते उसे, स्वर के ज्ञाता हो तो, उनको गाते चलो। मातारानी का है... नौ दिनों तक बरसता है, अमृत जहां, भक्त मैय्या की महिमा को गाते जहां। मैय्या मोती लुटाने को आई धारा, तुम भी दर जाके, झोली फैलाते चलो। मातारानी का है ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ ...
सबको हंसा दो
कविता

सबको हंसा दो

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** सबका जीवन भरा कष्टों से पर हंसकर पार करो तुम माना धन की कमी है सभी को पर दिल से रहीश बनो तुम । आज अकेले कर परिश्रम दिखा दो ताकत सभी को तुम । करके जरूरतें कम अपनी खुशियों को बढ़ा लो तुम । आज पैदल कल साइकिल से चल गाड़ी में बैठ जाना एक दिन तुम बड़ों का आदर छोटों से प्यार सबके दिलों पर राज करो तुम गम में होके सरीक सभी के दुखों को कम कर दो ना तुम मुरझाए चेहरे हैं चारों तरफ बोल मीठे बोल खिलखिला दो तुम अपनी चाहतों को फैला कर रोते को सीमा हंसा दो ना तुम परिचय :-  सीमा रंगा "इन्द्रा" निवासी :  जींद (हरियाणा) विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ हेतु प्रचार, रक्तदान शिविर में भाग लिया। उपलब्धियां : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल...
हमेशा याद रहता वो
ग़ज़ल

हमेशा याद रहता वो

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** हमेशा याद रहता वो अग़र हर बार होता तो। कहानी में कहीं उतना असर क़िरदार होता तो। उठा लेता सभी के साथ उनमें हाथ वो अपना, हमारी बात रखने के लिए तैयार होता तो। लगा लेते गले उसको शिक़ायत भूलकर सारी, कि दिल का हाल जब लब पर खुला इज़हार होता तो। वहाँ उसकी ख़ता सारी समझकर माफ़ हो जाती, रिवायत में किसी ज़ज़्बात का इकरार होता तो। उसे दिखता, उसे मिलता, उसे ही चाहता अक्सर, कि उसकी वो कभी उतनी हसीं दरकार होता तो। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास : अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति : शिक्षक प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान : साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जा...
राम नाम यशगान
भजन, स्तुति

राम नाम यशगान

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** राम नाम है वंदगी, राम नाम यशगान। राम नाम सुख-चैन है, नित्य धर्म का मान।। राम नाम तो ताप है, राम नाम में साँच। राम नाम यदि संग तो, कभी न आती आँच।। राम नाम सुख से भरा, राम नाम रसधार। राम नाम आराध्य तो, महके नित संसार।। राम मोक्ष हैं, दिव्य हैं, जग के पालनहार। राम शरण में जो गया, पाता वह उपहार।। राम नाम तो सूर्य है, राम नाम अभिराम। राम नाम आवेग है, नित ही तीरथधाम।। राम नाम तो श्रेष्ठ है, राम नाम आदर्श। तरे मनुज भव से सदा, मिले राम का स्पर्श।। राम नाम शुचिता लिए, राम नाम में सार। राम नाम वरदान है, राम नाम उपहार।। राम नाम उजियार है, हर ले जो अँधियार । राम नाम यशगान है, राम नाम जयकार।। राम नाम मधुरिम-सुखद, राम रहें आराध्य। राम नाम है वंदगी, राम प्रखर अध्याय।। राम नाम आशीष...
माँ  कृपा
कविता

माँ कृपा

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** माँ कृपा बड़ी निराली है करो समर्पण फिर जिंदगी में खुशहाली है भले ही माँ भूखी रह जाती है मुझे आई तृप्ति की डकार से माँ संतुष्ट हो जाती है। संसार में माँ ही शक्तिशाली है बिन माँ के दुनिया की बदहाली है माँ रातो को लोरिया सुनाती है नींद में मीठे सपनो को बुलाती है। कभी नींद में हँसाती गालो में गड्डे बनाती है जब जब माँ की याद आती है सुबह मीठी आवाज में उठाती है। माथे को चुम कर बालो को सहलाती है स्वर्ग धरा पर बनाती है माँ का कृपा बड़ी निराली है करो समर्पण फिर जिंदगी में खुशहाली है। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निर...
सूर्यवंशी राम
भजन, स्तुति

सूर्यवंशी राम

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** चतुर्भुज गोविन्द के अवतारी, लीलाधारी घनश्याम। दशरथ नंदन, रघुकुल भूषण, मर्यादा पुरुषोत्तम राम।। सूर्यवंश के प्रतापी अधिपति, त्रेतायुग के पुरुष विराट। प्रजाओं के परम पूजनीय, आदर्श देव महान सम्राट।। गुरु वशिष्ठ के प्रिय शिष्य, धनुर्विद्या में अति प्रवीण। करुणानिधान, दयालु,जन मन कीर्ति किया उत्कीर्ण।। दीन-हीन, पतितों के अभिरक्षक, रणबांकुरा, रणधीर। दानव और राक्षस संहारक, सर्व शक्तिमान, शूरवीर।। माता-पिता वचन अनुगामी, प्रिया के प्रति समर्पण धर्म। भ्राता के प्रति स्नेहिल व्यवहार, न्याय संगत, राज कर्म।। मित्र के प्रति सहयोग भावना, मृदुभाषी,सरल व्यक्तित्व। लोकमंगल, जनकल्याण, खुशहाल, समृद्ध था प्रभुत्व।। रामराज्य में अंगीय, अगत्या, पार्थिव तापों से थी मुक्ति। किंचित मृत्यु, व्याधि व्यथा की थी प्रभावज...
माँ भारती शर्मसार हो गई
कविता

माँ भारती शर्मसार हो गई

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पाशविक दहलाती करतूतें हदों से ही गुज़र गई दरिंदों की दारुण बेहयाई अब सीमा पार हो गई नैतिक मूल्यों की वो बातें कहाँ बिखर बिसर गई अमानवि दुःशासिनी हरकतें अब तो कारगार हो गई देवियों से पूजित बेटियों की चुनरी क्यूँ तार तार हो गई ये मासूम अधखिली कलियाँ अब दर्द से बेज़ार हो गई नोची खसोटी गई कई गोरियाँ अनब्याही ही आज रह गई ख़्वाबों की सुरमई गलियों से बदनाम बस्तियाँ बन गई शिवानी एलीना आसिफ़ा सी निर्भया दामिनी चली गई हाथरस में मनीषा की हड्डियां हथौड़े से चूर चूर हो गई ना रहा भय महामारी का इन्हें दुर्दांत कहानी मशहूर हो गई रक्तरंजित गूंज रही कराहों से यम- ड्योढ़ी तरबतर हो गई लक्ष्मी दुर्गा पद्मिनी के देश में माँ भारती शर्मसार हो गई परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती ह...
नारी का समर्पण
कविता

नारी का समर्पण

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** देखो-देखो नारी समर्पण, इस जग में सबसे न्यारा और प्यारा। इतिहास भी साक्षी है, हर नारी बोले, हर पुरुष नारी तोले, बिन बात पति बोले, पत्नी से हौले-हौले, तुम सारा दिन करती ही क्या हो ? प्रश्न सुन पत्नी का क्रोध खौलें, पत्नी कहे मत दिखाओ, नयनों के गोले, तुम कितने हो भोले, ऐसी कटु वाणी से रिश्ते हो जाते पोले। तुम सब पुरुष पहन लो मानवता के चोल़े, हर्ष से भर लो अपने-अपने झोले। जीवन नैया तुम्हारी क्यों डोले ? यह जानो और समझो। तुम बजाओ शहनाई, और सुंदर जीवन संगीत के ढोलक-ढोले। अपने-अपने अंतस भरे अहंकार कालिमा धौले। हटाओ घृणा, द्वेष, ईर्ष्या के फफोले। समझो नारी समर्पण का मोल, भस्म करो पंच विकार ज्ञान यज्ञों की अग्नि में, मत करो नारी से अति अपेक्षा का लोभ। अब जान भी जाओ और मान भी जाओ। न...
नव वर्ष संकल्प करें
कविता

नव वर्ष संकल्प करें

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आओ इस नववर्ष संकल्प करें बीते कल का आभार करें, नव संवत्सर का सत्कार करें उज्जवल भविष्य की सोच लिए अपनी मंजिल की ओर बढ़ें तमस मिटा अंतर्मन का, हर भेद भाव को दूर करें नई उमंग नई चाह लिए जीवन में नया प्रवाह भरें भूल गए जिन कर्तव्यों को संपूर्ण उन्हें इस वर्ष करें हर जीव को सम्मान मिले, जीने का अधिकार मिले, हर चेहरे पर मुस्कान खिले, हौसला ये रख हर कदम बढ़ें क्यों भूल गया मानव इनको, धरती माता के लाल हैं ये निर्बल, असहाय, कमजोर मगर ईश्वर का प्रतिरूप हैं ये ले दृढ़ प्रतिज्ञ इनके हक़ में इनका मार्ग प्रशस्त बनाना है सृष्टि के उपहार हैं ये इसका कर्ज चुकाना है ये धरा-गगन कल कल नदियां, हर जीवन का आधार हैं ये वन का मूल्य पहचान हमें इनका अस्तित्व बचाना है ले प्रण हर जीवन के संरक्षण का धरती का सौंदर...
आ जाओ हे राम
स्तुति

आ जाओ हे राम

अनुराधा प्रियदर्शिनी प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** आज भी विपदा भारी, आ जाओ हे! नाथ। धरती पर संकट बहुत, पीड़ा हर लो नाथ।। मानव तन में घूमते, दानव दल का राज । संत जनों को कष्ट दे, करते हैं वो राज।। वचन तुम्हारा नारायण, लोगे तुम अवतार । जब जब धरती पर बढ़े, पाप औ अत्याचार ।। संत जनों के साथ में, धरती करे पुकार। धर्म की रक्षा करने वाले, सुन लो आज गुहार।। त्रिभुवन के तुम स्वामी, आ जाओ हे राम । नर के अंतस से रावण का, नाश करो श्री राम।। चैत्र मास शुक्ल पक्ष की, नवमी तिथि है आज। अवधपुरी के साथ ही, उत्सव जग में आज।। परिचय :- अनुराधा प्रियदर्शिनी निवासी : प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्...
ये ख्वाब हमारे
कविता

ये ख्वाब हमारे

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** जब देश की आजादी के १०० वर्ष पूरे होंगे आजादी के अमृत काल तक भारतीय शिक्षा नीति सारी दुनिया को दिशा देने वाले दिन होंगे ये ख्वाब हमारे संकल्प सामर्थ्य से पूरे होंगे अमृत काल में हिंदुस्तान की शिक्षा नीति की विश्व प्रशंसा करे, यहां ज्ञान लेने आएं, ऐसा हमारा गौरव हों, विश्व कल्याण की भूमिका निर्वहन करने में भारत समर्थ होंगे राष्ट्रीय शिक्षा नीति को शिक्षकों प्रशासकों ने गंभीरता से अमल में लाना है शिक्षा क्षेत्र में भारत को विश्वगुरु बनाना है भारतीय युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं बस गंभीरता से उसे पहचानना है शिक्षण को स्वांदात्मक बहुआयामी आनंदमयी अनुभव बनाना है छात्रों में मूल्यों को विकसित करने शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित करनाहै छात्रों के आचरण को सुधारने विपरीत परिस्थितियों का स...
राम आते हैं
कविता

राम आते हैं

रेणु अग्रवाल बरगढ़ (उड़ीसा) ******************** युग-युग में आकर सदा अपना वचन निभाते हैं हर अहिल्या को तारने एक राम ही आते हैं। सदियों से हो सिलारूप असह्य वेदना भोग रही कब आएँगे वो तारनहार आतुर नैनों से जोग रही स्नेह स्पर्श देकर अपना उसकी व्यथा मिटाते हैं। हर अहिल्या....। पुरुष तत्व रहा दंभ भरा नारी को न स्वीकार पाया बदला था न बदलेगा कभी अहं विरासत उसने पाया अहं का मर्दन करते हैं वो पुरुषोत्तम राम कहलाते है हर अहिल्या को....। नारी पावन होकर भी देती रही अग्नि परीक्षा पुरुष प्रधान समाज ने कब जानी उसकी इच्छा हर सीता के आँचल में क्यों सदा काँटे आते हैं हर अहिल्या...। प्रेम आड़ में छलता जो स्त्री के कोमल मन को क्या पाएगा आत्मा को छूकर रह गया तन को प्रेम शक्ति की सत्ता की वो अनुभूति कराते हैं हर अहिल्या....। परिचय :-  रेणु अग्रवाल निवासी - बरगढ़ (उड़ीसा)...
पानी
कविता

पानी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रे बाबा कैसी जिंदगानी है, पानी की भी अजब कहानी है, पानी से ही धोना नहाना, पानी से ही पीना खाना, नहीं करती कभी ओछी हरकत, पानी निःस्वार्थ देती है कुदरत, पर कुछ जातियों में जबरदस्त शक्तियां देखी जाती है जो अन्न को, जल को, यहां तक भगवान को भी अपवित्र कर देते हैं, कइयों की भावनाएं आहत कर उनमें मातम भर देते हैं, इनके आगे कोई नहीं ठहरता, पता नहीं कौन है इनमें शक्ति भरता, सुअर, कुत्ते, बैल जैसे जानवर भी किसी घाट, जलाशय को अपवित्र नहीं कर सकते, पर वाह रे अमानवीय नियम कुछ मानव पानी में अपना पांव नहीं धर सकते, मगर धन्य है वो महामानव, जिसने मनुवादियों के सामने पानी छूने से लेकर पीने तक का अधिकार दिलाया, लोगों को पानी पिलाया, रोते रहें वे जो रहते हैं हरदम रोते, लेकिन इतना जरूर जान लें पानी और खून कभी अ...
अबे ओ काले घन!
कविता

अबे ओ काले घन!

शैल यादव लतीफपुर कोरांव (प्रयागराज) ******************** अबे ओ काले घन! क्यों बना रहे हो हमें और भी निर्धन, पेशे से ‌भले ही मैं 'किसान' हूॅं, लेकिन यार मैं भी तो एक इंसान हूॅं, नहीं मिलती किसी भी प्रकार की हमको पेंशन है, दिन-रात,सुबह-शाम, आठों पहर केवल टेंशन है, चैत माह में जब रबी की फसल तैयार है, फिर बूॅंदों की तलवारों और ओलों से क्यों प्रहार है, हमारी जिंदगी में क्यों रोड़े बन रहे हो, निरपराध के लिए भी क्यों कोड़े बन रहे हो, तैयार फसलों को देखकर कैसे तुम्हारा मन करता है आने को, अब तुम ही बताओ कहाॅं से लाऊॅं अन्न बच्चों को खाने को, खून पसीने से सींच-सींच कर जब मैं अन्न उगाता हूॅं, तब जाकर कहीं बच्चों के लिए मैं दो वक्त की रोटी पाता हूॅं, लेकिन अबकी बार तो रोटियों से पहले तुम आ गए, मौत का तरल दूत बनकर गगन में तुम छा गए, अब तुम ही बताओ कैसे ह...
हाथ तेरा थामकर
धनाक्षरी

हाथ तेरा थामकर

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पूर्वाक्षरी अनुप्रास अलंकृत घनाक्षरी हाथ तेरा थामकर, नेह डोर बाँधकर, जुदा कभी ना हो हम, कसम ये खाई है। साथ रहें सातों जन्म, चाहे खुशी चाहे गम, हर दिन बसंत हो, रीत ये बनाई है। बात नहीं हो अधूरी, भले आँखों में हो पूरी, समझ ही लेंगे हम, प्रेम की सच्चाई है। रात-दिन संग रहें, संगम की वायु बहे, ये कहानी अमर हो, मन मेरे भाई है। परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानि...
पतझड़ मानवता का
कविता

पतझड़ मानवता का

सोनल सिंह "सोनू" कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़) ******************** पेड़ों से छूटा पत्तों का साथ, दिल में बाकी रहे न जज्बात। कोई नहीं बढ़ाता मदद का हाथ, लोग बदल जाते हैं अकस्मात्। ये है नैतिकता के पतझड़ की शुरुआत। कोई समझता नहीं किसी की बात, आपस में टकराने लगे ख्यालात। उजालों को निगलने लगी स्याह रात, बद् से बद्तर हो रहे हालात्। ये है मानवता के पतझड़ की शुरुआत। तरक्की पर अपनों की हृदय में साँप लोट जाता है, ईर्ष्या द्वेष के गर्त में मानव डूब जाता है। अपना कहकर लोगों को छला जाता है, शराफत का लबादा ओढ़े हैवान नजर आता है। अपनत्व का ये पतझड़ थम नहीं पाता है। प्रकृति का पतझड़, मधुमास में बदल जाता है। नई कोपलें आती हैं, पलास भी मुस्काता है। गुलमोहर भी खिलने को आतुर हो जाता है। किन्तु इंसान इंसानियत से दूर ही रह जाता है। मानवीय मूल्यों का ये पतझड़ थम नहीं पाता है। परिचय -...
गौरैया
कविता

गौरैया

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा दिन-भर किया-करें धमा-चौकड़ी फेरा एक नहीं, दो नहीं दस - बीस में आऍ कभी-कभी डेरा करें कभी मंडराऍ बच्चे देख हर्ष करें कभी करें टेरा अढ़उल के फूलों में चीड़ियों का बसेरा सुबह-शाम चीं-चीं-चूॅ-चूॅ, करें ना अघाऍ केलों के पत्तों में दौड़ - दौड़ जाऍ लगे वहॉ घोसल में चुज्जों का जनेरा अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा आर्यन जब पास जाए वो भी फुदक आऍ आर्या भी मम्मी से चावल मॉग लाए चारो तरफ बिखराए बनाकर के घेरा अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा इधर-उधर दाना चुगे दौड़े - कूॅदे धाऍ जरा सा आहट मिले फर्र से उड़ जाऍ पीछे-पीछे दौड़ें सभी हो - कर फिरेरा अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा परिचय :-  बृजेश आनन्द राय निवासी : जौनपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत...
सावधान
कविता

सावधान

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** भारतीय संस्कृति पर हमला, भारत की अस्मत पर हमला चाहे कुछ भी हो जाए, कभी नहीं होने देंगे। चाहे कितने बम बना लें, चाहे कितने पत्थर बरसा लें चाहे कितनी मिसाइल चला लें, उनकी न हम चलने देंगे। छेद रहे हैं देश की संस्कृति, देश की ही दीवारों से सचेत रहना है हमको, इन आतंकी गुनहगारों से। यहाँ वहाँ आतंक मचाते, नहीं देश के काम आते आगज़नी, गोली, गन, ये घर में ही बम बरसाते। कभी राजनीति के ज़रिये, कभी कहीं ये छुप जाते कभी देश के टुकड़े करते, ये बोली से बम बरसाते। छुपेरुस्तम ये देश के दुश्मन, बचना है ग़द्दारों से छेद रहे हैं देश की संस्कृति, देश की ही दीवारों से। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका...
रोटी ही बहुत है
कविता

रोटी ही बहुत है

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** घर में न हों जो चार, दाने तो कहीं भी यार, मिल जाए रूखी सूखी, रोटी ही बहुत है। गंजी खोपड़ी पे केश, बचे हों विशेष शेष, तो भी चार बालोंवाली, चोटी ही बहुत है। जेब में न हो छदाम, रखा हो कुबेर नाम, ऐसे नामी को तो खरी, खोटी ही बहुत है।। लट्ठ देख भाग उठे, बिना लिए प्राण ऐसे, भागे हुए भूत की लँगोटी ही बहुत है।। परिचय :- गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंद...