तुझ बिन
आकाश प्रजापति
मोडासा, अरवल्ली (गुजरात)
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तुझ बिन मैंने कैसी ये प्रीत लगाई रे
राधे-राधे नाम जपते तेरी याद आई रे
तुझ बिन कैसी प्रीत लगाई रे
प्रेम की अभिभाषा तुझ से ही तो मुझे समझाई रे
जीवन की नई दिशा तुझ से ही तो पाई रे
तुझ बिन कैसी ये प्रीत लगाई रे
राधा रानी भी तो कृष्ण को न मिल पाई रे
फिर भी एक दूजे के हमराही रे
तुझ बिन मैंने ये कैसी प्रीत लगाई रे
राम सीता जैसी हमारी जोड़ी मिल आई रे
जनम जनम के प्रेम के हम साथी रे
तुझ बिन मैंने कैसी प्रीत लगाई रे
किया तुझ से जब से मैंने प्रेम रे
हुआ मैं तो इस दुनियां से मुक्त रे
तुझ बिन मैंने कैसी प्रीत लगाई रे
पास होकर भी हम एक दूजे से क्यों दूर रे
जीवन भर साथ का है फिर भी क्यों मोह रे
तुझ बिन मैं कैसे प्रीत लगाऊं रे
तू ही मेरा जीवन है तू ही काया रे
सदेव तुझ से ही प्रेम करूंगा तू ही मेरी छाया रे
तुझ से ही...
























