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कविता

आ गया बसंत है
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आ गया बसंत है

शैलेश यादव "शैल" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** विटपों के पुराने पत्ते जब मिलने लगे धूल, वसुधा भर के वृक्षों में जब लगने लगे फूल, आम की मंजरी जन जन का मन मोहने लगे, सेमर पलाश वन लाल सुमनों से सोहने लगे, तो समझ लीजिए आस-पास आ गया बसंत है। कलघोष सुमधुर कंठों‌ से जब प्रिय बोलने लगे, अपनी मधुरता को मनुज के मन में घोलने लगे, सहजन का तरु जब श्वेत पुष्पों से भर रहा हो, बरगद जब कूचों को लाल लाल कर रहा हो, तो समझ लीजिए आस-पास आ गया बसंत है । बैरों के वृक्षों में भी जब लालिमा छा गई हो, जामुन के वृक्ष में भी जब नई पत्ती आ गई‌ हो, जब कटहल के छोटे फल वृक्ष में लटक रहे हों, जब अपने पराए सब यहाॅं-वहाॅं भटक रहे हों, तो समझ लीजिए आस-पास आ गया बसंत है। महुए में भी छाई एक अलग ही मुस्कान हो, सुमनोहर सुगंध से भरा जब सारा वितान हो, जब चारों तरफ खुशियों की छाई बहार हो, ...
ठौर कहां
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ठौर कहां

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** समंदर के सैलाब का है साहिल यादों के सैलाब का साहिल कहां आसमां ठौर मेहताब आफताब का चमकते सितारों का ठौर कहां। नदियों के कल-कल में स्वर हैं जल में पडती किरणों के प्रतिबिंब का ठौर कहां शून्य आकाश में उड़ते पक्षी की फुनगी है ठौर वृक्ष से गिरे पत्ते का ठौर है कहां। सूरज की किरणों का ठौर है धरती आकाश, धरती के क्षितिज का ठौर कहां। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तम...
आलिंगन
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आलिंगन

प्रतिभा दुबे ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** होता जब आलिंगन तब, प्रेम से जीवन लेता जन्म ! नव शिशु की धड़कन सुन हुआ मधुर सा आलिंगन।। प्रेम से भरा स्पर्श हमें प्राप्त, आलिंगन से ही हुआ सदैव। जैसे धरती और गगन के, आलिंगन से बहती हैं पवन।। स्नेह से भरे आलिंगन ही, हमें सहानभूति प्रदान करता। हम बचपन की दहलीज में, आलिंगन की भाषा प्रेम समझते।। भटकते नहीं है फिर यह कदम जब मिल जाता प्रेम का आलिंगन। जब बढ़े ज्ञान की ओर कदम होता परम आत्मा से आलिंगन।। प्रेम, दया, क्षमा से भरा हृदय सत्य का करता सुंदर आलिंगन।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कह...
मातृभाषा दिवस
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मातृभाषा दिवस

गायत्री ठाकुर "सक्षम" नरसिंहपुर, (मध्य प्रदेश) ******************** माता होती है सबको प्यारी, भाषा होती है सबकी न्यारी। हर क्षेत्र की होती अलग भाषा, मातृभाषा होती सबकी दुलारी। संपूर्ण विश्व में प्रायः हर जगह, मातृभाषा में वार्तालाप होता है। माता से भी अधिक महत्व देते, अपनेपन का एहसास होता है। शैशवावस्था से सुनते जिसको, प्रेम प्रगाढ़ता बढ़ती ही जाती है। उम्र दराज होते होते मातृभाषा, तन मन में सबके बस जाती है। स्वाभिमान का प्रतीक वो बनती, क्षेत्रीयता का प्रतिनिधित्व करती। दिवस विशेष क्या है उसके लिए, सदा ही 'सक्षम' चहेती बनी रहती। परिचय :- गायत्री ठाकुर "सक्षम" निवासी : नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अ...
माँ केवल माँ जैसी होती
कविता

माँ केवल माँ जैसी होती

डॉ. अवधेश कुमार "अवध" भानगढ़, गुवाहाटी, (असम) ******************** चाहता हूँ वक्त को, मुट्ठी में अपने बंद कर लूँ, ज़िंदगी की दौड़ में अब, माँ न मेरी दौड़ पाती। *** जंग लड़ती ही रही माँ, ज़िंदगी भर ज़िंदगी से, वक्त ने धोखा दिया है, ज़िंदगी के साथ मिलकर। **** माता ने फिर भाँप लिया है, बेटे की नादानी को, किंतु न बेटा समझ सका है, कुर्बानी अपने माँ की। **** माँ को अपने छोड़ गया है, बेटा एक अनाथालय में, वर्षों पहले उस बच्चे को, उसी जगह से गोद लिया था। ***** माँ - बापू को छोड़ अनाथालय में, बेटा भागा है, शायद उसके तीर्थाटन की, ट्रेन छूटने वाली है। ***** पढ़ी- लिखी वह नहीं किंतु बेटे का मन पढ़ लेती है, जाने कब, किन स्कूलों में, माँ ने ये भाषा सीखी? ***** माँ केवल माँ जैसी होती, गुरु, ईश्वर सब पीछे हैं, जग में ऐसा बैंक नहीं, जो उसके ऋण को चुका सके। ***** परिचय :- डॉ. अवधेश कुमा...
मानवता देखो शरमाई
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मानवता देखो शरमाई

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** मानवता का छेद, जात पात का भेद, कभी ना बुर पाई, वोट बैंक की रोटी सेके जात पात के चूल्हे पर, मानवता में घृणा पैदा कर, छेद और भेद बुद्धि में भर देवें, आज का मानव शिक्षित और समझदार ! छेद और भेद का फर्क है समझे, वह हे पढ़ा लिखा इंसान। छेद और भेद की परिभाषा है देखो उसके पास, कम पढ़े (अनपढ़) और बुद्धिहीन करते जाति भेद की बात, आदर्श राम तो शबरी और केवट को गले लगाते, प्रेम के साथ, विभीषण का भेद नहीं लेते हैं श्री राम, राम-राज्य में छेद करें, देखो मंथरा दासी बात, वन जाते श्री राम प्रभु छेद भेद की नही बात। राजनीति में चलती है छेद-भेद की बात, भारत में सब मिलजूल कर रहते हे हर पंथ, छेद-भेद की बात तो अशोभनीय देती अपने मुहँ, वसुदेव कुटुंबकम् का भाव रहा हरदम, जात पात का जहर क्यों? घोलो मानव तन, जह...
क्यूँकि मैं नारी हूॅ
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क्यूँकि मैं नारी हूॅ

नीलेश व्यास इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** इन्दौर मे महिला प्रोफेसर के प्रति किये गए जघन्य अपराध, से उपजी मेरी कविता ”क्यूँकि मैं नारी हूॅ, क्या मेरे दर्द बस मेरे ही है, क्या समाज, क्या नेता, क्या संविधान का चैथा स्तंभ, सब चुप है, सब मौन खड़े है, आँखे भी सब मोड़ लिये है, मुझे सताया मुझे रुलाया और मुझे यूँ जला दिया, नारी उत्थान के कानुन, राष्ट्रपति सिंहासन तक दिये, मेरे नाम के सम्मान झेलते और आश्रम भी खोलते, क्या तुमको लज्जा आती नही, क्यूँ गली, चैराहे से नशा करते, यूँ सरेराह मुझे छेड़ते, यूँ तेज चलाते वाहनों से कभी हाॅर्न मारकर कभी कट मारकर वो नालायकी कर जाते है, कभी विरोध किया तो कार से घसीटी ओर जला दी जाती हूँ, मेरे प्रति घृणा लिये, क्यूँ ये लोग तुम्हे दिखते नही, कितना सहूँ, ओर किससे कहूँ, भेदभाव का, जातिवाद का दंश झेलती, लगता है मैं सबला नही, ...
अकादमिक आत्महत्या
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अकादमिक आत्महत्या

नवनीत सेमवाल सरनौल बड़कोट, उत्तरकाशी, (उत्तराखंड) ******************** हे! अतिमानव नहीं समाधान आत्महत्या का तुम्हारा कदम सपना टूटे नहीं टूटना तुम मिलेगी काया बड़ा है भरम। विफल हो रहें कृतसंकल्प में सृजन करें अद्भुत आशा क्षणिकावेश में लिया जो निर्णय आलम कहेगा तुमको हताशा। आत्मघाती न समझे कुछ भी होती वेदना एक ही बार सुन परितापी हृतपीड़ा से परिजन मरते बारम्बार। सहानुभूति के तुम अभिलाषी मार्गी से पूछना हर एक बार पीछे छोड़ दो अतीतगत को सुखद बने जीवन का सार। यदि हो केंद्रित धीर अवस्था प्रदीप्त करेगा लक्ष्य तुम्हारा अन्तर्ज्वाला को बाधित रखना निजता में तू कुल का है तारा।। परिचय :-  नवनीत सेमवाल निवास : सरनौल बड़कोट, उत्तरकाशी, (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्...
दुलार तो लीजिए
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दुलार तो लीजिए

वीरेन्द्र कुमार साहू मंदिरपारा, सूरजपुर (छत्तीसगढ़) ******************** मैं कब से यही पड़ा हूं, सिरहाने के नीचे जमीन पर जरा नजरों से उठा तो लीजिए। चांद कब का ठहरा है, सरोवर में कुमुदनी के बीच में जरा हाथो से रास्ता बना तो दीजिए। देखिए तो वो तारा जरा मधीम हो चला है जरा धूल को हटा तो दीजिए। कुछ परिंदे भूखे ही लौट जाते हैं दरवाजे से थोड़े और दाने बिखेर तो दीजिए। कब तक कोई निराश जीवन काटेगा, जरा बाहों में भर कर दुलार तो लीजिए।। परिचय :- वीरेन्द्र कुमार साहू निवास : भैयाथान रोड, मंदिरपारा, जिला सूरजपुर (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी...
चल-चल
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चल-चल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जब मैंने शुरू किया अपनी ओर से कुछ हलचल, तुरंत लोगों ने कहना शुरू किया यहां से चल चल, हां बिल्कुल चलना तो है, इस सड़ांध भरे माहौल से निकलना तो है, अभी तक हमें कोई और चलाता था, पल पल हमारे अहम को चोट पहुंचाता था, ले दे के चलके कुछ आगे आ पाये हैं, कुछ अपनों को सच्चा इतिहास बता पाये हैं, तुम्हारी अगुवाई में अब तक केवल लानत, मनालत, जहालत ही झेलते आये हैं, खुद से खुद को ढंग से नहीं मिला पाये हैं, अब खुद को जान रहे हैं तब भी तुम्हें परेशानी है, ये तुम्हारी सोची समझी साजिश है नहीं कोई अनायास वाली नादानी है, अब जब तक अपनों के अंदर न आ पाये आग, अपने जब तक न जाये जाग, तब तक आप बोलते रहो चल चल, हम अपने हक़ हुक़ूक़ के लिए चलते रहेंगे पल पल, तो जागृति पहल जारी है, ये हमारे भविष्य के लिए तैयारी है। ...
काश! मैं भी स्कूल जा पाती…
कविता

काश! मैं भी स्कूल जा पाती…

सोनल सिंह "सोनू" कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़) ******************** स्कूल जाते हम उम्र बच्चों को, अपलक निहारती बर्तन माँजती मुनिया, मन ही मन ये सोचे, काश! मैं भी स्कूल जा पाती ... होते जो मेरे अम्मा-बाबा, न होती आज ये लाचारी। मैं भी जा पाती स्कूल, लिए किताबें पहने ड्रेस प्यारी। रोज नया कुछ सीख जाती, सखियों से भी मिल पाती। मन लगाकर मैं पढ़ती, आगे-आगे मैं बढ़ती। पढ़-लिखकर कुछ बन जाती, जीवन बेहतर कर पाती। मिलता जो मुझको मौका, अंबर को भी छू जाती। काश! मैं भी स्कूल जा पाती... परिचय - सोनल सिंह "सोनू" निवासी : कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं,...
हमारा भी जमाना था
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हमारा भी जमाना था

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** पीढ़ी देखे चरम बदलाव, चिंता बिन अफसाना था। भला-बुरा का ज्ञान नहीं पर, हमारा भी जमाना था। बिन शर्म संकोच बचपन में, पैदल साइकल जो हुआ। दूर-पास विचार नहीं संग, मां पिता गुरु ईश दुआ। चला करते पीढ़ी के रिश्ते, चाचा मामा बहन बुआ। ढपोरशंख पदवी से दूर, प्रतिशत उच्च अंक छुआ। बिना शरम इगो पुस्तकों का, क्रय विक्रय ठिकाना था। परिवार सहयोग में कितनी, लाइन में लग जाना था। अपनी पीढ़ी चरम बदलाव, बिन चिंता अफसाना था। भला-बुरा का ज्ञान नहीं पर, हमारा भी जमाना था। प्रभु प्रलोभन मिठाई का, कम मेहनत विनय करते। पढ़ाई खर्च का बोझ वहन, कभी उजागर ना करते। सिलवटी ड्रेस सस्ते खेल से, जमकर खुशियां पा लेते। कंचा भौंरा पिट्टुल कौंडी, लूडो चेस चला करते। जरा सी पॉकेट मनी बचे, अन्य शौक भी पाना था। घर का मुरमुरा चूड़ा भेल, अपना शौक पुराना था। अपनी पी...
खुद को, खुद से ही समझाया जाए
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खुद को, खुद से ही समझाया जाए

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** रख कर दिल में, जज़्बात अपने, ना किसी और को, बताया जाए, दर्द जो उसने दिया, दिल को मेरे, अब खुद ही इसे, तड़पाया जाए, वादे तो हमसे, हसीन किए थे उसने, मगर उन सबको, अब भुलाया जाए, दिया है ग़म उसने, तो ग़म ही सही, अपने दर्द को अब, दिल में समाया जाए, ज़माने से कह, हसीं उड़वानी है अपनी, ज़ख्म जो मिले, खुद ही मरहम लगाया जाए, उसने तो जो किया, समझ है उसकी, अब खुद को, खुद से ही समझाया जाए, बड़ा दर्द दिल में, दे जाता है प्यार करना, आंसुओं को अब, ज़माने से छिपाया जाए परिचय :-  रामेश्वर दास भांन निवासी : करनाल (हरियाणा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अप...
हाँ ! मैं लड़की हूँ
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हाँ ! मैं लड़की हूँ

शैलेश यादव "शैल" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** हाँ! मैं लड़की हूँ। हमारे जन्म लेते ही, घरवाले हो जाते हैं मायूस, सोहर नहीं होता हमारे जन्म पर, नहीं बाँटी जाती मिठाइयाँ, कभी तो इस जहाँ में आने से पहले ही, भेज दी जाती हूँ दूसरे जहाँ में, हमें अपनो द्वारा ही बोझ समझा जाता है, अपनों के द्वारा ही सुनती बहुत घुड़की हूँ, छोटी हूँ, मझली हूँ या मैं बड़की हूँ, हाँ ! मैं लड़की हूँ, हाँ! मैं लड़की हूँ। संसार के श्वानों की आंखों में गड़ती हूँ, दिन-रात गिद्धों से लड़ती झगड़ती हूँ, सारा काम घर का मैं ही तो करती हूँ, फिर भी दुनिया से मैं ही डरती हूँ, जहाँ देखें वहीं, खाती मैं झिड़की हूँ हाँ ! मैं लड़की हूँ, हाँ ! मैं लड़की हूँ। मुझे पराया धन माना जाता है, मुझे दान किया जाता है, कभी सारी सभा के बीच में अपमान किया जाता है, कभी सौंदर्य का कभी पीड़ा का गुणगान किया जात...
शब्दांजलि
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शब्दांजलि

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** मां तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा तस्वीर में ही रहा। तस्वीर में छलकते चेहरे को निहारता।। अब अपने मन को समझाता। तस्वीर की झूलती माला को असहाय से देखता ।। भूली बिसरी यादों को अपनी यादों से जोड़ता। मां के आशीषों एवं आंचल को खोजता।। यादों में खोकर बीते कल को खोजता। अब तुम्हारी यादों में आंसुओं को बहाता।। अपनी नई-नई बातों को तुमसे जोड़ता। बीते कल को तुमसे जोड़ता।। अब तुम्हारे बिना अपनी ख्वाहिश किसको बताऊं। अपनी मुश्किलों और दुख किसको सुनवाऊं।। मां तुम्हारे बिना अपना वजूद बचा ना सका। अब अपनी जिद्द किसी से पूरी करवा न सका।। अपने नए नए सपने, खुशियां किसी को बतला ना सका।। अब मुझे घर में गले से लगाने वाला ना रहा। मेरी आवाज को सुनने वाला कोई ना रहा।। अपनी सफलता का जश्न मनाने वाला, कोई ना रहा। अब तुम्हारा मुस्क...
शहीदों की वीरगाथा
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शहीदों की वीरगाथा

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** चौदह फरवरी दो हजार उन्नीस का दिन, कभी विस्मृति वश भी भूल ना पाएंगे। पुलवामा में हुए शहीदों की वीरगाथा, कर नमन हम आज फिर से दोहराएंगे।... जम्मू से अठत्तर वाहनों में हो सवार, निकला था सुरक्षाकर्मियों काफ़िला। बीच राह अवन्तिपोरा के निकट हुआ, लेथपोरा इलाके में आत्मघाती वाकया। अपराधी जैश-ए-मौहम्मद के कायराना, मनसूबों से चालीस जवानों का लहू बहा। कर्त्तव्य पथ पर मां भारती के वीरों की, शहादत का हम भारतीयों ने जो दर्द सहा। वीर योद्धाओं के शौर्य साहस पराक्रम को, कर सलाम आज अपना शीश झुकाएंगे।... है नाज़ सदा उन जांबाज वीरों पर जो वतन से मोहब्बत इस कदर निभा गए। इस जहान आज मोहब्बत के दिन जो, निज वतन पर जान अपनी लुटा गए। राष्ट्र रक्षा में प्राणोत्सर्ग करने वालों के लिए, भारतीय युवा मिलकर प्रण ले...
मधुमास
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मधुमास

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** धरा मांग सिंदूर सजाकर, झिलमिल करती आई भोर। खग कलरव भ्रमर गुंजन, चहुं दिस नाच रहे वन मोर। सुगंध शीतल मन्द समीर, बहती मलयाचल की ओर। पहने प्रकृति पट पीत पराग, पुष्पित पल्लवित महि छौर। रवि आहट से छिपी यामिनी, चारूं चंचल चंद्रिका घोर। मुस्काती उषा गज गामिनी, कंचन किरण केसर कुसुम पोर। महकें मेघ मल्लिका रूपसी, मकरंद रवि रश्मियां चहुंओर। मदहोश मचलती मतवाली, किरणें नभ भाल पर करती शोर। सुरभित गुलशन बाग बगीचे, कोयल कूके कुसुमाकर का जोर। नवयौवना सरसों अलौकिक, गैंहू बाली खड़ी विवाह मंडप पोर। मनमोहक वासंतिक मधुमास, नीलाभ मनभावन प्रकृति में शोर। कृषक हिय प्रफुल्लित आनन्दित, अभिसारित तरु रसाल पर बौर। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घो...
प्रभु स्वरूप साजन पाना
कविता

प्रभु स्वरूप साजन पाना

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** स्वर्णिम स्वप्न सँजो कर बैठी, डोली में बिटिया रानी। होठों पर लालिमा मनोहर, नैनों में दुख का पानी। कभी सोचती अपने मन में, मुझे पिया के घर जाना, झाँक-झाँक पर्दे से कहती,j भैया मुझे लिवा जाना। नयन नीर हाथों से पौंछे, पिता सिसकियाँ भरता है। पहली बार पिता बेटी को, घर से बाहर करता है। प्यार सुरक्षा अपनापन दे, माता रखती थी घर में। कन्यादान पिता ने करके, सौंप दिया वर के कर में। आँखों से ओझल होते ही, व्याकुल होते थे पापा। मुझको आज बिठा डोली में, क्यों ओझल होते पापा। रुठा करती थी पल-पल में, आज क्यों नहीं मैं रूठी। कोई रोक नहीं पायेगा, सब उम्मीदें हैं झूठी। जाना होगा आज सजन घर, समझ गई बिटिया रानी। सजल नयन हैं आज खुशी से, उम्मीदों का है पानी। सोच रही थी मन ही मन में, इतने में भाई आया। नीर ...
क्या मैं इतना बुरा हूंँ
कविता

क्या मैं इतना बुरा हूंँ

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** क्या मैं आज इतना बुरा लगने लगा हूंँ, जो आज सत्ता मुझे कभी दीवार बनाकर तो कभी शामियानों के कपड़ों की दीवार बनाकर छिपाने का भरसक काम करती है, क्योंकि उन्हें मेरी मुफ़लिसी पसंद नहीं, मेरा चेहरा उन्हें भाता ना हो, उनकी चकाचौंध के लिए तो मेरा शरीर सदैव सेवा में तैयार रहता है, कभी मुझे सड़क किनारे अपनी फटी पुरानी चादर या मेरी टूटी-फूटी रेहड़ी पर कुछ रखकर बेचने से रोका जाता है तो लाठी-डंडों से और ना सुनने वाली गालियां देकर पिटवाया जाता है, कभी मेरी घास-फूंस की झोपड़ियों को तहस-नहस कर भगाया जाता है, आखिर क्यों ये राजसत्ता मुझे अपनाने को तैयार क्यों नहीं ? हाँ मुझे एक जगह बहुत खुश करने का बहुत काम होता है और वो है राजनेताओं का मेरी ग़रीबी और मुफ़लिसी को दूर करने का भाषण, चुनाव के समय सब मेरे इर्द-गिर्द गिद्धों...
बदलते रिश्ते
कविता

बदलते रिश्ते

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रंग बदलते खून के रिश्ते देख अब तक की उम्र में रिश्तों को हमने खंगाला है। माना सबको अपने जैसा पर कोई सनकी, कोई लालची, कोई गुरूर वाला है। खंजर छुपा कर रखे हैं ताक में पसीना तो पसीना खून चूसकर मचलने वाला है। रूप रंग पर कभी मत जाना यारों जितना तन उजला उससे ज्यादा ही मन काला है। चीर कर दिखा चुका अपना हृदय पर पिशाचों का मन इतने में कहां भरने वाला है। उन्नति में भभक धधक उठेंगे शोले मशाल ले जलाएंगे अरमां उदर में जाता निवाला है। जब तक देख न लें नेस्तनाबूद होते तानों बानों से उलझा ये रिश्तों का श्याह जाला है। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कवित...
२१ लाख दीपो की श्रृंखला
कविता

२१ लाख दीपो की श्रृंखला

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** उज्जैन जगमगाया, देख नजारा रामघाट का, विश्व स्तब्थ खडा सा पाया विश्व रिकॉर्ड तोड़ा उज्जैन ने, विश्व मे नाम कमाया, क्यों ना चमके उज्जैन जगत मे, महाकाल जहां हे पाया, विक्रमादित्य कालिदास की नगरी नवरत्न जहां है पाये, राजा भर्तहरी, पीर मछंदर, शक्तिपीठ, दर्शन जहाँ हे पाये, पुरानी चमक फिर से यहाँ चमके, इसलिए दीपो से जगमगाया, अवंतिका तो अवंतिका हे, अवन्तिकानाथ जहाँ हे पाया, ३२ पुतलियाँ करे हे निर्णय सिंहासन धर्राया, नतमस्तक हो गई हे दुनिया, जहां महाकाल मै काल समाया, नित्य मुर्दे की भस्म चढे शीश पर, साधु संत मन भाया, देख नजारा रामघाट का जीवन धन्य धन्य हो पाया परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्ष...
कुछ भी स्थिर नहीं है जग में
कविता

कुछ भी स्थिर नहीं है जग में

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** कुछ भी स्थिर नहीं है जग में 'रूप-रंग' झुठलाना होगा! ठुकरा कर 'प्रणय-निवेदन' मेरा प्रिय, इक दिन पछताना होगा...!! ज्यों-तेरा बचपन है बीता त्यों-बीतेंगे दिन यौवन के साँझ घिरी आती है देखो, 'इन्द्रजाल-जीवन-अम्बर-के!' ये 'गगन-सिन्दुरी' भी जाएगी... 'सब-स्याह-में-खो-जाना होगा!' ठुकरा-कर प्रणय-निवेदन मेरा प्रिय, इक-दिन पछताना होगा।। मैं मन्दिर में देख रहा हूँ, 'प्रत्युष का इक दीप बुझ रहा, जहाँ अगुरु-धूम सुवासित था, वहाँ उमस औ घुटन उठ रहा', 'मन-सुकून' था जिस दर्शन में- अब-लगे न फिर पाना होगा... ठुकरा-कर 'प्रणय निवेदन' मेरा प्रिय, इक-दिन पछताना होगा।। 'नव-मूरत' का मोह है केवल 'न-विग्रह-प्राण-प्रतिष्ठित' है अन्तर्मन में झाँक के देखो! 'सत-सुन्दर-छवि' स्थापित है 'नयन-यवनिका' फिर से खोलो 'चिर-सत्य-प्रेम-द...
बसंती बयार
कविता

बसंती बयार

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बसंती बयार बह रही घर आंगन चौखट द्वारे रवि किरण लजा रही छुप, चुप कर गगन में।। पेड़ों के झुरमुट से झांकती कलियां भौरो का गुंजन होता पुष्प पराग से पेड़ों के पत्ते हिल-हिल कर लेते बलैय्या मां सरस्वती को बसंत देता बधाइयां कहीं कोयल कुकती स्वागत में कहीं झरनों की फुहारें भरें स्फुरण। कहीं झरना नहलाता बसंत को तो पलाश टेसु टीका लगाता रक्तिम भरमाए भागते बादल बसंत से धूप-छांव का खेल खेलते। नदी, तडाग की लहरें देती बसंत को झूले मीन मिलकर नृत्य करती बसंत की अगवानी में। आओ देखे हम भी मिलकर नर्तन बसंत आगमन में। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं ...
रास्ते का अंधा बटोही …
कविता

रास्ते का अंधा बटोही …

मानाराम राठौड़ जालौर (राजस्थान) ******************** मंजिल कितनी दूर है! देख ले सपना कितना सच है! देख ले सपना है! मंजिल की पहुंच अपना है! सपने का मंजिल देख ले मंजिल की राह कांटो से भरी कंकड़ सड़क जाते मंजिल चटक-भटक मंजिल कितनी दूर है! सपना कितना सुदूर है! बटोही नहीं देखे राह अपनी कौन कहे यह कहानी अपनी घर आते आते ढल जाती है! संध्या सुबह होते-होते भूल जाते हैं! सपना परिचय :- मानाराम राठौड़ निवासी : आखराड रानीवाड़ा जालौर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहान...
बहराइच
कविता

बहराइच

अनुराधा प्रियदर्शिनी प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** भारत में उत्तर प्रदेश का एक जिला बहराइच देवीपाटन क्षेत्र का एक भाग है बहराइच घना जंगल और नदी की बहाव यहाँ पर तेज भर राजवंश की राजधानी बहराइच, भारिच प्रकृति की मनोहर छटा बहराइच की पहचान ग्यारहवीं सदी में एक राजा हुए बहुत महान सैयद सालार मसूद गा़ज़ी को दी थी शिकस्त महाराज सुहेलदेव की गौरवगाथा महान उत्तर में नेपाल की है अंतरराष्ट्रीय सीमा दक्षिण भाग में है सीतापुर और बाराबंकी पूरब में श्रावस्ती से स्पर्श करता है बहराइच पश्चिम भाग में इसके गोंडा जिला और खीरी पुरूषोत्तम श्रीराम और लव का यहाँ राज्य कतर्निया वन्यजीव अभयारण्य यहाँ शान पर्यटकों को लुभाता है यहाँ का सुंदर दृश्य ब्रह्मा जी का रचा हुआ ऋषियों का स्थल जप तप और साधना को सुंदर बसा स्थान पांडव कालीन सिद्धनाथ मंदिर यहाँ बीच पांडव को जब वनवास बह...