कागज़ और कलम
ऋषभ गुप्ता
तिबड़ी रोड गुरदासपुर (पंजाब)
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कुछ गहरे राज़ छुपे थे दिल में
कागज़ और कलम उठाया
तो निकल कर बाहर आए
बातों में कुछ दर्द ऐसा छुपा था
जिस अकेलेपन का एहसास
कागज़ की महक और
कलम की खुशबू में भी हो रहा था
जो कागज़ और
कलम के भी आँसू ले आए
कोई साथ ना था मेरे जब
कोई पास ना था मेरे जब
हर रास्ते पर अकेला चला मैं था जब
सोचता था कौन है मेरा यहाँ
तो कागज़ और कलम मेरा हाथ थाम
उन राहों पर साथ चलने आए
रास्ता मुश्किल था
मंजिल भी दूर थी
दूर.दूर तक सन्नाटा था
लेकिन कागज़ और कलम ने
कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा
सोचता था कैसे उतारूँगा इन का कर्ज़
जो हर समय साथ देने आए थे मेरा
सुख से भी ज्यादा मेरी परेशानी के समय
दिल के दरिया में ख्वाबों का इक महल
कागज़ पर लफ़्ज़ो की
माला में सजा कर लिखा था
जो हर बार उनको पूरा करने के लिए
मुझे नींद से जगाने आई
हवाओं के रुख बदलने ...





















