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कविता

मनमानी
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मनमानी

मनोरमा संजय रतले दमोह (मध्य प्रदेश) ******************** कैसा समय आ गया अब कोई, किसी की ना सुनेगा..। मनमानी करेगा अरे.....अरे.. ये कोई में ... माँ बाप भी शामिल है इस बात पे विचार करो चौथी पाँचवी के बच्चे माँ बाप को धमका रहे आप ने हमसे जिद्द की हम घर छोडकर चले जायेगे अब आप ही बताये ऐसे बच्चे समाज के क्या काम आयेगे.. इन्हें तो ना सुनने की आदत ही नहीं चाहे वो माँ बाप से चाहे आफिस में चाहे रिश्तेदार से... सोचिये...ये फिर कैसे शादी कर पायेगे.. एक दूसरे से सामंजस्य बनाना ही नहीं चाहते कैसे रिश्ते टिकेगे.. इसलिये ये लिव इन रिलेशनशिप चल रहा फल फूल रहा इस रिश्ते को हिन्दी मे क्या कहे.. सोच के भी शर्म आती है आज बेटो बेटी को विवाह तो नहीं करना पर विवाह के बाद का सुख चाहिए बच्चे चाहिए... आज के युवाओ के लिये बालीवुड ही आदर्श बना है तभी तो माँ बाप मुँह ...
शाल्मली: एक मौन सार्थकता
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शाल्मली: एक मौन सार्थकता

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** आकाश की नीलिमा को चुनौती देता, एक दरख्त खड़ा है नग्न शाखाओं पर सिंदूरी मशालें जलाए। उसे मलाल नहीं कि वह किसी के जूड़े की शोभा नहीं, न ही उसे दुख है कि देवताओं के चरणों तक उसका सफर नहीं पहुँचता। उसका सौंदर्य प्रदर्शन की वस्तु नहीं, वह तो एक 'होने' का उत्सव है। वह खिलता है तब, जब पतझड़ सब कुछ छीन लेता है, जब उम्मीद की टहनियाँ ठूँठ होने लगती हैं, तब वह रक्तिम आभा बनकर फूटता है- धैर्य का पर्याय बनकर। उसका धर्म किसी प्रशंसा का मोहताज नहीं, वह छाया नहीं देता, पर आश्रय देता है; वह खुशबू नहीं बाँटता, पर रंग भर देता है- उन रास्तों में, जिन्हें लोग 'सूखा' कह कर छोड़ देते हैं। उसकी सार्थकता उन पंछियों की चहचहाहट में है, जो उसकी ऊँचाई पर भरोसा करते हैं। सीखना हो तो सेमर से सीखें- कि समय पर ख...
मेरी मांँ
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मेरी मांँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** मन की बातें किसे बताए कौन है जो गले लगाये, समझे जो कोई मेरी बातें, वह तो मेरी माँ ही जाने। दुख-दर्द, दुख-सुख को जो जाने, मन के भाव को जो पहचाने, प्यार और दुलार की जो है जननी। संबंधो की जो है टहनी, उज्जवल भविष्य की कामना जो करती, निर्मल मन निर्मल है विचार, संस्कार और संस्कृति का रखे जो ख्याल, मान मर्यादा का जो पाठ पढाती, बच्चों का रखती जो खयाल, माँ तो माँ बस माँ होती है चन्दा सी शीतल है मां ,सुरज सा प्रकाश हे माँ माँ तो बस माँ ही होती है। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्ज...
मन की नम् माटी
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मन की नम् माटी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की नम मिट्टी में जब भावों का बीज गिराया, आँखों की कोरों ने चुपके से जल बरसाया। पीड़ा की हल्की धूप में सपनों ने अंगड़ाई ली, आशा की कोमल कोंपल ने फिर मुस्कान सजाया। मन की नम मिट्टी में श्रद्धा का दीप जले, विश्वास की खुशबू से जीवन के आँगन पले। संघर्षों की धूल भले ही राहों में बिखर जाए, धैर्य की फसल उगे तो भाग्य के द्वार खुले। मन की नम मिट्टी में रिश्तों के फूल खिलें, ममता की सरिता बहे, प्रेम के मोती मिलें। अंतर की करुणा जब बन जाए हरियाली, सूखे से जीवन में फिर सावन झूमे खिलें। मन की नम मिट्टी में संस्कारों की जड़ हो, सत्य की धूप मिले, मर्यादा का अंकुर हो। लोभ की आँधी आए तो भी न डिग पाए, नीति का वटवृक्ष बने, आदर्शों का स्वर हो। मन की नम मिट्टी में ईश्वर का नाम पले, भक्ति का अंकुर फूटे, आत्मा के दीप जले। ...
होली के रंग मस्ती के संग
कविता

होली के रंग मस्ती के संग

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मौसम हुआ है फागुनी, फागों पर छाया शवाब। हरम मन में सजने लगे, फिर रंग-बिरंगे ख्वाब। हर कली को है चूमता, चंचल भ्रर सदाबहार। फिजाओं में है घुल रही, देखो अब बसंती बयार। गली-गली में हो रही, अब रंगों की बरसात। रंग-बिरंगे से दिन हुए, हुई मस्ती वाली रात। बहके बहके से कदम, हो गई नशीली चाल। भंग की मस्ती में अब, तन मन हुए हैं बेहाल। अंगारों सा दहक उठा, गोरी का तन है आज। सुध बुध है बिसराय के, भूल गई वो सब काज। भींग गई लहंगा चोली, भींग गई चुनरी आज। गोरी का घूंघट सरका, तज करके सारी लाज। मुखड़ों पर हैं सज रहे, अब इंद्र धनुषी ये रंग। हुलियारी टोली निकली, फिर से मस्ती के संग। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी से...
रंगो की बौछार
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रंगो की बौछार

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** होली आई, होली आई रंगो की बौछार ला ई टेसु ओढे लाल चुनरिया पलाश अगन लगा ए रे। रंग, रंग मे भीगी गौरी छुप, छुप कर रंग डाले रे चली पिचकारी की बौछारे तन भीगे, मन भीगे और भीगे आंचल रे। आरती की थाली सजा ऐ घुघंट ओढे निकली सजनी बौछारो से बचती जाती चाल चले मतवाली रे। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २...
मुझे नफरत है पापा
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मुझे नफरत है पापा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां मैं बहुत नाराज हूं आपसे, आपसे मुझे नफरत है पापा, हमेशा हमसे झूठ बोलते हो, जहां प्रखर आवाज चाहिए वहां क्यों सब कुछ म्यूट बोलते हो, सारी परेशानियां सर पर लेकर कहते हो कोई समस्या नहीं है, मैं हूं ना सारी समस्याओं का मुकम्मल समाधान यहीं है, हमसे सच छुपाने की ये नौबत आ गई, खून बेचकर राशन लाने की क्यों नौबत आ गई, हमारी भूख सहने पर क्या भरोसा नहीं है, हम पर अविश्वास क्या धोखा नहीं है, हां पैसा तो कमाते हो, पर पैसा आने का सोर्स क्यों नहीं बताते हो, कहीं औलाद की उदर भरने के लिए हम औलादों से धोखा नहीं है, हमें विश्वास में ले लेने खोते क्यों मौका नहीं है, भीख मांगना पाप है आपने ही सिखाया, रिश्तेदारों से मांगने का गुर कहां से आया, कर्ज में डूब हमें क्यों पाल रहे हो, हमारे संघर्ष मय जीवन से ...
मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं
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मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत हूँ, मौन हूँ किन्तु अनभिज्ञ नहीं हूँ दर्द को मुस्कराहट में छुपाना जानती हूँ एक कहानी हूँ, पर अधूरी नहीं!! प्रेम धर्म निभाती हूँ करुणा से भरा हृदय रखती हूं संवेदनाओं से भरी हूँ आरंभ हूँ अंत नहीं! कभी उकेरी हुई भावनाओं से ओतप्रोत, कभी भ्रमित होती कल्पनाओं एवं वास्तविकता में, कभी तराशी गई कभी नकारी गई हूँ दिलों की अभिव्यक्ति बनी हूँ खामोशी नहीं!! खुशियों की बरसात में छुपकर रहने वालों को, हँसी की दो बूंद के लिए तरसते देखा है, अभिमान मे डूबे रहने वालों को तन्हाई में छुपकर रोते देखा है, सपनों को पूरा करने का हौसला रखती हूँ नारी हूँ, किन्तु बेबस-लाचार नहीं!! जीवन के सही अर्थ को समझना चाहती हूँ, स्नेह और करुणा का दीपक चारों ओर जलाना चाहती हूँ, स्व चेतना के प्रकाश से आंतरि...
कर्मो का फल
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कर्मो का फल

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** ये वक़्त का फेर कहो या कर्मो की गाथा क्योंकि, जब समय है आता तो ईश्वर भी नही बच पाता।। ना राजा दशरथ कर्मो के फल वश बाण चलाता, ना मंथरा विष की वाणी घोलती ना केकई राम को वन का मार्ग दिखाती।। ना युद्ध में कृष्ण ने छल किया होता ना माँ गांधारी को क्रोध आता, ना श्राप वश ईश्वर होने पर भी मानव मृत्यु का दंश मिलता।। ना भीष्म से नारी का अपमान होता ना अंबा ने श्रीखंडी का रूप मांगा होता, ना अर्जुन ने उनकी ओट ली होती ना भीष्म को बाणो की शय्या मिलती।। ना पिता की मृत्यु पर अस्वथामा ने क्रोध किया होता ना पांडवो के वंश को निंद्रा मे चिर निंद्रा देते, ना ज़ख़मो मे रिस्ते खून के संग चिरंजीवी होके अकेले वनों मे भटकने का श्राप मिलता।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाण...
एक इल्जाम
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एक इल्जाम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** एक इल्जाम मेरे नाम आया है न होते हुए भी मोहब्बत सरेआम मेरा नाम आया है। मैं ढूंढता रहा हर जगह खुद को ही न जाने क्यों फिर भी मेरा नाम किसी ओर के साथ आया है। लोग पूछते रहे मुझे मेरे गम का कारण और मैं हर गम में खुदा तेरा नाम हर बार लेता आये हूँ। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित...
तुम पर ही फ़िदा हूँ
कविता

तुम पर ही फ़िदा हूँ

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** मैं तुम्हें चाहता हूँ, तुम पर ही मर मिटा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। धड़कनें कह रही हैं, कुछ सुनो तो ज़रा। पास आओ ना तुम, दूर क्यों हो भला? मन की बातें बता दूँ, वर्षों के बाद मिला हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। पास-पास हम हैं, मिलन की घड़ी आई है। रंग-बिरंगे बाग दिखे, रुत ने ली अंगड़ाई है।। खुशबू बिखेर दो ना, कुसुम बन खिला हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। तुम गीत बन जाओ, मैं संगीत बन जाऊँ। तुम हो हमजोली, मैं कविमीत बन जाऊँ।। लिख कर कविता, कल्पनाओं से घिरा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। जीत की राहें, फैलाती हैं बाँहें, आ भी जा। खुशी के पल, ना जाए ढल, मान भी जा।। तुम हो बसंत बहार, मैं बदलती फ़िज़ा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हू...
हाथ मिला
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हाथ मिला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हाँ- यदि दम है… तो हाथ मिला। हमें गले लगा, हमें हँसा-खिलखिला। चाय नहीं तो कम से कम अपने घर पानी पिला। मगर… आपके रवैये से हम निराश हैं, इंसानियत के लिए इंसानों से ही हताश हैं। कहो- सचमुच मिट गया है जातिभेद? तो आ… सबको बता। हमें छूने दे वही घड़ा, जिसके लिए कभी अपना प्राण गँवाना पड़ा। सिर्फ समरसता की बयार बहाते हो, अपने घर से लाया भोजन अपनी ही थाली में फोटो खिंचवा खाते हो। मूर्ख बना सकते हो चंद अनपढ़ों को, मगर तोड़ोगे कैसे ये जमे हुए सामाजिक घड़ों को? हमने हमेशा अमन और शांति का साथ दिया है, हुई ज्यादतियाँ- प्यार पाकर भुला दिया है। हमने नहीं रखा कभी कोई गिला… पर आज भी पूरे दम से पूछते हैं- यदि सच में बराबरी का हौसला है, तो आओ… हाथ मिला। परिचय...
रामायण सार
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रामायण सार

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** (१) आदर्शों की अयोध्या में जन्मा मर्यादा का उजास, राम बने धर्म-दीप, जिनसे जग ने सीखा विश्वास। राजा दशरथ की वाणी, वचन बना पथ का शूल, त्याग की कसौटी पर चढ़ा, राजसिंहासन का मूल। (२) वन-पथ पर संग सीता, लक्ष्मण बने छाया-सार, कांटों में भी खिला कुसुम, प्रेम रहा आधार। शबरी के बेरों में मिला भक्ति का निर्मल स्वाद, साधारण हृदय में बसता, ईश्वर का संवाद। (३) अहंकार के रथ पर चढ़ा, लंका का वह अभिमान, सीता-हरण से काँप उठा, मानव-मूल्य विधान। अशोक-वाटिका में धैर्य, दीपक-सा जलता रहा, नारी-सम्मान का शिखर, इतिहास लिखता रहा। (४) हनुमान बने सेतु-स्वप्न, शक्ति का संयम रूप, वानर-सेना ने बाँधा, आशा का दृढ़ अनूप। राम-रावण संग्राम में, नीति ने पाई जीत, अधर्म ढहा, धर्म उठा, सत्य हुआ प्रतिष्ठित। (५) अयोध्या लौटा उजियारा, दीपों...
बाहर फागुन बौराया है
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बाहर फागुन बौराया है

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** बाहर फागुन बौराया है, मलय-पवन लहराती है पर भीतर की अगन अनकही, पल-पल मुझे जलाती है रंगों की इस भीड़-भाड़ में, मैं तनहा खड़ा रहूँ निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? यादों की समिधा सुलगी है, नयनों के इस कुंड में धुआँ-धुआँ सा हुआ जा रहा, मैं सपनों के झुंड में भीग रही है दुनिया सारी, केसरिया बौछार से मैं अपनी रुलाई को अब, हँस कर कैसे सहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? अबीर गुलाल उड़ाते चेहरे, लगते हैं सब बेगाने मौन खड़ा हूँ अधरों पर मैं, लिए हज़ारों अफ़साने कोरे रह गए मन के पन्ने, बिन तेरे अनुराग के राख हुए इन अहसासों को, कब तक चुनता रहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? परिचय :- . विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" निवासी : सेंधवा (मध्य प्रदेश) सम्प्र...
प्यारी माँ
कविता

प्यारी माँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** माँ मेरी ममता की मूरत, मिले हमेशा तेरी गोद। शान्ति शकुन है तेरी गोद मै, प्यार ममता की छाँव भी। सुख चैन आँचल मै तेरे, मीठी लोरी भाव है। हर जनम तेरी गोद मिले माँ, प्रेम स्नेह अपार है। मधुर बोल शांति स्वरूप माँ, सुख दुख सहती अपार है। माँ का आँचल इतना विशाल, समा जाये सब घर संसार। निर्मल मन निर्मल विचार, देती माँ तू शुभ आशिर्वाद। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम...
देदो अलसाई संध्या
कविता

देदो अलसाई संध्या

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मनमन्दिर कर दो मेरा तृप्त शबनम हो अगर पत्तो पर की देदो कमनीयता मुझे तुम जैसा क्षणिक जीवन जीने के लिए। रजत राशि हो अगर आफताब की दो बिछा चांदनी आंगन मे मेरे अगर हो मेहताब की रश्मि तो देदो कुछ क्षण शाम अलसाई सी। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित ...
अंतर्मन का द्वंद्व
कविता

अंतर्मन का द्वंद्व

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सबसे भयंकर युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़े जाते वे मन के भीतर होते हैं जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजाता। यहाँ दुश्मन यादें बनकर आता है, कभी डर बनकर वार करता है कभी उम्मीद बनकर उठाता है और कभी तोड़कर छोड़ जाता है। इस लड़ाई में खून नहीं बहता, पर सपने रोज़ मरते हैं चेहरा हँसता रहता है पर अंदर हजारों चीखें होती हैं। कभी मन हार मान लेता है कभी आत्मा उठ खड़ी होती है हर रात गिरती है हर सुबह फिर लड़ती है। यह युद्ध सब लड़ते हैं पर कोई दिखाता नहीं क्योंकि कमजोरी बताना इस दुनिया में अपराध समझा जाता है। भीतर की लड़ाई इंसान को थका देती है पर खत्म नहीं करती जो सह जाता है वही मजबूत बनता है बाकी टूटकर खामोश हो जाते हैं! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी ...
होली तेरे रंग
कविता

होली तेरे रंग

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** फीके-फीके अब लगे, होली तेरे रंग। क्यूं बेसुरे से हो गये, फागुन वाले चंग। बहुरंगी दुनिया में, शेष ना असली रंग, ढ़ोल नगाड़े प्रेम के, बजते नहीं मृदंग। खास वर्जित है, आकर दबे पाँव लगाना, गुलाल गजबन गालों पे, नहीं सुहाती अंग। फागुन में धूमिल पड़ी, रसिया वाली रात, गुलमोहर की डाल पर, बसंत नंग-धड़ंग। बदले बदले मौसम में, दुखी खड़ा पलाश, फागुन अब नहीं खेलता, रंग रंगीला फाग। रिश्तों में से गायब है, चंदन की सी महक, चौपालों पर बस्ती में, बजती नहीं भपंग। लाती नहीं कुमारियां, अब गेहूँ चने की बाल, कच्चे पक्के मासूमों को, देख बिड़कुल्ले दंग। पीलिया ग्रसित ठिठोली, मन में मीठी आग, प्रीत प्रेत सी देखकर, भौचक धुरखेल के रंग। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा,...
बिन पते का पत्ता
कविता

बिन पते का पत्ता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हरा-भरा, नीला-पीला पेड़ की डाली का मैं बस पत्ता कहलाता हूँ, तना, डालियों, शाखाओं का मामूली सा रंगबिरंगी पत्ता, पेड़ की स्वाभिमान बढ़ाता हूँ पेड़ का जीवनसाथी बनकर मैं तो मामूली पत्ता कहलाता हूँ, पेड़ की रौनक क्या है प्रकृति की रौनक क्या है, चार चांद लगाने आता हूँ, मैं मामूली सा पत्ता कहलाता हूँ, हरियाली को हरदम हरा भरा खिलाता हूँ, मैं प्रकृति की आज्ञा से पहले पेड़ की डाली में आ नहीं पाता हूँ हरा-भरा खिलाखिला मुर्झाता छोड़ चला जाता हूँ, हवा आंधी तूफान का भरोसा नहीं कर पाता हूँ अस्तव्यस्त प्रकृति में हरा भरा सा खुशहाल बेहाल बनकर तमाशा सा जमीन पर उतर आता हूँ अस्तित्वहीन, मूकदर्शक निर्जीव मुर्झाया मृत सा न जाने कहाँ कौन सी दिशा में दूर दर-दर की ठोकरों में जमीन के कण-कण में समय चक्र की भांति कालचक...
लो बसंत के दिन अब आए
कविता

लो बसंत के दिन अब आए

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** सरसों फूले टेसू महके, आम्र तरु मंजरी बौराए, लो बसंत के दिन अब आए। कोयल कूके मयूर है नाचे, भ्रमर कलि संग गुनगुनाए, लो बसंत के दिन अब आए। बासंती बयार सखि को, प्रिय का संदेश पहुंचाए, लो बसंत के दिन अब आए। हरियाली और पुष्पों से, प्रकृति का दामन भर जाए, लो बसंत के दिन अब आए। मदमस्त बसंत के मौसम में, सजनी साजन संग सुहाए। लो बसंत के दिन अब आए। चहुं दिशाएं सुरभित हो जाए, प्रकृति संग मानव हर्षाए, लो बसंत के दिन अब आए। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., जिला संयोजक- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति मंडला। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौल...
जीव जगत के लिये
कविता

जीव जगत के लिये

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दृग चन्चल, मन चन्चल बिटिया चन्चल, गौरी चन्चल मृग चन्चल, मृग दृग चन्चल आखेट के लिए आते हिन्सक के पग चन्चल। चन्चल सरिता झरना चन्चल जल की बून्दे, फुहारे चन्चल भागती चन्चल रश्मि छाया के संग। चन्चल पवन, चन्चल अग्नी पतझड चन्चल करता पथ को पथ पर पडे पर्ण चन्चल। पर, स्थिर, धैर्यवान धरा इन सब को संवारती आश्रय देती है मानव जीवन के लिए जीवजगत के लिए ... जीव जगत के लिए ...। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इं...
माँ … ज्ञान का सागर
कविता

माँ … ज्ञान का सागर

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ज्ञान का सागर है माँ, तू भक्ति की आराधना, सरस्वती सा विवेक तुझमे, तप-बल की तू शक्ति माँ। इस सागर मै नहार कर के माँ ज्ञान की ज्योति तुम्ह से पाई। भक्ति मै सरोबार होकर माँ प्रेम की रित तुझसे पाई। तेरी गोदी पाकर के माँ काव्य गीत मैने गाया, शक्ति बल पाकर के तुझसे यह कलम दवाद चलाई माँ। शान्त चित्त बुद्धि पाकर के यश तेरा फैलाया माँ, कठिन घड़ी और कठिन परीक्षा बस तेरा आशीर्वाद है माँ, प्रेम की धारा माँ है मेरी पिता किनारा नदियो का, कैसे हम बहकर के जाये, जो हाथ हे थामा गुरूवार का। अहंकार मान ना आये गुरूवार, हाथ झडी़ थामै रखना, प्रेम बोल से फटकार तुम गुरुवार। मुझ दिनन पर मडँते रहना परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर...
कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद
कविता

कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कोई पूछे तो धन्यवाद, ना पूछे तो समझो प्रसाद, सेवा का सच्चा सुख मिले, बस इतना ही है इराद। मनुष्य जिए अपने लिए, स्वस्थ रहे, सुखी रहे, दिखावे की चादर ओढ़े क्यों, सच मन में ही रुके रहे। सेवा यदि की निस्वार्थ भाव से, फल उसका तुम पाओगे, तालियाँ चाहे कम मिलें, भीतर दीप जलाओगे। प्रशंसा की प्यास छोड़ दो, कर्म को ही साथी मान, जो बोओगे वही उगेगा, यही है जीवन का विधान। जो करते हो स्वयं के सुख को, वही सच्चा उत्सव है, बिना दिखावे का जीवन ही, सबसे बड़ा अनुभव है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेर...
इस वक्त मैं …
कविता

इस वक्त मैं …

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बड़े-बड़े अधिकारियों के रहमोकरम पर डोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं, हर पहुंच कार्यालय में मेरा हरदम नाम होता है, इधर से उधर हिस्सा निकाल पहुंचाना मेरा काम होता है, अब घर में रहूं या कार्यालय में मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, अरे आपका भाई बिंदास है कभी किसी से नहीं डरता है, मुझसे डरते मेरे सारे साथी हैं, दूल्हा कोई और रहे पर आपका भाई होता सबसे पहला बाराती है, पैसे की बात आ जाए तो मेरा जिगरी भी एतबार नहीं करता है, आपका भाई कुछ जन्मजात जलवे धरता है, मगर सोच रहा हूं कि सेवानिवृत्त पश्चात क्या कोई मुझे पहचानेगा, निस्वार्थ वाला सहकर्मी मानेगा, अरे जाने भी दो यारों अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं। परिचय :-  रा...
बेरूखी क्यों
कविता

बेरूखी क्यों

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रह तो रहे हैं, इसे घर कह तो रहे हैं, पर घर में मकड़ियों का जाला है, अव्यवस्थाओं का बोलबाला है, कोई किसी को अपने आगे कुछ समझ नहीं रहा है, क्या तुम्हे नहीं लगता कि अंदर ही अंदर कुछ सुलग नहीं रहा है, सोच अलग हो सकता है, विचार अलग हो सकता है, पर अपनों के प्रति प्यार क्या दिल में नहीं रहा या गए हो भूल, इतने बड़े या इतने जिम्मेदार बन गए कि अपने आप में हो चुके हो मशगूल, परिवार के बीच रह रहे हो तो अपनों के प्यार को चख, सबको अपने स्वार्थ के हिसाब से न परख, अब लग ही नहीं रहा कि खून खून को पुकारता है, मगर कैसा खून है जिसका स्वार्थ चिंघाड़ता है, जब अपनों के प्रति इतनी बेरूखी है तो क्या खाक देश से प्यार दिखा पाओगे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्...