चिट्ठियां तेरे नाम की
विशाल कुमार महतो
राजापुर (गोपालगंज)
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आंखों की आँसू सुख गई, अब सिसकियां नही आती,
तू याद नही करती और मुझे हिचकियाँ नही आती।
लिखने को लिखी कई चिट्ठियां तेरे नाम की,
पर तु जहाँ हैं, वहाँ कोई चिट्ठियां नहीं जाती।
अगर तू बन जाय मंजिल, तो हम तेरे सफर बनेंगे
सुख में तेरे साथ हैं, और दुःख का भी हमसफर बनेगें।
जो बह जाय लहरों के संग वो वापस कभी मिट्टियां नही आती,
पर तु जहाँ हैं, वहाँ कोई चिट्ठियां नहीं जाती।
कभी सोचा ना था बदलोगे और इतना कैसे बदल गए,
कहते थे साथ न छोड़ेंगे, और छोड़के क्यों तुम चले गए।
जिस लब की बाते गूंजती थी, उस लब से अब तो सीटियां नही आती
पर तु जहाँ हैं, वहाँ कोई चिट्ठियां नहीं जाती।
कैसे तुम्हें बताए हम, इस दिल सुनाए हम
तेरे बिना तन्हा तन्हा कैसे ये पल बिताए हम
दिल दर्द होठो से कभी बयां नहीं कि जाती
पर तु जहाँ हैं, वहाँ कोई चिट्ठियां नहीं जाती।
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