मुझे शर्म आती है
कंचन प्रभा
दरभंगा (बिहार)
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कितने कितने फरेब देखे इस दुनिया के
इस दुनिया के हालात पे मुझे शर्म आती है
बादशाहत से जीने वाले वो बुजदिल ही होंगें
उन बेदर्द बुजदिल-ए-हयात पे मुझे शर्म आती है
कपड़ों से नहीं वो चमरी से चिथड़े पहने थे
आलिशान महलों के सजाने पे मुझे शर्म आती है
लाखों लाख बेघर जब भूखे बिलख रहे थे
झूठी आस्था के उन खजाने पे मुझे शर्म आती है
मंदिरों के नाले में बहा दी गई दुध की नदियाँ
बेबस माँ के बिलखते लाल पे मुझे शर्म आती है
सड़क पर भागती वो कार जब रोके न रुकी थी
उस बेबस लड़की की बलात्कार पे मुझे शर्म आती है
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परिचय :- कंचन प्रभा
निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार
सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित
आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय ए...
























