कन्या भ्रूण हत्या
अर्चना अनुपम
जबलपुर मध्यप्रदेश
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कन्या भ्रूण के हत्यारे नरपिशाचों के विरुद्ध धिक्कारती स्वरचित रचना
गायत्री, सावित्री, दारा, गार्गी, उपाला कन्या थीं।
गंगा, गौरा, सिया-जानकी वंश वृद्धिका कन्या थीं।
प्रजापति की वीर पुत्रियाँ प्रकटे जिनसे अस्त्र सहस्त्र।
रण में विजयी राम बने वो शस्त्र जननी भी कन्या थीं।
शक्ति के मंदिर में जाकर शक्ति को दुत्कार रहा।
मानव चाहे पुत्र जन्म नित स्वारथ यूँ चित्कार रहा।
जिससे चाहे जने पुत्र ही वह माता भी कन्या है।
गर्भ में कन्या मार रही जो वह 'दुष्टा' भी कन्या है।
दानव बनता मानव देखो निरत अजन्मी मार रहा।
वधु चाहिए बेटे ख़ातिर इतना जबकि जान रहा।
एक दिन वधु भी नहीं मिलेगी गर तेरी यह नीति रही।
विधुर सरीखे जीवन होगा सुनले मेरी खरी-खरी।
ढूढ़ने जाता जिस कन्या को मैया के नवरातों।
उन दुर्गा का दोषी है जगता जिनके जगरातों में।
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