शीत
विनोद सिंह गुर्जर
महू (इंदौर)
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शीत बड़ी.....!!!!
क्यों चीख पड़ी ?
क्या दुखद घड़ी..?
ना, ......
मेघों की दड़ी।
बारिश की झड़ी।
बूंदों के संग-संग,
हिम तुहिन लड़ी।।
कैसा भय है...?
कुछ नव क्षय है...?
सदियों से ही,
प्रकृति लय है।।
इस बार सजन,
घबराये मन ।
धक-धक धड़कन,
अंग-अंग जकड़न।।
पावक ना दहक,
बर्फीली महक।
नस-नस में चहक,
बहे रक्त बहक।।
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परिचय :- विनोद सिंह गुर्जर आर्मी महू में सेवारत होकर साहित्य सेवा में भी क्रिया शील हैं। आप अभा साहित्य परिषद मालवा प्रांत कार्यकारिणी सदस्य हैं एवं पत्र-पत्रिकाओं के अलावा इंदौर आकाशवाणी केन्द्र से कई बार प्रसारण, कवि सम्मेलन में भी सहभागिता रही है।
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