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कविता

पीली-पीली सरसों फूली
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पीली-पीली सरसों फूली

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** भटकी बयार राहें भूली, कुंजन-कलिन बहारों में। पीली-पीली सरसों फूली, पग-पग खेत कछारों में।। कभी कुहासों में पालों की, बूँदे टप-टप गिरती हैं कभी सुबह सूरज की किरणें, साक सुनहला करती हैं आलू हरे-भरे खेतों से, हरियाली महकी जाए चमकीली अलसी पुष्पों से, रँग लतरी में भर आए लहराते अरहर को देखो, बांगर-खेत खदारों में। पीली-पीली सरसों फूली, पग-पग खेत कछारों में।। शिशिर झूम के हवा उठाए, तृण-तृण में कंपन आए चना-मटर अरु बरसीमों की, खेती सुख से लहराए गेहूंँ के उठते सुगन्ध से, आस जगे सबके मन की गन्ने के खेतों में देखो, पोर-पोर बरसे रस की गाजर मूली लहसुन लहके, छोटे-छोटे क्यारों में । पीली-पीली सरसों फूली, पग-पग खेत कछारों में।। धुंँधले-बादल बैठन चाहें, धरती की अकवारी में टप-टप बूँदे बरसन चाहें अमवा अरु महुआरी में सू...
घर की रौनक
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घर की रौनक

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** माँ के मन का भाव जो जाने, दिल का हर अरमान वो जाने, खुशी के पल देती वो हर क्षण, कीमत पहचाने वो हर पल, घड़ी समय पल को पहचाने, दुख सुख की परवाह वो करती, आदर्श चरित्र बेटी वो होती। गम को कोसो दूर है रखती, बिन बेटी के आँगन है सुना, बिन बेटी के त्यौहार भी सुना, खुशीयाँ आये आने से द्वार, शुभ मंगल होवे सब काज। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. १५००+ कविताओं की रचना व भजनो की रचना रूचि : कविता लेखन, चित्रकला, पॉटरी, मंडला आर्ट एवं संगीत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
“स्त्री : नर की जीवनधारा”
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“स्त्री : नर की जीवनधारा”

राम बहादुर शर्मा "राम" बारा दीक्षित, जिला देवरिया (उत्तर प्रदेश) ******************** महिला अबला का पर्याय पर शक्तिरूप अभिव्यक्ति है म मनुष्य का प्रथमाक्षर म से ही मनुज उतपत्ति है हि मे हिमालय सा हिय विराट ममता वात्सल्य और भक्ति है ला है लाखो स्वरूप का द्योतक यह एक रूप में स्त्री है यह जननी है, यह भगिनी है. पत्नी, पुत्री, और प्रेयसी है। है नमन आज शत बार उसे जो हर मानव की शक्ति है जब मैं एक पिंड अजन्मा था नव मास कोख में ढोया था जब जन्म लिया तब प्रथमबार जिस पावन कुक्षि में रोया था वह पीड़ा में भी मुसकायी ममता परिपूर्ण आहलादित थी वह जननी भी एक महिला थी वात्सल्य पूर्ण आच्छादित थी बचपन में खेला जिसके संग जिसने लाड़-दूलार दिया अपने से बढकर जिसने मुझको चाहा, पुचकारा, प्यार किया । वह भगिनी थी जिसके हिस्से का भी प्यार मुझे भरपूर मिला वह भी तो एक महिला थी छोड़ा अधिका...
भारत की नारी
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भारत की नारी

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नारी सदा स्वयंसिद्धा है, कर्म निभाता नारी जीवन। देकर घर भर को उजियारा, क्यों मुरझाता नारी जीवन।। कर्म निभाती है वो तत्पर, हर मुश्किल से लड़ जाती। गहन निराशा का मौसम हो, तो भी आगे बढ़ जाती।। पत्नी, माँ के रूप में सेवा, तो क्यों खलता नारी जीवन। देकर घर भर को उजियारा, क्यों मुरझाता नारी जीवन।। संस्कार सब उससे चलते, धर्म नित्य ही उससे खिलते। तीज-पर्व नारी से पोषित, नीति-मूल्य सब उसमें मिलते।। आशा और निराशा लेकर, नित ही पलता नारी जीवन। देकर घर भर को उजियारा, क्यों मुरझाता नारी जीवन।। वैसे तो हैं दो घर उसके, पर सब लगता यह बेमानी। फर्ज़ और कर्मों से पूरित, नारी होती सदा सुहानी।। त्याग और नित धैर्य, नम्रता, संघर्षों में नारी जीवन। देकर घर भर को उजियारा, क्यों मुरझाता नारी जीवन।। कभी न हि...
ओ चंद्रयान
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ओ चंद्रयान

रोहताश वर्मा "मुसाफिर" हनुमानगढ़ (राजस्थान) ******************** चल चल चला चल हमारी पहचान करता जा। चांद की जमीं को... तू हिंदुस्तान करता जा।। है अमर गाथा अब दूर न कोई ग्रह होगा.. देखना धीरे धीरे एक दिन नया भोर उदय होगा .. आंचल में शामिल तू आसमान करता जा।। क्या मुश्किलें क्या रूकावट? सब पर भारी पड़ेंगे.. देखना एक दिन... स्वर्णाक्षरों में इतिहास गढ़ेंगे.. चांद की जमीं पर अपना निशान करता जा।। धन्य! इसरो, धन्य देश हुआ.. हर गिरते हुए को... एक नया संदेश हुआ.. हार न मानना कभी, सफल.. हर इम्तिहान करता जा। हे ! टूटते 'मुसाफिर' स्वयं को चंद्रयान करता जा।। चल चल चला चल चांद की जमीं को हिन्दुस्तान करता जा।। परिचय :- रोहताश वर्मा "मुसाफिर" निवासी : गांव- खरसंडी, तह.- नोहर हनुमानगढ़ (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रच...
याचक
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याचक

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** यह हार नहीं क्षणिक विराम है क्योंकि जीवन कुरुक्षेत्र का महासंग्राम है बुरे कर्म बुरे शब्द अब नहीं ग्रहण करूंगा बहुत हुआ खुद से विमुख होना दया की भीख अब नहीं मांगूंगा वरदान लूँगा, चाहे वो तमस हो, चाहे हो ताप , जान चुका हूँ सम्मान के बिना कोई अस्तित्व ही नहीं मनुष्य बन धर्म की संपूर्ण कला से विकसित करूंगा स्वयं को मुक्त आए थे जीवों का जीवन बदलने का संकल्प लिए, है सृष्टि का कर्ज इस जन्म मे मेरे लिए बार-बार आना पडे इस कर्तव्य पथ पर फिर भी, भागुंगा नहीं विक्षिप्त होकर बार-बार ही सही मुक्त आया हूँ मुक्त ही जाऊँगा, अनवरत अनन्त काल तक!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र,...
मृदुल वाणी
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मृदुल वाणी

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** हमारी वाणी ही हमारी पहिचान हैं। बिना वाणी के हमारा शरीर बेजान है। ****** वाणी मधुर हो तो सुनने में आनंद आता है। और कठोर हो तो मन खराब हो जाता है। ******* मीठी वाणी बोलने वाला तीखे मिर्च भी बेच देता है। कठोर वाणी बोलने वाला मिठाई भी नहीं बेच पता है। ******* नफरत करते है सभी कठोर वाणी बोलने वाले से। प्यार करते है सभी मृदुल वाणी बोलने वालों से। ******* मीठी वाणी से पराये भी अपने हो जाते हैं। कड़वा बोलने से अपने भी दूर हो जाते है। ******* कोई गीत गाता है कोई भाषण देता है। जब उनकी भाषा होती है मृदुल तो सुनने में आनंद आता है। ******* मधुर वाणी हमें तरक्की के रास्ते पर ले जाती है। कठोर वाणी हमें ऊपर से नीचे गिरती है। ******* यदि आप चाहते है जिंदगी में आगे बढ़ना। तो हमेशा अपनी वाणी ...
काश दिख जाये
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काश दिख जाये

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि अपनी मौत कैसे देखूं, हां देखना है यार मुझे बनिस्पत इसके कि कोई मेरा अपना मुझे दिखाये, मुझे व्यवहार या चाल सिखाये, वैसे थोड़ा-थोड़ा जा रहा हूं उसी अनचाहे रास्तों की ओर जहां नहीं चाहता कोई स्वेच्छा से जाना, सभी चाहते हैं फर्ज निभाना, हर कर्ज़ चुकाना, लेकिन फंस जाता है भंवर में, जज्बातों के, हालातों के, जो करने की कोशिश करता है कि इसे कब और कैसे कमजोर करूं, इनके सिर पर कब पांव धरुं, दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो बुरे या आफत के वक्त में आपको सम्बल दे, हर रिश्ते से लेकर हर मित्र मंडली तक तैयार बैठे हैं शायद आपके मौत के इंतजार में, चाल,चरित्र,चेहरा मेरा स्थिर था है और रहेगा, अभी तक किसी को भी अपनी मौत देखने को नहीं मिला, काश दिख जाये, जब भी आये। ...
सूरज न अभिमान दिखाता
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सूरज न अभिमान दिखाता

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** ‌हाथी ही पहाड़ के नीचे नही आता दिनपति भी बादलों में छुप जाता है रवि को जब ढक लेते हैं मेघा तो वह भी अपनी सीमा जान जाता है तभी तो रवि गर्व नहीं करता उसे अहंकार नही ढक पाता आओ मानव मुझे मनाओ कह, वह सिर न उठाता। सूर्य ऊर्जा, प्रकाश का दाता सारे जग का जीवन दाता उस बिन अस्तित्व नही जग का फिर भी न अभिमान दिखाता। जल, वायु सबको देता सबका मान सम दृष्टि से सबका करता सम्मान नही कभी एहसान जताता हर कण पर पूरा प्यार लुटाता। इस गुण से ही दिनकर पाता सबमें सम्मान नही कोई बैरी उसका ब्रह्मंड में सर्वोच्च स्थान। बच्चों तुम सूरज बन जाओ। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका) शिक्षा : एम.ए. अंग्रेजी, एम.ए. भाषाविज...
मातृशक्ति
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मातृशक्ति

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** "रोज ही मातृ दिवस मनाओ, झुझती वह हर रोज है, हर पल पग-पग देती परीक्षा, कभी माँ बन कभी सासु वो" कितनी भी रणचंडी बन ले, प्रेम झलकता आंखों में, कभी हाथों में तलवार है उसके, कभी हाथों में बेटा है। कभी घोड़े पर असवार है होती, कभी घोड़ा बन जाती वो, कभी रक्त से तलवार है धोती, कभी कलम चलाती वो। कभी सिंहासन राज है करती, कभी वन वन में डोले वो, कभी बेटे का बलिदान है करती, कभी पन्नाधाय बन जाती वो। एक आंख में आंसू उसके, एक में प्रेम झलकाती वो , एक पल में रोना है उसका, एक पल में हंस जाती वो। कितना त्याग बलिदान है उसका, कभी चण्डी कभी दुर्गा वो, कभी जनक दुलारी सीता बनती, कभी वन देवी बन जाती वो। कभी हल से वह पैदा होती, कभी-कभी अग्नि परीक्षा देती वो, कभी धरती फट समा वह जाती, वह भारत की बेटी जो। ...
इन्तजार कब तक
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इन्तजार कब तक

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** यूँ ही दिल जलाया हमने किसी को अपना बना के यूं ही इन्तजार किया हमने किसी को आज भुलाके। यू ही पथ पर बिछाई आंखें किसी से आंख मिलाके तारों के झुरमुट में खोजा खोजा चांद की चांदनी में। तुम छुपतीं रही ओ सुरमई सन्ध्या थानी चुनरिया ओढकर के फूलो में लताओं में छुपते देखा और देखा हैं, शाम तुम्हें पहाड़ों की चोटियों को सुनहरी करते। मैं इन्तजार कब तक करतीं। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसा...
मधुमास
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मधुमास

प्रतिभा दुबे ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** बसंत ऋतु के आगमन पर छाया हुआ हैं मधुमास बिहंग कलरव करते मधुर प्रिय की करते सब आस।। रूप अलौकिक राधिका का, कृष्ण करें जब श्रृंगार फागुन मैं होरी खेलन को कान्हा लियो मोहे पुकार।। नवयौवन, लावण्यता, जैसे नवीन ही आई हो बाहर खिल उठी देखो वसुंधरा, मधुमास छाया हैं अपार।। पीली पीली सरसों के फूलों से छाई बहार रही मैं माप अंबर तक दिखती रौनक, जैसे सूर्य का बड़ गया ताप।। आनंदित है यह दसों दिशाएं, देखकर मधुर ये मधुमास प्रियतम से मिलने जाए सखी, प्रिय से मिलन की आस।। फागुन को आता देख कर वसंत ऋतु में छाया मधुमास, कोयल कुके हर डाली पर, पुलकित विहंग करें प्रेम रास।। खेत खलियान सब फल फूल रहें, बोराया हुआ फिर आम, नव पल्लवित पुष्पित जीवन, यही तो हैं मधुर मधुमास।। परिचय :-  श्रीमती प...
इंतजार के पल …
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इंतजार के पल …

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** इंतजार के पल भी बहुत होते हैं कठिन, इंतजार किया माता रुक्मणी ने, प्रभु पति पाये गोपाल नारद के मुख से कहानी सुनी ! कृष्ण चंद्र महाराज, पति रूप स्वीकार किया माता देखो आज, पाती (पत्र) भेजी कृष्ण को ले जाओ दीनानाथ, नहीं तो शिशुपाल दुष्ट आपकी दासी ले जाएगा साथ (आपका हक)। पाती पढ़कर है प्रभु कुंदनपुर में आए, रूखमणि को रथ में बैठा करके, ले जाए प्रभु साथ, इंतजार के पल खत्म हुए वर पाया गोपाल, पटरानी रुक्मणी बनी राजा हे नंदलाल। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. ...
बसंत का स्वागत
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बसंत का स्वागत

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आओ-आओ, चलो-चलों रे केशर क्यारी-क्यारी बौरायी आंगन, द्वारे थ्वज केसरिया। करै बसंत की अगुवाई। आमृवृक्ष की पात-पात झूमें गावे कोयल मतवाली। कोमल, कोमल रवि रश्मि में पांखी फूल-फूल पर मंडराती। स्वागत करती कली, क्लीं केतकी की श्वेत वर्ण में सज आई रक्त, श्वेत, पीत वर्ण में चम्पा करें मनुहारी आमृवृक्ष पर अमिया झूमें दसों दिशाओं में सुगथ बिखरातीं। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रस...
चलो आओ जरा अपने मन में झाक आएं
कविता

चलो आओ जरा अपने मन में झाक आएं

प्रतिभा दुबे ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** हर दिवस ही हम नारी दिवस मनाएं चलो आओ जरा अपने मन में झाक आएं।। सुबह चुपचाप उठ जाती, हर स्त्री चाय बना, बाद मैं ही सबको जगाती।। खाना जतन से बनाती, खुद पीछे भोजन करती पहिले सबको खिलाती।। काम सभी के अपने जिम्मे, जिमेदारी से अपने हाथ से हर सामान को पकड़ाती।। कही कोई गड़बड़ न हो, इसलिए अनुशासन बनाती, वो घर को स्वर्ग बनाती।। जब कभी विपादये आए तो, वो शक्ति स्वरूप में आती, सबका मनोबल सदैव बढ़ाती।। न समझो तुम अबला सबला रूपी वे सृजन करता हैं सृष्टि की, वही जीवन भी सजाती ।। हंसकर महिला दिवस मनाओ, कभी किसी वृद्ध महिला से भी उसका हाल पूछ आओ।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार...
जब बसंत आता है
कविता

जब बसंत आता है

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** जब बसंत आता है मन मे उमंग जगाता है बागो मे कोयल जब प्यार के गीत गाती है सरगम की लय पर सस्वर गीत सुनाती है इन मधुर गीतों से दिल मेरा भर जाता है जब बसंत आता है मन मे उमंग जगाता है अमुवा की मौर से फ़िज़ा भी मतवाली है बासंती बयार सबका मन मोहने वाली है सरसराती हवाएं दिल मे आग लगाता है जब बसंत आता है मन मे उमंग जगाता है पीले सरसो के फूल प्रकृति का श्रृंगार है धरा पर बसंत, रति काम का अवतार है इसकी मादकता मन को सदा हर्षता है जब बसंत आता है मन मे उमंग जगाता है रग-रग मे जीने की नवीनतम आश है प्रकृति का अप्रतिम कैसा अहसास है प्रकृति का हर शै प्रेम की बात बताता है जब बसंत आता है मन मे उमंग जगाता है प्रकृति से सीखे परिवर्तन कैसे स्वीकारना विषम परिस्थिति मे भी खुद को निखारना पतझड़ के बाद ही नई-नई कोपले आता है ज...
ये कैसी दुनिया
कविता

ये कैसी दुनिया

सुरभि शुक्ला इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** ये कैसी अजब नगरी है जहाॅं कोई राजा और कोई रंक है कोई आसमान में बैठा कोई ज़मीन की धूल में लेटा है कोई ऐसी के आलिशान कमरों में सोता तो कोई सड़क के किनारे फुटपाथ पर सारी रात जागता है कोई फाईव स्टार होटल में आराम से बढ़िया व्यंजन खाता तो कोई उनकी जूठन से अपना पेट भरता है कोई धन की गड्डी ही दिनभर गिनता रहता तो कोई एक एक रुपया जोड़ने में जिंदगी गुजार देता है कोई दाग़ लगे श्वेत वस्त्रों में भी शरीफ़ होता तो कोई शरीफ़ होकर भी दाग़ दार कहलाता है परिचय :-   सुरभि शुक्ला शिक्षा : एम.ए चित्रकला बी.लाइ. (पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान) निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) जन्म स्थान : कानपुर (उत्तर प्रदेश) रूचि : लेखन, गायन, चित्रकला सम्प्रति : निजी विद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष आप भी अपनी कविताएं,...
आया महीना फ़ागुन का
कविता

आया महीना फ़ागुन का

गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" बमोरी, गुना (मध्यप्रदेश) ******************** अंतर्मन में जगाए आकुलता, शीत सयानी फागुनी। अमराई में छुपकर कोयलिया, छेड़ रही मृदु रागिनी।। पवन वाबरी मदहोश हुई है, छू किसलय कपोल। उर आलिंद हर्षित अतिशय, सुनक़े मिश्री-से बोल।। मन मोहक महुआ की महक, करे मतवाला अंग-अंग। नव यौवना-सा निखरा पलाश, समेट बासंती रंग-रंग।। निपर्ण तरुवर का तन लगता, मानो हो निष्प्राण देह। कर रहे चाकरी हवाओं की, शायद सोनपरी के गेह।। ढल गया फ़िर ये दिन दीवाना, तेरा ही इंतज़ार लिए। सारी रानी बरसी ये अखियां, तेरा ही इनकार लिए।। आया महीना फ़ागुन का प्रिय! ले करक़े रंग हज़ार। आभी जा ओ हरजाई अब तो, रहता जिया बेकरार।। परिचय :- गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" निवासी : बमोरी जिला- गुना (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं म...
क्या नहीं चाहिए
कविता

क्या नहीं चाहिए

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जरा बता तो दो ऐ ताक़त क्या तुम्हें इस वतन में मजलूम नहीं चाहिए, गरीब लाचार नहीं चाहिए, यदि हां तो कुछ करते क्यों नहीं? तुम्हारे कारिंदे सुधरते क्यों नहीं? पॉवर सिर्फ पैसे, पद और कद बढ़ाने के लिए ही नहीं है, उनका जीवन स्तर सुधारने के लिए है जो इसके दायरे में रहते सही हैं, गरीबों, दलितों पर रौब जमाने के लिए नहीं है, कैलेंडर से पांच साल निकल जाते हैं, पर दिल का कालापन रह जाते हैं, बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह जाते हैं, सत्ता कुछ चंद गिरोहों का धंधा नहीं, संविधान के सफल क्रियान्वयन का है एक उचित जरिया, जहां चलना चाहिए एकमात्र नजरिया, क्या देश का संपूर्ण विकास संवैधानिक तरीके से संभव नहीं? पॉवर के लिए कुछ भी असंभव नहीं। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत...
मर्यादा जीवन की पूँजी
कविता

मर्यादा जीवन की पूँजी

अंजनी कुमार चतुर्वेदी "श्रीकांत" निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** मर्यादा जीवन की पूँजी, संस्कार देती है। मर्यादित आचरण सदा ही, सद्गुण की खेती है। मर्यादा में रहे रामजी, पुरुषोत्तम कहलाते। मर्यादित व्यवहार राम का, बाबा तुलसी गाते। राम राज्य में सागर सबको, रत्न प्रेम से देते। मर्यादा में जल रहता है, वारिधि प्राण न लेते। कभी नहीं मर्यादा लाँघें, सीमा कभी न तोड़ें। धर्माचरण करें जीवन में, नहीं सुपथ को छोड़ें। मर्यादा का बाँध न तोड़ें, अपनी सीमा जाने। मर्यादित आचरण करें हम, अन्तस को पहचाने। बाँध टूटता मर्यादा का, सदा अमंगल होता। मर्यादा भंजक, जीवन में, नहीं चैन से सोता। मर्यादा को खंडित करके, कौरव दल मुस्काया। पाया दंड स्वयं माधव से, अपना वंश नशाया। मर्यादा में रहने वाले, जगवंदित हो जाते। मिलता है सम्मान जगत में, सुखमय जीवन पाते। जो मर्...
इश्क में वक्त बेकार न कर
कविता

इश्क में वक्त बेकार न कर

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** लेकर हाथों में लाल गुलाब न चला कर ! दिल की बात दिल में रख न जला कर !! नजरें मिला के यूँ नजरें ना झुकाया कर ! इश्क है हमसे तो लफ्जों में बयां ‌‌ कर !! हम तेरे दीदार को तड़पते है रात दीन ! आसमां में चांद सा यूँ ना छिप जाया कर दिल की बात दिल में ना दबा के रख ! शिकायत है मुझसे तो सरे आम कहा कर बेवजह मेरे ख्वाबों में तू  न आया कर ! चैन से सोने दे नींद से न जगाया कर !! मुलाक़ात करना है तो मिलो हमसे आकर दरवाजा खुला है घर में आ जाया कर !! इश्क नहीं है तो इश्क का इजहार न कर वक्त कीमती है! मुहब्बत में बेकार न कर लाखों अजमा चुके है किस्मत इश्क कर ! खाकर ठोकर संभल चुके है लोग इश्क कर परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्...
बदनाम गली
कविता

बदनाम गली

रवि कुमार बोकारो, (झारखण्ड) ******************** मैने अक्सर उन गलियों में जिंदगी को सिसकते देखा है. हंसते चेहरों में बेबश और परेशान इंसान भी देखा है। हम जैसे ही है सब वहां कोई फर्क नही है उनमें।। मैने उन बदनाम गलियों में भी कुछ पाक इंसान देखा है जीने की कोई वजह नहीं वहां किसी में, चंद पैसों में जिस्म नीलाम करते देखा है। तुमने सिर्फ जिस्म देखा उनका उनमें बैठा इंसान कहा देखा है मैने उन बदनाम गलियों में भी कुछ पाक इंसान देखा है जाती धर्म का जरा भी खेद नही हर मज़हब के लोग आते वहां देखा है। उनके भी है कई ख्वाब अधूरे उमंगों का शैलाब भी उनमें देखा है सबने सिर्फ बदन नोचा है उनका क्या कभी उनका दिल भी देखा है मैने उन बदनाम गलियों में भी कुछ पाक इंसान देखा है।। परिचय :- रवि कुमार निवासी - नावाड़ीह, बोकारो, (झारखण्ड) घोषणा पत्र : यह प्रमाणित किया जाता है कि रचना ...
जिंदगी
कविता

जिंदगी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** जिंदगी तो जिंदगी व्यस्त है जिंदगी समय बेकार व्यर्थ फिजूलखर्च में बीत रई है जिंदगी जिंदगी की कहानी जिंदगी की जुबानी जिंदगी ही समझाती जिंदगीभर सिखलाती जिंदगीभर सताती जिंदगी कहर बरपाती जिंदगी सुखदुख में जिंदगी बीत जाती जिंदगी कभी आसान जिंदगी कभी परेशान जिंदगीभर झनझनाहट जिंदगीभर आहट जिंदगी का अहसास जिंदगीभर करवाती जिंदगी समझ नहीं पाती जिंदगी कभी रुलाती जिंदगी कभी हंसाती जिंदगी का वक्त अच्छा जिंदगी का वक्त बुरा जिंदगी में हंसकर जिंदगी में रो रो कर जिंदगी सांसे लेती जिंदगी सांसो में जीते जिंदगी सांसो के भरोसे जिंदगी समेटे रखती जिंदगीभर बेफजूल जिंदगी लगती धूल जिंदगीभर की जिद्द जिंदगीभर होती न सिद्ध जिंदगी में नफरत जिंदगीभर करते कसरत जिंदगी की यही झंझट जिंदगी यहीं लेती करवट जिंद...
शगुनी-सा लगे विश्वास
कविता

शगुनी-सा लगे विश्वास

गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" बमोरी, गुना (मध्यप्रदेश) ******************** मतलबी हुए लोग यहां, खुदगर्ज हुआ ज़माना , रह गया दुनिया मे शेष, फ़क्त नाम का याराना।। छल-कपट में सना हुआ, लगता है पावन प्यार, कहां कृष्ण-सी करुणा, कहां कर्ण-सा व्यवहार।। वादे तो करते कई, हर मुश्किल में साथ देने के, पर लेते खींच हाथ, आते लम्हे जब हाथ देने के।। टुकड़ों-टुकड़ों में वट चुका सु-भाव-ओ-सहयोग, झरते नही अश्रु नयनों से होता देख अव वियोग।। मन की सौम्य बगिया से, गायब हुई स्नेह सुवास, दुर्योधन-सी हुई दीनता, शगुनी-सा लगे विश्वास।। सिमट रहा रिश्तों-से, त्याग,समर्पण, शिष्टाचार, अधरों पर अर्धनग्न हंसी, करें उर से प्रश्न हजार।। आ गए हम कहां 'गोविमी', स्वार्थ में होकर अंधे, आओ करें अवगुणों से तौबा, छोड़ें कुटिल धंधे।। परिचय :- गोविन्द सरावत मीणा "गोविमी" निवासी : बमोर...
कैसे रिश्ते
कविता

कैसे रिश्ते

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** छिन लिया आसरा पेड़ को कटते देख दूसरे पौधे रो रहे थे कौन समझे इनकी पीड़ा नेक इंसान ही समझते उसे लगा होगा जैसे, माता-पिता के मरने पर रोते है कैसे रिश्ते। यह जानते हुए भी खोने दे रहा है खुद के जीने की प्राण वायु पेड़ की खोल के रहवासी उड़े भागे थे ऐसे जैसे भूकंप आने पर लोग छोड़ देते है मकान। थरथरा कर गिर पड़ा था पेड़ पेड़ के रिश्तेदार, मूक पशु-पक्षी खड़े सड़क पर, बैठे मुंडेरों पर आँखों में आँसू लिए विचलित अस्मित भाव से कर रहे संवेदना प्रकट और मन ही मन में सोच रहे क्यों छिन लिया आसरा हमसे क्रूर इंसान ने। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभि...