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कविता

सियासत
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सियासत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सियासत जाल है मकड़ी का साम-दाम-दंड-भेद आधार स्तंभों पर टिका महल सियासत का..... पहला और अंतिम लक्ष्य है पाना सत्ता येन केन प्रकारेण बचाना है अस्तित्व ले कर सहारा सत्ता का..... कहीं छुप कर कहीं खुल कर नदी के दो पाट यहाँ कौन किसका सियासत में रिश्तों का आधार जुर्म सदा सहभागी सत्ता का.... सिद्धांत सदा ताक पर सलामत रहे सदा सत्ता कत्ल कर देते बाप-भाई का मात्र पाने को सत्ता हम हैं आपके कौन यही है मूल मंत्र सत्ता का.... कर दी गई है तुलना गणिका से.... मगर गणिकाओं के भी उसूल होते हैं सिद्धांत हीन होते सत्ता लोभी पूर्ण हो महत्वाकांक्षा यही सिद्धांत होता है सत्ता का...! परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में प...
ऐसी हवा चले की बदल जाये जमाना
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ऐसी हवा चले की बदल जाये जमाना

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** हर लब पे सदा गूंजे खुशियों का तराना हो राम भरत जैसा अगर भाइयों में प्यार मिट जाएगी जहाँ चाहत का बहाना लक्षमन के जैसी सेवा और भरत के जैसा त्याग घर घर में पैठ जायेगा खुशियों का खजाना विभीषण की तरह मित्र और रिछ जैसा दोस्त फिर कहाँ रह पायेगा रावण का ठिकाना हनुमान की तरह सेवक गर हों सभी जगह सब भूल जायेंगे किसी सीता को चुराना हो जायेगा संसार में फिर व्याप्त रामराज्य खुशियों का राग गूंजेगा वंशी से सुहाना परिचय :-  विजय वर्धन पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद माता जी : स्व. सरोजिनी देवी निवासी : लहेरी टोला भागलपुर (बिहार) शिक्षा : एम.एससी.बी.एड. सम्प्रति : एस. बी. आई. से अवकाश प्राप्त प्रकाशन : मेरा भारत कहाँ खो गया (कविता संग्रह), विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेर...
नयी सी हवा है नया आसमां
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नयी सी हवा है नया आसमां

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** नयी सी हवा है नया आसमां ठंडी हवा का दौर चल रहा है। मन तुमसे मिलने को मचल रहा है। ******** नयी सी हवा है नया आसमां। तुम आ जाओगे तो बदलेगा समां। ******** मौसम सुहाना है हमने ये माना है। सब कुछ छोड़कर तुम्हे चले आना है। ******** आसमां में बादल छाये है हम तुमपे नजरे विछाये है। अपना लो मुझको इसके पहले कि कहीं मौसम बदल न जाये। ********* इस समय जरुरत है धुप की जो कुछ गर्मी दे जाय। कड़कड़ाती ठंडी से कुछ रहत दे जाये। ******** मौसम बदल रहा है तुम मत बदल जाना। रोज की तरह जरूर मिलने आना। ********* हवाएं भले नयी है हमारे संबंध पुराने है। तुमसे से तो रोज मिलता हूँ बाक़ी लोग अनजाने है। ******** नयी हवा तुम्हारे आगमन का संकेत दे रही है पल-पल मुझे बैचैन कर रही है। ********* परिचय : डॉ. प्रताप म...
पराभौतिक
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पराभौतिक

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मृत्यु तुम करो न भक्षण मेरा मैंना भी देखना है काल बड़ा है या काली। भाग्यविधाता लिखो ना भाग्य मैंना भी देखना है कर्म बड़ा है या कर्मदाता। समय बदलो न अपना पहिया मैंना भी देखना है भविष्यवक्ता बड़ा है या भविष्यकर्ता। प्रेतराज चलो न करोड़ों प्रेतो के साथ मैंना भी देखना है तंत्र बड़ा है या प्रेम मंत्र। देवराज इंद्र करो तप जरा भंग मैंने भी देखना है योगाग्नि बड़ी है या कामाग्नि। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।  ...
९० के दशक का प्रेम
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९० के दशक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ९० का प्रेम भी अजीब था किसी को देखने के लिए जाने कितने प्रेमियों की साइकिल की चेन हमेशा ही उतरा करती थी. कितनी खिड़कियों को आँखें मिलती थी किस टाइम पर उन्हें खुलने का अधिकार मिला था सिर्फ वही समझती थी. रंगबिरंगे कागज़ पर कितने जवां दिलों ने कांपते हाथों से प्रेम की दास्तान लिखी. कितने प्रेमियों ने नोटबुक के आखरी पृष्ठ पर अनजान सी आँखें बनायी होगी तो किसी ने मेहंदी की डिजाइन पर अपने महबूब का नाम छुपा कर लिखा होगा. अगर प्रेम गीत नहीं लिखे गए तो मोहब्बत अंदर ही अंदर घुटती रहती फिर एक दिन टेंट हाउस का सामान डाले टेंपो आता तो पता चलता अपना चांद किसी दूसरी की छत की चांदनी बन चुका. कितनी अच्छी मोहब्बत थी बिल्कुल "उसने कहा था" ये कहानी हर किसी ने पढ़ी थी कितने...
नये साल में
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नये साल में

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** सभी अधूरे सपने मेरे, पूरे होंगे नये साल में। अरमानों में रंग भरेंगे, नहीं फंसेंगे मकड़ जाल में।। अब तक जो भी रहे अधूरे, सपने वे मुस्काएंगे। हमको देकर के खुशियाँ वे, मंज़िल आज सजाएंगे।। नहीं निराशा संग रहेगी, मातम को दफनाएंगे। कर्म करेंगे नये साल में, मंगल गीत सुनायेंगे।। जाने वाले का वंदन कर, आगत को घर लाएँगे। रहे अधूरे सपने अब तक, उनको अब महकाएँगे।। जीवन में अब नव गति होगी, और सुहानी बातें। सब कुछ अब मंगलमय होगा, सुखमय अब दिन-रातें।। नहीं संग अवसाद रहेगा, नया वेग अब तन-मन में। आने वाला काल सँजोये, नया नेग अब आँगन में।। जीवन संकल्पित होकर के, नव अध्याय लिखेगा। मुस्कानों का मौसम होगा, मातम नहीं दिखेगा।। सभी अधूरे सपने आकर, वंदन नमन करेंगे। पूरे करके "शरद" उन्हें हम, आगत चमन करेंगे।। परिचय :- ...
ओस बून्द
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ओस बून्द

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** धरती की दहलीज पर कदम रखती रवि किरणो से ओस बून्दो ने पूछा क्या तुम हमे चमकाने आई हो या गिराने। किरणे बोली कुछ देर विश्राम करेंगी तुम प्रेम फिर तुम्हारी ठंडक लेकर फैल जावेगी धरा पर। मृदुल-दुकुल मे समाने के लिए। जिससे किसी वृक्ष को जीवन मिलेगा हम तुम प्रकृति की नियति है कभी भी समाप्त हो जाने के लिए कटिबद्ध है। एक प्रखरता, एक की कमनीयता क्षणिक है क्या यह सच नही पुछे हम रवि किरण और, हाँ और औस बून्द से। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से ध...
मेरी माँ
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मेरी माँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** आशा और विश्वास की, गहराई और उडा़न की, सोच और विचार की, अच्छे और बुरे की एक शुभ चिंतक होती है माँ। खुशी और गम की, आव और भाव की, दर्शन और विज्ञान की एक कला होती है माँ। पथ और संचलन की, निर्जन मन मै ज्ञान की, अंधकार में प्रकाश की, भटके को राह की एक पथिक होती है माँ। डुबते को सहारे की, मेहनत और उत्साह की, खुशियो के खजाने की, आँसू को पी जाने की, जीवन मे एक तरंग सी, लहर होती है माँ, नीरस मै रस की, अमृत सा पान की, एकान्त मै ध्यान की, भक्ति और शक्ति की, संस्कार और संस्कृति की जननी होती है माँ। समय के ज्ञान की, साहस और विश्वास की, साथ और विकास की शक्ति होती है माँ । शान्ति और मंगल की, प्रेम के प्रसाद की, आनन्द और उमंग की दरिया होती है माँ। परिचय : किरण विजय पोरवाल पत...
दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए
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दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** बीते लम्हों का सूनापन तेरी यादों का महकता चंदन आंखें में थमी तेरी परछाई, रोशनी बनकर बूंदों में घुल जाए। दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए। कहां मुमकिन है मोहब्बत को लफ्ज़ों में बयां कर पाना। आसान नहीं भुला, यादें सुकून की नींद में सो जाना। ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए। दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए। जीवन के पावन ‘निर्झर’ को, तुम यूँ ही बह जाने दो। एक पल, बस एक पल, नीले अँधेरे में गुम हो जाने दो। तारों की चादर ओढ़, चाँद की रोशनी में खो जाऊं। तेरी मोहब्बत की खुशबू में, खुद को फिर से पा जाऊं। ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए। दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए। तेरे बिना सारा जहाँ, सूना सा लगता है, जैसे एक सिसकी.… जैसे एक सिसकी। ये कैसा अधूरापन? ये कैसा सूनापन? शायद यही है इश्क़...
कैसा वो दिन था
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कैसा वो दिन था

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कैसा वो दिन था, प्रारम्भ का अंत था, प्रचंड पराक्रम था, कर्म अखंड था। सनातन की रक्षा हेतु चढ़ा वो धर्म की सूली पर प्राण दिए अपने, स्वाभिमानी बलिदानी था! ना स्वयं की चिंता ना घर-बार की खबर कोई, दृढ़ संकल्प लिए गा रहा पवित्र राम नाम था। नमन है, प्रणाम है, कोटि कोटि वंदन है युवक था, बालक था, बुजुर्ग भी पर भगवा था। शौर्य- वीरता, पराक्रम का अद्भुत वो पल था, ना भुला सके इतिहास कभी, वो ज्वलंत क्षण था। ६ दिसंबर १९९२ का दिन था धर्म के दाग को सेवकों ने स्वयं के रक्त से धोया था। नमन तुम्हें हे बालक यशवर्धन तू यज्ञ था, कितनों की आहुतियों से खड़ा हुआ ये आज का मंदिर है। अवध था, अवध है, जय श्री राम का ब्रम्हांड में जय घोष था। भारत के लाल थे कैसा वो जोश था। अमर हुए, इतिहास ब...
न जाने क्या बदला है
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न जाने क्या बदला है

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** वो बदल गये समझ नहीं आया। न जाने क्या बदला है। ******** वक्त के साथ हर चीज बदलती है। पर तुम न बदल जाना वक्त के साथ। ******** कली बदलकर फूल बनती है। बच्चा युवा बन जाता है। ******* बदलना प्रगति की निशानी है। जिंदगी के आगे बढ़ने की कहानी है। ******** मौसम भी बदलता है ख्याल भी बदलते है। चुनाव जीतने के बाद नेता भी बदलता है। ******** बहुत दुख होता है जब अपना कोई बदल जाता है। हमें छोड़कर किसी दूसरे की बाहों में समा जाता है। ********* केवल वक्त को बदलने दीजिए। अपना स्वभाव और संस्कार मत बदलिए। ******** कोई दल बदलता है कोई शहर बदलता है। होता हैं जिसमें फायदा आदमी वह चीज बदलता है। ******** बदलो जरूर बदलो मगर इतना मत बदलो। कि तुमसे बदला लेने की इच्छा हो। ********* परिचय : डॉ. प्रत...
बुरा इंसान
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बुरा इंसान

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम हमेशा खुश रहो। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम बुरे लोगों से सदा दूर रहो। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम सदा मुस्कुराते रहो। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम्हारे जीवन में दुख न आए। हां मैं बुरा हूं क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम मेरे बाद भी खुश रहो। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।  ...
साक्षरता का दीप जलाइए
कविता

साक्षरता का दीप जलाइए

डॉ. राजेश कुमार शर्मा "पुरोहित" भवानीमंडी (राजस्थान) ******************** साक्षरता का दीप घर-घर जलाइए अनपढ़ भाई बहनों को पढ़ाइये शिक्षा का उजाला हर झोंपड़ी में हो आप पढ़े लिखे हो अपना फर्ज निभाइए केवल हस्ताक्षर करना ही साक्षर नहीं डिजिटल साक्षरता वित्तीय साक्षरता जीवन मूल्यों की शिक्षा भी अवश्य दीजिए अपने गली मोहल्लों में सबको साक्षर कीजिए बरसों से जो बैठे अनपढ़ अपने घरों में उन असाक्षरों को चिन्हित कर पढ़ाइये एक व्यक्ति दस को साखर करने का काम करे आओ यह पुनीत संकल्प कर आगे बढिए शिक्षा का उजाला अब घर-घर होना चाहिए डिजिटल दुनिया में डिजिटल ज्ञान होना चाहिए मिटे अज्ञान का तिमिर सारा ज्ञान का उजाला फैले हर नागरिक हो पढ़ा लिखा साक्षरता का दीप जले उल्लास ऐप जीवन को रोशन करने आ गई है उल्लास ऐप पर रजिस्ट्रेशन अवश्य करवा लें शिक्षित हो देश विकास में हाथ जरूर बंटाइये ...
डाम
आंचलिक बोली, कविता

डाम

सौ. निशा बुधे झा "निशामन" जयपुर (राजस्थान) ******************** (राजस्थानी बोली) बचपन मै म्हे खेल खेलता रह्या पछाड़ी, देता डाम। पिदतां पिदतां होठ सूखता नरच्यूं न करता आराम। मायड़ कहती खाणो खा ले देख ऊपरां ढळगी शाम। दोस्त बोलता कोनी आसी बिना दियां यो अपणो डाम। आ जातो जद नयो खिलाड़ी म्हारो पिण्ड छुड़ाता राम। सगळा बींकै लूम'र कहता नयी छै घोड़ी नयो नयो डाम। परिचय :- सौ. निशा बुधे झा "निशामन" पति : श्री अमन झा पिता : श्री मधुकर दी बुधे जन्म स्थान : इंदौर जन्म तिथि : १३ मार्च १९७७ निवासी : जयपुर (राजस्थान) शिक्षा : बी. ए. इंदौर/बी. जे. मास कम्यूनिकेशन, भोपाल व्यवसाय : एनलाइन सेलर असेंबली /फ़िलिप कार्ड /अन्य प्रकाशित पुस्तक : स्वयं की मराठी संकलन लघुकथा (मधुआशा 2024) एवं विभिन्न पटल पर पुरस्कार एवं समाचारपत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित स्वरचित कविता/कहा...
इत्तेफाक
कविता

इत्तेफाक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आज हमारा समाज जिस जगह खड़ा है मैं नहीं समझता कि यह इत्तेफाक है, लाखों करोड़ों जुल्म ज्यादतियां सह कर मुस्कुराने में कोई तो बात है, शांत स्वभाव में हरदम रहना, लेकिन अत्याचार को नहीं कभी सहना, लेकर शांत पड़े रहे दिल में ज्वालामुखी की धधक, जब चाहे प्रतिक्रिया दे दे नहीं ऐसी सनक, भविष्य की स्वाभाविक चिंताएं लेकर, करते हर काम अपनों की बलाएं लेकर, अच्छे कामों की सराहना भी की उज्जवल भविष्य की दुआएं देकर, खौलते खून की उबाल दिखाये हैं शस्त्र से लैस भीमा कोरेगांव में, जब तक अत्याचारियों को समूल नष्ट न कर दिए सुस्ताये नहीं किसी पेड़ की छांव में, हमने लड़े और जीते भी कई युद्ध, मगर हमने जग को दिये भी हैं दैदीप्यमान बुद्ध, अस्पृश्यता की बात कर बैठाया गया समतायुक्त शिक्षालय से निश दिन बाहर, भावना...
कठिन डगर
कविता

कठिन डगर

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन की यह राह कठिन है, जीवन की यह डगर कठिन है, कितनी उलझन कितना भार कितनी चिंता कितना काम। हर उम्र के पड़ाव में बढ़ता जाता है यह भार, मानसिक शारीरिक व्यापारिक सांसारिक, उलझन में फसता जाता इंसान। चिंतन कम चिंता ज्यादा, भक्ति कम बदलाव ज्यादा, स्मरण कम उलझन ज्यादा, दर्शन कम प्रदर्शन ज्यादा। होड़ की इस दौड़ में घानी का सा बेल जुत गया प्यारा, जीवन के इस चक्र में घूमता-घूमता रह गया न्यारा, आओ इस उलझन को हम दूर करें। चिंतन और मनन से, पठन और पाठन से, ज्ञान ध्यान योग और विद्या से, संतो महंतों की वाणी से , दान और पुण्य से, तीर्थो में भ्रमण से, आदर और सत्कार से, सेवा और पूजा से, प्रेम और विश्वास से , इस काया को कंचन करें मेल और मिला से। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय प...
सौदागर
कविता

सौदागर

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** ऐ सौदागर, मतलबपरस्त इस दुनिया में किसी को किसी से प्यार नहीं है। लिए बैठा है कब से मुनाफाखोर बाजार में, दर्द कोई व्यापार नहीं है। होते है सौदे जज्बातों के यहां हर पल, गम का कोई खरीदार नहीं है। बिन पूंजी लाभ की चाहत, स्वर्ग चाहिए सबको मरने को कोई तैयार नहीं है। बिकते है चांद और तारे जमीन पर, आसमान का कोई जमींदार नहीं है। होते है सौदे सूर्यकिरण के, खाली जेब हो जिनकी वो इसका हकदार नहीं है। दाम लगा है खुशियों का भी, न हो भुगतान तो कोई दुख में भागीदार नहीं है। सपनो के बाजार सजे है हर पल, यहां झूठ हैं बिकते जो इनके पहरेदार नहीं हैं। भूख बिके दर्द बिके देह के भी कर जाते सौदे, इज्जत को समझे ऐसे किरदार नहीं है। बिना स्वार्थ न दान भी होता, भक्ति भाव के ऐसे दिलदार नहीं है। खुशियों में सब संग ही होते, दुख में...
रोम-रोम में प्रीत रमी जब
कविता

रोम-रोम में प्रीत रमी जब

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रोम-रोम में प्रीत रमी जब शब्दों में उतर छंद बन गई बिखरी जो अँधेरों में हंसी तो मोहक सा वो गीत बन गई अलकों से छलकी जब बूँदे बना मीठा मीसरा ग़ज़ल का नेह धार बही मृगनयनन तो आधार बन गई नज़्मों का गुलज़ार हुये साँसों के स्पंदन बिखर गये मुक्तक सपनों के महका जो चंदन बदन दमकता ढेर लग गया दहकते दोहों का पायल की रूनझुन से निकली बन कर झंकृत सी कुडंलियां वाणी से बहे सरिता शब्दों की खिली माँ शारदे की मनकलियां मन मर्ज़ी से लहके बहके कलम मदहोश चली हिरणी की चाल गीत, कवित्त, छंद मधुर मीत के मन करे फक्कड़ शर्म से लाल परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, प...
नारी शक्ति
कविता

नारी शक्ति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** नारी तू शक्ति है, श्रद्धा सुमन भक्ति है तू गौरी, तू लक्ष्मी, तू सरस्वती है।। तू करुणा है, तू ममता है, तू जननी है, तू माया है तू शक्तिस्वरुपिणी दुर्गा, सत्यस्वरुपिणी राधा है।। तू भाव है, तू भावना है, तू लज्जा है, तू सज्जा है तू नंदिनी, तू कामिनी, तू सद्गुण वैभव शालिनी है।। तू इत्र है, तू मित्र है, तू चित्र है, तू चरित्र है तू दृष्टि, तू चेतना, तू सृष्टि, तू बंदना है।। मीरा की भक्ति तुझमें, मां अहिल्या का धैर्य पद्मावती सी साहस तुम में, लक्ष्मीबाई का शौर्य।। तेरे ज्ञान से है जीवन तेरे कर्मो से है पहचान ऋृणी रहेगी ये धरती तू है हाड़ी रानी का बलिदान।। परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
बरगद का पेड़
कविता

बरगद का पेड़

रतन खंगारोत कलवार रोड झोटवाड़ा (राजस्थान) ******************** वो पुराना बरगद का पेड़, सैंकडों वर्षों से खड़ा है अटल। आंधी-तूफानो से लड़ता, पर जरा भी हुआ नहीं विरल।। गाँव के मुखिया सा है इसका वर्चस्व, चौपाल पर खड़ा है सीना तान के। सबके सुख दुःख की कहानी सुनता, पर न्याय करता है सब जान के।। भरी दुपहरी जेठ की या हो सावन मास, पशु-पक्षी हो या हो बुढे-जवान। अपनी तलहटी में पनाह देता है सबको, ये पुराना बरगद का पेड़ कितना महान।। हजारों कहानियों का गवाह है ये, समाई है इसमें हमारी विरासत। राष्ट्रीय वृक्ष का दर्जा है इसको, यही है हमारे संस्कारों की वसीयत।। परिचय : रतन खंगारोत निवासी : कलवार रोड झोटवाड़ा (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।...
महाकाल की नगरी प्यारी
कविता

महाकाल की नगरी प्यारी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** महाकाल की नगरी प्यारी, तीनों लोकों से है न्यारी। यहां बसते हे कालों के काल, वह तो है बस महाकाल। सप्तपुरी में उज्जैनी नगरी, शिप्रा निर्मल पावन बहती, पापो का करती नाश। यहाँ ज्योतिर्लिंग महाकाल। वह तो है कालों के काल, दुष्टो का करते नाश। यह नगरी विक्रमादित्य की नगरी, राजा महाराजा न्याय प्रिय की है यहां कृष्ण सुदामा पढ़ने आए, सखा प्रेम की देते मिसाल। साधु सन्यासी बसे ओघड़ी, भक्तों का लगे डेरा द्वार। १२ वर्ष में सिहस्थ है लगता, अमृत बरसे शिप्रा के घाट। तपोभूमि तांत्रिक की भूमि, त्यागी और योगी की भूमि, ओघडी़ और महंतों की भूमि,। कवियों और दार्शनिकों की भूमि, नवरत्नों की देखो खान, उज्जैन नगरी पावन धाम। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ...
चलो बताओ
कविता

चलो बताओ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किसी के अथाह संघर्षों से मिला हुआ हर चीज खा रहे हो,खुले आम चिल्ला रहे हो, चलो बताओ उस महामानव को कितना वापस देते जा रहे हो, जब समाज को वापस करने वाला धन कहीं और देकर आते हो, अपने आप को दिखावे में ले जाते हो, बनाकर बैठे रहते हो दस लोगों का संगठन, लालच से भरा हुआ आदमी कभी कर लिया करो अपने अंतस का मंथन, जीने की ललक नहीं जा रही दूसरों के छिलकों पर, अपना ही फसल जा रहे हो कुतर, संख्या ज्यादा होने से कुछ नहीं होता, कोई पत्थरों पर फसल कभी नहीं बोता, चंद संख्या वालों का हुजूम एक मजबूत दबाव गुट बना सकता है, अपनी समूह की चाही गयी लक्षित सोच का सकारात्मक परिणाम ला सकता है, सोचो जरा कि हम क्या कर रहे हैं? केवल गुब्बारों में हवा भर रहे हैं? हमें ये समझना होगा कि गुब्बारे उड़ाने से कोई समाज न ऊपर उड़ेगा न ऊपर...
हाले बया खुद से खुद की जंग
कविता

हाले बया खुद से खुद की जंग

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** अब डर नहीं लगता मौत से, मैंने जिन्दगी को बहुत करीब से देखा है। के डर नही लगता किसी को खोने का, मैंने खुद को करीब से खोते हुए देखा है।। के बिखरी हूँ टूटी हूँ, खुद को बहुत समेटा है। के अब चाहत ही खत्म हो गई खुद से खुद की, मैंने खुद को खोते हुए देखा है।। के लुटे हुए मंदिरों की सूनी दहलीज देखी है, देखा है बिखरना मजारो का, सूनी मांग देखी है।। क्या कहूं अब किसी बात का खोफ मुझे नही सताता, हर रोज बिगडती हूँ , पर अब मुझे खुद का हाल बताना रास नही आता, के नही लगता अब इस दुनिया में कोई अपना सा मुझे, क्यों के इस अपनेपन को मैंने बेगानों के रूप में देखा है।। के अब डर नही लगता मौत से, मैंने जिन्दगी को करीब से जाते देखा है।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
परंपरा का पक्ष
कविता

परंपरा का पक्ष

सूरज सिंह राजपूत जमशेदपुर, झारखंड ******************** हाँ, मैं परंपरा हूँ। वही परंपरा, जिससे तुम कभी प्रश्न करते हो, कभी संदेह की दृष्टि से देखते हो, कभी मुझे अतीत का बोझ समझकर अपने कंधों से उतार फेंक देना चाहते हो। परंतु क्या तुमने कभी रुककर यह सोचा है कि मेरा अस्तित्व तुम्हें क्यों अखरता है? क्या सचमुच मैं उतनी रूढ़, उतनी संकीर्ण हूँ, जितना तुम्हारी आधुनिक दृष्टि मुझे मान लेती है? आओ, मेरे युवा, मेरे जागरूक, विचारशील और तेजस्वी युवा आज मैं स्वयं अपना परिचय देती हूँ। मैं परंपरा हूँ पर मैं अतीत की जंजीर नहीं तुम मुझे अक्सर बीते समय की निशानी समझते हो, पर क्या तुम जानते हो कि मैं वह चेतना हूँ जो सदियों के अनुभवों, प्रयोगों, संघर्षों और सीखों से निर्मित हुई है? मैं कोई मृत अवशेष नहीं, मैं पीढ़ियों की यात्रा हूँ जिसमें ज्ञान भी है, गलतियाँ भी हैं, शिक...
नदी फिर से बहना
कविता

नदी फिर से बहना

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** कलम बोलती कागज से, आओ मन की कह दूं। झूठे जग के चलचित्रों में, सत् के रंग बतला दूं। सूख गया रिश्तों का सागर, संबंधो में थार मरूस्थल। स्वार्थ के वशीभूत जगत है, बहरूपिया सा अंतस्थल। ज़र जोरू जमीन खास है, रत्तीभर स्नेह कहां सहोदर में। शुष्क लुप्त है आत्मियता, रिसती दरार गहरी आंगन में। बोल चाल बंद अपनों से, कुंठित गैरों से भ्रमित हुए। दूध में तलवार चलती, संस्कार सब धूमिल हुए। वात्सल्य शल्य से ग्रसित, रोये अपनापन संन्यास लिए। मात-पिता में अनबन बडी, बच्चें पढ़ने को वनवास लिए। पति पत्नी के गठबंधन में, निरस गाँठों की भरमार घनी। अलगाव विखंडित मोहब्बत, झूठी शान जिए प्रणय के धनी। कब समरसता को सीखेंगे, अपनेपन में कटे कटे से रहना। यूं विस्तापित जग जीवन में, ममता की नदी फिर से बहना। परिचय :- डॉ...